मिड-डे-मील के तहत आने वाले स्कूलों की संख्या में अभूतपूर्व कमी! सरकारी स्कूलों की संख्या में भी भारी कमी!
दिल्ली स्टेट आँगनवाड़ी वर्कर्स एण्ड हेल्पर्स यूनियन (DSAWHU)
केन्द्र सरकार की मिड-डे-मील योजना का लाभ पहले ही काफ़ी कम बच्चों को मिलता था। मगर बीते दिनों संसद में शिक्षा मंत्री जयन्त चौधरी द्वारा दिये गये आँकड़े तो चौंकाने वाले हैं। 2021-22 तक इस योजना के तहत 11.19 लाख स्कूल आते थे जो 2024-25 में घटकर 10.35 लाख रह गये हैं यानी 5 सालों में 7.5% स्कूल कम हो गये। 84,453 स्कूल मिड-डे-मील योजना (पीएम-पोषण योजना) से बाहर हो गये हैं।
देश में सरकारी स्कूलों की कुल संख्या में भी कमी आयी है। 2020-21 में 10.32 लाख स्कूल थे जो 2024-25 में घटकर 10.13 लाख हो गये, यानी इस बीच 18,727 सरकारी स्कूल बन्द हो गये। 2014 से 2024 के बीच देश में कुल 89,000 स्कूल बन्द हो चुके हैं।
भाजपा-शासित राज्यों में पीएम-पोषण योजना से बाहर होने वाले स्कूल सबसे अधिक है। उत्तर प्रदेश में जहाँ 2020-21 में इस स्कीम के तहत आने वाले स्कूलों की संख्या 1.6 लाख थी, वहीं 2024-25 में यह घटकर 1.4 लाख हो गयी। सिर्फ़ यूपी में पाँच सालों के दौरान तक़रीबन 25,361 स्कूल और इनमें पढ़ने वाले लाखों बच्चे पोषण योजना के लाभ से बाहर हो गये। मध्य प्रदेश में इन पाँच सालों में स्कूलों की संख्या 1.1 लाख से घटकर 88,000 के आसपास रह गयी। असम में भी 9,321 स्कूलों में मिड-डे-मील मिलना बन्द हो गया।
अबतक इस योजना के तहत देशभर के 10-11 लाख स्कूलों में औसतन 8-9 करोड़ बच्चों को एक वक़्त का भोजन मिल रहा था। सरकार द्वारा चलायी जा रही यह योजना पहले ही अपर्याप्त थी लेकिन अब उसे भी धीरे-धीरे मोदी सरकार ख़त्म कर रही है। जब शिक्षा मंत्री से सवाल किया गया तो उन्होंने बहुत बेशर्मी से यह कहकर टाल दिया कि “इस स्कीम के तहत बच्चों को खाना देने की पूरी ज़िम्मेदारी राज्य सरकारों और केन्द्र शासित प्रदेशों की है।”
इनसे यह पूछा जाना चाहिए कि “डबल इंजन” की सरकार होने के बावज़ूद भी क्यों लगातार लाखों बच्चों की पहुँच से मिड-डे-मील दूर होता जा रहा है? उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और असम में तो राज्य सरकार भी भाजपा की है फ़िर ज़िम्मेदारी किसकी बनती है?
