रेलवे-सम्बन्धी कैग की रिपोर्ट ने खोली पोल: 89 प्रतिशत रेलवे स्टेशनों पर बुनियादी यात्री सुविधाओं की कमी, सुरक्षा से जुड़े 20,304 काम आज भी अधूरे!

ज्योति

देश में रेलवे के ‘आधुनिकीकरण’ का प्रचार पिछले कई वर्षों से ज़ोर-शोर से किया जा रहा है। नयी ट्रेनें, नये स्टेशन, स्टेशन पुनर्विकास, हाईस्पीड ट्रेन और “विश्वस्तरीय” रेलवे जैसे दावों का हवाला देकर सरकारी पन्नों में भारतीय रेलवे की तस्वीर लगातार चमकदार होती जा रही है। लेकिन इस चमकदार तस्वीर से इतर आम यात्रियों के लिए स्थिति कुछ और ही दिखती है। हाल ही जारी हुई नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की ऑडिट रिपोर्ट ने रेल सेवाओं के विषय में ऊँचे सरकारी दावों और उनकी ज़मीनी हक़ीक़त के बीच की खाई को सबके सामने रख दिया है। कैग की रिपोर्ट के अनुसार, जिन 512 ग़ैर-उपनगरीय रेलवे स्टेशनों का ऑडिट किया गया, उनमें से 458, यानी क़रीब 89 प्रतिशत स्टेशनों पर निर्धारित बुनियादी यात्री सुविधाओं तक में कमी पायी गयी। इन स्टेशनों पर पीने का पानी, शौचालय, बैठने की जगह, पंखे, वाटर कूलर और प्लेटफॉर्म शेड जैसी सुविधाओं तक आम नागरिकों को मुहैया नहीं करायी गयी हैं। यानी जिस रेलवे को “विश्वस्तरीय” बनाने के बड़े-बड़े दावे किये जा रहे हैं, उसके लगभग हर नौ में से आठ स्टेशनों पर यात्रियों को अभी भी बुनियादी सुविधाएँ पूरी तरह उपलब्ध नहीं हैं।

हालाँकि मामला केवल सुविधाओं की कमी तक ही सीमित नहीं है। कैग के ऑडिट में यह भी सामने आया कि 2019-20 से 2023-24 के दौरान यात्री सुविधाओं के लिए उपलब्ध कराये गये बजट का 36 से 44 प्रतिशत हिस्सा ख़र्च ही नहीं किया गया। जहाँ एक तरफ़ यात्रियों को बुनियादी सुविधाएँ मुहैया नहीं हो रहीं हैं, वहीं दूसरी तरफ़ इन सुविधाओं के लिए उपलब्ध फण्ड और संसाधनों का एक बड़ा हिस्सा इस्तेमाल तक नहीं हुआ। सवाल तो यह बनता है कि जब बुनियादी सुविधाएँ उपलब्ध नहीं हैं और उनके लिए आवण्टित फण्ड भी पूरा ख़र्च नहीं हो रहा है, तो रेलवे का यह ‘आधुनिकीकरण’ आख़िर हो किसके लिए रहा है? यहाँ तक कि रेलवे बोर्ड ने यात्रियों के लिए जो न्यूनतम आवश्यक सुविधाओं के मानक पहले से ही निर्धारित कर रखे हैं, कैग के ऑडिट में इन मानकों के पालन की स्थिति भी बेहद बदतर मिली।

ऑडिट में शामिल 512 स्टेशनों में से 458 पर निर्धारित यात्री सुविधाओं में कमियों के अलावा यह भी पाया गया कि यात्री सुविधाओं से जुड़ी कई परियोजनाएँ भी तय समय में पूरी नहीं हुई हैं। 325 ग़ैर-अमृत भारत स्टेशनों से जुड़ी 395 परियोजनाओं की जाँच में बड़ी संख्या में परियोजनाएँ एक वर्ष से लेकर चार वर्ष से भी अधिक समय की देरी से चलती मिलीं। यहाँ मामला साफ़ हो जाता है कि सवाल केवल कुछ स्टेशनों की अव्यवस्था का नहीं है बल्कि रेलवे की प्रणालीगत समस्या का है। आज सरकार भले ही अपने प्रचार में ‘आधुनिकीकरण’ के नाम पर नये भवन, नयी ट्रेनों और नयी परियोजनाएँ के जुमले उछाल ले, लेकिन आम यात्रियों के लिए रेलवे का पहला मतलब आज भी प्रदूषित पानी, गन्दे शौचालय, बैठने की जगह न मिलना और एक असुरक्षित यात्रा है।

