नोएडा मज़दूर आन्दोलन के मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने आकृति चौधरी पर लगे एनएसए को किया रद्द!
योगी सरकार व यूपी पुलिस के आरोपों को मनगढ़न्त बता डीएम मेधा रूपम पर लगाया ₹ 5 लाख का जुर्माना!
सर्वोच्च न्यायालय ने ज्ञानेश कुमार पुत्री को दी राहत, जुर्माने के आदेश पर लगायी रोक!
सुनवाई की प्रक्रिया गम्भीर सवालों के घेरे में!

बिगुल संवाददाता

नोएडा मज़दूर आन्दोलन मामले में दो कार्यकर्ताओं (सत्यम वर्मा व आकृति चौधरी) पर लगाये गये एनएसए में से एक की सुनवाई करते हुए इलाहाबाद उच्च न्यायालय की जस्टिस अतुल श्रीधरन व जस्टिस अचल सचदेव की खण्डपीठ ने 3 सितम्बर को न सिर्फ़ एनएसए रद्द करने का फ़ैसला सुनाया बल्कि यूपी पुलिस की पूरी कहानी और जाँच को मनगढ़न्त बताया। इसके साथ ही, झूठे आरोपों के तहत एक छात्रा को एनएसए जैसे आपवादिक क़ानून में जेल भेजने वाले अधिकारियों पर 5 लाख का जुर्माना भी लगाया, जिसमें केचुआ आयुक्त ज्ञानेश कुमार की पुत्री ज़िला मैजिस्ट्रेट मेधा रूपम प्रमुख है। हालाँकि, इलाहाबाद उच्च न्यायालय के इस फ़ैसले को नोएडा की डीएम और उत्तरप्रदेश सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी।

23 सितम्बर को सुप्रीम कोर्ट में इस याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस सतीश चन्द्र शर्मा और जस्टिस एन के सिंह की पीठ ने अन्तरिम राहत के तौर पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा डीएम मेधा रूपम के ऊपर जुर्माने के आदेश व गम्भीर आलोचनात्मक टिप्पणियों पर रोक लगा दी और बाक़ी मसले पर सुनवाई के लिए अगली तारीख़ मुकर्रर कर दी। सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने जुर्माने के फ़ैसले को रद्द करने के पीछे उत्तरप्रदेश सरकार व ज्ञानेश कुमार पुत्री के वकील मुकुल रोहतगी और तुषार मेहता के तर्क से सहमति जतायी कि एनएसए लगाने का फ़ैसला सिर्फ़ जिलाधिकारी का नहीं होता है, कई स्तरों पर होने वाली जाँच और रिपोर्टों के आधार पर ज़िलाधिकारी अपनी अनुशंसा देती है जो कि इस पूरी प्रक्रिया कि एक कड़ी मात्र है इसलिए उनपर जुर्माना लगाया जाना न्यायोचित नहीं होगा!

यूँ तो इलाहाबाद उच्च न्यायालय के जस्टिस श्रीधरन व जस्टिस सचदेव ने अपने आदेश में यह साफ़-साफ़ कहा था कि फ़र्ज़ी तरीक़े से एनएसए लगाये जाने के मामले में ज़िम्मेदार सभी अधिकारियों यानी थाने के एसएचओ से लेकर डीएम तक से हर्जाने की राशि वसूली जानी चाहिए मगर इस पूरे आदेश को डीएम मेधा रूपम तक सीमित करके एक बचकाने तर्क के आधार पर उच्च न्यायालय के जुर्माने सम्बन्धी फ़ैसले को रद्द कर दिया गया। सर्वोच्च न्यायालय के उपरोक्त तर्क के मुताबिक़ ऐसे तमाम मामलों में कभी किसी अधिकारी को ज़िम्मेदार ठहराया ही नहीं जा सकेगा और ऐसे मनगढ़न्त और झूठे मामलों में बेगुनाह लोगों को फँसाने वाले अधिकारियों की जवाबदेही भी नहीं तय की जा सकेगी। सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले पर कई वकीलों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, पत्रकारों आदि ने गम्भीर सवाल उठाते हुए कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि देश का सर्वोच्य्य न्यायालय न्याय और क़ानून के उसूलों की रक्षा से अधिक कुछ विशेष अधिकारियों और सत्ता में बैठे लोगों के हितों की रक्षा में लगा है। ऐसा इसलिए क्योंकि न सिर्फ़ उच्चतम न्यायालय का तर्क इस मामले में बेहद विवादास्पद था बल्कि इससे भी बढ़कर कोर्ट की पूरी सुनवाई की प्रक्रिया ही अपारदर्शी और सन्देहयुक्त थी।

