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पेट्रोल-डीज़ल के दामों में पिछले 11 दिनों में चौथी बार बढ़ोतरी से मेहनतकश आबादी बेहाल

ऐसे में इस सरकार से यह सवाल बनता है कि जब अन्‍तरराष्‍ट्रीय बाज़ार में तेल की क़ीमतों में हुई भारी गिरावट का फ़ायदा आम जनता को नहीं हुआ तो फिर आज कच्‍चे तेल की क़ीमत में हो रही बढ़ोतरी का ख़ामियाज़ा आम जनता क्‍यों भुगते? पिछले 12 सालों में मोदी सरकार ने जहाँ अप्रत्‍यक्ष करों के रूप में आम जनता पर करों का बोझ बढ़ाया है वहीं पूँजीपतियों और सेठ-व्‍यापारियों को करों में अरबों रुपयों की रियायत दी है। प्रभावी कॉरपोरेट कर को 35 प्रतिशत से घटाकर 25 प्रतिशत से भी कम कर दिया गया है। अगर आज इस सरकार को ग़रीबों-मज़दूरों आह सुनायी देती तो वह आसानी से पेट्रोल-डीज़ल पर लगाये जा रहे केन्‍द्रीय करों में ज्‍़यादा कटौती करके उसकी भरपायी धन्‍नासेठों पर करों का बोझ बढ़ाकर कर सकती थी। परन्‍तु सरकार की प्राथमिकता लोगों की भूख शान्‍त करना नहीं बल्कि धन्‍धा करने की सहूलियत सुनिश्चित करना है। यही वजह है देश की जनता त्राहि-त्राहि कर रही है और धन्‍नासेठों की ऐय्याशियाँ बढ़ती जा रही हैं। इस प्रकिया में इस सरकार का जनविरोधी चरित्र ज्‍़यादा से ज्‍़यादा उजागर होता जा रहा है।

कॉकरोच जनता पार्टी और उसकी लोकप्रियता : भारतीय जनता में व्‍यवस्‍था और मौजूदा सरकार के प्रति बढ़ते गुस्‍से व असन्‍तोष और साथ ही विकल्‍पहीनता की अभिव्‍यक्ति 

कॉकरोच जनता पार्टी की अचानक बढ़ी भारी लोकप्रियता के पीछे मुख्‍य कारण यह है कि हमारे देश का शासक वर्ग, उसकी राज्‍यसत्‍ता और उसके विभिन्‍न अंग-उपांग मेहनतकश जनता की तक़लीफ़ों के प्रति आश्‍चर्यजनक असंवेदनशीलता दिखा रहे हैं और उनका रवैया काफ़ी हद तक पुराने फ्रांस की रानी मैरी एन्‍त्‍वानेत जैसा हो चुका है जिसने पूछा था कि “अगर जनता के पास खाने के लिए रोटी नहीं है, तो वह केक क्‍यों नहीं खा लेती?” उसी प्रकार, भूख और कुपोषण की कगार पर खड़ी भारी बहुसंख्‍यक मेहनतकश और आम मध्‍यवर्गीय आबादी को बताया जा रहा है कि “सब चंगा सी”, “मेलोडी खाओ खुद जान जाओ”, “देश शान्ति और विकास के पथ पर अग्रसर है”, आदि। वहीं दूसरी ओर, खाता-पीता उच्‍च मध्‍य वर्ग और उच्‍च वर्ग नशे में बुरी तरह से टल्‍ली है। यह नशा है उपभोक्‍तावाद, खाऊ-पियू-अघाऊ संस्‍कृति का जिसमें चूर यह वर्ग निरन्‍तर “खाओ-पियो-ऐश करो मितराँ” गाने पर उन्‍मादी नृत्‍य करता रहता है। उसे न सिर्फ़ सुई से लेकर जहाज़ तक बनाने वाली और हर सेवा पैदा करने वाली जनता के दुख-दर्द से कोई लेना-देना नहीं है, बल्कि वह उसकी खिल्‍ली भी उड़ाता है। प्राचुर्य और धनाढ्यता का उसका यह अश्‍लील प्रदर्शन भी आँसुओं के समन्‍दर में खड़ी मेहनतकश जनता के धैर्य को परख रहा है।

पाँच राज्‍यों के विधान सभा चुनावों के नतीजों से फ़ासीवाद का विस्‍तार स्‍पष्‍ट: मज़दूर वर्ग के लिए इसके मायने क्‍या हैं?