नये एस्केलेटर, लिफ़्ट, एयरपोर्ट जैसे स्टेशन और आधुनिक इमारतों की तस्वीरें दिखा कर जुमले बरसाने वाली भारतीय रेलवे साफ़ पीने के पानी जैसी मूलभूत ज़रूरत भी अपने यात्रियों को मुहैया कराने में असफल पायी गयी है। ऑडिट के दौरान कुछ स्टेशनों पर पानी के नमूनों में ‘टोटल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया’ सुरक्षित मानकों से ऊपर पाये गये। आठ स्टेशनों के वाटर कूलरों के पानी में ‘ई कोली’, जो कि एक घातक जीवाणु है, की मौजूदगी भी दर्ज की गयी। हालाँकि यह भी हो सकता है कि साफ़ पानी का सवाल “विश्वस्तरीय रेलवे” के लिए इतना मामूली हो कि इसके बजाय वह ‘बड़े’ मसलों पर काम करने में व्यस्त हो!

पानी जैसे ‘छोटे’ मसलों से हटकर अगर ‘बड़े’ मसलों पर बात की जाये तो भी तस्वीर कुछ ऐसी ही नज़र आती है। रेलवे की सुरक्षा व्यवस्था को मज़बूत करने के लिए बनाया गया ‘राष्ट्रीय रेल सुरक्षा कोष’ यानी RRSK है, जिसका उद्देश्य रेलवे की पुरानी परिसम्पत्तियों को बदलने और सुरक्षा से जुड़े महत्वपूर्ण कामों के लिये फण्ड उपलब्ध कराना है। कैग के अनुसार, RRSK की शुरुआती पाँच-वर्षीय अवधि में रेलवे को अपने आन्तरिक संसाधनों से 25,000 करोड़ रुपये का योगदान करना था। वास्तविक योगदान 5,324.62 करोड़ रुपये रहा। अर्थात् निर्धारित आन्तरिक योगदान का केवल लगभग पाँचवा हिस्सा ही उपलब्ध कराया गया। अब सवाल यह है कि जब रेलवे की सुरक्षा के लिए अलग कोष बनाया गया था और उसके लिए संसाधन जुटाने की ज़िम्मेदारी भी तय थी, तो निर्धारित धनराशि क्यों नहीं जुटायी गयी? आगे ग़ौर किया जाये तो रिपोर्ट में कैग ने RRSK के धन के इस्तेमाल को लेकर भी टिप्पणियाँ की हैं। 2022-23 से 2024-25 के दौरान RRSK से 3,397.60 करोड़ रुपये ऐसे कार्यों पर ख़र्च किये गये जिन्हें रिपोर्ट ने ग़ैर-प्राथमिकता वाले कार्यों के रूप में चिन्हित किया। इसके अलावा 823.14 करोड़ रुपये ऐसे कार्यों के लिए आवण्टित किये गये जो निर्धारित प्राथमिकताओं के अनुरूप नहीं थे। इन आँकड़ों को सुरक्षा से जुड़े 20,304 अधूरे कार्यों के साथ रखकर देखें तो सवाल और गम्भीर हो जाता है।

अकसर रेल दुर्घटना होने के बाद किसी एक कर्मचारी को बलि का बकरा बनाकर पूरी समस्या को एक व्यक्ति की ग़लती तक सीमित कर दिया जाता है और इस तरह समस्त रेल प्रशासन अपने आप को बरी कर लेता है। लेकिन रेलवे जैसी विशाल व्यवस्था में सुरक्षा कई स्तरों पर निर्भर करती है—ट्रैक का रख-रखाव, सिग्नल व्यवस्था, उपकरणों की स्थिति, सुरक्षा कार्यों का समय पर पूरा होना और पर्याप्त संख्या में प्रशिक्षित कर्मचारियों की उपलब्धता, वग़ैरह। दरअसल रेलवे में कर्मचारियों की कमी और बढ़ते काम के बोझ का सवाल पिछले वर्षों में लगातार सामने आता रहा है। ‘मज़दूर बिगुल’ के जुलाई 2024 अंक में रेलवे पर प्रकाशित रिपोर्ट में कर्मचारियों की कमी, लोको पायलटों पर बढ़ते काम के दबाव, रेलवे में ठेकाकरण और यात्रियों की बढ़ती भीड़ पर विस्तार से बात रखी गयी थी। रेलवे में जब सुरक्षा के नाम पर विशेष कोष है और सुरक्षा के हज़ारों काम अधूरे हैं तब इसी दौरान सुरक्षा कोष से ऐसे मदों पर भी ख़र्च हुआ जिन्हें कैग ने प्राथमिकता के अनुरूप ही नहीं माना। ऐसे में रेलवे में हुए हादसों और सुरक्षा में हुई कमियों को केवल तकनीकी समस्या या किसी कर्मचारी की व्यक्तिगत ग़लती के रूप में देखना अपर्याप्त है। हादसों में हुई मौतें दरअसल व्यवस्थागत हत्याएँ हैं, जिस बात की पुष्टि कैग की इस रिपोर्ट से स्पष्ट तौर पर होती है।

