उत्तर प्रदेश में एसआईआर का खेल और डिटेंशन कैम्प बनाने की फ़ासिस्ट साज़िश

प्रसेन

केन्द्रीय चुनाव आयोग (‘केचुआ’) की एसआईआर के ज़रिये बिहार चुनाव में भाजपा पर कृपा बरस चुकी है। बिहार चुनाव में भाजपा ने चुनाव आयोग की कृपा और अपने फ़ासीवादी तन्त्र से असम्भव को सम्भव बना दिया। बिहार में इस सफलता के बाद अब 12 राज्यों और केन्द्रशासित राज्यों में एसआईआर का खेल जारी है। ‘केचुआ’ की कृपा उत्तर प्रदेश में विशेष तौर पर बरस रही है। बिहार में “घुसपैठियों” की खोज करने के बाद (जो मिले ही नहीं!) अब ‘केचुआ’ उत्तर प्रदेश में “घुसपैठियों” की खोज में लग गया है! चुनाव आयोग ने निर्वाचन नामावली को शुद्ध करने का बीड़ा उठाया है। यह शायद प्रधानमंत्री मोदी के 18-18 घण्टे काम करने का ही असर है कि चुनाव आयोग नागरिकता साबित करने का भी काम कर दे रहा है जबकि यह काम गृह मन्त्रालय का है! इधर “घुसपैठियों” की खोज चुनाव आयोग अभी कर भी नहीं पाया है कि उधर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी ने अपने को प्रधानमंत्री मोदी से भी मेहनती साबित करते हुए उत्तर प्रदेश में डिटेंशन कैम्प बनाने का निर्देश जारी कर दिया है। आम मेहनतकश जनता को यह जानना चाहिए कि निर्वाचन नामावली को शुद्ध करने का बीड़ा उठाने में ‘केचुआ’ और सरकार की क्या साज़िश है? इस प्रक्रिया में किनके बाहर होने की सबसे अधिक सम्भावना है? योगी सरकार द्वारा डिटेंशन कैम्प बनाने के पीछे क्या मक़सद है?

ग़ौरतलब है कि उत्तर प्रदेश में एसआईआर के लिए 4 नवम्बर से 4 दिसम्बर तक का समय तय किया गया था। लेकिन इतने कम समय में भयंकर अफ़रा-तफ़री मची और भयानक दबाव के कारण कई बीएलओ की आत्महत्याओं की घटनायें सामने आयीं। हालाँकि चुनाव आयोग के लिए यह कोई बड़ा मसला नहीं था। लेकिन समस्या यह हो गयी कि तय समय-सीमा के भीतर लगभग 2.91 करोड़ फ़ॉर्म वापस नहीं आये। जिसके बाद मजबूरन चुनाव आयोग को उत्तर प्रदेश में गणना प्रपत्र जमा करने की तिथि पहले 7 दिन फिर 14 दिन और बढ़ानी पड़ी। अब अन्तिम मतदाता सूची के प्रकाशन की तारीख़ बढ़ाकर 28 फरवरी कर दी गयी है। चुनाव आयोग के आँकडों के अनुसार, 27 अक्टूबर 2025 को प्रकाशित चुनावी सूचियों में उत्तर प्रदेश में 15.44 करोड़ मतदाता दर्ज हैं। एसआईआर अभियान के दौरान, बूथ स्तर के अधिकारी (बीएलओ) ने 15.43 करोड़ (99.97%) मतदाताओं को गणना फ़ॉर्म वितरित किये, लेकिन केवल 80.29% फ़ॉर्म ही वापस प्राप्त हुए, जिनमें मतदाता या परिवार के सदस्य के हस्ताक्षर थे। शेष 19% फ़ॉर्म असंग्रहणीय हैं जिनमें अनट्रेसेबल, मृत, डुप्लिकेट, स्थायी रूप से स्थानान्तरित मतदाता और फ़ॉर्म लेकर वापस नहीं करने वाले मतदाता हैं।

