इलाहाबाद विश्वविद्यालय में छात्र आन्दोलन को मिली शानदार जीत के मायने

प्रशान्त

यूँ ही उलझती रही है ज़ुल्म से ख़ल्क़
न उनकी रस्म नई है, न अपनी रीत नई
यूँ ही खिलाये हैं हमने आग में फूल
न उनकी हार नई है न अपनी जीत नई।

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

बीते 25 नवम्बर को ‘दिशा छात्र संगठन’ के नेतृत्व में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्रों ने अपनी जुझारू एकजुटता से जीत हासिल कर इलाहाबाद विश्वविद्यालय के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ा है। इस शानदार जुझारू संघर्ष ने प्रशासन को न केवल छात्र-छात्राओं के फ़र्ज़ी निलम्बन को वापस लेने के लिए बाध्य किया बल्कि इसके कारण छात्रों को आतंकित करने वाले चीफ़ प्रॉक्टर को भी इस्तीफ़ा देने के लिए मजबूर होना पड़ा है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्रों ने इतिहास के इस सबक को फिर से सही साबित किया है कि आम मेहनतकश जनता और नौजवानों की एकजुट ताक़त निरंकुश से निरंकुश सत्ता को घुटने टेकने पर मजबूर कर देती है। इस संघर्ष ने फिर से यह साबित किया है कि ‘पूरब का ऑक्सफ़ोर्ड’ कहे जाने वाले विश्वविद्यालय में प्रशासन और सत्ता के नापाक गठजोड़ ने भले ही शैक्षणिक माहौल को बर्बाद करने में कोई कसर नहीं छोड़ी हो लेकिन यहाँ के छात्रों में हक़ और न्याय के लिए लड़ने का माद्दा अभी भी बरक़रार है। इस आन्दोलन ने विश्वविद्यालय प्रशासन और उसके लग्गुओं-भग्गुओं की तमाम धमकियों, तिकड़मों, झूठ-फरेब तथा पुलिसिया धौंस को धत्ता बताते हुए विश्वविद्यालय प्रशासन को घुटने पर ला दिया। जिस विश्वविद्यालय को बच्चों के स्कूल में बदलने की कवायद लम्बे समय से जारी थी, छात्रों के संघर्ष ने उसे फिर से विश्वविद्यालय की गरिमा प्रदान की है। शाम को 5:00 बजे के बाद जिस परिसर में प्रवेश को रोक कर शमशान जैसे ख़ामोशी क़ायम कर दी जाती थी, वहाँ पर छात्रों के नारे, कविता पाठ और गिटार की आवाज़ गूंज रही थी और अब खून का घूँट पीकर खामोश होने की बारी विश्वविद्यालय प्रशासन की थी। क्रान्तिकारी नेतृत्व में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्रों ने ठण्ड, भूख और दमन की सम्भावना को झेल कर अपनी बुलन्द आवाज़ को ज़िन्दा रखा। यही इस शानदार जीत का खुला राज़ है।

फ़ासीवादी मोदी सरकार के सत्तासीन होने के बाद से ही देशभर में लोकतान्त्रिक आवाज़ों और जनवादी स्पेस का गला घोंटा जा रहा है। देश की सभी संस्थाओं में ऊपर से नीचे तक फ़ासीवादी जकड़बन्दी लगातार मज़बूत होती जा रही है। भाजपा सरकार द्वारा मेहनतकश जनता पर हमले का दौर बदस्तूर जारी है। चार लेबर कोड मेहनतकशों पर अब तक का सबसे बड़ा फ़ासीवादी हमला है। इसी तरह कुछ साल पहले मोदी सरकार द्वारा लागू ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020’ मेहनतकश अवाम के घरों के बच्चों पर एक बड़ा हमला था। जैसे-जैसे नयी शिक्षा नीति पर अमल हो रहा है, वैसे-वैसे उसकी सच्चाई भी आम जनता के सामने खुलती जा रही है। विश्वविद्यालयों में बेतहाशा फ़ीस वृद्धि हो रही है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पिछले चार सालों में नियमित कोर्स के लिए छः गुना से ज़्यादा फ़ीस बढ़ायी जा चुकी है और हर साल 10 फ़ीसदी की फ़ीस वृद्धि की जा रही है।