रेलवे की समस्याओं पर अक्सर संसाधनों की कमी का तर्क दिया जाता है। लेकिन सरकार के ख़ुद के आँकड़े इस तर्क को पूरी तरह ख़ारिज कर देते हैं । 2019-20 से 2023-24 के दौरान यात्री सुविधाओं के लिए आवण्टित बजट का 36 से 44 प्रतिशत हिस्सा ख़र्च ही नहीं हुआ। जब एक ओर स्टेशन पर बुनियादी सुविधाओं की कमी हो और दूसरी ओर उसी मद के लिए उपलब्ध धन का बड़ा हिस्सा ख़र्च ही न किया जाये, तो सवाल रेलवे की प्राथमिकताओं और योजना-क्रियान्वयन पर उठता ही है।

‘वन्दे भारत’ से अलग भी एक रेलवे है जो प्रचार के लिए इस्तेमाल नहीं होती। शायद इसलिए उसकी ऐसी दुर्व्यवस्था है। रेलवे के आधुनिकीकरण की सरकारी कहानी में नयी ट्रेनों और आधुनिक स्टेशनों की चमचमाती तस्वीर तो ज़रूर है, लेकिन वह भारतीय रेलवे की सच्चाई से बिल्कुल उलट है। वास्तविकता यह है कि आज भी जनरल और स्लीपर डिब्बों में भीड़, टिकट की समस्या, प्लेटफॉर्म पर लम्बा इंतज़ार, साफ़-सफ़ाई व स्वच्छ पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी और सुरक्षा का पूर्ण अभाव है। इस विरोधाभास को समझे बिना रेलवे के “आधुनिकीकरण” की कहानी अधूरी रहेगी।

भारतीय रेलवे केवल एक परिवहन सेवा नहीं है। यह करोड़ों लोगों की रोज़मर्रा की ज़िन्दगी का हिस्सा है। मज़दूर, कर्मचारी, छात्र, छोटे किसान, छोटे व्यापारी और निम्न आय वाले परिवार बड़ी संख्या में रेलवे पर निर्भर हैं। ऐसे में रेलवे की सफलता का पैमाना सिर्फ नये स्टेशनों या नयी ट्रेनें का उद्घाटन करना मात्र नहीं हो सकता। असल सवाल तो यह है कि आम यात्रियों की आज स्थिति क्या है? क्या उसे साफ़ पानी मिलता है? क्या शौचालय पर्याप्त और साफ़ हैं? क्या प्लेटफॉर्म पर बैठने और प्रतीक्षा करने की उचित व्यवस्था है? क्या सुरक्षा से जुड़े काम समय पर पूरे होते हैं? क्या रेलवे में पर्याप्त कर्मचारी हैं? क्या ट्रैक और दूसरी आधारभूत संरचनाओं का समय पर रख-रखाव हो रहा है?  इन सब पहलुओं से जुड़े आँकड़े आज हमारे सामने सच्चाई साफ़ कर चुके हैं। रेलवे का उद्देश्य अगर सार्वजनिक सेवा है तो उसकी प्राथमिकता आम जनता की सुरक्षित, सस्ती और सुविधाजनक यात्रा होनी चाहिए। लेकिन आज यह पूछना ज़रूरी हो गया है कि विकास की प्राथमिकता किसके हितों से तय हो रही है?

हम इन रिपोर्टों को केवल अधिकारियों की लापरवाही या परियोजनाओं में देरी की समस्या के रूप में नहीं देख सकते है। रेलवे में पिछले वर्षों से निजीकरण, निगमीकरण और ठेकाकरण की दिशा में काफ़ी बदलाव किये जा रहे हैं। इसके साथ ही कर्मचारियों की संख्या और काम की परिस्थितियाँ भी बद से बदतर होती जा रही हैं । दरअसल ये बदलाव मोदी सरकार के सोचे-समझे हथकण्डे हैं जिनसे वह सार्वजनिक सम्पत्तियों को जानबूझ कर बदहाल करके उनके निजीकारण का रास्ता साफ़ कर देती है। हरेक सार्वजनिक उपक्रम का तेज़ी से होता जा रहा यह निजीकरण मज़दूर वर्ग की रोज़मर्रा की ज़िन्दगी और भी मुश्किल बना रहा है। पूँजीपतियों की तिजोरियाँ भर कर मोदी सरकार अपने असली लक्ष्य को पूरा करने में कोई कमी नहीं छोड़ रही है। रेलवे की यह दुर्व्यवस्था इसकी ही बानगी है।

 

मज़दूर बिगुल, अगस्त 2026

 

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