मोदी सरकार के ‘अमृतकाल’ में आर्थिक-सामाजिक असमानता की लगातार गहराती खाई
प्रियम्वदा
मोदी सरकार के “सबका साथ, सबका विकास” और “अच्छे दिन” के वायदों की सच्चाई आम जनता के सामने हर बीतते साल के साथ उजागर होती गयी है। जहाँ एक तरफ़ लोगों के बुरे दिन शुरू हुए तो वहीं दूसरी तरफ़ देश के अमीरों, पूँजीपतियों की तरक्की कोविड जैसी आपदा में भी दिन दोगुनी रात चौगुनी रफ़्तार से बढ़ी। इस स्थिति को अब तो ख़ुद मोदी सरकार ने मौजूदा संसद सत्र में तथ्यों के साथ प्रमाणित कर दिया है। कांग्रेस के एक सांसद मुरारी लाल मीणा के सवाल का जवाब देते हुए सरकार की तरफ़ से वित्त राज्यमंत्री पंकज चौधरी ने बताया की भाजपा के शासनकाल में अरबपतियों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हुई है। 100 करोड़ रुपये (यानी एक अरब) से ज़्यादा की आय बताने वाले भारतीयों की संख्या 2023-24 में 415 से बढ़कर 2024-25 में 576 हो गयी है।
वर्ष 100 करोड़ या उससे अधिक की सम्पत्ति घोषित करने वाले व्यक्तियों की सँख्या
2021-22 142
2022-23 301
2023-24 284
2024-25 415
2025-26 576
इससे पता चलता है कि इस दौरान देश में अरबपतियों की संख्या में लगभग 40% की बढ़ोतरी हुई है। हालाँकि यह आँकड़ा उन घोषित सम्पत्ति के ब्यौरों पर आधारित है जिसमें अरबपतियों ने अपनी दौलत को सरकार के सामने खुला किया है। इस बात में कोई शक़ नहीं कि एक आबादी ऐसी भी है जिसकी सम्पत्ति अघोषित है और वह भी अरबपतियों की इस फ़ेहरिस्त में शामिल है।
विपक्षी पार्टी के सांसद द्वारा यह पूछने पर कि क्या सरकार के पास भारतीय अरबपतियों की अनुमानित कुल सम्पत्ति और पिछले पाँच वर्षों में इस सम्पत्ति में हुई बढ़ोतरी के बारे में कोई डेटा है, भाजपा सरकार के प्रतिनिधि ने बताया कि वेल्थ टैक्स एक्ट, 1957 को अप्रैल 2016 में ही ख़त्म कर दिया गया था और इसलिए सरकार टैक्स देने वालों की कुल सम्पत्ति का हिसाब नहीं रखती है! यानी, जो अपनी सम्पत्ति स्वघोषित करेगा वही सरकार की सूची में शामिल होगा। वैसे इस हिसाब से भी देखें तो अरबपतियों की संख्या में काफ़ी बढ़ोतरी हुई है मगर सवाल यह है की सरकार ख़ुद क्यों इन अमीरों, पूँजीपतियों की दौलत का कोई हिसाब नहीं लेती? जब सम्पत्ति का सही ब्यौरा ही नहीं होगा तो हम इस बात की उम्मीद कैसे कर सकते हैं कि इन धनिकों द्वारा किये जा रहे टैक्स का भुगतान भी सही होगा? असल बात यह है कि भाजपा सरकार ने देश के अमीरों, थैलीशाहों, पूँजीपतियों को हर तरह के बन्धन से मुक्त कर दिया है। उनके लिए प्राकृतिक संसाधनों पर क़ब्ज़ा करना आसान हो गया है, श्रमशक्ति की लूट को नये लेबर कोड्स के ज़रिये क़ानूनी जामा पहनाकर उन्हें शोषण की खुली और आधिकारिक छूट मिल गयी है और साथ में सम्पत्ति की क़ानूनी रूप से घोषणा करने की भी कोई बाध्यता बची नहीं है!