वास्तव में यह पूरी प्रक्रिया चुनाव आयोग और सरकार की मंशा साफ़ करती है। सबसे पहली बात तो यह है कि जानबूझकर एसआईआर प्रक्रिया की समय-सीमा कम रखी गयी और नवम्बर के महीने में शुरू की गयी जबकि तमाम त्योहारों में अपने घर वापस आये मज़दूर तमाम औद्योगिक केन्द्रों की ओर लौट चुके होते हैं। ऐसे में जानकारी के अभाव और जीविका की मजबूरी के चलते मेहनतकश आबादी का एक बड़ा हिस्सा इस प्रक्रिया में भागीदार नहीं हो सकता। दूसरे, एसआईआर की प्रक्रिया को, जिसके अनुसार बीएलओ को मतदाता से मिलकर मतदाता सूची दुरुस्त करनी होती थी, बदल दिया गया। अब बीएलओ द्वारा मतदाताओं को एक फ़ॉर्म दिया जा रहा है, जिसे भरकर उन्हें बीएलओ को वापस करना है। इस फ़ॉर्म में मतदाता को अपना नाम 2003 की मतदाता सूची से मिलान करवाना है। जिसका नाम 2003 की मतदाता सूची में नहीं है उन्हें 2003 की मतदाता सूची से अपने माता या पिता की भाग संख्या और क्रमांक आदि भर कर देना है। जिनके माता-पिता का नाम भी 2003 की सूची में नहीं है उनके लिए तीन केटेगरी बनायी गयी है। पहला, जिनका जन्म 01/07/87 से पहले भारत में हुआ है उनको तय किये गये 13 अभिलेखों में से कोई स्व-सत्यापित अभिलेख प्रस्तुत करना पड़ेगा जिससे उनके जन्मतिथि या जन्मस्थान का पता चलता हो। दूसरा, जिनका जन्म 01/071987 और 02/12/2004 के बीच हुआ है उनको अपना और अपने माता या पिता का स्व-सत्यापित अभिलेख प्रस्तुत करना पड़ेगा जिससे उनके जन्मतिथि या जन्मस्थान का पता चलता हो। तीसरा, जिनका जन्म 02/12/2004 के बाद भारत में हुआ है उनको अपना, अपने माता-पिता दोनों का स्व-सत्यापित कोई अभिलेख प्रस्तुत करना पड़ेगा, जिससे उनके और उनके माता-पिता की जन्मतिथि और जन्मस्थान का पता चलता हो।

जानबूझकर बनायी गयी इस जटिल प्रक्रिया का नतीजा यही होना था कि लगभग 2.91 करोड़ लोगों के फ़ॉर्म वापस नहीं आये। बहुत विरोध के बाद भले ही इसकी समय-सीमा एक बार 7 दिन और 14 दिन के लिए बढ़ा दी गयी हो लेकिन अभी भी यह सारे फ़ॉर्म इकट्ठे तभी हो सकते हैं जबकि प्रतिदिन 19 लाख 14 हज़ार फ़ॉर्म जमा किये जायें। एक तरफ यह स्थिति है कि रोज़ाना 19 लाख 40 हज़ार फ़ॉर्म  जमा कराये जायें तब 2.91 करोड़ बचे या वापस नहीं लौटे फॉर्मों का टारगेट पूरा होगा; दूसरी तरफ यूपी के सीईओ का कहना है कि बुधवार तक 99.13% एकत्रित फॉर्मों का डिजिटलाइज़ेशन पूरा हो चुका है, और गुरुवार यानी 12 दिसम्बर तक 100% हो जायेगा। उन्होंने ज़ोर दिया कि 2.91 करोड़ मतदाताओं की जाँच ड्राफ्ट चुनावी सूचियों के प्रकाशन से पहले पूरी की जायेगी, और मृत, स्थानान्तरित, डुप्लिकेट तथा अनट्रेसेबल मतदाताओं के नाम हटा दिये जायेंगे। फ़ॉर्म भरवाने में जगह-जगह संघी/भाजपाई लगे हुए थे। मतदाता सूची के सत्यापन में बीएलओ और बीएलए (बूथ एजेण्ट) की भूमिका रहेगी। स्वतः स्पष्ट है प्रशासनिक मशीनरी में फ़ासिस्टों की आन्तरिक पकड़ और स्वयंसेवकों की बड़ी संख्या के चलते इस प्रक्रिया में भाजपा के पक्ष में हेर-फेर की पूरी गुंजाइश होगी। इस प्रक्रिया में बहुत से ग़रीब दलित, स्त्रियों, अल्पसंख्यकों, प्रवासी मज़दूरों, हर छोटे-बड़े शहर में सड़कों पर रहने वाले या एक शहर से दूसरे शहर ठीहा बदलने वाले करोड़ों लोगों के बाहर होने की पूरी सम्भावना है। इसके पहले बिहार में एसआईआर के अनुभव हमारे सामने हैं।

