Category Archives: औद्योगिक दुर्घटनाएँ

चमोली सुरंग हादसा: मुनाफ़े की अँधी हवस ले रही मज़दूरों की जान!

केदारनाथ आपदा, रैणी आपदा, तपोवन-विष्णुगाड आपदा, जोशीमठ भू-धँसाव, सिलक्यारा और अब चमोली टनल हादसा! ये हादसे और आपदाएँ आज हिमालय की नियति बनते जा रहे हैं। मुनाफ़े की अन्धी हवस में जिन परियोजनाओं को लागू किया जा रहा है उससे होने वाले नुक़सान को केवल हिमालय ही नहीं बल्कि पूरे उत्तर भारत को भुगतना पड़ सकता है। हिमालय में बड़े-बड़े बाँधों से लेकर चार धाम परियोजना, ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल परियोजना, पंचेश्वर बाँध परियोजना आदि ने पूरे हिमालय को तबाह करके रख दिया है। इसके परिणाम भी लगातार देखने को मिल रहे हैं।

रेलवे-सम्बन्धी कैग की रिपोर्ट ने खोली पोल: 89 प्रतिशत रेलवे स्टेशनों पर बुनियादी यात्री सुविधाओं की कमी, सुरक्षा से जुड़े 20,304 काम आज भी अधूरे!

कैग की रिपोर्ट के अनुसार, जिन 512 ग़ैर-उपनगरीय रेलवे स्टेशनों का ऑडिट किया गया, उनमें से 458, यानी क़रीब 89 प्रतिशत स्टेशनों पर निर्धारित बुनियादी यात्री सुविधाओं तक में कमी पायी गयी। इन स्टेशनों पर पीने का पानी, शौचालय, बैठने की जगह, पंखे, वाटर कूलर और प्लेटफॉर्म शेड जैसी सुविधाओं तक आम नागरिकों को मुहैया नहीं करायी गयी हैं। यानी जिस रेलवे को “विश्वस्तरीय” बनाने के बड़े-बड़े दावे किये जा रहे हैं, उसके लगभग हर नौ में से आठ स्टेशनों पर यात्रियों को अभी भी बुनियादी सुविधाएँ पूरी तरह उपलब्ध नहीं हैं।

विशाखापट्टनम स्टील प्लाण्ट से लेकर सूरत के सेप्टिक टैंक तक कार्यस्थल पर मज़दूरों की मौतों का सिलसिला बदस्तूर जारी है!

सरकारी आँकड़ों के मुताबिक़ भारत में हर रोज़ कार्यस्थल पर हुई दुर्घटनाओं में 3 लोगों की मौत हो जाती है। हम सभी जानते हैं कि वास्तविक संख्या इससे कहीं ज़्यादा होगी। इसके बावजूद मज़दूरों की सुरक्षा कभी भी राष्ट्रीय चर्चा का विषय नहीं बनती। नवउदारवादी पूँजीवाद के इस दौर में मज़दूरों की सुरक्षा के प्रति उपेक्षा और लापरवाही लगातार बढ़ती गयी है। मुनाफ़े की नाली बेरोकटोक बहती रहे इसके लिए उसमें आने वाली बाधाओं को एक-एक करके हटाया जा रहा है। मज़दूरों के अधिकारों को लगातार छीना जा रहा है। ज़्यादातर काम ठेके पर कराये जा रहे हैं ताकि मज़दूरों की सुरक्षा के प्रति कोई जवाबदेही ही न रहे। हाल ही में लागू हुए 4 मज़दूर-विरोधी लेबर कोड में से एक मज़दूरों की पेशागत सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्यस्थितियों से सम्बन्धित है। इसके नाम से किसी को लग सकता है कि इसमें ज़्यादा से ज़्यादा फ़ैक्ट्रियों में काम की परिस्थितियों को ज़्यादा सुरक्षित करने की बात होगी। पर असलियत यह है कि इस कोड में फ़ैक्ट्री की परिभाषा को ही इस तरह बदल दिया गया है कि देश की क़रीब आधी फ़ैक्ट्रियों को सुरक्षा की जवाबदेही से ही छुटकारा मिल गया है। ऐसे में स्प्ष्ट है कि इस देश का बेशर्म और बेरहम हुक़्मरान तबक़ा विशाखापट्टनम और सूरत जैसे हादसों के लिए सीधे तौर पर ज़िम्मेदार है।

