शान्ति (SHANTI) विधेयक, 2025 – कॉरपोरेट मुनाफ़े के लिए मानव जीवन को ख़तरे में डालने का बेशर्म दस्तावेज़

ज्योति

17 दिसम्बर को फ़ासीवादी मोदी सरकार ने लोकसभा में एक और जनविरोधी विधेयक – ‘सस्टेनेबल हार्नेसिंग एण्ड एडवांसमेण्ट ऑफ न्यूक्लियर एनर्जी फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इण्डिया (SHANTI), 2025’ पेश किया और पारित कर दिया। एक बार अधिसूचित हो जाने के बाद, यह क़ानून परमाणु ऊर्जा अधिनियम, 1962 और परमाणु क्षति के लिए नागरिक दायित्व अधिनियम, 2010 का स्थान ले लेगा। यह विधेयक और कुछ नहीं बल्कि ऊर्जा उत्पादन के अत्यन्त ख़तरनाक क्षेत्र को निजी कम्पनियों के लिए खोलने का एक प्रयास है, जिसमें उनकी जवाबदेही ना के बराबर होगी। जैसा कि फ़ासीवादी मोदी सरकार पिछले कई वर्षों से बार-बार करती आ रही है, यह एक और प्रयास है जिसके तहत मुनाफ़े का निजीकरण और आपदाओं व वित्तीय दायित्वों का समाजीकरण किया जा रहा है।

इस प्रकार मोदी सरकार निजी कम्पनियों को परमाणु ऊर्जा उत्पादन से मुनाफ़ा कमाने में सक्षम बनाने की दिशा में आगे बढ़ रही है। हालॉंकि इस बदलाव को सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) मॉडल के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, लेकिन तारीख़ गवाह है कि इस तरह के प्रबन्धों से निजी कम्पनियों को ही असमान रूप से लाभ मिलता है, जबकि जोख़िम और ज़िम्मेदारी को आम जनता पर डाल दिया जाता है। आइए, इस विधेयक के विभिन्न पहलुओं के बारे में जानते हैं।

इस विधेयक की शुरुआत में ही सरकार ने अपनी मंशा स्पष्ट कर दी है। दरअसल, बड़े पैमाने पर होने वाले परमाणु रिसाव, कचरे का अनुचित प्रबन्धन व निपटारा तथा परमाणु संचालन से जुड़े अन्य बड़े जोख़िम वाले कारकों से होने वाली आपदाओं को छिपाने, उन्हें कम करके दिखाने और उनकी ज़िम्मेदारी से पूँजीपतियों और निजी प्रतिष्ठानों को मुक्त करने की मंशा से ही यह विधेयक मूलतः संचालित है। जैसे-जैसे आप इस विधेयक को पढ़ेंगे तो पायेंगे कि यह पूरा क़ानून इस अत्यन्त ख़तरनाक क्षेत्र में बड़े पैमाने पर निजी और विदेशी भागीदारी को प्रोत्साहित करने के लिए बनाया गया है। वहीं दूसरी तरफ़ सार्वजनिक सुरक्षा सम्बन्धी चिन्ताओं को पूरी तरह से नज़रअन्दाज़ कर दिया गया है। यह विधेयक पूरी निर्माण श्रृंखला यानी खनन से लेकर संयंत्र संचालन और कचरा प्रबन्धन तक के लिए एक ही लाइसेंस की अनुमति देता है। इससे निजी कम्पनियाँ बिना किसी वास्तविक जवाबदेही और दण्ड से मुक्त रहते हुए अधिकतम मुनाफ़ा कमा सकती हैं।

विधेयक के अगले हिस्से में, ख़राब उपकरणों या दोषपूर्ण रिएक्टर डिज़ाइनों से उत्पन्न दायित्वों के लिए आपूर्तिकर्ताओं को क़ानूनी संरक्षण प्रदान किया गया है। विधेयक में कहा गया है कि संचालक “निर्माणाधीन परमाणु संयंत्र, उसी स्थल पर निर्माणाधीन किसी अन्य परमाणु संयंत्र सहित, उसी स्थल पर स्थित ऐसी सम्पत्तियों जिनका उपयोग ऐसे संयंत्रों के सम्बन्ध में किया जाता है या किया जाना है, या परमाणु दुर्घटना के समय परमाणु सामग्री ले जाने वाले परिवहन के साधनों” को हुए नुकसान के लिए उत्तरदायी नहीं होगा। यह प्रावधान निर्माण चरण और परिचालन के दौरान पैदा हुई खराबियों और विफ़लताओं के लिए नियोक्ता की ज़िम्मेदारी को प्रभावी रूप से समाप्त कर देता है।