विश्वविद्यालयों में लम्बे संघर्षों और अकूत कुर्बानियों से हासिल जनवादी अधिकारों पर सुरक्षा और शान्ति के नाम पर प्रशासनिक बुलडोज़र चलाया जा रहा है। अभी हाल ही में प्रशासन द्वारा अनुशासनात्मक कार्रवाई का हवाला देते हुए एक निरंकुश फ़रमान जारी किया गया जिसके ज़रिये परिसर में बिना अनुमति छात्र गतिविधियों पर प्रत्यक्ष तौर पर रोक लगा दी गयी है। शाम को पाँच बजे के बाद विश्वविद्यालय परिसर में छात्रों के प्रवेश पर रोक लगी हुई है। परिचय-पत्र की जाँच के नाम पर विद्यार्थियों को परेशान किया जा रहा है। पिछले दिनों विश्वविद्यालय के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ जब सुरक्षाकर्मियों ने छात्रों पर गोली तक चलायी। वास्तव में, तमाम विश्वविद्यालयों की तरह इलाहाबाद विश्वविद्यालय में भी प्रशासन की गुण्डागर्दी, छात्रों के साथ गाली-गलौच, मारपीट, हर प्रकार की छात्र गतिविधि पर रोक, फ़र्ज़ी निलम्बन-निष्कासन और फ़र्ज़ी मुकदमे आम बात बन गयी थी। जबकि संघियों और उसके बगलबच्चा संगठन के कार्यक्रम न केवल बेरोकटोक हो रहे हैं बल्कि प्रशासन की अगुवाई में करवाये जा रहे हैं। छात्रों-युवाओं में इतना डर बैठा दिया गया था कि आम छात्रों की तो बात छोड़ दीजिये तमाम छात्र नेता भी चूँ तक नहीं बोल पाते थे।

इन प्रतिकूल परिस्थितियों के बीच ‘दिशा छात्र संगठन’ छात्रों के जनवादी अधिकारों के लिए, परिसर में स्वस्थ राजनीतिक-सांस्कृतिक माहौल बनाने के लिए पिछले लम्बे समय से छात्रों को जागरूक-संगठित करता रहा है। यही वजह थी कि प्रशासन की नज़रों में ‘दिशा छात्र संगठन’ के कार्यकर्त्ता और उनकी गतिविधियाँ बुरी तरह से चुभ रही थीं। किसी भी प्रगतिशील छात्र संगठन की गतिविधियों पर रोक लगाने के लिए प्रशासन ने गुण्डागर्दी, कार्यक्रम करने के लिए अनुमति की बाध्यता, कार्यक्रमों के प्रचार पर अघोषित रोक और “बाहरी” होने का आरोप लगाने आदि का हथकण्डा अपनाया। लेकिन इससे कोई हल निकलता न देख विश्वविद्यालय प्रशासन ने ‘दिशा’ के कार्यकर्ताओं के फ़र्ज़ी निलम्बन का रास्ता चुना। लेकिन प्रशासन की यह गुण्डागर्दी इस बार उल्टी पड़ गयी।

दरअसल यह पूरा मामला 15 अक्टूबर को शुरू हुआ जब ‘दिशा छात्र संगठन’ के कुछ कार्यकर्ता विश्वविद्यालय में पर्चा वितरित कर रहे थे और ‘दिशा’ के सदस्यों का एक समूह सामूहिक अध्ययन कर रहा था। तभी सुरक्षाकर्मी आकर छात्रों से बदसलूकी करने लगे और एक गार्ड ने तो संगठन के एक सदस्य का कॉलर पकड़ लिया तथा छात्राओं को धक्का देने लगा। इस गुण्डागर्दी के ख़िलाफ़ ‘दिशा छात्र संगठन’ के समर्थन में सैकड़ों छात्र एकत्रित हो गये जिसके बाद एफसीआई परिसर में सभा का आयोजन किया गया। सभा के बाद छात्रों का जुलूस मेन गेट पहुँचा तो सुरक्षाकर्मियों ने गेट बन्द कर दिया। बाद में छात्रों की बढ़ती भीड़ और जुझारूपन को देखते हुए उन्हें गेट खोलना पड़ा और जुलूस प्रॉक्टर ऑफिस पहुँचा। प्रॉक्टर कार्यालय पर सभा का आयोजन किया गया और अपनी माँगों के समर्थन में प्रॉक्टर के माध्यम से कुलपति को ज्ञापन सौंपा गया।

