‘इण्डिगो संकट’ मज़दूर वर्ग के अमानवीय पूँजीवादी शोषण का नया ज्वलन्त उदाहरण है!
पायलट-विमानकर्मियों के हितों और यात्रियों की सुरक्षा को ताक पर रखकर मोदी सरकार की पूँजीपतियों के प्रति वफ़ादारी एक बार फिर हुई ज़ाहिर!
केशव
विगत 1 दिसम्बर से देशभर में हज़ारों उड़ानें प्रभावित रही हैं। 3 दिसम्बर से 9 दिसम्बर तक पूरे भारत में इण्डिगो एयरलाइन्स की सैकड़ों फ़्लाइटें रद्द हो गयीं। इसका कारण था रेस्ट पीरियड के नये नियमों का लागू होना जिसकी वजह से पायलट पहले से तय फ्लाइट्स उड़ाने के लिए उपलब्ध नहीं थे। ज्ञात हो की विमानन सेक्टर में लगभग 65 प्रतिशत हिस्सेदारी रखने वाला और एशिया का दूसरा सबसे बड़ा एयरलाइन इण्डिगो इस सेक्टर एक इजारेदार पूँजीपति की भूमिका में है। लम्बे समय से एयरलाइन के स्टाफ़ और पायलट कामों के बढ़ते दबाव को रेखांकित भी करते रहे थे और इण्डिगो अपना अकूत मुनाफ़ा इन्हीं विमानकर्मियों के अमानवीय पूँजीवादी शोषण के दम पर पीट रहा था।
ग़ौरतलब है कि इण्डिगो में काम करने वाले कर्मचारी और पायलट अपने यूनियनों के माध्यम से अपनी जायज़ माँगों को लेकर सरकार और इण्डिगो के ऊपर काफ़ी पहले से दबाव बना रहे थे। राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय उड़ानों की संख्या को मिलाकर प्रतिदिन 2,300 से अधिक उड़ान भरने वाले इण्डिगो के पास न तो पर्याप्त क्रू (कर्मचारी) हैं और न ही पायलट। इसकी वजह से एक-एक पायलट और कर्मचारी पर कामों का अतिरिक्त बोझ आ रहा है। अन्तरराष्ट्रीय मानकों के हिसाब से भी ये कर्मचारी और पायलट अतिरिक्त काम करने को मजबूर हैं। नाइट शिफ़्ट में एक पायलट को 6 लैण्डिंग करनी पड़ती है। दो उड़ानों के बीच में उन्हें अपर्याप्त आराम मिलता है। इसके साथ ही इस क़िस्म के कई कामों में सीधे-सीधे अन्तरराष्ट्रीय मानकों का उल्लंघन किया जा रहा है, जिससे न केवल पायलट और कर्मचारियों के स्वास्थ्य को नुक़सान हो रहा है, बल्कि हर दिन हवाई जहाज से सफ़र करने वाले लाखों लोगों की सुरक्षा से भी समझौता किया जा रहा है।
जनवरी-मई 2024 के दौरान कई विमानन दुर्घटनाओं के मद्देनज़र सरकार द्वारा फ़्लाइट ड्यूटी टाइम लिमिटेशन (एफ़डीटीएल) में कुछ संशोधन अधिसूचित किये गये थे। हालाँकि इण्डिगो को सीमित पायलट संख्या के साथ काम करने की इजाज़त दी गयी जिससे पायलटों के काम के घण्टे दिसम्बर 2025 तक बढ़ गये थे। यह बताने की भी ज़रूरत नहीं है की पायलटों सहित सभी कर्मचारियों पर काम का बोझ बढ़ाकर इण्डिगो ज़्यादा मुनाफ़ा कमाने के लिए यात्रियों और विमानकर्मियों की जान ख़तरे में डाल रहा था। इण्डिगो प्रबन्धन द्वारा नियमों को लागू न करना कोई चूक नहीं थी बल्कि मोदी सरकार के समर्थन से लिया गया एक सोचा-समझा फ़ैसला था जो “धन्धे की आज़ादी” के अनुरूप था! बिना मोदी सरकार की मदद और आपराधिक अनदेखी के इण्डिगो के लिए इस तरह नियमों का सरेआम उल्लंघन करना सम्भव ही नहीं था।