क़ानूनी मसले पर रिपोर्टिंग करने वाले कुछ बेहद महत्वपूर्ण न्यूज़ चैनल्स, ऑनलाइन पोर्टल्स व सर्वोच्च न्यायालय के कई वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने न्यायालय द्वारा सुनवाई की प्रक्रिया के दौरान सुनवाई में ऑनलाइन शामिल लोगों के लिए माइक बन्द करवाने को कोर्ट की आपत्तिजनक कार्रवाई बतायी है। माइक बन्द करने का आदेश जस्टिस सतीश चन्द्र शर्मा ने दिया था। लोगों ने पूछा है कि जस्टिस शर्मा द्वारा वीडियो-कॉन्फ्रेंसिंग के दौरान ऑडियो म्यूट करने के निर्देश के पीछे क्या कारण हो सकते हैं? न्यायालय की सार्वजनिक सुनवाई की प्रक्रिया से वकीलों और पत्रकारों को क्यों वंचित किया जा रहा है? कोर्ट में पहले ही पत्रकारों को भौतिक रूप से मौजूद रहने की अनुमति नहीं थी और बाद में वीडियो-कॉन्फ्रेंसिंग का ऑडियो भी बन्द कर देना कोर्ट की मंशा पर गहरे सवाल उठाता है।

इसके साथ ही कोर्ट में नोएडा मज़दूर आन्दोलन से जुड़े इस मामले की लिस्टिंग भी सर्वोच्च न्यायालय में बेहद असामान्य तरीक़े से हुई। ‘लाइव लॉ’ पोर्टल के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय में मेधा रूपम और यूपी सरकार द्वारा इलाहाबाद हाईकोर्ट के फ़ैसले को रद्द करने की माँग करते हुए लगायी गयी स्पेशल लीव पेटीशन की लिस्टिंग भी अदालत की कार्रवाई पर सन्देह पैदा करती है। रिपोर्ट के मुताबिक़ नोएडा प्रदर्शन से जुड़े मसले व अन्य Habeas Corpus और Preventive Detention के मामले सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस नागरत्ना की वरिष्ठ पीठ के समक्ष सूचीबद्ध होते हैं, तो ऐसे में ज़िलाधिकारी और उत्तर प्रदेश सरकार की याचिकाएँ जस्टिस शर्मा की निचली पीठ के सामने कैसे सूचीबद्ध हुईं? 13 जुलाई 2026 के सुप्रीम कोर्ट रोस्टर के अनुसार, हेबियस कॉर्पस और प्रीवेण्टिव डिटेन्शन (कैटेगरी 2201-2202) से जुड़े मामले वरिष्ठता क्रम में शुरुआती चार पीठों को सौंपे गये हैं। इनमें चीफ़ जस्टिस सूर्यकान्त, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस बी॰वी॰ नागरत्ना और जस्टिस एमएम सुन्दरेश की अध्यक्षता वाली न्यायिक पीठें शामिल हैं। रिपोर्ट के अनुसार, नोएडा मजदूर प्रदर्शन से जुड़े अन्य मामलों की सुनवाई पहले से जस्टिस बी॰वी॰  नागरत्ना की अध्यक्षता वाली पीठ कर रही है और वे सभी मामले सुप्रीम कोर्ट में पहले से लम्बित हैं। आदित्य आनन्द और रूपेश रॉय के साथ हिरासत में हुई पुलिसिया बर्बरता का मामला हो या फिर योगेश मीणा की गिरफ़्तारी को चुनौती देते हुए लगायी गयी याचिका हो, ये सभी याचिकाएँ जस्टिस नागरत्ना की पीठ के समक्ष अभी लम्बित है। इन याचिकाओं को भी कैटेगरी 2202 के तहत दिखाया गया है परन्तु यह कैटेगरी जस्टिस शर्मा के नियमित रोस्टर में मौजूद ही नहीं है। आमतौर पर एक ही मामले से जुड़ी याचिकाओं की न्यायिक पीठ में कोई तब्दीली नहीं होती है और इसमें किसी भी तरह के बदलाव की प्रशासनिक शक्ति चीफ़ जस्टिस के पास होती है। इसलिए, सर्वोच्च न्यायालय में मुख्य चुनाव आयुक्त की सुपुत्री मेधा रूपम की सज़ा को माफ़ करने के लिये सुनवाई में हुई यह हेराफेरी फ़ैसले की निष्पक्षता को ही कटघरे में ला खड़ा करती है।