ज्ञापन में उठायी गयी माँगों पर काम करने की जगह प्रशासन ने उल्टे आन्दोलन का नेतृत्व कर रहे ‘दिशा छात्र संगठन’ के चन्द्रप्रकाश को बिना किसी पूर्व सूचना के निलम्बित कर परिसर में उसके प्रवेश को प्रतिबन्धित कर दियाा। अपने निलम्बन और परिसर प्रवेश प्रतिबन्ध से अनजान चन्द्रप्रकाश जब 27 अक्तूबर को क्लास करने के लिए जा रहे थे तभी सुरक्षाकर्मी उनसे बदतमीज़ी करने लगा। जब चन्द्रप्रकाश और अन्य छात्रों ने इसका विरोध किया, तब सुरक्षाकर्मी छात्रों से गाली-गलौज करने लगा और चन्द्रप्रकाश के साथ मारपीट करने लगा। बाद में चन्द्रप्रकाश को खींच कर वह एक बिल्डिंग के पीछे ले जाने लगा। जब चन्द्रप्रकाश ने इसका विरोध किया और वहाँ उपस्थित छात्र विडियो बनाने लगे तब जाकर सुरक्षाकर्मी शशिकान्त ने बताया कि चन्द्रप्रकाश के विश्वविद्यालय प्रवेश पर बैन लगाया गया है। इस बदसलूकी के ख़िलाफ़ सैकड़ों छात्रों ने 28 अक्टूबर को विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार को बन्द कर दिया और पूरे दिन प्रदर्शन करते रहे। प्रदर्शनरत छात्रों से मिलने आये चीफ़ प्रॉक्टर ने प्रदर्शन स्थल पर पहुँचते ही छात्रों को धमकाना शुरू कर दिया और मारने-पीटने की धमकी देने लगे। इसके बाद छात्रों ने नारेबाजी शुरू कर दी। डीएसडब्ल्यू के समझाने पर छात्र शान्त हुए और अपनी माँगों का ज्ञापन प्रशासन को सौंपा। छात्रों ने मुख्यतः तीन माँगें उठायी- 1. चन्द्रप्रकाश के साथ गाली-गलौज तथा मारपीट करने वाले सुरक्षाकर्मी शशिकान्त और दीपचन्द की तत्काल सेवा समाप्त की जाये और उचित विधिक कार्यवाही की जाये; 2. चन्द्रप्रकाश के ख़िलाफ़ भ्रामक प्रचार करने वाले प्रोक्टोरियल  बोर्ड के सदस्यों पर प्रशासनिक कार्रवाई की जाये और 3. चन्द्रप्रकाश समेत अन्य सभी छात्रों के ग़ैरकानूनी निलम्बन और परिसर में प्रवेश पर लगी रोक को तत्काल वापस लिया जाये।