इसके अतिरिक्त, मोदी सरकार ने किसी गम्भीर परमाणु दुर्घटना की स्थिति में ऑपरेटरों से वसूले जा सकने वाले मुआवज़े की अधिकतम सीमा 300 मिलियन स्पेशल ड्रॉइंग राइट्स (SDR) तय की है, जो दिसम्बर 2025 तक लगभग 3,690 करोड़ रुपये के बराबर है। यह राशि परमाणु आपदा की लागत को पूरा करने के लिए अपर्याप्त है या यूँ कहें कि ‘ऊॅंट के मुँह में ज़ीरे’ के बराबर है। ऐसी आपदाओं के पारिस्थितिक, मानवीय और आर्थिक प्रभाव अरबों में होते हैं। 3,690 करोड़ की राशि इसके नुकसान के एक अंश की भी भरपाई नहीं कर पायेगी। चेर्नोबिल और फुकुशिमा इसके ज्वलन्त उदाहरण हैं।

इसके अलावा, सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम को लगातार कमज़ोर करने की अपनी नीति के अनुरूप, मोदी सरकार ने “राष्ट्रीय सुरक्षा” का हवाला देते हुए SHANTI विधेयक को RTI के दायरे से बाहर रखा है। इससे कुछ गम्भीर प्रश्न उठते हैं। जैसे – जब पूरी आपूर्ति श्रृंखला का निजीकरण तेज़ी से किया जा रहा है , तब किसकी “राष्ट्रीय सुरक्षा” की रक्षा की जा रही है? राज्य अपने ही नागरिकों, जिनके जीवन को ख़तरे में डाला जा रहा है, की तुलना में मुनाफ़ा कमाने वाली कम्पनियों को प्राथमिकता क्यों दे रहा है? सुरक्षा और पर्यावरण सम्बन्धी जानकारी को पूरी तरह से गुप्त रखकर, यह विधेयक प्रभावी रूप से निजी प्रतिष्ठानों को जवाबदेही से मुक्त कर देता है।

इस विधेयक में परमाणु क्षेत्र के कर्मचारियों को श्रम सुरक्षा क़ानूनों के दायरे से बाहर रखा गया है। इसमें उन कर्मचारियों के लिए कार्यस्थल सुरक्षा, दुर्घटना क्षतिपूर्ति या लागू किये जाने योग्य सुरक्षा मानकों के बारे में कोई विस्तृत प्रावधान नहीं है जो कम्पनियों के मुनाफ़े के लिए अपनी जान जोख़िम में डालते हैं। विधेयक में एक स्वतंत्र परमाणु सुरक्षा प्राधिकरण की स्थापना का दावा तो किया गया है, लेकिन इसकी संरचना या कार्यप्रणाली के बारे में कोई स्पष्टता नहीं दी गयी है।

इसके विपरीत विधेयक में लगभग किसी भी पूँजी सम्पन्न संस्था को परमाणु रिएक्टर चलाने की अनुमति दे दी गयी है। इसे ‘स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टरों’ (SMR) को बढ़ावा देने के नाम पर उचित ठहराया जा रहा है, जबकि ये बड़े रिएक्टरों से किसी भी सूरत में अधिक सुरक्षित नहीं हैं। विकिरण और दुर्घटनाओं का जोखिम मूल रूप से वही रहता है।

तेज़ी से लाइसेंस देने की प्रक्रिया को सुगम बनाने और पर्याप्त पूँजी रखने वाली किसी भी संस्था को ऐसे रिएक्टर चलाने की अनुमति देने के ज़रिये, जोकि पारिस्थितिक तंत्र को नष्ट कर सकते हैं, पीढ़ियों तक हज़ारों लोगों की जान ले सकते हैं और विकिरण-जनित बीमारियों के कारण पूरे शहरों को रहने योग्य नहीं छोड़ सकते, सरकार ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि पूँजीवादी व्यवस्था और भारत की फ़ासीवादी मोदी सरकार का एकमात्र लक्ष्य पूँजीपतियों के मुनाफ़े को अधिकतम सम्भव बढ़ाना है।

इस विधेयक में एक और अमानवीय प्रावधान यह है कि परमाणु दुर्घटना के 10 से 20 वर्षों के भीतर ही अपराधों की समय-सीमा (statute of limitations) समाप्त हो जाती है, जिसके बाद कोई आपराधिक मुक़दमा नहीं चलाया जा सकता। यह वैज्ञानिक रूप से भी असंगत है, क्योंकि विकिरण से जुड़ी बीमारियाँ और मौतें अक्सर दशकों बाद और पीढ़ियों तक सामने आती हैं। यह प्रावधान सुनिश्चित करता है कि कॉरपोरेट अपराधी दीर्घकालिक चिकित्सीय और आपराधिक ज़िम्मेदारी से बच निकलें और लोगों की ज़िन्दगियाँ, ज़मीन, पारिस्थितिकी तंत्र और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य बर्बाद करते रहें।

