Category Archives: बोलते आँकड़े, चीख़ती सच्चाइयाँ

बढ़ते आर्थिक अन्तर

स्विट्जरलैंड के एक बैंक क्रेडिट स्विस की एक नयी रिपोर्ट के अनुसार दुनिया भर में अमीर-गरीब के बीच का अन्तर लगातार बढ़ रहा है। यह अन्तर इतिहास के किसी भी दौर से अब अधिक हो चुका है, जहाँ ऊपर की 1% आबादी की कुल संपत्ति बाकी 99% आबादी की संपत्ति के बराबर हो चुकी है। इस रिपोर्ट के अनुसार ऊपर की 1% आबादी के पास संसार की कुल सम्पदा का लगभग 50% हिस्सा है, जबकि नीचे की 50% आबादी के पास इसका 1% भी नहीं बनता| ऊपर की 10% आबादी के पास संसार की 87.7% संपत्ति इकट्ठी हो चुकी है, जबकि नीचे की 90% आबादी के पास केवल 12.3% हिस्सा है।

बोलते आँकड़े, चीखती सच्चाइयाँ! – अमीर और गरीब आबादी के बीच आर्थिक गैर-बराबरी

ऑक्सफैम की एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक अमीर और गरीब आबादी के बीच आर्थिक गैर-बराबरी इतिहास के पहले किसी भी दौर से ज्यादा हो चुकी है। 2008 से शुरू हुए आर्थिक संकट के बाद से तो यह गैर-बराबरी और अधिक गति से बढ़ी है। रिपोर्ट के मुताबिक विश्व के 62 सबसे अमीर व्यक्तियों की कुल संपदा विश्व की 50% सबसे गरीब आबादी की संपदा के बराबर है, यानी 62 व्यक्तियों की कुल संपदा 350 करोड़ लोगों की संपदा के बराबर है! 2010 के बाद से दुनिया की सबसे गरीब आबादी में से 50 फीसदी की संपत्ति करीब 1,000 अरब डॉलर घटी है। यानी उनकी संपत्ति में 41% की जोरदार गिरावट आई है। रिपोर्ट के अनुसार 2010 में दुनिया की सबसे गरीब आबादी के 50 फीसदी के पास जितनी धन संपदा थी, उतनी ही संपत्ति दुनिया के 388 सबसे अधिक अमीर लोगों के पास थी. उसके बाद यह आंकड़ा लगातार घट रहा है. 2011 में यह घटकर 177 पर आ गया है, 2012 में 159, 2013 में 92 और 2014 में 80 पर आ गया।

सेठों ने डकारे बैंकों के 1.14 लाख करोड़ रुपये

यह रकम कितनी बड़ी है इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि अगर ये सारे कर्ज़दार अपना कर्ज़ा लौटा देते तो 2015 में देश में रक्षा, शिक्षा, हाईवे और स्वास्थ्य पर खर्च हुई पूरी राशि का खर्च इसीसे निकल आता। इसमें हैरानी की कोई बात नहीं। पूँजीपतियों के मीडिया में हल्ला मचा-मचाकर लोगों को यह विश्वास दिला दिया जाता है…

क्या मेहनतकश के लिए “ख़ुशी” का मतलब यही है?

पूँजीवाद का यह निर्मम रूप है जहाँ एक तरफ ख़ुशी दिखाने के सर्वे किये जाते हैं और दूसरी तरफ मेहनतकश वर्ग के लोगों के सर से छत और उनके बच्चों के मुँह से निवाला छीन लिया जाता है। क्या इन लोगों से पूछा जाता है कि ये कितने ख़ुश हैं? मेहनतकश की यही आबादी हर तरह के उत्पादन के लिए दिन रात हाड़तोड़ मेहनत करती है। इसी आबादी के खून-पसीने से चंडीगढ़ जैसे शहरों की सुन्दरता बन पाती है और इन शहरों में रहने वाले खाये-पिये-अघाये वर्ग की ‘ख़ुशहाली’ होती है। लेकिन यही आबादी अपने बच्चों के लिए रोटी तक जुटा नहीं पाती और अब तो हालात ये हैं कि इस आबादी के सर पर कच्ची छत तक नहीं रहने दी जा रही। खाये- पिये वर्गों की ख़ुशी के लिए करोड़ों मेहनतकश पूँजीवाद का यह अभिशाप झेलने को मजबूर हैं।