इसके अलावा ‘लाइव लॉ’ ने एक अन्य रिपोर्ट में मेधा रूपम, जो केचुआ आयुक्त ज्ञानेश कुमार की पुत्री है, व चुनाव आयोग से सम्बन्धित मामलों की सुनवाई के लिए जस्टिस सतीश चन्द्र शर्मा के सम्बन्ध में न्यायिक औचित्य व उपयुक्तता पर भी सवाल खड़े किये। जस्टिस शर्मा के पुत्र चुनाव आयोग के स्टैंडिंग काउंसिल (वकील) हैं! क्या इस बात को और अधिक समझने की आवश्यकता है? क़ायदे से तो जस्टिस शर्मा को खुद इन सुनवाइयों से अपने आप को अलग कर लेना चाहिए था क्योंकि स्पष्ट तौर पर यहाँ हितों का टकराव है। लेकिन वह ऐसा नहीं करते हैं। उल्टे, सुनवाई के दौरान माइक बन्द करवा देते हैं, केचुआ पुत्री पर लगा जुर्माना माफ़ कर देते है, अदालती कार्यवाई के दौरान केचुआ पुत्री के समर्थन में टिप्पणियाँ करते हैं! इस पूरे मामले पर ‘लॉयर्स असोशिएशन फॉर कोन्स्टिट्यूशन’ नामक अधिवक्ता मंच ने एक बयान जारी करते हुए अदालत के हालिया फैसले को वापस लिए जाने की माँग की और पूरी प्रक्रिया की कड़ी निन्दा की।

मौजूदा फ़ासीवादी दौर में पूँजीवादी न्यायतंत्र दिन-ब-दिन बेपर्द होता जा रहा है। भाजपा सरकार ने पिछले 12 सालों में न्यायपालिका से लेकर तमाम पूँजीवादी लोकतान्त्रिक संस्थाओं व प्रक्रियाओं पर आन्तरिक क़ब्ज़े के ज़रिये उन्हें अन्दर से खोखला करने का काम किया है, उनकी बचे-खुचे जनवादी अन्तर्वस्तु को भी धीरे-धीरे एक लम्बी प्रक्रिया में कुतरने और क्षीण करने का काम किया है। मज़दूरों-मेहनतकशों और आम जनता के  पक्ष में आपवादिक तौर पर अदालत के फ़ैसले आते हैं। एनएसए को रद्द करने और ज़िम्मेदार अधिकारियों पर जुर्माना लगाने का इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फैसला उन्हीं चन्द आपवादिक फ़ैसलों में से एक था।

मालूम हो कि इस साल के अप्रैल माह में नोएडा के मज़दूर वेतन बढ़ोत्तरी और बेहतर कार्यस्थितियों को लेकर स्वतःस्फूर्त तरीक़े से आन्दोलनरत थे। जिसके बाद राज्य सरकार ने मज़दूरों के आन्दोलन पर तथाकथित हिंसा भड़काने के आरोप में दमनात्मक कार्रवाई करते हुए सैकड़ों मज़दूरों व सामाजिक कार्यकर्ताओं को गिरफ़्तार कर लिया। यूपी पुलिस ने गिरफ़्तार लोगों पर हिंसा भड़काने के साथ-साथ भड़काऊ भाषण देने और “साज़िश रचने” का भी आरोप लगाया। 11 अलग-अलग एफ़आईआर के अलावा दो कार्यकर्ताओं पर एनएसए जैसा दमनकारी आपवादिक  क़ानून भी थोप दिया गया। इसमें से ही एक, आकृति चौधरी के एनएसए मामले की सुनवाई करते हुए बीते 3 सितम्बर को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपना फ़ैसला सुनाया। ‘स्टेट ऑफ उत्तर प्रदेश वर्सेज़ आकृति चौधरी’ मामले की सुनवाई करते हुए उच्च न्यायालय के जस्टिस श्रीधरन और अचल सचदेव की पीठ ने न सिर्फ़ एनएसए को रद्द किया बल्कि यूपी पुलिस की पूरी कहानी को मनगढ़न्त और हास्यास्पद बताया।

