Category Archives: बोलते आँकड़े, चीख़ती सच्चाइयाँ
कैसी तरक्की, किसकी तरक्की? हमारे बच्चों को भरपेट खाना तक नसीब नहीं
संयुक्त राष्ट्र के विश्व खाद्य कार्यक्रम की ताज़ा रिपोर्ट में दिये गये आँकड़े तरक्की के तमाम दावों के चीथड़े उड़ाने के लिए काफ़ी हैं। रिपोर्ट के अनुसार दुनिया भर में भूखे पेट सोने वालों में से एक चौथाई भारत में हैं और कुपोषित आबादी का 27 फ़ीसदी यहाँ है। कुपोषित बच्चों के मामले में पूरी दुनिया के 100 कुपोषित बच्चों में से 47 हमारे देश के होते हैं, यह संख्या दुनिया के सबसे पिछड़े क्षेत्र सहारा अफ्रीकी देशों के 28 फ़ीसदी बच्चों से भी कहीं ज़्यादा है! यहाँ के असमय मरने वाले 50 फ़ीसदी बच्चे पौष्टिक खाना न मिल पाने की वजह से मर जाते हैं। वैश्विक भूख सूचकांक में शामिल 119 देशों में से भारत 94वें नम्बर पर पहुँच गया है। भूख और कुपोषण के बारे में होने वाले अधिकांश अध्ययनों में हमारा देश किसी से पीछे नहीं है, बल्कि ग्राफ लगातार ऊपर उठता जा रहा है।
मज़दूरों पर मन्दी की मार: छँटनी, बेरोज़गारी का तेज़ होता सिलसिला
पूँजीवादी व्यवस्था में पूँजीपति वर्ग मुनाफ़े की अन्धी हवस में जिस आर्थिक संकट को पैदा करता है वह इस समय विश्वव्यापी आर्थिक मन्दी के रूप में समूचे संसार को अपने शिकंजे में जकड़ती जा रही है। मन्दी पूँजीवादी व्यवस्था में पहले से ही तबाह-बर्बाद मेहनतकश के जीवन को और अधिक नारकीय तथा असुरक्षित बनाती जा रही है। इस मन्दी ने भी यह दिखा दिया है कि पूँजीवादी जनतन्त्र का असली चरित्र क्या है? पूँजीपतियों की मैनेजिंग कमेटी यानी ‘सरकार’ पूँजीपतियों के लिए कितनी परेशान है यह इसी बात से जाना जा सकता है कि सरकार पूँजीवादी प्रतिष्ठानों को बचाने के लिए आम जनता से टैक्स के रूप में उगाहे गये धन को राहत पैकेज के रूप में देकर एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा रही है। जबकि मेहनतकशों का जीवन मन्दी के कारण बढ़ गये संकट के पहाड़ के बोझ से दबा जा रहा है। परन्तु सरकार को इसकी ज़रा भी चिन्ता नहीं है। दिल्ली के कुछ औद्योगिक क्षेत्रों के कुछ कारख़ानों की बानगी से भी पता चल जायेगा कि मन्दी ने मज़दूरों के जीवन को कितना कठिन बना दिया है।
बोलते आँकड़े चीखती सच्चाइयाँ
बोलते आँकड़े चीखती सच्चाइयाँ
बिगुल पुस्तिका – 14 : बोलते आँकड़े चीखती सच्चाइयाँ
आँकड़ों के ज़रिए निजीकरण-उदारीकरण के दो दशकों के ”विकास“ की असली तस्वीर।
बिगुल पुस्तिका – 13 : चोर, भ्रष्ट और विलासी नेताशाही
अन्तरराष्ट्रीय एजेंसियों और पूँजीवादी अख़बारों की कुछ रिपोर्टों, सूचना के अधिकार के तहत विभिन्न सरकारी महक़मों से हासिल की गयी जानकारियों और आर्थिक-राजनीतिक मामलों के बुर्जुआ विशेषज्ञों की पुस्तकों या लेखों से लिये गये थोड़े से चुनिन्दा तथ्यों और आँकड़ों की रोशनी में भारतीय जनतन्त्र की कुरूप, अश्लील और बर्बर असलियत को पहचानने की एक कोशिश।
