Category Archives: बोलते आँकड़े, चीख़ती सच्चाइयाँ

कोरोना से हुई मौतों का सच छिपाने की मोदी सरकार की कोशिश बेनक़ाब!

फ़ासीवादी मोदी सरकार द्वारा देश में कोरोना महामारी से हुई मौतों को छुपाने व मौत के ग़लत आँकड़े पेश करने के बावजूद कई रिपोर्टों से अब यह साबित हो रहा है कि दुनिया में कोरोना महामारी से सबसे ज़्यादा मौतें, एक रिपोर्ट के मुताबिक़ लगभग 47 लाख, भारत में हुई हैं। मानवद्रोही व संवेदनहीन मोदी सरकार का यह दावा कि कोरोना की दूसरी लहर में देश में ऑक्सीजन की कमी से एक भी मौत नहीं हुई, महज़ एक लफ़्फ़ाजी है।

75वें स्वतंत्रता दिवस का जश्न वे मनायें जिन्हें इस लुटेरी व्यवस्था ने सबकुछ दिया है

आने वाले पन्द्रह अगस्त को 75वें स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाने की तैयारियाँ जारी हैं। सबसे ज़्यादा शोर वे मचा रहे हैं जिन्होंने ब्रिटिश हुक़ूमत के ख़िलाफ़ लड़ाई में कभी एक ढेला तक नहीं चलाया, क्रान्तिकारियों की मुखबिरी तक की और जंगे-आज़ादी को कमज़ोर करने के लिए उस समय भी हिन्दू-मुस्लिम को बाँटने में लगे रहते थे।

बोलते आँकड़े चीख़ती सच्चाइयाँ

बोलते आँकड़े चीख़ती सच्चाइयाँ – प्रस्तुति : पराग वर्मा बेरोज़गारी  भारत में अर्थव्यवस्था के आँकड़ों पर नज़र रखने वाली प्रमुख संस्था, सेण्टर फ़ॉर मॉनीटरिंग इण्डियन इकोनॉमी के अनुसार इस साल…

बोलते आँकड़े चीख़ती सच्चाइयाँ

कृषि में पूँजीवादी विकास के साथ ही किसान आबादी के बीच ध्रुवीकरण की प्रक्रिया चलती रही है। धनी किसानों-कुलकों-फ़ार्मरों की एक छोटी-सी आबादी अमीर हुई है और उसके पास ज़मीन बढ़ती गयी है जबकि अपनी ज़मीन से उजड़कर मज़दूर बनने वाले किसानों की संख्‍या लगातार बढ़ती गयी है। हरित क्रान्ति के बाद यह सिलसिला तेज़ हुआ और पिछले पाँच दशकों से लगातार जारी है।

लगातार चौड़ी होती असमानता की खाई पूँजीवादी संकट की लाइलाज बीमारी का लक्षण है

अपने एसी कमरों तक महदूद बुद्धिजीवियों को समाज में लगातार बढ़ रही असमानता नज़र नहीं आती, लेकिन हम मेहनतकश लोग इसे अपने निजी अनुभवों से बख़ूबी जानते हैं। हम कारख़ाने में काम करते हों, आलीशान इमारतें बनाने का काम करते हों, घरों में काम करते हों, रेहड़ी-खोमचा लगाते हों या कहीं भी मेहनत-मज़दूरी करते हों, अपने रोज़मर्रा के जीवन में हम क़दम-क़दम पर इस असमानता को जीते हैं। ऊँची-ऊँची इमारतों में बने पूँजीपतियों और धन्नासेठों के महलों जैसे आलीशान घर और हमारे बदबूदार-घुटनभरे दड़बेनुमा कमरे समृद्धि के तलघर में नरक के अँधेरे की तरह हैं।

इधर ग़रीबों-मज़दूरों की थाली से रोटियाँ ग़ायब, उधर मोदी-गोदी मीडिया के नक़्शे से ग़रीबी ही ग़ायब!