अदालत के इस फ़ैसले ने उत्तर प्रदेश में योगीराज की हक़ीक़त को एक बार फिर सबके सामने ला खड़ा किया है। एक बार फिर यह साबित हो गया कि मालिकों की सेवा में नतमस्तक फ़ासीवादी योगी सरकार मज़दूरों के आन्दोलन को कुचलने के लिये किसी भी हद तक जा सकती है। सत्यम वर्मा और आकृति चौधरी, जो मज़दूरों की न्यायसंगत व संवैधानिक माँगों का समर्थन कर रहें थे (जिन माँगों को उत्तर प्रदेश पुलिस ने अनुचित ठहराया था!), उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा के लिये ख़तरा बता दिया गया और उनकी गिरफ़्तारी के तक़रीबन एक महीने बाद जब कि वे जेल में ही थे और अपनी ज़मानत के लिये निचली अदालतों में याचिका लगा रहे थे, उनके ऊपर एनएसए लगा दिया गया। निचली अदालतों में सुनवाई के दौरान यूपी पुलिस ने गिरफ़्तार कार्यकर्ताओं की तथाकथित हिंसा में भागीदारी को लेकर कोई पुख़्ता सबूत जमा नहीं किये थे और इस बात की पूरी सम्भावना थी कि उन्हें ज़मानत पर रिहा कर दिया जाता। मगर इस सम्भावना को ख़त्म करने के लिये पुलिस ने अपनी मनगढ़न्त कहानी को आधार बनाते हुए एनएसए का इस्तेमाल किया।

सत्यम वर्मा जो एक प्रसिद्ध जन बुद्धिजीवी, लेखक, वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता व ‘जनचेतना’ प्रगतिशील पुस्तक संस्थान से जुड़े रहें हैं और आकृति चौधरी  ‘दिशा छात्र संगठन’, ‘प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट्स लीग’ से जुड़ी दिल्ली विश्वविद्यालय की होनहार छात्रा और कलाकार है, उन्हें प्रिवेण्टिव डिटेंशन के तहत 12 मई को हिरासत में लिया गया। आकृति चौधरी और सत्यम वर्मा के ऊपर लगाये गये फ़र्ज़ी एनएसए और इस मामले में गिरफ़्तार तमाम सामाजिक कार्यकर्ताओं को फँसाने के लिए यूपी पुलिस ने जो तीन-तिकड़म किये थे उसकी असलियत एक-एक करके लोगों के सामने खुल रही थी। ग़ैर-क़ानूनी गिरफ़्तारी से लेकर झूठे आरोप और फिर उसे साबित करने के लिए पुलिस हिरासत के दौरान हिंसा करने से लेकर सबूत गढ़ने के कई साक्ष्य जनता के सामने आ चुके थे। इसमें अब शायद ही किसी को कोई शक़ बचा हो कि नोएडा मज़दूर आन्दोलन में यूपी पुलिस ने ‘एजेण्ट प्रोवोकेटियर’ की भूमिका निभायी है और खुद साज़िश रची है। असली नोएडा कन्स्पिरेसी केस यह है!

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने भी नोएडा मज़दूर आन्दोलन में उत्तरप्रदेश पुलिस और कार्यपालिका के जनविरोधी रवैये पर टीका की। जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की न्यायिक पीठ ने अपने फ़ैसले में कहा कि “आकृति चौधरी के ऊपर एनएसए जैसा गम्भीर क़ानून लगाने के पीछे पुलिस ने कोई पर्याप्त आधार पेश नहीं किया। पुलिस को बार-बार मौक़ा दिया गया मगर आकृति चौधरी के हिंसा में संलग्न होने या उनसे होने वाली “राष्ट्रीय सुरक्षा को ख़तरे” के मद्देनज़र कोई भी ठोस साक्ष्य अदालत के सामने नहीं लाया गया। इसके उलट राज्य द्वारा जो वीडियो और फ़ोटो पेश किये गये उनमें ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे यह साबित होता हो कि याचिकाकर्ता किसी भी हिंसक गतिविधि में शामिल थी। उन वीडियो और तस्वीरों में यह दिख रहा है कि मज़दूर अपने संवैधानिक अधिकारों का उपयोग करते हुए प्रदर्शन कर रहें हैं। मज़दूरी में बढ़ोत्तरी, 8 घण्टे काम और बेहतर कार्यस्थितियों की माँग बेहद बुनियादी और जायज़ माँग है।”