आँसुओं के महासागर में समृद्धि के टापू हुए और जगमग
आज देश में एक लाख अरबपति धनकुबेर हैं जो इस देश के करोड़ों मेहनतकश लोगों की हडि्डयाँ और मांस निचोड़ने में लगे हैं । ये अपने महलों में चैन से सो सकें इसके लिए तमाम “जनप्रतिनिधि” संसद और विधान सभाओं में कानून पास कर रहे हैं । छँटनी–तालाबन्दी और तमाम तथाकथित विकास परियोजनाओं के नाम पर करोड़ों लोग अपनी रोज़ी–रोटी, जगह–जमीन से बेदखल किये जा रहे हैं और आवाज़ उठाने पर उन्हें लाठियाँ–गोलियाँ मिल रही हैं । कलिंगनगर, सिंगूर, नन्दीग्राम तो देशी–विदेशी पूँजी की बर्बरता के प्रतीक बन चुके हैं लेकिन तमाम औद्योगिक क्षेत्रों में मज़दूर रोज़–रोज़ जिन बर्बरताओं के शिकार हो रहे हैं उनकी खबरें भी लोगों तक नहीं पहुँचने दी पातीं । मुनाफे और बाजार पर आधारित पूँजीवादी खेती की मार से देश भर में पचास हज़ार से ज्यादा छोटे–मँझोले किसान आत्महत्याएँ कर चुके हैं । अकेले महाराष्ट्र में 1995 के बाद से 32,000 किसान आत्महत्याएँ कर चुके हैं ।
सच्चर कमेटी की रिपोर्ट : मुस्लिम समुदाय की हालत की सच्चाइयाँ और सुधार के नुस्खों का भ्रम
सच्चर कमेटी की रिपोर्ट मुस्लिम आबादी की जिस दोयम दर्जे की स्थिति को सामने लाती है उसका अनुमान चन्द आँकड़ों से लगाया जा सकता है। देश में मुसलमानों की आबादी 13.4 प्रतिशत है लेकिन सरकारी नौकरियों में उनका प्रतिनिधित्व सिर्फ़ 4.9 प्रतिशत है, इसमें भी ज़्यादातर निचले पदों पर हैं। उच्च प्रशासनिक सेवाओं यानी आईएएस, आईएफएस और आईपीएस में मुसलमानों की भागीदारी सिर्फ़ 3.2 प्रतिशत है। रेलवे में केवल 4.5 प्रतिशत मुसलमान कर्मचारी हैं जिनमें 98.7 प्रतिशत निचले पदों पर हैं। पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और असम जहाँ मुस्लिम आबादी क्रमश: 25.2 प्रतिशत, 18.5 प्रतिशत और 30.9 प्रतिशत है, वहाँ सरकारी नौकरियों में मुसलमानों की भागीदारी क्रमश: सिर्फ़ 4.7 प्रतिशत, 7.5 प्रतिशत और 10.9 प्रतिशत है।
बोलते आंकडे़ चीखती सच्चाइयां
देश में सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की खस्ता हाल का अंदाज लगाने के लिए यह तथ्य काफी है कि कुल स्वास्थ्य सेवाओं में सरकारी क्षेत्र का योगदान केवल 18 प्रतिशत है, जबकि 82 प्रतिशत स्वास्थ्य सेवाएं निजी क्षेत्र के दायरे में आती हैं। विश्व बैंक की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार सरकार स्वास्थ्य सेवाओं के लिये जो आर्थिक सहायता देती है उसका केवल 10 प्रतिशत ही गरीबों को मिलता है। बाकी 90 प्रतिशत अमीर हड़प जाते हैं।






















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