चिकित्सा में खुली मुनाफ़ाख़ोरी को बढ़ावा, जनता के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़

फ़रवरी 2015 के टाइम्स ऑफ़ इण्डिया में छपी एक रिपोर्ट पर नज़र डालें, जो निजी अस्पतालों के डॉक्टरों से बातचीत पर आधारित है। इसके अनुसार निजी अस्पतालों में सिर्फ़ उन्हीं डॉक्टरों को काम पर रखा जाता है जो ज़्यादा मुनाफ़ा कमाने में मदद करते हों और मरीजों से भिन्न-भिन्न प्रकार के टेस्ट और दवाओं के माध्यम से ज़्यादा से ज़्यादा पैसे वसूल कर सकते हों। यदि एक डॉक्टर मरीज के इलाज में 1.5 लाख रुपया लेता है तो उसे 15 हज़ार रुपये दिये जाते हैं और बाक़ी 1.35 लाख अस्पताल के मुनाफ़े में चले जाते हैं।

भारत में जन्म लेने वाले अधिकतर बच्चे और उन्हें जन्म देने वाली गर्भवती माँएँ कुपोषित

विकास के लम्बे-चौड़े दावों और ‘बेटी बचाओ’ जैसे सरकारी नुमायशी अभियानों के बावजूद एक नंगी सच्चाई यह है कि भारत में जन्म लेने वाले अधिकतर बच्चे और उन्हें जन्म देने वाली गर्भवती माँएँ कुपोषित होती हैं। यहाँ तक कि उनकी स्थिति कांगो, सोमालिया और जिम्बाब्वे जैसे ग़रीब अफ्रीकी देशों के बच्चों और गर्भवती स्त्रियों से भी बदतर है।

हर पाँच में चार लोग अपराध साबित हुए बिना ही भारतीय जेलों के नर्क के क़ैदी हैं

सवाल उठता है कि दलितों, आदिवासियों और मुस्लिमों के जेलों में अधिक अनुपात में होने के तथ्य को किस रूप में देखा जाये? क्या वे सब स्वभाव से ही अधिक अपराधी है? या उन्हें मात्र जातिगत, सामाजिक एवं धार्मिक पहचान के आधार पर ही जानबूझकर निशाना बनाया जाता है? या इस रूप में देखा जाये कि इन तीनों समुदायों के लोगों का बहुसंख्यक भाग ग़रीब और मज़दूर है।

औद्योगिक कचरे से दोआबा क्षेत्र का भूजल और नदियाँ हुईं ज़हरीली

देश के विभिन्न हिस्सों में फैले सभी औद्योगिक क्षेत्रों में औद्योगिक कचरा यूँ ही बिना किसी ट्रीटमेण्ट या रिसाइक्लिंग के आसपास की नदियों या जलाशयों में छोड़ दिया जाता है। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि पूँजीपति ज़्यादा से ज़्यादा मुनाफ़े के लक्ष्य की सनक में इतने डूबे रहते हैं कि कारख़ाने के भीतर श्रम क़ानूनों को ताक पर रखकर मज़दूरों की हड्डियाँ निचोड़ने से भी जब उनका जी नहीं भरता तो वे कचरे के ट्रीटमेण्ट में लगने वाले ख़र्च से बचने के लिए तमाम पर्यावरण सम्बन्धी क़ानूनों और कायदों को ताक पर रखकर ज़हरीले कचरे को आसपास की नदियों अथवा जलाशयों में बिना ट्रीट किये छोड़ देते हैं। यही वजह है कि इस देश की तमाम नदियाँ तेज़ी से परनाले में तब्दील होती जा रही हैं।