इसके साथ ही न्यायाधीशों की बेंच ने यह स्पष्ट किया कि पुलिस की पूरी चार्जशीट आरोपों से भरी हुई है और कई विरोधाभासी तथ्य इस ओर इशारा करते हैं कि एनएसए के तहत की गयी गिरफ़्तारी याचिकाकर्ता को उदाहरण बनाकर दण्डित करने की मंशा से की गयी है ताकि आगे कोई मज़दूरों के समर्थन में आवाज़ उठाने से पहले डरे। पुलिस द्वारा बतायी गयी गिरफ़्तारी की तारीख़ और समय में भी विसंगतियाँ हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि गिरफ़्तारी क़ानूनी प्रक्रिया का पालन करते हुए नहीं की गयी और याचिकाकर्ता को गिरफ़्तार करने के पश्चात उसे नोटिस जारी किया गया जो पुलिसिया कार्रवाई के ग़ैर-क़ानूनी चरित्र को दिखलाता है।

जस्टिस अतुल श्रीधरन व जस्टिस अचल सचदेव ने अपने फैसले में यह भी कहा कि “एनएसए के तहत हिरासत में रखना एक अपवाद है। किसी व्यक्ति को बेल मिलने की सूरत में, राज्य द्वारा उसे मनगढ़न्त कहानी के आधार पर क़ैद में रखना कोई विकल्प नहीं हो सकता। ज़िला अधिकारी द्वारा बताये गये हिरासत के आधार दोहरावपूर्ण, काल्पनिक और केवल दावों पर आधारित हैं जिसे साबित करने के लिए साक्ष्यों का कोई हवाला नहीं दिया गया है। हिरासत का आधार आरोपों और राय से परे होना चाहिए। ज़िलाधिकारी के दिमाग़ में उठने वाली उनकी आत्मगत राय के पीछे सन्दर्भ और ठोस प्रमाण पेश किये जाने चाहिए अन्यथा यह मनमानापन होगा। ऐसे असाधारण अधिकारों का प्रयोग, जो संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत किसी व्यक्ति के मूलभूत अधिकारों का सीधा उल्लंघन करता है, वह अनुमानों, पूर्वाग्रहों, अटकलों और राय के आधार पर हल्के में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।”

अदालत ने अपने फैसले में एक बार फ़िर यह स्पष्ट किया कि “पुलिस को यह समझना चाहिए कि उनकी निष्ठा राजनीतिक पार्टियों के प्रति नहीं, बल्कि संविधान के प्रति है और उनकी ईमानदारी तथा निष्पक्षता उन लोगों के प्रति है, जिनकी वे सेवा करते हैं। उन्हें यह भूलना नहीं चाहिए कि वे जनता के सेवक हैं और जनता की सेवा करना उनका कार्य हैं….” साथ ही, अदालत ने इस मामले में एनएसए के आदेश को पारित करने वाली गौतमबुद्ध नगर की ज़िलाधिकारी यानी मेधा रूपम के आचरण को निन्दनीय बताया और एनएसए के मनमाने इस्तेमाल के लिए 5 लाख रुपए का जुर्माना/मुआवज़ा भी याचिकाकर्ता को देने का आदेश दिया। हालाँकि, उन्होंने यह जुर्माना इस मामले में सम्बन्धित तमाम अधिकारियों यानी पुलिस थाने के एसएचओ से लेकर ज़िलाधिकारी तक के वेतन से वसूलने की बात कही। इलाहाबाद उच्च न्यायालय का यह फ़ैसला उत्तर प्रदेश में जारी पुलिसिया दमनतंत्र की सच्चाई को सामने लाता है। यह कोई अकेला फ़ैसला नहीं है, इससे पहले भी आम नागरिकों के साथ यूपी पुलिस की बर्बरता पर कई सख़्त आदेश न्यायालयों के द्वारा जारी किये गये हैं।

राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून जैसे दमनकारी क़ानून के चरित्र और इसके इस्तेमाल को लेकर पहले भी सवाल खड़े होते रहें हैं और भाजपा सरकार के राज में तो यह नंगे तौर पर दमन के औज़ार के रूप में सामने आया है। नोएडा मज़दूर आन्दोलन के मामले में आकृति चौधरी पर लगाये गये एनएसए को रद्द करते हुए दिया गया इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फ़ैसला एक बार फिर यह साबित करता है कि राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून का एकमात्र लक्ष्य इस मसले में भी यही था कि गिरफ़्तार कार्यकर्ताओं की रिहाई को अधिकतम सम्भव समय के लिए मुश्किल बना दिया जाये और  सुनवाई की प्रक्रिया को ही सज़ा में तब्दील कर दिया जाये। सत्यम वर्मा के ऊपर लगे रासुका को चुनौती देते हुए एक याचिका इलाहाबाद उच्च न्यायालय में लम्बित है।

कई मीडिया रपटों और अतीत में की गयी न्यायाधीशों की टिप्पणी को देखें तो इस बात में कोई दोराय नहीं है कि एनएसए जैसे काले क़ानून को अलग-अलग सरकारें और आज फ़ासीवादी मोदी सरकार और उसकी पुलिस लोगों को डराने, चुप कराने और फ़र्ज़ी तरीक़े से जेल भेजने के लिए कर रहीं है। आर्टिक्ल 14 नामक वेब पोर्टल की एक रिपोर्ट के अनुसार उत्तरप्रदेश सरकार एनएसए के इस्तेमाल में सबसे आगे है। 2017 से लेकर अबतक अधिकांशतः इसका इस्तेमाल प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ हुआ है या किसी भी रूप में सरकार की आलोचना करने वालों के ख़िलाफ़। दिसम्बर 2019 में सीएए और एनआरसी के काले क़ानून के विरुद्ध हुए विरोध प्रदर्शनों के ख़त्म होने के तुरन्त बाद मऊ ज़िले में स्थानीय मुस्लिम युवाओं पर एनएसए (राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून) लगाया गया, 2020 में कोविड लॉकडाउन के दौरान बरेली में समाजवादी पार्टी के एक कार्यकर्ता सहित कई लोगों पर एनएसए के तहत मामला दर्ज किया गया (जबकि दोनों ही मसलों में कथित हिंसा या पुलिसिया आरोप को साबित करने के लिये कोई वीडियो या फ़ोटो सबूत नहीं था), 2022 में कानपुर में तत्कालीन बीजेपी प्रवक्ता नूपुर शर्मा की मुस्लिम-विरोधी टिप्पणी के बाद हुए विरोध प्रदर्शनों को दबाने के लिए भी इस दमनकारी क़ानून का इस्तेमाल किया गया और एक मुस्लिम एक्टिविस्ट हयात ज़फ़र हाशमी को एनएसए के तहत गिरफ़्तार कर लिया गया। डाक्टर कफ़ील ख़ान पर भी ‘भड़काऊ भाषण’ देने का आरोप लगाकर उन्हें रासुका के तहत नौ महीने जेल में रखा गया। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के अधिवक्ताओं ने बताया कि, ” पिछले कुछ सालों में यह देखा जा रहा है कि उत्तर प्रदेश सरकार की नीतियों के ख़िलाफ़ बोलने वालों पर या तो रासुका लगा दिया जाता है या फ़िर एनकाउण्टर जैसे न्यायेतर तरीक़ों का इस्तेमाल आम बनता जा रहा है।”

‘आर्टिकल 14’ ने अपने शोध में यह भी पाया कि 2010 से 2019 के बीच इलाहाबाद हाईकोर्ट में सुने गये 101 रासुका मामलों की जाँच में  आमतौर पर, हिरासत में लिए गये लोग—चाहे वे निर्दोष हों या नहीं—अपनी याचिकाओं के अन्तिम निपटारे से पहले राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (एनएसए) 1980 के तहत अपनी अधिकतम हिरासत अवधि का लगभग 76% हिस्सा जेल में बिताते थे। लगभग 79 प्रतिशत मामलों में एनएसए को न्यायालय द्वारा ख़ारिज किया गया है, यह आँकड़ा इस क़ानून के इस्तेमाल के पीछे की मंशा को दिखलाता है।

दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहलाने वाला भारत उन चन्देक देशों में से है जहाँ का संविधान ‘प्रिवेण्टिव डिटेंशन’ के क़ानून की इजाज़त देता है, जिसके तहत केवल सरकार या पुलिस प्रशासन के अधिकारियों के ‘मनोगत तौर पर सन्तुष्ट’ होने के आधार पर किसी को भी बिना किसी सबूत या ट्रायल के अधिकतम 12 माह तक जेल में रखा जा सकता है। 1980 में इस क़ानून के बनने के पहले 1977 तक ऐसा ही एक दूसरा क़ानून ‘मीसा’ 1971 से प्रभाव में था। उसके पहले 1950 में एक प्रिवेण्टिव डिटेंशन क़ानून आया था। 1977 से 1980 तक के तीन वर्ष ही आज़ाद भारतीय गणराज्य में ऐसा दौर हैं, जबकि ऐसा ‘प्रिवेण्टिव डिटेंशन’ का कोई क़ानून मौजूद नहीं था। इसके अलावा, आज़ाद भारत के पूरे इतिहास में आम इंसान की आज़ादी का मख़ौल बनाने वाला कोई न कोई ऐसा क़ानून मौजूद रहा है।

एनएसए दरअसल अंग्रेज़ों के कुख्यात ‘रोलैट एक्ट’ का ही एक नया संस्करण है। ‘रोलैट एक्ट’ वही दमनकारी क़ानून था जिसके विरोध में जलियाँवाला बाग़ का जुटान हुआ था, जिस पर अन्धाधुन्ध गोलियाँ बरसाकर अंग्रे़ज़ों ने हज़ारों भारतीय लोगों का क़त्ले-आम किया था। आज का राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून भी रोलैट एक्ट के दमनकारी प्रावधानों के सिद्धान्तों पर ही चलता है। इसके अनुसार, अगर किसी पुलिस अधिकारी, डीएम या सरकार को व्यक्तिगत तौर पर यह “आत्मगत सन्तोष” है कि कोई व्यक्ति राष्ट्रीय सुरक्षा या सार्वजनिक क़ानून-व्यवस्था के लिए ख़तरा हो सकता है, तो उसे बिना किसी सबूत या मुक़दमे के जेल में रखा जा सकता है। यह ऐसा क़ानून नहीं है जिसके तहत आपको किसी किये गये अपराध के आधार पर हिरासत में रखा जाये, बल्कि एक ऐसा क़ानून है जो बिना कोई अपराध किये भी आपको जेल पहुँचा सकता है क्योंकि पुलिस या सरकार को यह “लगता है” कि आप अपराध कर सकते हैं! भाजपा सरकार ने इस क़ानून को राजनीतिक विरोध और प्रतिरोध को कुचलने के एक महत्वपूर्ण हथियार के तौर पर बख़ूबी इस्तेमाल किया है। ख़ास तौर पर उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने एनएसए का धड़ल्ले से प्रयोग असहमति की आवाज़ों को दबाने व जनपक्षधर आवाज़ों को ख़त्म करने के मक़सद से किया है।

 

मज़दूर बिगुल, सितम्बर 2026

 

‘मज़दूर बिगुल’ की सदस्‍यता लें!

 

वार्षिक सदस्यता - 125 रुपये

पाँच वर्ष की सदस्यता - 625 रुपये

आजीवन सदस्यता - 3000 रुपये

   
ऑनलाइन भुगतान के अतिरिक्‍त आप सदस्‍यता राशि मनीआर्डर से भी भेज सकते हैं या सीधे बैंक खाते में जमा करा सकते हैं। मनीऑर्डर के लिए पताः मज़दूर बिगुल, द्वारा जनचेतना, डी-68, निरालानगर, लखनऊ-226020 बैंक खाते का विवरणः Mazdoor Bigul खाता संख्याः 0762002109003787, IFSC: PUNB0185400 पंजाब नेशनल बैंक, निशातगंज शाखा, लखनऊ

आर्थिक सहयोग भी करें!

 
प्रिय पाठको, आपको बताने की ज़रूरत नहीं है कि ‘मज़दूर बिगुल’ लगातार आर्थिक समस्या के बीच ही निकालना होता है और इसे जारी रखने के लिए हमें आपके सहयोग की ज़रूरत है। अगर आपको इस अख़बार का प्रकाशन ज़रूरी लगता है तो हम आपसे अपील करेंगे कि आप नीचे दिये गए बटन पर क्लिक करके सदस्‍यता के अतिरिक्‍त आर्थिक सहयोग भी करें।
     

Lenin 1बुर्जुआ अख़बार पूँजी की विशाल राशियों के दम पर चलते हैं। मज़दूरों के अख़बार ख़ुद मज़दूरों द्वारा इकट्ठा किये गये पैसे से चलते हैं।

मज़दूरों के महान नेता लेनिन