दिल्ली लक्ष्मी योजना: इसका लाभ किसे मिलेगा?
नीशू
दिल्ली में रेखा गुप्ता सरकार ने महिलाओं के लिए नई योजना शुरू की है। इसका नाम ‘दिल्ली लक्ष्मी योजना’ है। इसके तहत महिलाओं को “सशक्त” बनाने के लिए मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने अपनी “दरियादिली” दिखाते हुए 2500 रुपये देने का फ़ैसला किया है और इसके लिए 5100 करोड़ रुपये का बजट भी पास कर दिया गया। मगर भाजपा सरकार की बाक़ी योजनाओं की तरह इस योजना का लाभ उठाना भी ग़रीब घरों से या आम परिवार से आने वाली किसी महिला के लिये दूर की कौड़ी है।
हिन्दू धर्म की देवी लक्ष्मी के नाम पर रखी गयी योजना के नाम से ही यह साफ़ है कि इसका लाभ मुस्लिम महिलाओं को मिलने से रहा। बाक़ी हिन्दू आबादी की महिलाओं के लिये भी रेखा गुप्ता ने कम चुनौतियाँ नहीं रखी हैं। उनके लिए भी 2500 रुपये हासिल करना टेढ़ी खीर बन चुका है।
याद हो कि दिल्ली में पिछले साल विधान सभा चुनाव से पहले भाजपा को जब वोट लेना था तब हर महिला को 2500 रुपये देने का वायदा किया गया था और उस समय कोई शर्त नहीं बतायी गयी थी। लेकिन अब सरकार ने शर्तों का जाल बिछा दिया है। आयु सीमा (21 से 60 वर्ष), आय सीमा (2.5 लाख रुपये प्रति वर्ष तक), बिजली बिल सीमा (2400 यूनिट प्रति वर्ष से अधिक नहीं ) निवास शर्त (कम से कम दस वर्ष दिल्ली निवासी), प्रति परिवार केवल एक महिला को लाभ जैसी अन्य कई शर्तें रख दी हैं। महिलाओं को मिलने वाली ₹2,500 की राशि सीधे बैंक खाते में नहीं जायेगी। इसमें से 1,000 रुपये हर महीने सेण्ट्रल बैंक डिजिटल करेंसी (CBDC) वॉलेट में दिये जाएंगे, जबकि बाक़ी के 1,500 रुपये को रिकरिंग डिपॉजिट (RD) या फ़िक्स्ड डिपॉजिट (FD) में जमा किया जायेगा। CBDC वॉलेट में आयी राशि का इस्तेमाल केवल ऑनलाइन भुगतान में ही किया जा सकेगा। इसलिए इस योजना का लाभ लेने के लिये पहले एंड्रॉयड मोबाइल लेना होगा। कोई कैश निकाल कर इसका इस्तेमाल करना चाहे तो यह सम्भव नहीं होगा। वास्तव में, सरकार 2500 रुपये का वायदा करके 1000 रुपये ही दे रही है क्योंकि तीन साल बाद कितने लोग FD वाले फण्ड का इस्तेमाल कर पाएंगे यह तो आने वाला वक़्त ही बतायेगा।
योजना की शर्तें यहीं ख़त्म नहीं होती हैं। इनमें एक महत्वपूर्ण शर्त यह भी है कि लाभार्थी को अपने इलाक़े के विधायक या सांसद का हस्ताक्षर और मुहर लगवाना अनिवार्य होगा। इस शर्त के ज़रिये नेताओं को अब पूरी छूट दे दी गयी है कि वह तय करे कि किसको इस योजना का लाभ देना है और किसको नहीं!
पात्रता-अपात्रता की इतनी शर्तें लाद दी गयीं हैं कि महिलाओं की एक बड़ी आबादी इससे वंचित हो गयी है। कोई आपवादिक तौर पर ही इन शर्तों को पूरा कर पायेगा। मज़दूर-मेहनतकश परिवार से आने वाली स्त्रियों के लिए यह योजना है ही नहीं! इस योजना के तहत भाजपा सरकार अगले साल आने वाले एमसीडी चुनाव में अपनी नाक बचाना चाहती है। उनकी तैयारी है कि साँप भी मर जाये और लाठी भी न टूटे! कहने को तो एक और वायदा पूरा कर दिया भाजपा ने!