अभी यह मामला चल ही रहा था कि 20 नवम्बर को मशहूर शायर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ के स्मृति दिवस पर सांस्कृतिक कार्यक्रम की सूचना देने गये ‘दिशा छात्र संगठन’ के कार्यकर्ता सौम्या, पूजा और संजय को प्रॉक्टर ऑफिस में बन्धक बनाकर रखा गया तथा चीफ़ प्रॉक्टर राकेश सिंह और अतुल नारायण सिंह द्वारा दो घण्टे से ज़्यादा समय तक मानसिक उत्पीड़न किया गया। सौम्या और पूजा को प्रॉक्टर द्वारा जातिसूचक गलियाँ दी गयी। संजय और सौम्या को प्रॉक्टर बार-बार पटक कर मारने की धमकी देता रहा। सौम्या ने जब प्रॉक्टर के इस निरंकुश व्यवहार का विरोध किया तो प्रॉक्टर ने सौम्या पर माफ़ीनामा लिखने के लिए दबाव बनाया। सौम्या के दुबारा विरोध करने पर प्रॉक्टर ने सौम्या और संजय को तत्काल प्रभाव से निलम्बित कर इनके परिसर में प्रवेश को प्रतिबन्धित कर दिया। निलम्बन पत्र देने के बाद सौम्या और पूजा को छोड़ दिया गया, लेकिन संजय को प्रॉक्टर ऑफिस में बिठाये रखा गया और लाठियों से मारने की धमकी प्रॉक्टर राकेश कुमार और उपप्रॉक्टर अतुल नारायण सिंह देते रहे।

इसके पहले ‘दिशा’ के कार्यकर्ता चन्द्रप्रकाश को निलम्बित किया गया था और गार्डों द्वारा मारपीट की कोशिश की गयी थी। प्रॉक्टर द्वारा तीन छात्रों को बन्धक बनाने की सूचना जब छात्रों को मिली, तब छात्र सैकड़ों की संख्या में प्रॉक्टर ऑफिस पर इकठ्ठा हो गये। छात्रों ने जब प्रॉक्टर ऑफिस का घेराव शुरू किया तब जाकर संजय को छोड़ा गया। प्रॉक्टोरियल बोर्ड की इस तानाशाही और निरंकुशता के ख़िलाफ़ छात्रों ने पूरे परिसर में मार्च निकाला, लाइब्रेरी गेट पर शाम तक बैठे रहे और इसके बाद क्रमिक धरने की शुरुआत हुई। 24 नवम्बर की सुबह जब आन्दोलन शुरू हुआ तो हज़ारों की संख्या में छात्र प्रदर्शन स्थल पर छात्र इकठ्ठा हो गये। शाम होने पर भी छात्र डटे रहे। इस दौरान प्रशासन से दो दफ़ा बात हुई लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला जिसके बाद आन्दोलन को क्रमिक धरने से अनिश्चितकालीन धरने में तब्दील कर दिया गया।

आन्दोलन शुरू होने के बाद से ही प्रॉक्टर राकेश सिंह और अतुल नारायण सिंह शिक्षक पद की मर्यादा को तार-तार करते हुए झूठ बोलने के नये-नये कीर्तिमान गढ़ रहे थे। छात्रों पर प्राक्टोरियल बोर्ड द्वारा तोड़-फोड़ करने के फ़र्ज़ी आरोप लगाने से शुरू हुआ सिलसिला, दाँत से काटने के झूठे आरोप लगाने तक नहीं रुका। यहाँ तक कि राकेश सिंह ने सारी हदें पार करते हुए छात्रों को आतंकी, देशविरोधी और नक्सली तक बना डाला! आन्दोलन शुरू होने के दिन प्रशासन ने छात्रों के मनोबल को तोड़ने के लिए इस ठण्ड के मौसम में सुबह से ही कई टैंकर पानी लाइब्रेरी गेट की सड़क पर गिरवा दिया था। इससे भी मन नहीं भरा तो प्रशासन द्वारा सबमर्सिबल से सड़क पर पानी भर दिया गया। छात्र आन्दोलन में शामिल न हो सके इसके लिए जानबूझकर 2 दिन के लिए स्नातक की सभी कक्षाओं को रद्द कर दिया गया। लेकिन इन सब तिकड़मों के बाद भी छात्रों का हुजूम सड़कों पर उतरा और प्रशासन के मंसूबों पर पानी फिर गया। सोमवार यानी 24 नवम्बर की शाम को जब क्रमिक आन्दोलन को अनिश्चितकालीन आन्दोलन में बदला गया तब प्रशासन ने जानबूझकर प्रदर्शन स्थल की बिजली काट दी। जिस समय बिजली काटी गयी, उस समय ‘दिशा छात्र संगठन’ की सांस्कृतिक टीम ‘राजा का बाजा’ नाटक का मंचन करने जा रही थी। सैकड़ों छात्रों ने प्रशासन की इस साज़िश का जबाब देते हुए अपने-अपने मोबाइल की फ्लैश लाइट जला दी और सफलतापूर्वक नाटक का मंचन किया गया। पूरी रात छात्र मुस्तैदी से कैम्पस में ही टिके रहे। रात भर क्रान्तिकारी गीत, कविता पाठ, रैप सॉन्ग आदि का सिलसिला चलता रहा। सालों बाद इलाहाबाद विश्वविद्यालय रात में इतनी गुलज़ार रही। ‘रिक्लैम द नाईट, रिक्लैम द राइट’ का नारा बुलन्द करते हुए दर्जन भर से ज़्यादा लड़कियाँ पूरी रात परिसर में रहीं। इतिहास गवाह रहा है कि आधी आबादी की भागीदारी के बग़ैर कोई भी अन्दोलन किसी मुकम्मल जीत पर नहीं पहुँच सकता है। इस आन्दोलन को जीत तक पहुँचाने में स्त्री साथियों की जुझारू भागीदारी ने बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभायी।

