Category Archives: समाज

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का वहशी चेहरा एक बार फिर बेनक़ाब

इन मानवता के दुश्मनों  के लिए मानव शरीर केवल भोग की वस्तु हैं जिसे ये पशुवत भोग लेना चाहते हैं। गुजरात दंगों से लेकर मुज़फ्फ़रनगर दंगों तक, कठुआ से लेकर हाथरस तक में इन नरपशुओं की बर्बरता पूरी दुनिया ने देखी है। ये संघी वैम्पायर समाज में तो लूट, शोषण, बलात्कार जैसे बर्बरता को अंज़ाम देते ही हैं, अपने संगठन में  भी उन लोगों को अपने हवस का शिकार बनाते रहते हैं जो उनके कुकर्मों को सर झुका कर सह लेते  हैं और अन्दर ही अन्दर घुटते हुए अन्ततः जीवन ख़त्म करने की दिशा में आगे बढ़ जाते हैं। केरल की यह जुगुप्सा पैदा करने वाली घटना भी संघ परिवार की इसी असलियत को सामने लाती है और इनके असली “संस्कारों” की कलई खोल देती है।

शिक्षा के निजीकरण की भेंट चढ़ गया यूपी के छात्र उज्जवल का जीवन

 उज्जवल ने अपने वीडियो सन्देश में इस पूँजीवादी व्यवस्था का असली चेहरा उजागर कर दिया था। उसकी यह मृत्यु केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उन तमाम आम घरों के छात्रों की भी है, जो आज बढ़ती फ़ीसों, घटती सीटों और घटते अवसरों की मार झेल रहे हैं। आज अधिकांश कैम्पसों में छात्रावासों की कमी, महंगी कैण्टीनें, खराब मेस, मेडिकल सुविधाओं का अभाव, साइकिल स्टैण्ड की कमी, शिक्षकों की कमी एक आम परिदृश्य है। लड़कियों के लिए “पिंक टॉयलेट” या “पिंक हॉल” जैसी घोषणाओं का महज़ दिखावा किया जा रहा है जबकि सच इस नौटंकी से कोसों दूर है। यह सब मिलकर बताता है कि शिक्षा किस तरह से आम छात्रों की पहुँच से बाहर होती चली जा रही है।

‘आई लव मुहम्मद’ विवाद और उसका फ़ासीवादी साम्प्रदायिक इस्तेमाल

कानपुर में मुस्लिमों पर एकतरफ़ा कार्यवाई के बाद पुलिस ने सफ़ाई देते हुए कहा कि यह कार्यवाई ‘आई लव मुहम्मद’ पर नहीं बल्कि नई परम्परा शुरू करने और माहौल ख़राब करने के लिए की गयी है।  लेकिन सवाल यह है कि माहौल ख़राब करने में हिन्दू संगठन के लोग भी ज़िम्मेदार थे लेकिन उन पर कोई कार्यवाई क्यों नहीं हुई? अपनी धार्मिक आस्था के अनुसार पोस्ट डालना कैसे गुनाह हो गया? बजरंग दल से लेकर कई कट्टरपंथी हिन्दू संगठनों ने ‘आई लव महादेव’ से लेकर ‘आई लव योगी’ तक के पोस्टर, बैनर लगाये और सोशल मीडिया पर पोस्ट डाली। लेकिन तब इस “नई परम्परा” पर कोई कार्यवाई नहीं हुई। सोशल मीडिया पर मुस्लिम-विरोधी साम्प्रदायिक पोस्ट की बाढ़ आ गयी लेकिन इस पर भी कोई कार्यवाई नहीं हुई। हाथरस में एक प्रदर्शन में तो ‘आई लव यूपी पुलिस’, ‘आई लव योगी’ और ‘आई लव महादेव’ के बैनर लेकर लोग नारे लगा रहे थे- ‘यूपी पुलिस तुम लट्ठ बजाओ, हम तुम्हारे साथ हैं’! क्या इससे माहौल ख़राब नहीं होता?