भाजपा सरकार के गुलाबी आँकड़े और ज़मीनी हक़ीक़त
बढ़ती आर्थिक असमानता, ग़रीबी, बेरोज़गारी पर सरकार की ओर से सवाल का जवाब देते हुए पंकज चौधरी ने कहा कि असमानता और ग़रीबी में कमी आयी है और रोज़गार की स्थिति बेहतर हुई है। उन्होंने कहा कि हालिया ‘हाउसहोल्ड कंज़म्पशन एक्सपेंडिचर सर्वे’ (HCES) 2023-24 से पता चलता है कि ‘गिनी गुणांक’ (Gini Coefficient – आय असमानता को मापने का एक पैमाना) ग्रामीण इलाक़ों में 0.266 से घटकर 0.237 और शहरी इलाक़ों में 0.314 से घटकर 0.284 हो गया है। चौधरी ने कहा कि इससे पता चलता है कि गाँव में और शहरों में आय असमानता कम हो रही है। उन्होंने ‘पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे’ (PLFS) का भी ज़िक्र किया और बताया कि लेबर मार्केट महामारी से पहले के स्तर से बेहतर स्थिति में है और 15 साल व उससे ज़्यादा उम्र के लोगों के लिए बेरोज़गारी दर 2022 में 3.6% थी जो घटकर 2025 में 3.1% हो गयी है। भाजपा सरकार द्वारा जारी इन गुलाबी आँकड़ों की पड़ताल करें तो यह देश की असल तस्वीर से कहीं मेल नहीं खाते हैं। दुनिया के नामचीन अर्थशास्त्रियों द्वारा जारी ‘वर्ल्ड इनइक्वालिटी रिपोर्ट 2026’ (World inequality Report 2026) के तथ्यों को ही देखें तो यह एक हद तक भारत की बदहाल छवि को व्यक्त करने में सफल है। इस रिपोर्ट के मुताबिक़ जहाँ एक तरफ़ भारत में आमदनी में असमानता बहुत ज़्यादा है, वहीं दूसरी तरफ़ दौलत में असमानता तो और भी अधिक है। सबसे ज़्यादा आमदनी वाले 10% लोग देश की कुल आमदनी का लगभग 58% हिस्सा हासिल करते हैं, जबकि सबसे कम आमदनी वाले 50% लोगों को सिर्फ़ 15% हिस्सा मिलता है। सम्पत्ति के मामले में, देश की 65% सम्पत्ति सबसे अमीर 10% लोगों के पास है। सबसे अमीर 1% के पास लगभग 40% दौलत इक्कठा है। यह रिपोर्ट बताती है कि भारत दुनिया के सबसे ज़्यादा असमानता वाले देशों में से एक है और पिछले कुछ सालों में यह खाई और भी गहरी हुई है।
कुछ और आँकड़ों को देखें तो यह भाजपा सरकार के दावों के उलट तस्वीर पेश करती है। ‘ग्लोबल हंगर इण्डेक्स 2025’ के अनुसार भारत 123 देशों की सूची में 102वें स्थान पर आता है जिससे यह साफ़ है कि भारत में भुखमरी काफ़ी गम्भीर और चिन्ताजनक स्तर पर है। रोज़गार की स्थिति को देखें तो सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) के हालिया ‘पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे’ (PLFS) के अनुसार, जनवरी-मार्च 2026 में 15-29 साल के युवाओं में बेरोज़गारी दर बढ़कर 15% हो गयी। अक्टूबर-दिसम्बर 2025 में यह आँकड़ा 14.3% था। ‘फाइनेंशियल एक्सप्रेस’ ने PLFS डेटा का हवाला देते हुए बताया कि युवा महिलाओं में बेरोजगारी पिछली तिमाही के 16.6% से बढ़कर 17.7% हो गयी। स्वास्थ्य सुविधाओं के हालात देखें तो ‘नेशनल हेल्थ अकाउण्ट्स’ की रिपोर्ट के अनुसार चिकित्सा 50% तक महँगी हो चुकी है। 2014-15 में जहाँ प्रति व्यक्ति स्वास्थ्य पर होने वाला ख़र्च ₹4,839 था, वह 2024 तक बढ़कर अनुमानित 10,000 रुपये तक पहुँच गया है। 2026 में यह ख़र्च आगे ही बढ़ा है। एक रिपोर्ट के अनुसार हमारे देश में सालाना 6 करोड़ 30 लाख लोग यानी लगभग हर सेकण्ड में दो लोग दवा-इलाज पर बढ़ते ख़र्च के कारण बदहाली के अँधेरे में धकेल दिये जाते हैं। ‘नेशनल फ़ैमिली हेल्थ सर्वे’ और एनएसएसओ के आँकड़े बताते हैं कि भारत में 70% से अधिक मेहनतकश परिवार न्यूनतम पौष्टिक आहार (जैसे दाल, सब्ज़ियाँ, फल, मांस-मछली) ख़रीद पाने में असमर्थ हैं। ग़ैर-बराबरी का आलम यह है कि हमारे देश में बड़ी कम्पनियों के सीईओ जितना एक साल में कमाते हैं उतना किसी दिहाड़ी मज़दूर को कमाने में 900 से अधिक साल लग जायेंगे। भारत में मज़दूरों, मेहनतकशों की स्थिति भाजपा सरकार के आँकड़ों से भी ग़ायब है।
सरकारी तथ्य जब इस बात को स्पष्ट करते हैं कि देश में अरबपतियों की संख्या बढ़ रही है, मुट्ठीभर लोगों के हाथ में समस्त सम्पत्ति-सम्पदा इकट्ठी होती जा रही है तो इसका दूसरा कड़वा पहलू यह है कि एक बड़ी आबादी को बदहाली, मुफ़लिसी और मौत के कगार पर धकेला भी जा रहा है। मोदी सरकार द्वारा लाये गये ‘अमृतकाल’ में इस गहराती आर्थिक-सामाजिक असमानता में भारत ने बिना शक बेहतर प्रदर्शन किया है! यह पिछले 12 सालों में भाजपा सरकार की पूँजीपरस्त नीतियों और पूँजीपति वर्ग की सेवा में न्योछावर होने की देन है। ‘अच्छे दिन’ का नारा देश के पूँजीपतियों, धन्नासेठों के लिए था, तो वहीं ‘सबका साथ, सबका विकास’ से अर्थ सभी अमीरों, करोड़पतियों का साथ और उनके विकास से था। हालाँकि, यह पूँजीवादी विकास की नैसर्गिक गति है कि एक तरफ़ तो सुख-समृद्धि और विलासिता की मीनारें खड़ी होती हैं, तो दूसरी तरफ़ ग़रीबी, भूखमरी, अभाव और बेबसी का गहरा कुआँ खोदा जा रहा होता है, जिसे मौजूदा फ़ासीवादी हुकूमत ने तेज़ी से अंजाम दिया है। बढ़ती आर्थिक असमानता यानी अमीरी-ग़रीबी के बीच की लगातार चौड़ी और गहरी होती खाई फ़ासीवादी ताक़तों और इस मानवद्रोही पूँजीवादी व्यवस्था के अन्त को और क़रीब लाती जा रही है।
मज़दूर बिगुल, अगस्त 2026














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