दूसरे दिन शाम तक प्रशासन ने घुटने टेकना शुरू कर दिया और अन्ततः देर रात प्रशासन को छात्रों की सभी माँगों को मानने पर मजबूर होना पड़ा। आन्दोलन की जीत के बाद परिसर में आन्दोलन स्थल से शुरू होकर छात्रसंघ भवन स्थित शहीद लाल पद्मधर की प्रतिमा तक विजय जुलूस निकाला गया जहाँ एक सभा का आयोजन किया गया। छात्रों की एकजुटता के आगे झुकते हुए प्रशासन को न केवल छात्रों का निलम्बन वापस लेना पड़ा बल्कि साफ़ पानी, साफ़-सफाई समेत विभिन्न समस्याओं के निवारण पर आश्वासन देना पड़ा जिस दिशा में अब काम शुरू भी हो चुका है। पिछले लम्बे समय से बात-बात पर छात्रों को निलम्बित करने की आदत के शिकार प्रशासन को इस बार छात्र-छात्राओं ने अपनी एकजुटता से मुँहतोड़ जवाब दिया। छात्रों के साथ गुण्डागर्दी करने वाले चीफ़ प्रॉक्टर राकेश सिंह को इस्तीफ़ा देना पड़ा। इस अंधेरे वक़्त में छात्र आन्दोलन को मिली यह जीत तमाम विश्वविद्यालयों, शैक्षणिक संस्थानों और मज़दूर साथियों के संघर्ष के लिए एक ऊर्जा स्त्रोत के रूप में काम करेगी।

मज़दूर साथियो, ‘दिशा’ के नेतृत्व में इलाहाबाद विश्वविद्यलय के छात्रों की यह शानदार लड़ाई कई मायनों में हमारे लिए भी महत्वपूर्ण है। हमें अपने आने वाले संघर्षों के लिए इस आन्दोलन से कुछ ज़रूरी सबक निकलने होंगे। सबसे ज़रूरी सबक यह है कि बिना किसी क्रान्तिकारी नेतृत्व के कोई भी स्वत:स्फूर्त आन्दोलन या जनउभार कुछ सफलताओं और अराजकता के साथ अन्ततः ज़्यादा से ज़्यादा किसी समझौते या अक्सर असफलता पर ही ख़त्म होता है। पिछले एक दशक में ही ऐसे तमाम जनान्दोलन दुनिया भर में देखने में आये हैं, जो स्वत:स्फूर्त थे, अपनी ताक़त से शासक वर्ग को भयभीत कर रहे थे, लेकिन किसी स्पष्ट राजनीतिक लक्ष्य, कार्यक्रम और नेतृत्व के अभाव में अन्त में वे दिशाहीन हो गये, जनता अन्तत: थककर वापस लौट गयी और शासक वर्गों को अपने आपको और अपनी सत्ता को वापस सम्भाल लेने का अवसर मिल गया। ऐसा ही हमें श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल में अचानक से हुए जनउभार में देखने को मिला। यही हमें अरब जनउभार में भी देखने को मिला था। इसलिए जो एक नकारात्मक सबक हमें इन उदाहरणों से मिलता है, वह यह कि हमें अपना ऐसा स्वतन्त्र राजनीतिक नेतृत्व और संगठन विकसित करना चाहिए जो पूँजीपति वर्ग के सभी चुनावबाज़ दलों के असर से मुक्त हो, पूर्ण रूप से मज़दूर वर्ग की नुमाइन्दगी करता हो, उसकी राजनीति और विचारधारा मज़दूर वर्ग की राजनीति और विचारधारा हो। ऐसे क्रान्तिकारी सर्वहारा संगठन के बिना जनसमुदाय कभी भी अपने जनान्दोलनों के उद्देश्यों की पूर्ति तक नहीं पहुँच सकते।

