बोलते आँकड़े  चीख़ती सच्चाइयाँ

बेतहाशा बढ़ती ग़ैरबराबरी

2025 के अन्त में आयी ऑक्सफ़ैम की रिपोर्ट बताती है कि मोदी सरकार के विकास के तमाम दावों के बावजूद सच यह है देश में भयानक ग़रीबी और ग़ैर-बराबरी लगातार बढ़ती जा रही है। विकास बेशक़ हो रहा है, लेकिन सिर्फ़ ऊपर बैठे मुट्ठीभर धनपशुओं का।

रिपोर्ट बताती है कि

  • देश की कुल सम्पत्ति के लगभग 77 प्रतिशत पर देश के सबसे धनी 10 प्रतिशत लोगों का क़ब्ज़ा है, जिसमें सबसे ऊपर के एक प्रतिशत लोगों के पास 40-50 प्रतिशत से अधिक सम्पत्ति है।
  • पिछले पाँच वर्षों के दौरान, भारतीय अरबपतियों की सम्पत्ति में 121 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई, जबकि देश की मेहनतकश आम जनता कोविड के बाद से चली आ रही परेशानियों से जूझ रही है।
  • देश के सबसे धनी 21 अरबपतियों के पास 70 करोड़ भारतीयों के बराबर सम्पत्ति है।
  • वर्ष 2021-22 में जनसंख्या के सबसे निचले 50 प्रतिशत हिस्से ने कुल जीएसटी के लगभग 64 प्रतिशत का भुगतान किया, जबकि सबसे ऊपर के 10 प्रतिशत ने केवल 3 प्रतिशत जीएसटी चुकाया।
  • सबसे ऊपर की 10 प्रतिशत लोग राष्ट्रीय आय का 58 प्रतिशत हिस्सा हड़प लेते हैं, जबकि सबसे नीचे के 50 प्रतिशत लोगों को राष्ट्रीय आय का सिर्फ़ 15 प्रतिशत हिस्सा मिलता है।
  • एक दशक में अरबपतियों की सम्पत्ति लगभग 10 गुना बढ़ गयी। उनकी कुल सम्पत्ति भारत के पूरे केन्द्रीय बजट से भी ज़्यादा है।
  • हर साल 6 करोड़ 30 लाख लोग दवा-इलाज के ख़र्च के कारण ग़रीबी में धकेल दिये जाते हैं – यानी लगभग हर सेकण्ड में दो लोग।
  • ग़ैर-बराबरी का आलम यह है कि ग्रामीण भारत में न्यूनतम वेतन पाने वाले मज़दूर को एक साल में उतना कमाने में 941 साल लग जायेंगे, जितना एक प्रमुख भारतीय गारमेंट कम्पनी का सीईओ एक साल में कमा लेता है।

ऐसे में भगतसिंह की चेतावनी याद आती है जो उन्होंने अंग्रेज़ों की अदालत में अपने बयान में दी थी :

यह भयानक असमानता और ज़बरदस्ती लादा गया भेदभाव दुनिया को एक बहुत बड़ी उथलपुथल की ओर लिये जा रहा है। यह स्थिति अधिक दिनों तक क़ायम नहीं रह सकती। स्पष्ट है कि आज का धनिक समाज एक भयानक ज्वालामुखी के मुख पर बैठकर रंगरेलियाँ मना रहा है और शोषकों के मासूम बच्चे तथा करोड़ों शोषित लोग एक भयानक खड्ड की कगार पर चल रहे हैं।

 

मज़दूर बिगुल, जनवरी 2026

 

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