Category Archives: औद्योगिक दुर्घटनाएँ

हरियाणा में मज़दूरों की ‘हत्या’ के लिए अवैध कारख़ानेदार तथा श्रम क़ानूनों की धज्जियाँ उड़ाने वाली भाजपा सरकार ज़िम्मेदार!

मोदी सरकार एक तरफ़ नये लेबर कोड के तहत महिलाओं को रात की पाली में काम करने की अनुमति देने की बात कर रही है, लेकिन दूसरी तरफ़ फ़ैक्ट्रियों में उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कोई ठोस क़दम नहीं उठाती है। नये लेबर कोड के तहत व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्यस्थितियों से जुड़ी संहिता में कई ऐसे बदलाव किये गये हैं जो मज़दूरों के लिए ख़तरनाक साबित हो सकते हैं। उदाहरण के लिए, अब बिजली से चलने वाली इकाई को फ़ैक्ट्री मानने के लिए कम से कम 20 मज़दूर और बिना बिजली वाली इकाई के लिए 40 मज़दूर होना आवश्यक कर दिया गया है। इससे कई छोटी इकाइयाँ श्रम कानूनों के दायरे से बाहर हो जायेंगी और वहाँ काम करने वाले मजदूरों को सुरक्षा, काम के घंटे और स्वास्थ्य सम्बन्धी कई क़ानूनी सुविधाएँ नहीं मिल पायेंगी।

रायपुर में सेप्टिक टैंक में उतरे 3 सफाईकर्मियों की मौत – ज़िम्मेदार है मुनाफाखोर व्यवस्था

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में एक अस्पताल के सेप्टिक टैंक (सीवरेज) की सफाई के दौरान तीन सफाईकर्मियों की ज़हरीली गैस और दम घुटने से मौत हो गयी। परिजनों के अनुसार एक ठेकेदार के माध्यम से रामकृष्ण केयर अस्पताल में गटर और टैंक साफ करने के लिए मज़दूरों को बुलाया गया था। अस्पताल के पीछे स्थित इस सीवरेज टैंक में उतरते ही ज़हरीली गैस के कारण एक-एक कर तीनों मजदूरों की मौत हो गयी।

इलाहाबाद में मुनाफ़ाखोरी की भेंट चढ़ी मेहनतकशों की ज़िन्दगियाँ

भारत में हर दिन औसतन 10 इमारतें गिर जाती हैं। इन घटनाओं में औसतन 7 लोग रोज़ाना मौत के मुँह में समा जाते हैं। हर साल केवल इमारतों के गिरने से 2700 लोग जान गँवा देते हैं। नेताओं-ठेकेदारों-नौकरशाहों का नापाक गठजोड़ हर रोज देश में दर्जनों मेहनतकशों की मौत का कारण बन रहा है। अभी कुछ दिनों पहले ही मध्यप्रदेश में नकली कफ सीरप पीने से 20 से ज़्यादा बच्चों की मौत हो गई। भारत के सबसे स्वच्छ शहर माने जाने वाले इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पानी पीने से 25 से ज़्यादा लोगों की मौत हो गई। अपराधियों को बचाने के लिए बिना पोस्टमार्टम किये कई शवों का अन्तिम संस्कार कर दिया। जिन लोगों का पोस्टमार्टम हुआ उनकी मौत का कारण पानी के जहरीले होने का तथ्य स्पष्ट हो गया। सरकारी रिकॉर्ड में सिर्फ 4 मौतें दर्ज की गयीं। अब यही खेल इलाहाबाद की इस घटना में भी खेला जा रहा है।

मज़दूरों का जीवन तो मीडिया में कहीं दिखता ही नहीं था, अब उनकी मौत भी ‘ख़बर’ नहीं रही

नागपुर ही नहीं, देशभर में लगातार कारख़ानों में हो रही दुर्घटनाओं में मज़दूरों की मौतें हो रही हैं। हर साल हज़ारों मज़दूर अपनी जान गँवा देते हैं या बुरी तरह घायल होते हैं। इसकी ज़िम्मेदारी पूरी तरह कारख़ाना मालिकों की होती है जो सुरक्षा उपायों पर पैसे और समय ख़र्च करके अपने मुनाफ़े में ज़रा भी कमी नहीं आने देना चाहते। उनके लिए यह फ़ालतू का ख़र्च है क्योंकि मज़दूर का श्रम और उसकी जान सस्ते में उपलब्ध है। उनके टुकड़ों पर पलने वाले सरकारी अफ़सर और नेता भी उन हत्याओं के लिए उतने ही ज़िम्मेदार हैं जो इस अँधेरगर्दी को देखकर आँखें मूँदे रहते हैं। लेकिन दिनभर टुच्ची और मसालेदार ख़बरें और नफ़रती प्रचार में डूबे टीवी चैनलों के लिए यह रिपोर्ट करने का मसला नहीं है।