दूसरी बात हमें आज यह समझनी होगी कि फ़ासीवादी मोदी सरकार आज मेहनतकशों पर चौतरफ़ा हमला बोल चुकी है। फ़ासीवादी मोदी सरकार हर तरह के विरोध को कुचलने के लिए तमाम हथकण्डे अपना रही है। जिस तरह से देशभर के विश्वविद्यालयों में छात्रों के जनवादी मंच छात्रसंघ को एक प्रक्रिया में ख़त्म कर दिया गया है और जहाँ पर है भी वहाँ प्रभावहीन बना दिया गया है; ठीक उसी तरह से मोदी सरकार ने हम मज़दूरों को आधुनिक गुलाम बनाने के लिए चार लेबर कोड लागू कर दिये हैं। इन लेबर कोड के ज़रिये पूँजीपतियों को हम मज़दूरो को लूटने की खुली छुट मिल जायेगी। हमारे यूनियन बनाने और हड़ताल करने तक के जनवादी अधिकारों को हमसे छिना जा रहा है। सच्चाई यह है कि फ़ासीवादी शासन के तहत समाज के हर शोषित-दमित-उत्पीड़ित तबके के विरोध को कुचलने के लिए खुला डंडातंत्र लागू कर दिया जाता है ताकि पूँजी के हितों को, बिना किसी प्रतिरोध के, साधा जा सके। इसलिए हम मज़दूर साथियों को मज़दूर-कर्मचारी-छात्र एकता कायम करने लिए कदम बढ़ाना चाहिए क्योंकि आज इसी फ़ौलादी एकजुटता के दम पर हम फ़ासीवादी हमलों का मुक़ाबला कर सकते हैं।

साथ ही हमें फ़ासीवाद की परिघटना की भी वैज्ञानिक समझदारी हासिल करनी होगी क्योंकि दुश्मन को समझे बग़ैर दुश्मन को हराया नहीं जा सकता है। हमें यह समझना होगा कि फ़ासीवाद टुटपूँजिया वर्ग का तृणमूल स्तर का धुर प्रतिक्रियावादी संगठित सामाजिक आन्दोलन होता है जो एक काडर आधारित संगठन द्वारा संचालित होता है और फ़ासीवादी विचारधारा पर खड़ा होता है। कुलमिलकर कहें तो फ़ासीवाद आम तौर पर पूँजीपति वर्ग तथा विशेष तौर पर बड़े पूँजीपति वर्ग की सेवा करता है और अपने इस ऐतिहासिक प्रकार्य को पूरा करने के लिए ही हर प्रकार के राजनीतिक प्रतिरोध को कुचलता है। इसलिए यह बात समझना भी उतना ही ज़रूरी है कि फ़ासीवाद का मुक़ाबला कांग्रेस, सपा, टीएमसी, आम आदमी पार्टी, राजद सरीखी पूँजीवादी पार्टियों का पिछलग्गू बनकर नहीं किया जा सकता है जैसा कि आज भाकपा, माकपा, भाकपा-माले(लिबरेशन) जैसी नामधारी कम्युनिस्ट पार्टियाँ कर रहीं हैं। फ़ासीवाद को सर्वहारा वर्ग के नेतृत्व में आम मेहनतकश जनता की फ़ौलादी एकता से संचालित तृणमूल स्तर के जुझारू जन आन्दोलन के दम पर ही परास्त किया जा सकता है।