पहले से ही मौजूद सरकारी स्कूलों की संख्या अपर्याप्त थी और उसे बढ़ाने की ज़रूरत थी और बच्चों तक पहुँचने वाले पके हुए खाने की गुणवत्ता को बेहतर करने की ज़रूरत थी लेकिन सरकार बिल्कुल इसके विपरीत दिशा में काम कर रही है। बचे-खुचे स्कूलों को भी बर्बाद करके, उन्हें बन्द करके, पोषण बजट को कम करके, शिक्षा के बुनियादी अधिकार को छीनने का काम कर रही है। आवंटित बजट भी पूरी तरह उपयोग में नहीं लाया जाता है। केन्द्र सरकार ने 2024-25 में पीएम पोषण स्कीम के लिए 12,467.39 करोड़ रुपये आवंटित किये थे मगर उसे बाद में कम करके 10,000 करोड़ कर दिया गया और उसमें भी ख़र्च सिर्फ़ 5,421.97 करोड़ हुए।
इस योजना की शुरुआत ग़रीब घरों से आने वाले बच्चों को शिक्षा और बेहतर पोषण मुहैया कराने के मक़सद से की गयी थी। हालाँकि इस योजना की शुरुआत से ही इसमें धाँधली और भ्रष्टाचार की कई ख़बरें सामने आयीं। सरकार द्वारा आवंटित बजट कभी भी पूरा ख़र्च नहीं होता था, वहीं बच्चों तक पहुँचने वाले खाने की गुणवत्ता की शिक़ायत भी आमतौर पर हर जगह से ही आती थी।
यूँ ही नहीं ‘विश्व भुखमरी सूचकांक’ में भारत बेहद छोटे और ग़रीब देशों से भी पीछे चला गया है। 2019-21 की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ देश की जनसंख्या का 16.3 फ़ीसदी हिस्सा कुपोषित है। यहाँ पाँच साल से कम उम्र के 35.5% बच्चों की लम्बाई उनके उम्र के हिसाब से कम है, 18.7% ऐसे हैं जिनका वजन बेहद कम है क्योंकि उन्हें पर्याप्त आहार नहीं मिलता है। 2.9% बच्चे तो पाँच साल पूरा होने से पहले ही मर जाते हैं। वैसे तो असल तस्वीर इन आँकड़ों से भी ज़्यादा बुरी है लेकिन मोदी सरकार तमाम ऐसे आँकड़ों और तथ्यों को भी झुठलाने का काम करती है। भारत दुनिया के उन 42 देशों की सूची में आता है जिनमें कुपोषण की स्थिति अतिगम्भीर है। नेपाल, श्रीलंका और बांग्लादेश की स्थिति भी “विश्वगुरु” से बेहतर है।
मोदी सरकार के पिछले 11 साल के कार्यकाल में स्थिति और अधिक ख़राब हुई है। बढ़ते कुपोषण और भुखमरी को देखते हुए जब ज़रूरत थी कि बच्चों और लोगों तक बेहतर आहार पहुँचाने का काम सुनिश्चित किया जाये, मिड-डे-मील जैसी स्कीम व अन्य सामाजिक कल्याण की स्कीमों के बजट को बढ़ाया जाये, तब सरकार ठीक इसके विपरीत काम करते हुए नज़र आ रही है। सरकारी स्कूलों के बन्द होने और बच्चों की पहुँच से मिड-डे-मील दूर होने का सीधा प्रभाव उनकी शिक्षा पर पड़ेगा।
कहने के लिए सरकार शिक्षा को हर किसी का अधिकार बताती है लेकिन असलियत इससे कोसों दूर है। पढ़ाई-लिखाई भी आज उन लोगों की ज़ागीर बन कर रह गयी है जिनके पास पैसा है। सरकारी शिक्षा तंत्र को बर्बाद कर दिया गया है जिसकी वज़ह से ग़रीब-मेहनतकश आबादी से आने वाले बच्चे शिक्षा से दूर होते जा रहे हैं। मिड-डे-मील में कमी और सरकारी स्कूलों के बन्द होने का असर बच्चों के साथ-साथ इस स्कीम के तहत काम करने वाले वर्कर्स पर भी पड़ेगा। देश में 26 लाख मिड-डे मील वर्कर्स हैं, जिनकी नौकरियाँ भी ख़तरे में हैं। भाजपा सरकार द्वारा इस योजना को बर्बाद किये जाने के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने की ज़रूरत है। यह बेहतर पोषण और शिक्षा के बुनियादी अधिकार को आम मेहनतकश आबादी के बच्चों से छीनने की तैयारी है।
मज़दूर बिगुल, दिसम्बर 2025













