फ़ासीवादी ताक़तों द्वारा इतिहास को विकृत करने का एक और प्रयास
दिल्ली विश्वविद्यालय के पीजी इतिहास पाठ्यक्रम से दिल्ली सल्तनत, प्राचीन भारत में ‘जेण्डर’ व अन्य महत्वपूर्ण विषयों से सम्बन्धित 20 से अधिक विषयों को पाठ्यक्रम से हटाया गया

चिरांशु

दिल्ली विश्वविद्यालय में हाल ही में जारी किये गये पीजी इतिहास के पाठ्यक्रम में पहले से पढ़ाये जा रहे कुछ विषयों को हटा दिया गया है। इनमें ‘स्ट्रक्चर्स ऑफ अथॉरिटी; द दिल्ली सल्तनत (1200–1400)’ के अलावा प्राचीन और मध्यकालीन भारत के इतिहास से जुड़े कई अन्य महत्वपूर्ण विषय भी शामिल हैं। इनमें ‘हिस्ट्री ऑफ़ नॉर्थ इण्डिया, c. 1400–1550’, ‘जेण्डर एण्ड विमेन इन अर्ली इण्डिया: 1500 BCE to 1000 CE’, ‘पॉलिटिकल प्रोसेसिस एण्ड स्ट्रक्चर ऑफ़ पॉलिटिक्स इन ऐंशिएंट इण्डिया’ और ‘रिलीजन एण्ड सोसाइटी इन ऐंशिएण्ट इण्डियन लिटरेचर’ जैसे विषय शामिल हैं, जो स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के तीसरे सेमेस्टर में पढ़ाये जाते थे। इससे पहले भी फ़ासीवादी भाजपा सरकार लगातार इतिहास के पाठ्यक्रम को तोड़-मरोड़ कर, इतिहास के नाम पर झूठ, अन्धविश्वास और मिथ्या परोसने की कोशिश करती आयी है।

इतिहास विभाग द्वारा प्रस्तावित 38 DSE पेपरों में से केवल 16 को ही विश्वविद्यालय द्वारा NEP (राष्ट्रीय शिक्षा नीति) 2020 के “उद्देश्यों” के अनुरूप माना गया। ‘इण्डियन एक्सप्रेस’ अख़बार की रिपोर्ट के अनुसार इतिहास विभाग से पाठ्यक्रम को NEP-2020 के उद्देश्यों के अनुरूप बनाने के लिए कहा गया था।

लेकिन इतिहास के पाठ्यक्रम को NEP-2020 के अनुरूप बनाने का आख़िर मतलब क्या है?

विश्वविद्यालय ने मीडिया में अपने बचाव में कहा है कि इसका उद्देश्य पाठ्यक्रम को विभिन्न कालखण्डों और क्षेत्रों का अधिक प्रतिनिधित्व करने वाला बनाना है। लेकिन इतिहास विभाग में पहले पढ़ाये जा रहे और अब विश्वविद्यालय द्वारा अस्वीकार किये गये पेपरों पर एक सरसरी नज़र डालना ही इस दावे की पोल खोलने के लिए पर्याप्त है। जिन विषयों को हटाया गया है, वे इतिहास के अलग-अलग महत्वपूर्ण कालखण्डों और क्षेत्रों को पहले से ही समेटे हुए थे, और इनके बिना भारतीय इतिहास की समग्र समझ बेहद अधूरी रह जायेगी।

मसलन, ‘जेण्डर एण्ड विमेन इन अर्ली इण्डिया: 1500 BCE to 1000 CE’ नामक पेपर वैदिक समाजों से लेकर 10वीं–11वीं शताब्दी ईस्वी की राजनीति और सामाजिक संरचनाओं तक के लगभग दो सहस्राब्दियों के विशाल कालखण्ड को समेटता था और इसमें विभिन्न क्षेत्रों का अध्ययन शामिल था।

यह दावा हास्यास्पद है कि पाठ्यक्रम को अधिक व्यापक बनाने के नाम पर दिल्ली सल्तनत जैसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक कालखण्ड के अध्ययन को ही हटा दिया जाये।

फिर इन पेपरों को क्यों हटाया गया और इसका उद्देश्य क्या है?