संसद में खुलासा : विदेशों में हर दिन 20 से अधिक भारतीय मज़दूरों की मौत

भारत के मज़दूरों की यह दयनीय स्थिति केवल देश के भीतर ही नहीं है, बल्कि विदेशों में रोज़गार की तलाश में गए भारतीयों के लिए यह स्थिति और भी गम्भीर रूप में मौजूद है। आम लोगों को यह लगता है कि विदेशों में जाकर उनकी स्थिति सुधर जायेगी और वहाँ के कानून अधिक प्रभावी होंगे, मज़दूरी अधिक होगी, अधिक श्रम अधिकार होंगे, लेकिन सच्चाई इसके विपरीत और बेहद भयावह है। विदेश मामलों के राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह द्वारा राज्यसभा में दिए गए लिखित उत्तर के अनुसार, पिछले पांच वर्षों (2021-2025) में विदेशों में 37,740 भारतीय श्रमिकों की मृत्यु हुई है। इसका अर्थ है कि प्रतिदिन औसतन 20 से अधिक भारतीय कामगार अपनी जान गँवा रहे हैं।

हरियाणा में मज़दूरों की ‘हत्या’ के लिए अवैध कारख़ानेदार तथा श्रम क़ानूनों की धज्जियाँ उड़ाने वाली भाजपा सरकार ज़िम्मेदार!

मोदी सरकार एक तरफ़ नये लेबर कोड के तहत महिलाओं को रात की पाली में काम करने की अनुमति देने की बात कर रही है, लेकिन दूसरी तरफ़ फ़ैक्ट्रियों में उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कोई ठोस क़दम नहीं उठाती है। नये लेबर कोड के तहत व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्यस्थितियों से जुड़ी संहिता में कई ऐसे बदलाव किये गये हैं जो मज़दूरों के लिए ख़तरनाक साबित हो सकते हैं। उदाहरण के लिए, अब बिजली से चलने वाली इकाई को फ़ैक्ट्री मानने के लिए कम से कम 20 मज़दूर और बिना बिजली वाली इकाई के लिए 40 मज़दूर होना आवश्यक कर दिया गया है। इससे कई छोटी इकाइयाँ श्रम कानूनों के दायरे से बाहर हो जायेंगी और वहाँ काम करने वाले मजदूरों को सुरक्षा, काम के घंटे और स्वास्थ्य सम्बन्धी कई क़ानूनी सुविधाएँ नहीं मिल पायेंगी।

रायपुर में सेप्टिक टैंक में उतरे 3 सफाईकर्मियों की मौत – ज़िम्मेदार है मुनाफाखोर व्यवस्था

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में एक अस्पताल के सेप्टिक टैंक (सीवरेज) की सफाई के दौरान तीन सफाईकर्मियों की ज़हरीली गैस और दम घुटने से मौत हो गयी। परिजनों के अनुसार एक ठेकेदार के माध्यम से रामकृष्ण केयर अस्पताल में गटर और टैंक साफ करने के लिए मज़दूरों को बुलाया गया था। अस्पताल के पीछे स्थित इस सीवरेज टैंक में उतरते ही ज़हरीली गैस के कारण एक-एक कर तीनों मजदूरों की मौत हो गयी।