इस वर्ष अप्रैल के महीने में यूनियनों के दबाव में दिल्ली उच्च न्यायालय ने इण्डिगो को एफ़डीटीएल की नियमावली को लागू करने का आदेश भी दिया था। न्यायालय द्वारा इसे दो फ़ेज़ में लागू करने की बात की गयी थी। पहला फेज़ 1 जुलाई से लागू होना था और दूसरा फेज़ 1 नवम्बर से। इस नियमावली के तहत पायलटों और कर्मचारियों के कामों के दबाव को कम किया जाना था। इसके तहत पायलटों को लगातार सात दिन काम के बाद 48 घण्टों का आराम देना अनिवार्य बना दिया गया। नाइट ड्यूटी के वक़्त एक पायलट द्वारा लैण्डिंग की अधिकतम सीमा छः से घटाकर दो कर दी गयी। लगातार दो नाइट शिफ़्ट को ख़त्म कर दिया गया। उड़ान के एक घण्टे पहले और बाद हर प्रकार के कामों को रोक दिया गया। एक लम्बी उड़ान के बाद एक पायलट के लिए 24 घण्टे के आराम को अनिवार्य बना दिया गया।
ज़ाहिरा तौर पर इस नियमावली से इण्डिगो को समस्या होनी शुरू हो गयी क्योंकि उन्हें इस नियमावली का पालन करने के लिए कर्मचारियों और पायलटों की संख्या बढ़ानी पड़ती जिससे कर्मचारियों की हड्डियों से निचोड़ने वाला उनका मुनाफ़ा कम हो जाता। इसलिए इण्डिगो ने इस आदेश पर कोई ध्यान नहीं दिया। इस नियमावली के लागू होने का दूसरा फ़ेज़ 1 नवम्बर से शुरू होने वाला था। कामों के दबाव में कोई विचारणीय बदलाव न आने पर क्रू सदस्य और पायलटों ने इसपर ऐतराज़ जताना शुरू किया। इसके नतीजे के तौर पर कई उड़ानें रद्द होनी शुरू हो गयी। 3 दिसम्बर तक आते-आते स्थिति और बिगड़ गयी और सैकड़ों की संख्या में उड़ानें रद्द हो गयी हैं।
जब सवाल मोदी सरकार की मिलीभगत और आपराधिक उपेक्षा पर खड़ा होना शुरू हो गया तो मामले को रफ़ा-दफ़ा करने के लिए सरकार इण्डिगो से लगातार वार्ता करने में लग गयी। नागरिक उड्डयन मंत्री राम मोहन नायडू लोगों को तरह-तरह के आश्वासन देने में लग गये। लेकिन सरकार पूरी कोशिश कर रही थी कि इण्डिगो के लिए मुनाफ़े को किसी तरह से बचा लिया जाये। हालिया जानकारी के मुताबिक़ सरकार ने इण्डिगो के प्रति अपनी वफादारी ज़ाहिर करते हुए उनके द्वारा इस नियमावली को लागू करने के लिए 10 फरवरी तक समय को बढ़ा दिया है। साथ ही उपरोक्त नियमावली में उन्हें काफी छूट भी दी गयी है। फेडरेशन ऑफ़ इण्डिया पायलट्स ने यह बयान जारी किया है कि इण्डिगो पिछले लम्बे समय से कर्मचारियों के ऊपर कामों का दबाव बना रहा था और नये कर्मचारियों की नियुक्ति नहीं की जा रही थी। एफ़डीटीएल को लागू करने के लिए कम्पनी को दो साल का वक़्त दिया गया था, लेकिन इसके बावजूद न कोई नयी नियुक्ति हुई और न ही कामों की स्थिति सुधारी गयी।
अधिकतम मुनाफ़ा निचोड़ने के लिए इण्डिगो द्वारा विमानों को रद्द किये जाने की वजह से यात्रियों को न केवल परेशानियों का सामना करना पड़ा, बल्कि कई यात्रियों को 12-12 घण्टे तक इन्तज़ार करना पड़ा। उन्हें खाने से लेकर सैनिटरी पैड जैसी बुनियादी चीज़ें भी नहीं प्रदान की गयीं। यह बात दीगर है देश में करोड़ों की आबादी हर दिन इससे भी बदतर स्थिति में रेल में सफ़र करती है। खाना और सैनिटरी पैड तो दूर, इस देश के आम मेहनतकश 24-48 घण्टों तक रेल में भेड़-बकरियों की तरह ठूँसकर सफ़र करने को मजबूर होते हैं, जहाँ टॉयलेट इस्तेमाल करना भी उन्हें मयस्सर नहीं होता है।