योगी-राज में उत्तर प्रदेश में जातिवादी गुण्डों का कहर

आज देश में होने वाली जातिगत उत्पीड़न की घटनाओं में उत्तर-प्रदेश पहले नम्बर पर आता है। इस बात से समझा जा सकता है कि जातिवादी गुण्डों और अपराधियों के मन में कानून का डर बैठा है या संरक्षण पाने का विश्वास! ‘राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो’ के 2022 के आँकड़ों के अनुसार यूपी में दलितों के ख़िलाफ़ अपराध के 15,368 मामले दर्ज हुए जो देश में कुल दलित-विरोधी अपराधों का 26.7% है। वहीं इन घटनाओं में 2021 की तुलना में 16% की वृद्धि हुई है। शायद जातिगत उत्पीड़न में उत्तर प्रदेश के प्रथम स्थान और वृद्धि को ही देखकर नरेन्द्र मोदी ने कहा था कि ‘योगी का कानून व्यवस्था मॉडल देश के लिए उदाहरण है।’ इसी मॉडल को राजस्थान और मध्य-प्रदेश की भाजपा सरकारों ने अपना लिया है, तभी तो ये राज्य दलितों के ख़िलाफ़ अपराध के मामले में दूसरे और तीसरे नम्बर पर हैं।

पंजाब में प्रवासियों के ख़िलाफ़ भड़कायी जा रही नफ़रत से किसको होगा फ़ायदा ?

तर्क-विवेक और न्यायबोध को एक ओर रखकर एक प्रवासी मज़दूर के दोष का ठीकरा सभी प्रवासियों पर फोड़ा जाने लगा। देखते-देखते पंजाब में रहने वाले लाखों प्रवासी श्रमिकों में भय की लहर दौड़ गयी और उन्हें डर के साये में धकेल दिया गया। यह पूरा मामला दर्शाता है कि लोगों की निम्न राजनीतिक चेतना का फ़ायदा उठाकर उनका ध्यान उनके असली मुद्दों से भटकाना कितना आसान है।

दिल्ली के शाहाबाद डेरी इलाक़े में छठ घाट पर डूबने से युवक की मौत

यह घाट बारिश के मौसम में नाले और बरसात के पानी से भर जाता है। बार-बार प्रशासन को बोलने के बावजूद इसपर कोई कार्रवाई नहीं की जाती। पाँच मन्दिर, शाहबाद डेरी में झुग्गियों के पीछे खुला मैदान स्थित है। यहाँ लोग पूरे दिन फैक्टरियों, कारखानों, और कोठियों में खटकर आने के बाद इस गर्मी और उमस के मौसम में बाहर टहलते हैं। कोई खुली जगह न होने के कारण बच्चे इसी पाँच मन्दिर के मैदान में खेलते-कूदते हैं। कुछ घटनाएँ ऐसी भी सामने आई जहाँ बच्चे तालाब में डूबते-डूबते बचे हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए इस तालाब को नियमित तौर पर खाली करवाये जाने की माँग भी ज्ञापन में रखी गयी ताकि तालाब में डूबने से लेकर बीमारियों के पनपने के ख़तरे को टाला जा सके। इसके साथ ही यह माँग भी उठायी गयी कि तालाब के इर्द-गिर्द सुरक्षा हेतु चारदीवारी बनायी जाये और ख़राब पड़ी लाइट को जल्द से जल्द ठीक कराया जाये।

काँवड़ यात्रा के ज़रिये फैलाया गया साम्प्रदायिक उन्माद!