इलाहाबाद में मुनाफ़ाखोरी की भेंट चढ़ी मेहनतकशों की ज़िन्दगियाँ

भारत में हर दिन औसतन 10 इमारतें गिर जाती हैं। इन घटनाओं में औसतन 7 लोग रोज़ाना मौत के मुँह में समा जाते हैं। हर साल केवल इमारतों के गिरने से 2700 लोग जान गँवा देते हैं। नेताओं-ठेकेदारों-नौकरशाहों का नापाक गठजोड़ हर रोज देश में दर्जनों मेहनतकशों की मौत का कारण बन रहा है। अभी कुछ दिनों पहले ही मध्यप्रदेश में नकली कफ सीरप पीने से 20 से ज़्यादा बच्चों की मौत हो गई। भारत के सबसे स्वच्छ शहर माने जाने वाले इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पानी पीने से 25 से ज़्यादा लोगों की मौत हो गई। अपराधियों को बचाने के लिए बिना पोस्टमार्टम किये कई शवों का अन्तिम संस्कार कर दिया। जिन लोगों का पोस्टमार्टम हुआ उनकी मौत का कारण पानी के जहरीले होने का तथ्य स्पष्ट हो गया। सरकारी रिकॉर्ड में सिर्फ 4 मौतें दर्ज की गयीं। अब यही खेल इलाहाबाद की इस घटना में भी खेला जा रहा है।

मज़दूरों का जीवन तो मीडिया में कहीं दिखता ही नहीं था, अब उनकी मौत भी ‘ख़बर’ नहीं रही

नागपुर ही नहीं, देशभर में लगातार कारख़ानों में हो रही दुर्घटनाओं में मज़दूरों की मौतें हो रही हैं। हर साल हज़ारों मज़दूर अपनी जान गँवा देते हैं या बुरी तरह घायल होते हैं। इसकी ज़िम्मेदारी पूरी तरह कारख़ाना मालिकों की होती है जो सुरक्षा उपायों पर पैसे और समय ख़र्च करके अपने मुनाफ़े में ज़रा भी कमी नहीं आने देना चाहते। उनके लिए यह फ़ालतू का ख़र्च है क्योंकि मज़दूर का श्रम और उसकी जान सस्ते में उपलब्ध है। उनके टुकड़ों पर पलने वाले सरकारी अफ़सर और नेता भी उन हत्याओं के लिए उतने ही ज़िम्मेदार हैं जो इस अँधेरगर्दी को देखकर आँखें मूँदे रहते हैं। लेकिन दिनभर टुच्ची और मसालेदार ख़बरें और नफ़रती प्रचार में डूबे टीवी चैनलों के लिए यह रिपोर्ट करने का मसला नहीं है।

नोएडा की एक फ़ैक्ट्री में लगी भीषण आग : फ़ैक्ट्री मालिकों को बचाने में लगा पुलिस-प्रशासन और गोदी मीडिया हुआ बेनक़ाब

नोएडा की इस फ़ैक्ट्री में हुई इस घटना ने न सिर्फ़ नोएडा की फ़ैक्ट्रियों में सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोल दी है बल्कि साथ ही पुलिस, प्रशासन और इस पूँजीवादी मीडिया की हक़ीक़त भी बयान कर दी है। इस फ़ैक्ट्री में काम कर रहे सभी मज़दूर ठेके पर थे, जिन्हें अलग-अलग ठेकेदारों द्वारा भर्ती किया जाता था। उनकी तनख्वाह 10-12 हज़ार रुपये ही थी। यहाँ 12-12 घण्टे की दो शिफ़्ट चलती थीं। ओवरटाइम का भुगतान भी डबल रेट से नहीं करके सिंगल रेट से ही किया जाता था। कम्पनी ने सुरक्षा व्यवस्था के सारे नियमों को दरकिनार करते हुए तमाम सुरक्षा उपकरणों को बाईपास कर रखा था। ऐसे में यह लाज़मी था कि कोई भी घटना होने पर मज़दूरों की जान को ख़तरा हो सकता था।

कोलकाता में वाउ मोमो और पुष्पांजलि डेकोरेटर्स के गोदामों में आग से झुलसकर हुई मज़दूरों की मौत

मज़दूर वर्ग अपने तजुर्बे से जानता है कि अभी तक की जो भी सीमित कार्रवाई हुई है, वो सबकुछ बस दिखाने के लिए है। पश्चिम बंगाल में मुख्य विरोधी दल, भाजपा भी मौका भुनाने के लिए विरोध कर रही है, लेकिन तृणमूल कांग्रेस और भाजपा की ये कुत्ताघसीटी सिर्फ़ पूँजीवादी चुनाव प्रणाली में अपनी रोटियाँ सेंकने के लिए है। मज़दूरों का खून पसीना नोचने के सवाल पर इन सारे के सारे दलों में आम सहमति है।