बढ़ रहे प्रदूषण के बीच मोदी सरकार की जुमलेबाज़ी और ख़राब होते मज़दूर वर्ग के हालात
अविनाश
भारत के कई शहर एक घने, ज़हरीले धुएँ की चादर से ढके हुए हैं जिससे आँखों में जलन और गले में खराश हो रही है। यह ज़हर न उम्र देखता है, न जाति-धर्म, न ही शक्ल-सूरत—यह लगातार साँस के ज़रिये हर किसी के फेफड़ों में समा रहा है। हाँ, एक तबका जिसके पास आर्थिक सामर्थ्य है वह इससे बचने की तात्कालिक कोशिशें ज़रूर कर रहा है। हाल के आँकड़े बताते हैं कि दिल्ली-एनसीआर में एयर प्यूरीफ़ायर की बिक्री में 72% की बढ़ोतरी हुई है, वहीं महाराष्ट्र 12% के साथ दूसरे स्थान पर रहा है। यानी बढ़ रहे प्रदूषण से फ़ायदा भी पूँजीपतियों को ही हो रहा है! कुछ ऐसे भी लोग हैं जो फिलहाल शहर छोड़कर पहाड़ियों और समन्दर के किनारे बसने चले गये हैं। ज़ाहिरा तौर पर प्रदूषण के दुष्प्रभावों से बचने की ऐसी कोशिशें देश की बहुसंख्यक मेहनतकश आबादी के लिए सम्भव नहीं।
प्रदूषण के इन बदतर हालात के बीच दिल्ली के बवाना, वज़ीरपुर, ओखला, नारायणा आदि के कारख़ानों या गुरुग्राम-मानेसर के ऑटोमोबाइल और कपड़ा कारख़ानों में जाने वाले लाखों मज़दूरों को कोई राहत नहीं मिली है। मुम्बई में सुबह 4:30 बजे की तेज़ रफ़्तार लोकल ट्रेन पकड़कर शहर को चलाने और चमकाने वाली आबादी बढ़ते प्रदूषण की मार झेलते हुए काम पर निकल रही है। यह साँसों में घुलता ज़हर सभी को धीमी मौत की ओर ले जा रहा है।
मगर सवाल यह बनता है कि क्या एयर प्यूरीफायर प्रदूषण से लड़ने के लिए काफ़ी हैं और इससे भी ज़रूरी सवाल यह कि उनका क्या जो यह ख़रीदने की कूव्वत नहीं रखते? उन्हें प्रदूषण से मरने के लिए ख़ुद को छोड़ देना चाहिए? क्या आज सरकार और इस व्यवस्था के पैरोकारों द्वारा प्रदूषण और पर्यावरण को लेकर पूछे जाने वाले इन्हीं ज़रूरी सवालों को दबा नहीं दिया जा रहा है? क्या हमें यह नहीं पूछना चाहिए कि प्रदूषण के इन हालात के लिए कौन ज़िम्मेदार है और कौन-सा वर्ग सबसे अधिक इसका खामियाज़ा भुगत रहा है?
लेकिन सरकार की मानें तो उसके पास वायु प्रदूषण से होने वाली मौतों पर “कोई पक्का डेटा नहीं” है, जबकि वैश्विक अध्ययन भारत में हर साल इसकी वजह से होने वाली 17 लाख मौतों का आँकड़ा बताते हैं। आइए, सरकार द्वारा पेश किये जा रहे इस कुतर्क और झूठ की जाँच-पड़ताल करते हैं।
सरकारी झूठ : प्रदूषण और इंसानी मौतों के बीच कोई रिश्ता नहीं है!