वास्तव में देखा जाये तो फ़ासिस्ट एक साथ कई भयानक जनविरोधी कामों को अंजाम दे रहे हैं। सबसे पहले तो चुनावों में धाँधली के अलावा एसआईआर के ज़रिये बहुत कैलकुलेटेड तरीक़े से ग़रीब दलित, स्त्रियों, मुसलमानों और प्रवासी मज़दूरों की एक ऐसी बड़ी आबादी को मतदान के अधिकार से वंचित कर रही है, जिनका वोट आमतौर पर भाजपा को नहीं जाता है। इस तरह आगामी चुनावों के मद्देनज़र भाजपा को अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए यह काफ़ी स्थाई क़दम साबित होगा। दूसरे, एसआईआर के ज़रिये मोदी-शाह जोड़ी चोर रास्ते से राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) और नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के काम को अंजाम दे रही है। वास्तव में, चुनाव आयोग को नागरिकता की वैधता जाँचने, उसे क़ायम रखने या रद्द करने का कोई अधिकार नहीं है। 2003 एसआईआर के दिशा-निर्देश स्पष्ट शब्दों में यह बात कहते हैं कि नागरिकता निर्धारित करने का अधिकार सिर्फ़ गृह मन्त्रालय को है। लेकिन फ़ासीवादी भाजपा इन दिशानिर्देशों की धज्जियाँ उड़ाते हुए नागरिकता निर्धारित करने का काम एसआईआर के ज़रिये कर रही है। यानी जो फ़ासिस्टों के हर ज़ुल्म-अन्याय में उसके साथ नहीं है उसे वोट देने का अधिकार नहीं है। इन फ़ासिस्टों के आदर्श हिटलर ने भी यहूदियों और राजनीतिक विरोधियों के मताधिकार को खुलेआम छीन लिया था। अब फ़र्क इतना है कि यह काम खुलेआम करने के बजाय पर्देदारी में और घुमा-फिराकर किया जाता है। यह आज के फ़ासीवाद की ख़ासियत है। पूँजीवादी जनवाद के खोल को नष्ट नहीं किया जाता, लेकिन उसकी अन्तर्वस्तु को क्रमिक प्रक्रिया में नष्ट किया जाता है, जो फ़ासीवाद को एक सतत जारी परियोजना में तब्दील कर देता है।

तीसरे, एसआईआर के ज़रिये नागरिकता साबित करने की आम मेहनतकश विरोधी प्रक्रिया पर पर्दा डालने और उसे वैध ठहराने के लिए फ़ासिस्ट न केवल “अवैध घुसपैठ को रोकने” का शोर मचा रहे हैं बल्कि अवैध घुसपैठ को साम्प्रदायिक रंग देकर बड़ी आबादी का ध्यान भटकाने की साज़िश कर रहे हैं। योगी व भाजपा नेताओं के बयानों को नमक-मिर्च लगाकर गोदी मीडिया और सोशल मीडिया द्वारा खूब प्रचारित किया जा रहा है कि यह “बांग्लादेशी मुस्लिम घुसपैठियो” को चिह्नित करने के लिए किया जा रहा है। बिहार चुनाव में अमित शाह और नरेन्द्र मोदी दोनों ने खुलकर कहा कि यह “घुसपैठियों” को भगाने का चुनाव है, एसआईआर के ज़रिये “घुसपैठियों” की पहचान की जायेगी। इन “घुसपैठियों” से मोदी-शाह का मतलब हमेशा बांग्लादेशी मुसलमान था। यानी “घुसपैठिये” के नक़ली शोर के पीछे भी भाजपाई फ़ासीवादियों का मक़सद था समाज में साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण को बढ़ावा देना ताकि जनता को असल मसलों से भटकाया जा सके। योगी आदित्यनाथ ने बयान दिया कि, “देश के संसाधनों पर हमारे नागरिकों का हक़ है। उत्तर प्रदेश की सुरक्षा, सामाजिक सन्तुलन और सुदृढ़ क़ानून-व्यवस्था हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता है।” यही नहीं योगी आदित्यनाथ ने सुप्रीम कोर्ट के इस बयान का खूब इस्तेमाल किया कि घुसपैठियों के लिए ‘रेड कार्पेट’ थोड़े बिछाया जायेगा! अब सोचने वाली बात है कि योगी के नागरिक कौन हैं? मेहनतकश तो कत्तई नहीं! क्योंकि मेहनतकश आबादी का मुट्ठीभर पूँजीपतियों द्वारा खून चूसने के लिए काम के घण्टों की क़ानूनी सीमा 8 से 12 करने के लिए श्रम क़ानून में संशोधन उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा किया जा चुका है। इसी तरह मज़दूरों को ग़ुलामों की तरह खटाने के लिए मोदी सरकार द्वारा ‘चार लेबर कोड’ लागू कर दिया गया है। मोदी-योगी के लिए असल में नागरिक ‘अम्बानी-अदानी’ जैसे पूँजीपति हैं और उन्हीं के हक़ में यह सारे क़दम उठाये जा रहे हैं। भाजपा की झूठ-प्रचार मशीनरी ने फैलाया था कि बिहार के सीमांचल के चार ज़िले “घुसपैठियों” से भरे हुए हैं। लेकिन इन चार जिलों में नागरिकता पर मिलने वाली आपत्तियों की कुल संख्या थी मात्र 106, इनमें से भी केवल 40 के नाम ख़ारिज हुए, हालाँकि उसमें भी पर्याप्त धांधली की गयी। इन 40 ख़ारिज मतदाताओं में हिन्दू कितने थे और मुसलमान कितने? हिन्दू थे 25 और मुसलमान थे 15! यानी, “घुसपैठिये” तो मिले नहीं, लेकिन वैध नागरिकों के ही नाम काट दिये गये और मुसलमान आबादी के बढ़ने का हौव्वा फैलाकर हिन्दू आम मेहनतकश आबादी को ही चपेट में ले लिया गया! यही असम के एनआरसी में भी हुआ था जिसमें 19 लाख रद्द नागरिकताओं में 14 लाख हिन्दू निकले थे।