इस योजना का फ़ायदा असल में भाजपा के कुछ गिने-चुने लोगों तक पहुँच जायेगा ताकि चुनाव में उसका ढोल पीटा जा सके और आम जनता पर दबाव डाल कर अपने मुताबिक़ वोट हासिल किया जाये! वैसे भी भाजपा आजकल मतदाता चुनने में माहिर हो गयी है! एसाईआर की प्रक्रिया को बिहार, पश्चिम बंगाल आदि में देख लें। भाजपा ने वहाँ मनमुआफ़िक मतदाता चुनकर अपनी जीत पक्की करवा ली! इसके अलावा महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित पवार की चेतावनी भी याद कर लें, “कि निकाय चुनाव में वोट न देने पर सरकारी निधि उपलब्ध नहीं कराई जायेगी”! यह बात आज कौन नहीं जानता कि भाजपा की इन लाभकारी नीतियों का सच क्या है!
भाजपा सरकार ने महिलाओं के नाम पर लायी गयी इस योजना में भी धर्म के आधार पर साम्प्रदायिक राजनीति नहीं छोड़ी। दरअसल भाजपा और उसकी फिरकापरस्त राजनीति न सिर्फ़ मुसलमानों के लिए ख़तरा है बल्कि भारतीय फ़ासीवादियों का यह दल ग़रीब और आम परिवार से आने वाली हिन्दू महिलाओं का भी सगा नहीं है।
यही आरएसएस और भाजपा ‘हिन्दू-मुस्लिम’ की नफ़रती राजनीति फैलाने के लिए और ‘हिन्दू धर्म की रक्षा’ के लिए वैसे हिन्दू महिलाओं को दस-दस बच्चे पैदा करने की सलाह देते हैं और अब सरकारी योजनाओं का लाभ प्राप्त करने के लिए यह शर्त रख रहे हैं कि जिसके तीन बच्चों से ज़्यादा बच्चे होंगे वो इस योजना के लिए अपात्र हैं! एक रिपोर्ट के मुताबिक़ तीन बच्चों की बाध्यता के कारण 15% महिलाएँ इस योजना का लाभ पाने से वंचित हो चुकी हैं। औरतों की चिन्ता में दुबली हो रही रेखा गुप्ता विधानसभा में चिंघाड़ रही हैं कि “औरतें बच्चा पैदा करने की मशीन नहीं हैं!” हाँ, महोदया बिल्कुल! औरतें बच्चा पैदा करने की मशीन नहीं हैं! यह बात आरएसएस के सर संघचालक मोहन भागवत और अपने “भाई” बागेश्वर धाम के धीरेन्द्र शास्त्री को बताइये जो औरतों को दस-दस और चार-चार बच्चे पैदा करने की सलाह दे रहे हैं।
इन योजनाओं का असल में किसको लाभ मिलता है?
मेहनतकश जनता के नाम पर लायी गयी इन तमाम योजनाओं का लाभ नेताओं और उनके लग्गुओं-भग्गुओं को ही मिलता है। भाजपा राज में सरकारी योजनों में घोटालों के चन्द उदाहरण देखें तो हालात समझने में देर नहीं लगेगी। इन योजनाओं में वित्तीय धोखाधड़ी, फ़र्ज़ी दस्तावेज़ों का उपयोग और अयोग्य लाभार्थियों को लाभ दिलाना शामिल हैं।
- प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (PMKVY): कैग की रिपोर्ट में 14,450 करोड़ रुपये के बजट में गड़बड़ी पायी गयी, जहाँ 34 लाख से अधिक युवा अपने हक़ के पैसे के लिए इंतज़ार कर रहे हैं और कई प्रशिक्षण केन्द्र बन्द होने के बावजूद सक्रिय दिखाये गये।
- प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY): तमिलनाडु के मदुरै में 21 लाख रुपये के घोटाले में बिना घर बनाये राशि निकाली गयी, जबकि राजस्थान के करौली में असल लाभार्थियों के बजाय प्रभावशाली लोगों को लाभ दिया गया।
- प्रधानमंत्री किसान समृद्धि निधि (PM-KISAN): राजस्थान के पाली जिले में 7 करोड़ रुपये के घोटाले में फ़र्ज़ी खातों में राशि ट्रांसफर की गयी और हरिद्वार में फ़र्ज़ी हस्ताक्षरों से अयोग्य लोगों को लाभ दिया गया।
- महाराष्ट्र में ‘लाडकी बहिन योजना’ में 3,541 करोड़ रुपये की हेरा फेरी का आरोप।
- ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ अभियान के लिए 446.7 करोड़ रुपये जारी किये गये थे। इसमें से एक बड़ा हिस्सा, लगभग 78.91 फ़ीसद रकम तो केवल मीडिया में प्रचार अभियान और जागरूकता के मद में ही ख़र्च हो गये! ‘दिल्ली लक्ष्मी योजना’ भी इसी श्रृंखला का अगला हिस्सा है। इसका लाभ दिल्ली की महिलाएँ शायद ही उठा पायें और कोई शक़ नहीं कि यह भी भाजपाई भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाये।
मज़दूर बिगुल, अगस्त 2026














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