नोएडा की एक फ़ैक्ट्री में लगी भीषण आग : फ़ैक्ट्री मालिकों को बचाने में लगा पुलिस-प्रशासन और गोदी मीडिया हुआ बेनक़ाब

नोएडा की इस फ़ैक्ट्री में हुई इस घटना ने न सिर्फ़ नोएडा की फ़ैक्ट्रियों में सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोल दी है बल्कि साथ ही पुलिस, प्रशासन और इस पूँजीवादी मीडिया की हक़ीक़त भी बयान कर दी है। इस फ़ैक्ट्री में काम कर रहे सभी मज़दूर ठेके पर थे, जिन्हें अलग-अलग ठेकेदारों द्वारा भर्ती किया जाता था। उनकी तनख्वाह 10-12 हज़ार रुपये ही थी। यहाँ 12-12 घण्टे की दो शिफ़्ट चलती थीं। ओवरटाइम का भुगतान भी डबल रेट से नहीं करके सिंगल रेट से ही किया जाता था। कम्पनी ने सुरक्षा व्यवस्था के सारे नियमों को दरकिनार करते हुए तमाम सुरक्षा उपकरणों को बाईपास कर रखा था। ऐसे में यह लाज़मी था कि कोई भी घटना होने पर मज़दूरों की जान को ख़तरा हो सकता था।

कोलकाता में वाउ मोमो और पुष्पांजलि डेकोरेटर्स के गोदामों में आग से झुलसकर हुई मज़दूरों की मौत

मज़दूर वर्ग अपने तजुर्बे से जानता है कि अभी तक की जो भी सीमित कार्रवाई हुई है, वो सबकुछ बस दिखाने के लिए है। पश्चिम बंगाल में मुख्य विरोधी दल, भाजपा भी मौका भुनाने के लिए विरोध कर रही है, लेकिन तृणमूल कांग्रेस और भाजपा की ये कुत्ताघसीटी सिर्फ़ पूँजीवादी चुनाव प्रणाली में अपनी रोटियाँ सेंकने के लिए है। मज़दूरों का खून पसीना नोचने के सवाल पर इन सारे के सारे दलों में आम सहमति है।

मालिकों के मुनाफ़े की हवस ले रही मज़दूरों की जान!

बीते पाँच वर्षो में 6500 मज़दूर फैक्ट्री, खदानों, निर्माण कार्य में हुए हादसों में अपनी जान गवाँ चुके हैं। इसमें से 80 प्रतिशत हादसे कारखानों में हुए। 2017-2018 कारखाने में होने वाली मौतों में 20 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है। साल 2017 और 2020 के बीच, भारत के पंजीकृत कारखानों में दुर्घटनाओं के कारण हर दिन औसतन तीन मज़दूरों की मौत हुई और 11 घायल हुए। 2018 और 2020 के बीच कम से कम 3,331 मौतें दर्ज की गयीं। आँकड़ों के मुताबिक, साल 2010 से 2020 के बीच फैक्ट्री अधिनियम, 1948 की धारा 92 (अपराधों के लिए सामान्य दण्ड) और 96ए (ख़तरनाक प्रक्रिया से सम्बन्धित प्रावधानों के उल्लंघन के लिए दण्ड) के तहत 14,710 लोगों को दोषी ठहराया गया, लेकिन आँकड़ों से पता चलता है कि 2018 और 2020 के बीच सिर्फ़ 14 लोगों को फैक्ट्री अधिनियम, 1948 के तहत अपराधों के लिए सज़ा दी गयी।

शान्ति (SHANTI) विधेयक, 2025 – कॉरपोरेट मुनाफ़े के लिए मानव जीवन को ख़तरे में डालने का बेशर्म दस्तावेज़