बोलते आँकड़े चीखती सच्चाइयाँ

एक रिपोर्ट के अनुसार अरबपतियों की संख्या के मामले में भारत दुनिया में आठवें नंबर पर पहुंच गया है और इस समय भारत में 14,800 अरबपति हैं। पूँजीपतियों की बाँछें खिली हुई हैं, मध्यवर्ग भारत की इस “तरक्की” पर लहालोट हुआ जा रहा है। पूँजीवादी मीडिया इस विकास का जोर-शोर से गुणगान कर रहा है। दूसरी ओर देश की 77 फीसदी आबादी रोजाना महज बीस रुपये पर गुजारा कर रही है। देश की 80 फीसदी जनता को शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास और पानी जैसी बुनियादी सुविधाएं भी मयस्सर नहीं हैं। आज़ादी मिलने के 67 साल बाद की स्थिति यह है कि देश की ऊपर की दस फीसदी आबादी के पास कुल परिसम्पत्ति का 85 प्रतिशत इकट्ठा हो गया है जबकि नीचे की 60 प्रतिशत आबादी के पास महज दो प्रतिशत है। भारत में 0.01 फीसदी लोग ऐसे हैं जिनकी आय देश की औसत आय से दो सौ गुना अधिक है। देश की ऊपर की तीन फीसदी और नीचे की चालीस फीसदी आबादी की आमदनी के बीच का फासला साठ गुना हो चुका है।

स्वतंत्रता दिवस – क्यों जश्न मनाये मेहनतकश आबादी!

आज़ादी के 67 सालों के बाद हम कहाँ पहुँचे हैं, इस पर एक नज़र डालना दिलचस्प होगा। आज़ादी के बाद से आज तक भारतीय समाज अधिकाधिक दो खेमों में बँटता चला गया है। 1990 के बाद यह खाई और भी तेज़ी से बढ़ने लगी है। एक ओर मुट्ठी भर लोग हैं जिन्होंने पूँजी, ज़मीनों, मशीनों, ख़दानों आदि पर अपना मालिकाना क़ायम कर लिया है तो दूसरी ओर बहुसंख्य मज़दूर, ग़रीब-मध्यम किसान और निम्न-मध्य वर्ग के लोग हैं जिनका वर्तमान और भविष्य इन मुट्ठी भर पूँजीपतियों के रहमोकरम पर आश्रित हो गया है। एक रिपोर्ट के अनुसार भारत दुनिया का 10वाँ सबसे धनी देश है, लेकिन प्रति-व्यक्ति आय के हिसाब से देखें तो दुनिया में भारत का स्थान 149 वाँ बैठता है। 2013 में देश में 55 अरबपति थे जिनकी दौलत दिन-दूनी रात चौगुनी रफ्ऱतार से बढ़ती जा रही है। वहीं दूसरी ओर दुनिया का हर तीसरा ग़रीब भारतीय है और देश के सबसे धनी राज्य गुज़रात में सबसे अधिक कुपोषित बच्चे हैं। आज हमारे देश में 20 करोड़ लोग ऐसे हैं जिन्हें अगर अच्छी मज़दूरियों पर कारखानों में काम मिले तो वे अपना वर्तमान पेशा छोड़ने के लिए तैयार हैं। इनमें ज़्यादातर लोग फेरी लगाने, फूल बेचने, खोमचा लगाने, जूतों-कपड़ों की मरम्मत करने आदि जैसे कामों में लगे हुए हैं। नये कारखाने लगने और उत्पादन में बढ़ोत्तरी के बावजूद नये रोज़गार लगभग नहीं के बराबर पैदा हो रहे हैं। कारखानों में काम करने वाले मज़दूरों की वास्तविक मज़दूरियाँ लगातार घट रही हैं। 1984 में जहाँ कुल उत्पादन लागत का 45 प्रतिशत हिस्सा मज़दूरी के रूप में मज़दूरों को दिया जाता था, वह 2010 तक आते-आते केवल 25 प्रतिशत रह गया। इसका सीधा मतलब हैः ज़्यादा मेहनत और अधिक उत्पादन करने के बावजूद मज़दूरियाँ लगातार घटी हैं जबकि मालिकों का मुनाफ़ा लगातार बढ़ता गया है।