आखिर डिटेंशन कैम्प बनाने के लिए क्यों उतावली है योगी सरकार?

ऊपर हम देख चुके हैं कि बिहार और असम आदि जगहों पर “अवैध मुस्लिम घुसपैठियों” का शोर हवाई था, बेबुनियाद था। लेकिन उत्तर प्रदेश में अभी एसआईआर की प्रक्रिया पूरी भी नहीं हुई तब तक योगी आदित्यनाथ द्वारा हरेक ज़िले में ‘डिटेंशन कैम्प’ बनाने की घोषणा शुरू कर दी गयी। ग़रीब बस्तियों और झुग्गी बस्तियों में एटीएस और पुलिस छापेमारी कर रही है। ‘टॉर्च अभियान’ चलाया जा रहा है। जो स्थिति दिख रही है उससे साफ़ तौर पर लग रहा है कि इस बार उत्तर प्रदेश सरकार बड़ी संख्या में “घुसपैठियों” को “तलाश” लेगी! यही वजह है कि योगी आदित्यनाथ ने 22 नवम्बर 2025 को सभी 75 ज़िलों के डीएम को निर्देश जारी कर दिया था कि सभी ज़िलों में अस्थायी डिटेंशन सेण्टर बनाये जायें, जहाँ सत्यापन तक “घुसपैठियों” को रखा जायेगा। साथ ही, 18 मण्डल डिवीजनों में स्थायी सेण्टर स्थापित करने का आदेश है। ये सेण्टर हाई-टेक होंगे। CCTV, बायोमेट्रिक, फ़ेस रेकग्निशन और मल्टी-लेयर सिक्योरिटी से लैस, ताकि भागने की कोई सम्भावना न हो। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में तो तिहाड़ जेल से भी बड़ा डिटेंशन सेण्टर बनाया जा रहा है जिसकी क्षमता 15000 लोगों को रखने की होगी।

स्थिति बहुत साफ़ है। आम मेहनतकश आबादी, ग़रीब दलित, मुसलमानों, स्त्रियों, प्रवासी मज़दूरों, झुग्गियों और सड़कों पर रहने वाली और घुमन्तू आबादी का एक बड़ा हिस्सा इस साज़िश का शिकार होगा। एक बड़ी आबादी जिसका नाम एसआईआर के ज़रिये काटा जायेगा उसके लिए अपनी नागरिकता को साबित करना मुश्किल होगा। उन्हें डिटेंशन कैम्पों में ठूँस दिया जायेगा। यह आबादी न तो यह साबित कर पायेगी कि वह बांग्लादेश की या किसी और देश की है और न ही उनकी कोई वापसी होगी। उन्हें मताधिकार आदि से वंचित कर दोयम दर्जे के नागरिक के तौर पर इन डिटेंशन कैंपों में रखा जायेगा। वैसे तो चार लेबर कोड के लागू होने के बाद तो हर कारखाना-फ़ैक्ट्री डिटेंशन कैम्प जैसे ही होंगे। लेकिन इस डिटेंशन कैंप में रहने वाले लोगों के कोई नागरिक अधिकार नहीं होंगे। उन्हें अम्बानी-अदानी के कारखानों में जानवरों से बदतर हालात में खटाया जायेगा। यानी अपने देश के नागरिकों को ही नागरिकता से वंचित कर फ़ासिस्ट उन्हें अपने “असली नागरिक” यानी अम्बानी-अदानी जैसे पूँजीपतियों की ग़ुलामी में लगा देंगे!