यात्रा के दौरान तेज आवाज़ में डीजे बजाना, मारपीट करना, किसी भी शक़ मात्र से किसी की जान ले लेना, छेड़खानी करना, ड्रग्स लेकर आम राहगीरों को उत्पीड़ित करना… क्या यह सहने योग्य है? इसका भला धर्म-कर्म से क्या लेना-देना? यह तो एक दिशाहीन लम्पट आबादी को साम्प्रदायिक उन्माद से भरकर अपनी राजनीति के लिए फ़ासीवादी संघ व भाजपा द्वारा इस्तेमाल किया जाना है। यात्रा के दौरान तमाम ऐसी घटनाएँ सामने आयी, जिससे यह पता चलता है कि काँवड़ यात्रा लम्पटों की एक ऐसी भीड़ बन गयी है, जिसमें कोई भी गैरक़ानूनी काम करने का लाइसेंस मिल जाता है।

भाजपा के रामराज्य में बढ़ते दलित-विरोधी अपराध

2014 में फ़ासीवादी भाजपा सरकार के सत्ता में आने के बाद जातिगत उत्पीड़न की घटनाओं की बाढ़ सी आ गयी है। दलित विरोधी अपराध बर्बरता की सारी हदें पार करते जा रहे हैं। ऐसा कोई दिन नहीं जाता, जब दलितों के साथ जातिवादी गुण्डों द्वारा हिंसा की घटना सामने न आती हो। देश भर में दलितों के ख़िलाफ़ होने वाले उत्पीड़न और शोषण की घटनाएँ इतिहास में एक ख़ून सने पन्ने की तरह दर्ज़ हो गयी हैं।

लाभार्थियों के फ़ेशियल रिकॉग्निशन व ई-केवाईसी के ज़रिये जनता की निगरानी और आँगनवाड़ीकर्मियों पर काम का बोझ बढ़ाती मोदी सरकार!

समेकित बाल विकास परियोजना का घोषित मक़सद ज़रूरतमन्द लोगों तक आवश्यक सुविधाएँ और पोषाहार पहुँचाने का है। इसे डिजिटल करना न केवल आँगनवाड़ीकर्मियों का काम बढ़ाना होगा बल्कि उस ज़रूरतमन्द आबादी तक इस परियोजना की पहुँच को ही सीमित कर देना होगा। दिल्ली स्टेट आँगनवाड़ी वर्कर्स एण्ड हेल्पर्स यूनियन सरकार के इस क़दम का विरोध करती है।

विश्व की “चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था” के शोर के पीछे की सच्चाई

जीडीपी का बढ़ना किसी भी देश की आर्थिक स्थिति के ठीक होने का सूचक नहीं है। क्योंकि इससे इस बात का पता नहीं चलता कि देश में पैदा होने वाली कुल सम्पदा का कितना हिस्सा देश के बड़े धनपशु हड़प लेते हैं और देश की आम मेहनतकश जनता की स्थिति क्या है? पिछले दिनों विश्व असमानता लैब की नवीनतम रिपोर्ट ‘भारत में आय और सम्पत्ति असमानता, 1922-2023: अरबपति राज का उदय’ (मार्च 2024) ने बताया कि भारत की शीर्ष 1% आबादी का राष्ट्रीय आय के 22.6% हिस्से पर नियन्त्रण है। शीर्ष 10% आबादी के पास राष्ट्रीय आय का 57.7% हिस्सा है, जबकि निचले 50% के पास केवल 15% हिस्सा है। यह असमानता दुनिया में सबसे अधिक है। साफ़ है कि दुनिया की “चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था” में पूँजीपतियों-धन्नासेठों की तिजोरियों का आकार तो बढ़ता जा रहा है लेकिन आम मेहनतकश आबादी इस “चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था” में तबाही और बरबादी की और गहरी खाई में धकेली जा रही है। यह हास्यास्पद है कि जिस जापान को पीछे छोड़कर चौथी अर्थव्यवस्था होने का दावा किया जा रहा है, वहाँ प्रति व्यक्ति जीडीपी भारत की तुलना में लगभग 11.8 गुना अधिक है।