पाँच राज्‍यों के इन चुनावी नतीजों से कुल मिलाकर जो तस्‍वीर उभरती है वह निश्चित रूप से मज़दूर वर्ग के लिए चिन्‍ता का सबब है। फ़ासीवादी दानव की बढ़ती ताक़त और देश के नए हिस्‍सों में उसका पैर पसारना निश्चित रूप से मज़दूर वर्ग के लिए एक बुरी ख़बर है क्‍योंकि इसमें कोई दो राय नहीं कि फ़ासीवादी भाजपा मज़दूरों की दुश्‍मन नंबर वन है। परन्‍तु ऐसे में बदहवास होकर किसी ग़ैर-फ़ासीवादी पार्टी का पिछलग्‍गू बनने से मज़दूरों की समस्‍याओं का समाधान नहीं होने वाला और न ही इससे फ़ासीवादियों को निर्णायक शिकस्‍त मिलने वाली है। आज ज़रूरत योजनाबद्ध ढंग से मज़दूर वर्ग के बीच क्रान्तिकारी विचारों का बड़े पैमाने पर प्रचार-प्रसार करने की है और फ़ासीवाद-विरोधी संघर्ष को पूँजीवाद-विरोधी संघर्ष के अभ‍िन्‍न अंग के रूप में आगे बढ़ाने की है।

सुप्रीम कोर्ट अधिवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा नोएडा मज़दूर आन्दोलन के दौरान यूपी पुलिस की संदिग्ध भूमिका पर सवाल!

दिनांक 19 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ताओं और प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा प्रेस क्लब ऑफ़ इण्डिया में प्रेस वार्ता का आयोजन किया गया। इस प्रेस वार्ता को सुप्रीम कोर्ट…

अखिल भारतीय सांस्कृतिक प्रतिरोध अभियान ‘हम देखेंगे’ का संयुक्त बयान मजदूर आंदोलन के समर्थन में लेखकों कलाकारों का एकजुटता बयान:

अखिल भारतीय सांस्कृतिक प्रतिरोध अभियान ‘हम देखेंगे’ का संयुक्त बयान मजदूर आंदोलन के समर्थन में लेखकों कलाकारों का एकजुटता बयान: हम लेखक कलाकार देश भर में चल रहे मजदूरों के…

हमारी पोस्ट पर नोएडा पुलिस द्वारा दिए गए स्पष्टीकरण का जवाब

हमारी पोस्ट पर नोएडा पुलिस द्वारा दिए गए स्पष्टीकरण का जवाब आदरणीय महोदय, हम सविनय व ससम्मान कहना चाहते हैं : 1) 11 अप्रैल की रात इन चार व्यक्तियों को…

क़ानून और न्याय का माख़ौल उड़ाती यूपी सरकार और पुलिस!! नोएडा के मज़दूर आन्दोलन का दमन करने के लिये यूपी पुलिस फर्ज़ी ख़बरों और मुक़दमों के ज़रिये छात्रों, सामाजिक कार्यकर्ताओं को बना रही है निशाना!