मोदी सरकार के तमाम दावों के विपरीत कई अध्ययन भारत में वायु प्रदूषण की गम्भीर स्थिति को उजागर करते हैं। चिकित्सा विज्ञान की प्रतिष्ठित पत्रिका ‘लैंसेट’ की ओर से 2009 से 2019 तक किये गये एक व्यापक अध्ययन में ज़ोर दिया गया है कि बारीक कणों (PM2.5) के लम्बे समय तक सम्पर्क में रहने से मृत्यु का ख़तरा काफ़ी बढ़ जाता है। अध्ययन के अनुसार, “भारत में हर साल PM2.5 के लम्बे समय तक सम्पर्क के कारण 1.5 मिलियन मौतें होती हैं, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के वायु गुणवत्ता दिशानिर्देशों द्वारा अनुशंसित 5 μg/m³ सीमा से कहीं अधिक है।” लैंसेट के शोध के मुताबिक, “सालाना PM2.5 सांद्रता में हर 10 μg/m³ की वृद्धि, सभी कारणों से होने वाली मृत्यु के 8.6% अधिक जोखिम से जुड़ी थी। भारतीय राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता मानकों के आधार पर 2009 और 2019 के बीच लगभग 3.8 मिलियन मौतें PM2.5 के कारण हुईं। जबकि WHO दिशानिर्देशों के पैमाने से देखें तो यह संख्या बढ़कर 16.6 मिलियन हो जाती है, जो देश में कुल मृत्यु दर का लगभग एक चौथाई है।”
एक अन्य अध्ययन में अनुमान लगाया गया कि PM10 सांद्रता में हर 10 μg/m³ की बढ़ोतरी पर सभी प्रकार की मौतों में 0.14% की वृद्धि होती है। गैसीय प्रदूषकों में नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (NO2) का सबसे ज़्यादा असर दिखा, जिसमें रोज़ाना की सांद्रता में हर 10 μg/m³ की बढ़ोतरी पर मौतों में 1.00% की वृद्धि हुई। NO2 के प्रभाव को नियंत्रित करने के बाद ओज़ोन (O3) और कार्मन मोनोऑक्साइड (CO) का असर भी ज़्यादा पाया गया। उम्र के आधार पर किये गये विश्लेषण से पता चला कि पार्टिकुलेट मैटर का सबसे ज़्यादा असर बुज़ुर्गों (65 वर्ष और उससे अधिक) पर होता है, जबकि गैसीय प्रदूषकों का सबसे ज़्यादा असर 5–44 वर्ष की आयु वर्ग पर पड़ता है। शोधकर्ताओं ने निष्कर्ष निकाला कि “यह अध्ययन इस बात के लिए अतिरिक्त सबूत देता है कि आस-पास की वायु गुणवत्ता सभी प्रकार की मौतों से जुड़ी है।”
इसके बावजूद मोदी सरकार संसद में कह रही है कि हम अन्तरराष्ट्रीय मानक नहीं मानते और आँकड़े जुटाने का हमारा अपना तरीक़ा है! यानी आम भाषा में, सरकार आँकड़ों की बाज़ीगरी करके यह दिखाने की कोशिश कर रही है कि “सब चंगा-सी”! सब कुछ नियंत्रण में है!
प्रदूषण फैलने के कारणों पर सरकार को बचाने के लिए गोदी मीडिया द्वारा फैलाया जा रहा झूठ
CPCB (केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड) की वेबसाइट से अक्टूबर 2024 से जनवरी 2025 तक भारत के पाँच बड़े शहरों—दिल्ली, मुंबई, भोपाल, लखनऊ और हैदराबाद—के AQI आँकड़ों की जाँच एक बिल्कुल अलग तस्वीर पेश करती है। टीवी बहसों में गोदी मीडिया एक झूठी कहानी गढ़ रहा है और “तू नंगा, तू नंगा” का खेल खेलकर मोदी सरकार को दोषमुक्त साबित करने में लगा हुआ है। ग़ौरतलब है कि इस बार के संसद सत्र में सरकार ने प्रदूषण के मसले पर कोई बहस होने ही नहीं दी जबकि ‘वन्दे मातरम’ पर निठल्ली चर्चा में कई घण्टे बर्बाद कर दिये गये। दिलचस्प बात यह जानना होगा कि प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री अमित शाह संसद में उछल-उछलकर जिस ‘वन्दे मातरम’ के इतने गुणगान गा रहे थे, क्या ख़ुद बिना टेलिप्रोंप्टर की मदद के शुरू से अन्त तक उसे सुना सकते हैं?! गोदी मीडिया से लेकर ईडी-सीबीआई तक को इस बात की तत्काल जाँच शुरू कर देनी चाहिए!