इस आन्दोलन से एक ज़रूरी सबक यह मिलता है कि स्त्रियों की भागीदारी के बग़ैर कोई भी आन्दोलन मुक्कमल जीत तक पहुँच ही  नहीं सकता है। इसी इलाहाबाद विश्वविद्यालय में इसके पहले तमाम आन्दोलन खड़े हुए, छात्रों-नौजवानों का एक बड़ा हुजूम भी सडकों पर उतरा लेकिन उन आन्दोलनों में छात्राओं की भूमिका नगण्य थी। आम तौर पर ऐसे आन्दोलन अक्सर असफलता पर ही समाप्त हुए। इस आन्दोलन में शुरू से ही छात्राओं की भी सक्रिय भूमिका रही। हमारी महिला साथियों ने इस आन्दोलन को शानदार तरीके से संचालित किया और इस वजह से भी इस आन्दोलन को जीत हासिल हुई। भारत जैसे पितृसत्तात्मक समाजों में स्त्रियों को सामाजिक-राजनीतिक संघर्षों से दूर रहने की हिदायत दी जाती है। हम मज़दूर साथी भी जाने-अनजाने पितृसत्ता की उत्पीड़नकारी विचारधारा के प्रभाव में होते हैं। हमें यह बात समझनी होगी कि स्त्रियों की गुलामी के केन्द्र में भी वही पूँजीवाद है जो पूँजीवाद मज़दूर वर्ग को गुलामी की दहलीज़ पर धकेल रहा है और उसके भी शोषण-दमन-उत्पीड़न का कारण है। इसलिए स्त्री मुक्ति संघर्ष मज़दूर वर्ग की मुक्ति संघर्ष से अटूट रूप में जुड़ा हुआ है।

एक आख़िरी ज़रूरी सबक यह कि जब भी किसी स्थापित सत्ता के ख़िलाफ़ कोई न्यायपूर्ण आन्दोलन खड़ा होता है तो सत्ता के दलाल और हमारे बीच मौजूद भितरघाती अपने आकाओं की सेवा में सक्रिय हो जाते हैं, जैसा इस आन्दोलन में भी हुआ। पूँजीपति वर्ग या पूँजीवादी सरकार के ख़िलाफ़ कोई जुझारू आन्दोलन शुरू होता है तो शोषक वर्गों द्वारा सबसे पहले आन्दोलन में फूट डालने के हथकण्डे अपनाये जाते हैं। शोषक वर्ग के लिए इस काम में सबसे बड़े सहयोगी बनते हैं हमारे बीच मौजूद भितरघाती और सत्ता के दलाल। इसी तरह मज़दूर आन्दोलन में भी ऐसी तमाम दलाल यूनियनें व संगठन काम कर रहे हैं जो वैसे तो हमारे बीच में बड़े क्रान्तिकारी बनते हैं, लेकिन जैसे ही हमारा कोई जुझारू आन्दोलन खड़ा होता है, तत्काल ही ये संगठन पूँजीपतियों की दलाली करने लगते है, उनसे साँठ-गाँठ करने लगते हैं और हमारे आन्दोलन को कमज़ोर बनाने की कोशिश करने लगते है। इसलिए ज़रूरी है कि हम अपने आन्दोलन को ऐसी दलाल यूनियनों और संगठनों से मुक्त करें और पूँजीपति वर्ग से राजनीतिक रूप से स्वतन्त्र क्रान्तिकारी मज़दूर यूनियनों व संगठनों को क़ायम करें।

 

मज़दूर बिगुल, दि‍सम्बर 2025

 

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