क़ानून और न्याय का माख़ौल उड़ाती यूपी सरकार और पुलिस!! नोएडा के मज़दूर आन्दोलन का दमन करने के लिये यूपी पुलिस फर्ज़ी ख़बरों और मुक़दमों के ज़रिये छात्रों, सामाजिक कार्यकर्ताओं…

दिल्‍ली एनसीआर में जायज़ माँगों को लेकर जारी मज़दूर आन्‍दोलन को सही दिशा देने के वास्‍ते 𝐓𝐨 𝐭𝐚𝐤𝐞 𝐭𝐡𝐞 𝐨𝐧𝐠𝐨𝐢𝐧𝐠 𝐰𝐨𝐫𝐤𝐞𝐫𝐬’ 𝐦𝐨𝐯𝐞𝐦𝐞𝐧𝐭 𝐢𝐧 𝐃𝐞𝐥𝐡𝐢-𝐍𝐂𝐑 𝐢𝐧 𝐭𝐡𝐞 𝐜𝐨𝐫𝐫𝐞𝐜𝐭 𝐝𝐢𝐫𝐞𝐜𝐭𝐢𝐨𝐧

हर जगह असंगठित मज़दूरों को अपनी यूनियनें संगठित करनी होंगी ताकि भविष्‍य में भी वे अपनी जायज़ माँगों को लेकर अनुशासित, व्‍यवस्थित व संगठित तौर पर संघर्ष कर सकें। मालिकान-प्रबन्‍धन व उनकी सरकारें आपसे ज्‍़यादा बड़ी नहीं हैं, बल्कि आपसे ज्‍़यादा संगठित हैं। आपका असंगठित होना ही उनके लिए सबसे बड़ा वरदान है। कारखाना मालिकों के संघ व संगठन होते हैं, जिसमें आपसी प्रतिस्‍पर्द्धा के बावजूद, मज़दूर वर्ग के विरुद्ध वे संगठित होते हैं। उनके ये संगठन और संघ ही मालिकान के हितों को सरकारों तक पहुँचाते हैं और चूँकि तमाम पार्टियों की सरकारें इसी मालिक वर्ग की मैनेजिंग कमेटी का काम करती हैं, इसलिए वे उनके हितों के अनुसार ही नीतियाँ बनाती हैं और कार्रवाई करती हैं। उनकी संगठित शक्ति द्वारा शोषण व उत्‍पीड़न का मुक़ाबला मज़दूर वर्ग केवल संगठ‍ित होकर ही कर सकता है। इसलिए आज ही समस्‍त असंगठित मज़दूरों को अपनी यूनियनों का गठन करने का प्रयास करना होगा। तभी हम अपने जायज़, क़ानूनी और संवैधानिक नागरिक व जनवादी अधिकारों के लिए संघर्ष कर सकते हैं।

मज़दूर कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी के ख़ि‍लाफ़ गोरखपुर में प्रदर्शन

देश भर में हो रहे मज़दूर आंदोलन ने फ़ासीवाद के असली चेहरे को बेनक़ाब कर दिया है। पूंजीपतियों के इशारे पर उत्तर प्रदेश की फ़ासीवादी योगी सरकार मज़दूर आंदोलन का बर्बर दमन करने पर उतारू है। स्थिति इतनी भयानक है कि आन्दोलन के बाद घर जा रहे साथी रूपेश, आकृति, सृष्टि और मनीषा के साथ उत्तर प्रदेश पुलिस ने बोटेनिकल गार्डन मेट्रो स्टेशन पर सीसीटीवी कैमरे के सामने मारपीट की और जबरन उत्तर प्रदेश पुलिस की गाड़ी में बैठा कर लेकर चली गई। इन्होंने महिला साथियों के साथ पुरुष पुलिसकर्मियों के साथ भी मारपीट की और उनको अगवा कर ले गए। 24 घण्टे बीत जाने के बाद भी अभी तक कार्यकर्ताओं को कहांँ रखा गया है नहीं मालूम चल पा रहा है।

Protest in Visakhapatnam opposing the arrest of Mazdoor Bigul activists

The police targeted Mazdoor Bigul activists who have been active in the strike, and forcibly picked them up from a metro station on Saturday evening while they were returning from the protest. Three women activists were detained without the presence of women police officers. Since last night, other activists have been waiting at the police station and demanding information, but the police haven’t given a shred of informationa—neither have they revealed their whereabouts nor have they released them.