बहरहाल, मीडिया की बहसों में दिल्ली में प्रदूषण फैलने के कारणों को सिर्फ़ पराली जलाने तक सीमित कर दिया गया है, जो प्रदूषण के लिए ज़िम्मेदार तमाम कारणों में से एक कारण है। सरकार का भोंपू मीडिया या तो प्रदूषण पर बात ही नहीं करता, या फिर सरकार को क्लीन चिट देने का काम करता है। जबकि CSE के एक विश्लेषण के अनुसार, 50.1% प्रदूषण परिवहन से होता है, जबकि पराली जलाने का योगदान महज़ 8.9% है। नतीजतन, मुंबई, भोपाल और लखनऊ जैसे शहर—जहाँ खेतों में आग लगने की घटनाएँ नगण्य हैं—प्रदूषण की बहस से बाहर रखे जाते हैं, जबकि वे भी गम्भीर वायु प्रदूषण से जूझ रहे हैं।
इसके अलावा निजी मालिकाने के तहत चल रहीं तमाम फ़ैक्टरियाँ और कारखाने भी वायु व जल प्रदूषण फैलाने का काम करते हैं क्योंकि अपना मुनाफ़ा बढ़ाने की हवस के चलते कारख़ाना मालिक अपशिष्ट निपटान के उपायों के ख़र्च में कटौती करते हैं। यह सब दर्शाता है कि प्रदूषण पर मीडिया की कहानी किसी गल्प कथा से कम नहीं है, जो न सिर्फ़ असन्तुलित और झूठी है, बल्कि डेटा-आधारित विश्लेषणों से भी कोसों दूर है।
प्रदूषण को नहीं, डेटा को नियंत्रित करती फ़ासिस्ट सरकार!
मोदी सरकार प्रदूषण पर नियंत्रण पाने के बजाय डेटा को नियंत्रित करने का काम कर रही है। सवाल यह है कि सरकार द्वारा फैलाये जा रहे झूठ और आँकड़े छिपाने के पीछे कारण क्या है? क्या फ़ासीवादी मोदी सरकार और बढ़ते प्रदूषण के बीच कोई रिश्ता है?
सरकारी भोंपू मीडिया, व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी और तमाम पैनलों में बिठाये गये भाड़े के “विशेषज्ञ” यह कुतर्क देते हैं कि प्रदूषण फैलाने में सबकी ज़िम्मेदारी है, सिर्फ़ सरकार को दोष देना ठीक नहीं; या फिर मोदी सरकार की काहिली को छिपाने के लिए पिछली सरकारों के मत्थे इस समस्या को भी मढ़ते हैं। दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने हाल के दिनों में “अक़्लमन्दी” के कुछ ऐसे नये रिकॉर्ड क़ायम किये हैं कि प्रधानमंत्री मोदी तक इस रेस में फिलहाल दूसरे स्थान पर जा पहुँचे हैं! पर्यावरण को लेकर रेखा गुप्ता की “अमृत वाणी” के चंदेक नमूने कुछ इस प्रकार हैं – AQI को तापमान बता देना, यह कहना कि कूड़े के पहाड़ से बस कह देने भर से कि “तुम्हें जाना पड़ेगा” और वे ग़ायब हो जायेंगे आदि! भाजपा सरकार द्वारा यमुना सफ़ाई को लेकर फैलाया गया झूठ भी सबके सामने है। दरअसल मोदी सरकार हर मोर्चे की तरह प्रदूषण की समस्या से निपटने के मोर्चे पर भी फिसड्डी साबित हुई है। ऐसे में अपना आभामंडल बनाये रखने के लिए और फ़ासीवादी राजनीति में छवि निर्माण की बाध्यताओं के चलते मोदी सरकार को प्रदूषण के मसले पर भी जुमलेबाज़ी का इस्तेमाल करना पड़ रहा है जिसमें वैसे भी यह सरकार काफ़ी माहिर है। छवि पर दाग़ न लगे, इसके लिए ही आँकड़े छिपाये जाते हैं—चाहे वे AQI के हों, बेरोज़गारी के हों या फिर GDP के!