हिटलर-मुसोलिनी ने भी अपने वक़्त में बहुत से यहूदियों को डिटेंशन कैम्प में ठूँस दिया था। उनसे इतना ज़्यादा काम लिया जाता था कि वे बहुत जल्दी मर जाते थे। भारतीय फ़ासिस्ट अपने आकाओं से सीखते हुए आज की वैश्विक राजनीतिक-आर्थिक परिस्थितियों के मुताबिक़ इसी प्रयोग को संविधान और क़ानून के दायरे में रहते हुए लागू कर रहे हैं।

इसलिए मेहनतकश हिन्दू आबादी को कम-से-कम अब समझ लेना चाहिए कि एनआरसी, सीएए और अब एसआईआर वास्तव में समूची जनता के ख़िलाफ़ है और जहाँ कहीं मोदी सरकार इसे फिर से करने का प्रयास करे, वहाँ हमें सड़कों पर उतरकर इसका विरोध करना चाहिए। “घुसपैठियों” का नक़ली डर दिखाकर वास्तव में सभी धर्मों व जातियों की आम मेहनतकश जनता को निशाना बनाया जा रहा है। निश्चित तौर पर, इसके ज़रिये सबसे ज़्यादा मुस्लिम आम जनता के विरुद्ध ज़हरीला माहौल बनाया जा रहा है ताकि बेरोज़गारी और महँगाई से त्रस्त जनता का गुस्सा एक नक़ली दुश्मन पर फूट जाये और मोदी सरकार को जनता कठघरे से बाहर कर दे। हिन्दू का दुश्मन मुसलमान या मुसलमान का दुश्मन हिन्दू नहीं है, बल्कि समस्त आम मेहनतकश हिन्दुओं, मुसलमानों, सिखों, ईसाइयों, दलितों, स्त्रियों, आदिवासियों की दुश्मन मोदी सरकार और यह पूँजीवादी व्यवस्था है।

एसआईआर के ज़रिये ‘केचुआ’ और फ़ासीवादी ताक़तों की साज़िश को तभी ध्वस्त किया जा सकता है जबकि अवाम ईवीएम की जगह बैलेट पेपर से चुनाव करवाने के लिए सड़कों पर ज़बरदस्त आन्दोलन के लिए उतरे। क़ायदे से तो विपक्ष जो कि लम्बे समय से चुनावों में वोट चोरी का मुद्दा उठा रहा है उसे चुनावों का बहिष्कार करते हुए सड़कों पर उतर जाना चाहिए। क्योंकि जब वह आँकडों और तथ्यों के ज़रिये यह बात साबित कर चुका है तो फिर चुनाव के बाद जनादेश को स्वीकार कर लेना उनके वोट चोरी के मुद्दे को जनता के बीच संदिग्ध बना देता है। लेकिन आम तौर पर पूँजीवादी जनवाद के क्षरण के वर्तमान दौर में विपक्षी पूँजीवादी ग़ैर-फ़ासिस्ट पार्टियों द्वारा ‘निष्पक्ष और पारदर्शी’ मतदान के जनवादी अधिकारों के लिए सड़कों पर उतरना सम्भव नहीं दिखता। ‘निष्पक्ष और पारदर्शी’ मतदान के जनवादी अधिकार के लिए क्रान्तिकारी ताक़तों और इंसाफ़पसन्द प्रगतिशील शक्तियों को आम जनता को लामबंद करने की तैयारी में लगना होगा। इसे विमर्श और प्रतीकात्मक प्रदर्शन की जगह एक देशव्यापी जुझारू जनआन्दोलन में तब्दील करना होगा। दूसरे, तमाम क्रान्तिकारी और प्रगतिशील ताक़तों को एसआईआर के ज़रिये नागरिकता से हाथ धोने वाले लोगों की हर तरह की मदद के लिए आगे आना होगा। “अवैध घुसपैठ” और “मुसलमान’ के सरकारी साम्प्रदायिक फ़ासिस्ट शोर की सच्चाई को आम जनता में उजागर करना होगा। इस फ़ासीवादी सरकार का घोर पूँजीपरस्त अमानवीय चेहरा जनता में नंगा करना होगा।

 

मज़दूर बिगुल, दि‍सम्बर 2025

 

 

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