सरकार यहीं नहीं रुकती है। कॉरपोरेट हितों की और अधिक रक्षा करने के लिए, यह विधेयक केवल केन्द्र सरकार या उन संस्थाओं जो कि “केन्द्र सरकार या परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड” द्वारा विधिवत अधिकृत हों, को आपराधिक शिक़ायत दर्ज करने की अनुमति देता है। इसका अर्थ यह है कि प्रभावित समुदाय, व्यक्तिगत तौर पर पीड़ित लोग, नागरिक समाज संगठन और यहाँ तक कि राज्य सरकारें भी स्पष्ट आपराधिक लापरवाही के मामलों में भी सीधे आपराधिक कार्रवाई शुरू नहीं कर सकती है।

भोपाल गैस त्रासदी इस सच्चाई का एक भयावह उदाहरण है कि ऐसी आपदाएँ दुर्घटनाएँ नहीं होतीं, बल्कि पूँजीपतियों द्वारा लागत में कटौती और कॉरपोरेट लापरवाही को राजनीतिक संरक्षण देने का परिणाम होती हैं। भाजपा से लेकर कांग्रेस तक, विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा कॉरपोरेट अपराधियों को दिया गया संरक्षण यही दर्शाता है कि पूँजीवादी व्यवस्था और उसकी हिफ़ाज़त करने वाली तमाम सरकारों और चुनावबाज़ पार्टियों को देश के नागरिकों के जीवन की कोई परवाह नहीं है।

आज देश के आम नागरिकों और महनतकशों को इस जनविरोधी कानून को तत्काल वापस लेने की माँग करनी चाहिए जो मानव जीवन और पर्यावरण दोनों के लिए विनाशकारी और घातक है। एक सच्चे अर्थों में जन पक्षधर व्यवस्था के अन्तर्गत किसी भी वास्तविक पर्यावरणीय कार्रवाई में कॉरपोरेट या निजी मुनाफ़े से ऊपर मानव कल्याण और सुरक्षा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। लेकिन हर बीतते दिन के साथ यह और स्पष्ट होता जा रहा है कि मौजूदा पूँजीवादी व्यवस्था में मुनाफ़ा-प्रेरित लालच और पूँजी के हितों को लगातार मानव जीवन से ऊपर रखा जाता है। आज मज़दूर वर्ग को पर्यावरण के मसले पर भी सरकार से जवाबदेही की माँग करनी चाहिए और इस मसले को वर्ग संघर्ष के मोर्चे का महत्वपूर्ण प्रश्न बनाना चाहिए। एक ऐसे सुरक्षित, स्वच्छ पर्यावरण के लिए संघर्ष जो सार्वजनिक स्वास्थ्य और सुरक्षा से समझौता न करे – यह मज़दूर आन्दोलन के चार्टर का एक अहम एजेंडा होना चाहिए।

 

मज़दूर बिगुल, दि‍सम्बर 2025

 

 

‘मज़दूर बिगुल’ की सदस्‍यता लें!

 

वार्षिक सदस्यता - 125 रुपये

पाँच वर्ष की सदस्यता - 625 रुपये

आजीवन सदस्यता - 3000 रुपये

   
ऑनलाइन भुगतान के अतिरिक्‍त आप सदस्‍यता राशि मनीआर्डर से भी भेज सकते हैं या सीधे बैंक खाते में जमा करा सकते हैं। मनीऑर्डर के लिए पताः मज़दूर बिगुल, द्वारा जनचेतना, डी-68, निरालानगर, लखनऊ-226020 बैंक खाते का विवरणः Mazdoor Bigul खाता संख्याः 0762002109003787, IFSC: PUNB0185400 पंजाब नेशनल बैंक, निशातगंज शाखा, लखनऊ

आर्थिक सहयोग भी करें!

 
प्रिय पाठको, आपको बताने की ज़रूरत नहीं है कि ‘मज़दूर बिगुल’ लगातार आर्थिक समस्या के बीच ही निकालना होता है और इसे जारी रखने के लिए हमें आपके सहयोग की ज़रूरत है। अगर आपको इस अख़बार का प्रकाशन ज़रूरी लगता है तो हम आपसे अपील करेंगे कि आप नीचे दिये गए बटन पर क्लिक करके सदस्‍यता के अतिरिक्‍त आर्थिक सहयोग भी करें।
     

Lenin 1बुर्जुआ अख़बार पूँजी की विशाल राशियों के दम पर चलते हैं। मज़दूरों के अख़बार ख़ुद मज़दूरों द्वारा इकट्ठा किये गये पैसे से चलते हैं।

मज़दूरों के महान नेता लेनिन