मोदी सरकार के शासनकाल में पूँजीपतियों को उनके मुनाफ़े की ख़ातिर जल, जंगल और ज़मीन बिना पर्यावरणीय मानकों की परवाह किये औने-पौने दामों पर सौंप दिया जा रहा है। इसका ताज़ा उदाहरण फ़ॉरेस्ट (कंज़र्वेशन) एक्ट, 1980 में किये गये संशोधन हैं, जिनसे पर्यावरणीय निगरानी कमज़ोर हुई है और अरावली व पश्चिमी घाट जैसे इकोलॉजिकली सेंसिटिव इलाक़ों में जंगल कटाई और खनन को बढ़ावा मिला है। एनवायरनमेंटल परफॉर्मेंस इंडेक्स (EPI) में भारत की लगातार गिरती रैंकिंग चीख-चीख कर इस बात की गवाही दे रही है कि मोदी सरकार द्वारा नंगे तौर पर लागू की जा रही पूँजीपरस्त नीतियाँ हमारे देश को पर्यावरणीय विनाश की ओर लेकर जा रही हैं। येल और कोलंबिया यूनिवर्सिटीज़ के हालिया आकलन में भारत 180 देशों में 180वाँ स्थान पर है। यह भी मौजूदा सरकार के कार्यकाल में पर्यावरणीय स्वास्थ्य और इकोसिस्टम सुरक्षा में आयी भारी गिरावट का ही प्रमाण है।
स्पष्ट है कि बेरोज़गारी, महँगाई, साम्प्रदायिक नफ़रत व हिंसा से लेकर पर्यावरणीय तबाही और प्रदूषण तक के मामले में निस्संदेह भारत “विश्वगुरु” बन चुका है! मोदी सरकार द्वारा अदानी और रिलायंस जैसे बड़े कॉरपोरेट समूहों को सस्ती ज़मीन मुहैया करवाकर और पर्यावरणीय नियमों में ढील के ज़रिये भारी फ़ायदा पहुंचाया गया है, जिसकी क़ीमत विस्थापित समुदायों, पर्यावरण और कुदरत ने चुकायी है।
इन्हीं पर्यावरणीय बदलावों का सीधा रिश्ता उत्तराखण्ड में धराली की घटना, केरल में भूस्खलन, असम और आंध्र–तेलंगाना में आयी बाढ़ जैसी तबाहियों से जुड़ता है। आज यह समझना ज़रूरी है कि इन विभीषिकाओं के लिए मुनाफ़ा-केन्द्रित पूँजीवादी उत्पादन प्रणाली ज़िम्मेदार है। पूँजीवादी शासक वर्ग ने मुनाफ़े की अन्तहीन हवस में पृथ्वी पर जीवन के अस्तित्व को ही ख़तरे में डाल दिया है। हमारे देश में सत्ता में बैठी हुई और पूँजीपतियों की सेवा में तत्परता के साथ लगी हुई फ़ासीवादी मोदी सरकार पूँजीवाद-जनित पर्यावरणीय विनाश को अभूतपूर्व गति से बढ़ा रही है। फिर चाहे जंगलों में आग हो, बाढ़ और सूखा हो, भूस्खलन हो या सुनामी—ये सभी घटनाएँ हमें चीख-चीखकर चेतावनी दे रही हैं कि पर्यावरण जैसे मुद्दे पर भी मज़दूर–मेहनतकशों को कमान सम्भालनी होगी, पूँजीवादी व्यवस्था और फ़ासीवादी सरकार की नीतियों के ख़िलाफ़ संगठित संघर्ष चलाना होगा।
मज़दूर बिगुल, दिसम्बर 2025