इन पेपरों को हटाने का उद्देश्य इतिहास के एमए पाठ्यक्रम को अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण बनाना बिल्कुल नहीं है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का उद्देश्य ही फ़ासीवादी भाजपा द्वारा लागू किये जा रहे इस कार्यक्रम के तहत, वैज्ञानिक, ऐतिहासिक, आलोचनात्मक और तर्कसंगत शिक्षा पर हमला करना है। इतिहास के सन्दर्भ में इसका उद्देश्य स्पष्ट है—इतिहास को मिथकों और साम्प्रदायिक दृष्टिकोण से भरना तथा इतिहास की जगह मनगढ़ंत कथाओं, कल्पनाओं, कट्टरपन्थी धारणाओं और अपने हिसाब से गढ़ी गयी कहानियों को स्थापित करना।

इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए भाजपा-संघ परिवार से जुड़ी फ़ासीवादी ताक़तें अपने पास उपलब्ध हर माध्यम का इस्तेमाल कर रही हैं—‘व्हाट्एप्प यूनिवर्सिटी’ से लेकर संस्थागत नेटवर्क, फ़िल्मों और भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद (ICHR) तथा भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) जैसी विभिन्न ‘स्वायत्त’ संस्थाओं पर नियंत्रण तक। इसके साथ-साथ पाठ्यक्रमों में बदलाव, महत्वपूर्ण विषयों का विलोपन और इतिहास के अध्यायों को हटाने का सिलसिला भी जारी है। एमए पाठ्यक्रम से इन पेपरों को हटाया जाना स्कूलों तथा विभिन्न विश्वविद्यालयों और कॉलेजों के पाठ्यक्रमों में पहले किये गये बदलावों और पूरे-पूरे अध्यायों को हटाये जाने की प्रक्रिया की ही अगली कड़ी है।

इतिहास पर यह हमला कोई आकस्मिक घटना नहीं है। इतिहास को विकृत करना उस वृहद फ़ासीवादी परियोजना का अभिन्न हिस्सा है, जिसका उद्देश्य वास्तव में मुनाफ़े पर आधारित इस पूँजीवादी व्यवस्था द्वारा पैदा की गयी तमाम समस्याओं और संकट के लिए एक नक़ली व काल्पनिक दुश्मन का निर्माण करना और फिर उससे ही इन समस्याओं के लिए ज़िम्मेदार ठहराना और उस नक़ली दुश्मन के बहिष्कार तथा विरोध के आधार पर एक विशुद्ध विचारधारात्मक समुदाय-अर्थात् “आर्यन राइख” या “हिन्दू राष्ट्र” का निर्माण करना है। इसके ज़रिये ही फ़ासीवाद टुट्टपूंजिया वर्गों के संगठित प्रतिक्रियावादी आन्दोलन को विशिष्ट तौर पर बड़ी पूँजी की सेवा और आम तौर पर पूँजी की सेवा में सन्नद्ध करता है। लेकिन न तो यह तथाकथित “नक़ली दुश्मन” और न ही यह विशुद्ध विचारधारात्मक समुदाय, मसलन ‘हिन्दू राष्ट्र’, किसी वास्तविक ऐतिहासिक आधार पर मौजूद है। इसलिए एक ऐसे स्वर्णिम, अखण्ड अतीत की काल्पनिक तस्वीर गढ़ी जाती है, जिसमें उस विचारधारात्मक समुदाय को हमेशा से महान और एकीकृत दिखाया जाता है तथा उसके ऊपर किसी “दुश्मन” द्वारा किये गये पतनकारी हमले की कहानी प्रस्तुत की जाती है। मुसलमानों को एक काल्पनिक शत्रु (False/Imaginary Enemy) के रूप में पेश करने के लिए यह सीधा झूठ फैलाया जाता है कि “हिन्दू धर्म और हिन्दू समाज लगातार मुस्लिम आक्रमणकारियों के निशाने पर थे, जिन्होंने मन्दिर लूटे, हिन्दू महिलाओं के साथ बलात्कार किया, उनकी हत्या की और हिन्दुओं का जबरन इस्लाम में धर्मान्तरण कराया।” इतिहास के पाठ्यक्रम से सल्तनत काल को हटाये जाने को इसी की रौशनी में देखा जाना चाहिए। लेकिन इतिहास पर एक सरसरी नज़र भी इस पूरे दावे को ख़ारिज़ करने के लिए पर्याप्त है। शिवाजी, औरंगज़ेब, सम्भाजी और उस दौर के अनेक अन्य शासक भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास के एक विशेष चरण में विशिष्ट सामाजिक वर्गों का प्रतिनिधित्व करते थे। उनके लिए धर्म प्राथमिक चिन्ता का विषय नहीं था। मध्यकालीन शासकों के लिए सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न राज्य, सत्ता और क्षेत्रीय विस्तार का था—अर्थात राजनीतिक सत्ता का प्रश्न—न कि धार्मिक पहचान का। लेकिन यह सरकार मनगढ़ंत कहानियों को इतिहास बनाकर लगातार इतिहास का साम्प्रदायिकीकरण कर रही है ।