जुलाई 2019 में आयी विश्व खाद्य संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में 19 करोड़ 44 लाख लोग अल्पपोषित हैं, यानी देश के हर छठे व्यक्ति को मनुष्य के लिए ज़रूरी पोषण वाला भोजन नहीं मिलता। इसी तरह वैश्विक भूख सूचकांक 2019 के मुताबिक़ भूख और कुपोषण के मामले में भारत 117 देशों में 102वें स्थान पर है, जबकि श्रीलंका (66), बंगलादेश (88) और पाकिस्तान (94) भी हमसे ऊपर हैं।

सरकारी रिपोर्ट से भी उजागर हुए लगातार ख़राब होते मज़दूरों के हालात

शोषण और मुनाफ़े पर टिकी इस व्यवस्था, जिसमें मज़दूर और मेहनतकश आबादी हमेशा बदहाल ही होती है, की असलियत आये दिन हमारे सामने आती रहती है। हाल ही में आयी केन्द्र सरकार की एक रिपोर्ट ‘पीरियॉडिक लेबर फ़ोर्स सर्वे’ (पी.एल.एफ.एस.) भारत में मज़दूरों की स्थिति की भयानक तस्वीर पेश कर रही है।

ख़र्चीला और विलासी बुर्जुआ लोकतन्त्र : जनता की पीठ पर भारी-भरकम बोझ सा सवार

हर बार के लोकसभा चुनावों की ही तरह इस बार भी लोकसभा चुनावों के दौरान राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय मीडिया में भारतीय लोकतन्त्र की शान में कसीदे पढ़े गये। किसी ने इन चुनावों को लोकतन्त्र के महाकुम्भ की संज्ञा दी तो किसी ने महापर्व की। लेकिन किसी ने ये बुनियादी सवाल पूछने की जहमत नहीं उठायी कि महीनों तक चली इस क़वायद से इस देश की आम जनता को क्या मिला और किस क़ीमत पर। चुनावी क़वायद ख़त्म होने के बाद जारी होने वाले ख़र्च के आँकड़े पर निगाह दौड़ाने भर से इसमें कोई शक नहीं रह जाता है कि इस तथाकथित लोकतन्त्र को वास्तव में धनतन्त्र की संज्ञा दी जानी चाहिए।

ग़रीबों से जानलेवा वसूली और अमीरों को क़र्ज़ माफ़ी का तोहफ़ा

रहा है, वहीं दूसरी ओर क़र्ज़ दे-देकर दिवालिया हुए बैंकों को भाजपा सरकार “बेलआउट पैकेज” के नाम पर जनता से वसूली गयी टैक्स की राशि में से लाखों करोड़ रुपये देने की तैयारी कर रही है। इससे पहले भी सरकार “बेलआउट पैकेज” के नाम पर 88,000 करोड़ रुपये बैंकों को दे चुकी है। ये सारा पैसा मोदी ने चाय बेचकर नहीं कमाया है, जिसे वह अपने आकाओं को लुटा रहा है। ये मेहनतकश जनता की गाढ़ी कमाई का पैसा है जिसे तरह-तरह के टैक्सों के रूप में हमसे वसूला जाता है। ये पैसा जनकल्याण के नाम पर वसूला जाता है, लेकिन असल में कल्याण इससे पूँजीपतियों का किया जा रहा है। इस पैसे से लोगों के लिए आधुनिक सुविधाओं से लैस अच्छे अस्पताल बन सकते थे और निःशुल्क व अच्छे स्कूल-कॉलेज खुल सकते थे, लेकिन हो उल्टा रहा है। सरकार पैसे की कमी का रोना रोकर रही-सही सुविधाएँ भी छीन रही है।

आम लोगों के जीवनस्तर में वृद्धि के हर पैमाने पर देश पिछड़ा – ‘अच्छे दिन’ सिर्फ़ लुटेरे पूँजीपतियों के आये हैं

मोदी सरकार और संघ परिवार का एजेण्डा बिल्कुल साफ़ है। लोग आपस में बँटकर लड़ते-मरते रहें और वे अपने पूँजीपति मालिकों की तिजोरियाँ भरते रहें। सोचना इस देश के मज़दूरों और आम लोगों को है कि वे इन देशद्रोहियों की चालों में फँसकर ख़ुद को और आने वाली पीढ़ियों को बर्बाद करते रहेंगे या फिर इन फ़रेबियों से देश को बचाने के लिए एकजुट होंगे।