इस घटना के बाद से देश के पूँजीपतियों के प्रति मोदी सरकार की पक्षधरता एक बार फिर ज़ाहिर हो गयी है। मोदी सरकार इण्डिगो के मुनाफ़े को बचाने के लिए जी जान से लगी हुई है। उन्हें न तो पायलट और क्रू के लोगों के ऊपर कामों के बढ़ते दबाव से कोई मतलब है और न ही लोगों की सुरक्षा से। मोदी सरकार उस काम को बख़ूबी निभा रही है, जिसे करने के लिए इन पूँजीपतियों ने उसे करोड़ों का चन्दा दिया था और सत्ता की कुर्सी तक पहुंचाया था। इस पूरे मसले को लेकर जहाँ एक ओर मोदी सरकार की पक्षधरता साफ़ तौर पर नज़र आ रही है वहीं दूसरी ओर कुछ लोग एकाधिकार पूँजीवाद के बरक्स “मुक्त प्रतिस्पर्धा” के दौर के पूँजीवाद की वकालत कर रहे हैं क्योंकि विमानन सेक्टर में इण्डिगो फिलहाल एक इजारेदार की स्थिति में है। लेकिन ऐसे “भोले” लोग यह नहीं समझ पाते है कि न तो पूँजीवाद के मुक्त प्रतिस्पर्धा के दौर में प्रतिस्पर्धा वास्तव में “मुक्त” थी और न ही आज इजारेदारी के दौर में प्रतिस्पर्धा पूरी तरह समाप्त हो गयी है। ये दोनों दौर असल में पूँजीवाद के ही अलग-अलग चरण हैं। हमें यह समझना होगा कि अपने आप में यह समस्या पूँजीवाद-जनित है, और एकाधिकार पूँजीवाद असल में “मुक्त प्रतिस्पर्धा” की ही तार्किक परिणति है। इसलिए इस समस्या को, बिना पूँजीवादी व्यवस्था से जोड़े, न तो समझा जा सकता है और न ही हल किया जा सकता है। मुनाफ़े के लिए मज़दूरों-कर्मचारियों के ऊपर कामों के बढ़ते दबाव और उनकी इस स्थिति का स्थायी समाधान असल में पूँजीवाद के ख़ात्मे के बिना मुमकिन नहीं है।
हालाँकि इण्डिगो आज जो कुछ भी खुलेआम कर रहा है, वह इस व्यवस्था के भीतर पूँजीवादी राज्य द्वारा सुनिश्चित किये जाने वाले कामों के हालात और बुनियादी सुरक्षा के मानकों का भी उल्लंघन है। और ऐसा करने के लिए मोदी सरकार इसे खुली छूट दे रही है। ग़ौरतलब है कि मुनाफ़े की गिरती दर की वजह से आर्थिक संकट के दौर में पूँजीपति वर्ग असल में इसी कारण से फ़ासीवाद की ओर रुख करता है ताकि मज़दूरों और कर्मचारियों के रहे-सहे अधिकारों को भी ख़त्म कर उन्हें लूटने की खुली छूट मिल सके। यह काम मोदी सरकार पूँजीपतियों के लिए बख़ूबी कर रही है। इण्डिगो के पायलट व क्रू के अधिकारों पर किया गया यह हमला असल में देशभर में मज़दूरों और कर्मचारियों के हक़ों और अधिकारों पर किये जाने वाले हमले की ही निरन्तरता में किया जा रहा है। हाल में ही लेबर कोड को लागू करने के बाद मोदी सरकार ने इसे ही क़ानूनी जामा पहनाने का काम किया है। लेकिन इसका जवाब मज़दूरों, कर्मचारियों और आम जनता की एकजुटता के ज़रिये ही दिया जा सकता है। इतिहास ने हमें यह सिखाया है कि बड़ी से बड़ी प्रतिक्रियावादी जनविरोधी ताक़तें जनता की एकजुटता के दम पर घुटनों पर आ जाती हैं और आज अपनी इसी एकजुटता के ज़रिये सरकार और पूँजीपतियों के गठजोड़ के ख़िलाफ़ हमें आगे आने की ज़रूरत है।
मज़दूर बिगुल, दिसम्बर 2025