शिक्षा का एक महत्वपूर्ण काम छात्रों के बीच आलोचनात्मक और तार्किक दृष्टिकोण पैदा करना होता है। लेकिन इस तरह के बदलाव से आलोचनात्मक दृष्टिकोण के बजाय छात्रों के बीच में एकांगी, अनैतिहासिक, अवैज्ञानिक और अतार्किक दृष्टिकोण पैदा होगा। वह दृष्टिकोण जो आरएसएस “चरित्र निर्माण” के नाम पर लम्बे समय से थोपना चाहता है।

इस प्रकार इतिहास को फ़ासीवादियों के राजनीतिक कार्यक्रम के अधीन कर दिया जाता है। इतिहास का वास्तविक और वैज्ञानिक अध्ययन इस परियोजना के रास्ते में बाधा बनता है। इसलिए फ़ासीवादी ताक़तें इतिहास को मनमाने ढंग से गढ़ने, झूठी कहानियाँ फैलाने और उन ऐतिहासिक कालखण्डों को पाठ्यक्रम से हटाने का सहारा लेती हैं जो उनके राजनीतिक एजेण्डा के अनुकूल नहीं हैं।

दिल्ली विश्वविद्यालय के एमए इतिहास पाठ्यक्रम से 20 से अधिक विषयों को हटाया जाना इतिहास पर किये जा रहे इसी व्यापक फ़ासीवादी हमले का हिस्सा है। इतिहास को विकृत करने और पाठ्यक्रम से महत्वपूर्ण विषयों को मनमाने ढंग से हटाने के इस खुले और बेशर्म प्रयास का दृढ़ता से विरोध किया जाना चाहिए। इसके लिये न सिर्फ़ पाठ्यक्रम और किताबों में इतिहास को विकृत करने के ऐसे तमाम प्रयासों का जुझारू विरोध किया जाना चाहिए, बल्कि इससे आगे बढ़कर आज हमें हर स्तर पर फ़ासीवादियों द्वारा इतिहास पर किए जा रहे हमलों का जवाब देने की ज़रूरत है और मेहनतकश आवाम के बीच हमारे सच्चे इतिहास को अलग अलग माध्यमों से लेकर जाने की जरूरत है। आज यह मज़दूर वर्ग की फ़ासीवाद-विरोधी  रणनिति का एक ज़रूरी हिस्सा है।

 

मज़दूर बिगुल, अगस्त 2026

 

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