बड़े पैमाने पर होने वाले परमाणु रिसाव, कचरे का अनुचित प्रबन्धन व निपटारा तथा परमाणु संचालन से जुड़े अन्य बड़े जोख़िम वाले कारकों से होने वाली आपदाओं को छिपाने, उन्हें कम करके दिखाने और उनकी ज़िम्मेदारी से पूँजीपतियों और निजी प्रतिष्ठानों को मुक्त करने की मंशा से ही यह विधेयक मूलतः संचालित है। जैसे-जैसे आप इस विधेयक को पढ़ेंगे तो पायेंगे कि यह पूरा क़ानून इस अत्यन्त ख़तरनाक क्षेत्र में बड़े पैमाने पर निजी और विदेशी भागीदारी को प्रोत्साहित करने के लिए बनाया गया है। वहीं दूसरी तरफ़ सार्वजनिक सुरक्षा सम्बन्धी चिन्ताओं को पूरी तरह से नज़रअन्दाज़ कर दिया गया है। यह विधेयक पूरी निर्माण श्रृंखला यानी खनन से लेकर संयंत्र संचालन और कचरा प्रबन्धन तक के लिए एक ही लाइसेंस की अनुमति देता है। इससे निजी कम्पनियाँ बिना किसी वास्तविक जवाबदेही और दण्ड से मुक्त रहते हुए अधिकतम मुनाफ़ा कमा सकती हैं।

तेलंगाना की फ़ार्मा-केमिकल फ़ैक्ट्री में भीषण आग – मालिक के मुनाफ़े की भट्ठी में जलकर ख़ाक हो गये 52 मज़दूर

सरकारी आँकड़ों के मुताबिक, पिछले 10 वर्षों में भारत में 269 से अधिक केमिकल फ़ैक्टरियों, कोयला खदानों और निर्माण स्थलों पर बड़े औद्योगिक हादसे हुए हैं। इन सभी हादसों की जड़ में मुनाफ़े पर टिकी पूँजीवादी व्यवस्था ही है। ये बढ़ती औद्योगिक दुर्घटनाएँ पूँजीवाद के मानवद्रोही चरित्र को सरेआम उजागर कर देती हैं। आज मज़दूरों के सामने सवाल यह है कि वे आख़िर कब तक पूँजीपतियों के मुनाफ़े की भट्टी में झोंके जाने को बर्दाश्त करते रहेंगे? इससे पहले कि पूँजीवाद हमारी ज़िन्दगी और हमारे सपनो को जलाकर ख़ाक कर दे हमें पूँजीवाद को ख़ाक में मिलाने के लिए कमर कसनी होगी।

एक बार फिर आग में झुलसी मज़दूरों की ज़िन्दगियाँ! दिल्ली के शाहाबाद दौलतपुर में आग से हज़ारों झुग्गियाँ तबाह, चार बच्चों की मौत

27 अप्रैल को शाहाबाद दौलतपुर गाँव के श्रीनिकेतन अपार्टमेण्ट के पास की झुग्गियों में लगी भीषण आग से हज़ारों झुग्गियाँ तबाह हो गयी। इस घटना में चार बच्चों की मौत हो गयी और हज़ारों लोगों की ज़िन्दगियाँ तबाह-बर्बाद हो गयी। इन झुग्गियों में ज़्यादातर आबादी कूड़ा बीनने का काम करती है। झुग्गियों में आग उस समय लगी जब लोग काम पर गये हुए थे। एक घर में सिलेण्डर फटने की वजह से आग ने भयानक रूप ले लिया और हज़ार के करीब झुग्गियाँ आग की चपेट में आ गयी। स्थानीय प्रशासन ने इस घटना पर बहुत देरी से कार्रवाई की। साथ ही दमकल की गाड़ियों को भी पहुँचने में देरी हुई। प्रशासन द्वारा तुरन्त कार्रवाई न करने और घटना के प्रति लापरवाही दिखाने के कारण भी आग पूरे इलाक़े में फैल गयी और हज़ारों लोग सड़क पर आ गये। अब तक लोग दर-दर मारे फ़िर रहे है। सालों की मेहनत-मज़दूरी करके, एक-एक पायी जोड़कर अपना घर बनाते हैं और अचानक से सब बर्बाद हो जाता है। घटना के बाद अभी तक लोगों के लिए रहने की व्यवस्था नहीं की गयी है।