‘चार लेबर कोड’ मज़दूरों-कर्मचारियों के अधिकारों पर सबसे बड़ा हमला है! अब एकदिवसीय हड़तालों की रस्मअदायगी का वक़्त नहीं रहा!
सभी मज़दूरों-कर्मचारियों, केन्द्रीय ट्रेड यूनियन फ़ेडरेशनों व स्वतन्त्र यूनियनों का आह्वान! अनिश्चितकालीन आम हड़ताल के लिए एकजुट हो!!

अपने तीसरे कार्यकाल के दौरान मोदी सरकार खुलकर उन सभी कार्यभारों को पूरा कर रही है जिनके लिए देश के पूँजीपति वर्ग ने सत्ता की कमान उसके हाथ में सौंपी थी। आर्थिक मन्दी से बिलबिलाया हुआ पूँजीपति वर्ग लम्बे समय से “धन्धे की आज़ादी” के लिए किलबिला रहा था। वही “आज़ादी” मोदी सरकार ने चार लेबर कोड की शक्ल में मालिकों और पूँजीपतियों को बतौर सौगात थमायी है। देश के करोड़ों मज़दूरों-कर्मचारियों की बदहाल ज़िन्दगी को और भी तबाह करने वाले चार ख़तरनाक लेबर कोड मोदी सरकार पिछले महीने लागू कर चुकी है। 21 नवम्बर को अचानक एक अधिसूचना जारी करके सरकार ने इसकी घोषणा कर दी। यह फ़ासीवादी मोदी सरकार द्वारा मज़दूरों और कर्मचारियों के अधिकारों पर अबतक का सबसे बड़ा हमला है।

इस घोषणा के कुछ ही दिनों बाद मोदी सरकार ने इस देश के ग्रामीण व खेतिहर मेहनतकशों पर भी एक हमला बोल दिया। सरकार ने मनरेगा क़ानून को ख़त्म करके उसकी जगह ‘विकसित भारत – रोजगार और आजीविका की गारण्टी मिशन (ग्रामीण) विधेयक, 2025 (VB-G RAM G)’ पारित किया जो वस्तुतः मनरेगा के तहत मिलने वाले सीमित रोज़गार गारण्टी के अधिकार को भी समाप्त कर देता है, केन्द्र सरकार की क़ानूनी व वित्तीय जवाबदेही को अतिसीमित बना देता है और वास्तव में धनी किसानों व खेतिहर पूँजीपति वर्ग को सस्ती दरों पर मज़दूर मुहैया करवाने का नया क़ानूनी औज़ार प्रदान करता है। मनरेगा को समाप्त कर इस नये क़ानून के तहत कृषि के पीक सीज़न में 60 दिनों के कार्य-निषेध (ब्लैकआउट फ़ेज़) का प्रावधान किया गया है। यह क़दम यही दिखलाता है कि धनी किसानों समेत पूरे पूँजीपति वर्ग की लॉबी की लम्बे समय से चली आ रही मनरेगा क़ानून को ख़त्म करने की माँग की तामील मोदी सरकार ने की है। रोजगार का सीमित अधिकार देने वाला मनरेगा क़ानून लम्बे समय से धनी किसानों-कुलकों की आँखों में किरकिरी बना हुआ था क्योंकि इसकी वजह से खेतिहर व ग्रामीण मज़दूर वर्ग की मोलभाव की सापेक्षिक ताक़त बढ़ी थी और वे गाँवों में दिहाड़ी मज़दूरी को लेकर अधिक मोलभाव करने की स्थिति में थे और कम मज़दूरी मिलने की स्थिति में बेहतर विकल्पों का इन्तज़ार कर सकते थे। अब नये क़ानून के आने के बाद ग्रामीण सर्वहारा की पहले से ही अरक्षित स्थिति और भी बदतर हो जायेगी।

बहरहाल, मोदी सरकार इन तमाम क़दमों को “सुधार” के तौर पर पेश कर रही है। ‘श्रमेव जयते’ की लफ़्फ़ाज़ी के साथ और ख़ुद को “मज़दूर हितैषी” घोषित करते हुए मोदी सरकार अपने ही गाल थपथपाने में लगी है। पुराने श्रम क़ानूनों को ‘तर्कसंगत’ बनाने और उनके ‘सरलीकरण’ के नाम पर ये “ऐतिहासिक सुधार” दरअसल समूचे मज़दूर वर्ग के अधिकारों पर एक ऐतिहासिक प्रहार है। हर बीतते दिन के साथ देश के मज़दूर-कर्मचारी दशकों के संघर्षों के बाद अर्जित किये गये हकों पर हो रहे इस फ़ासीवादी हमले की वास्तविकता समझ रहे हैं और यही कारण है कि सरकार और गोदी मीडिया समेत सम्पूर्ण फ़ासीवादी प्रचार तंत्र इन लेबर कोडों का झूठा प्रचार करने में एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा रहे हैं।

ग़ौरतलब है कि मोदी सरकार साल 2019 और 2020 में ही कोरोना महामारी और लॉकडाउन के दौरान इन क़ानूनों को संसद में पारित करवा चुकी थी और उसके बाद इन्हें आनन-फ़ानन में लागू करने की फ़िराक़ में भी थी। लेकिन 2024 लोकसभा चुनावों में ‘400 पार’ के गुब्बारे की हवा निकलने के बाद और नितीश कुमार और चन्द्रबाबू नायडू की बैसाखियों के सहारे सत्ता में तीसरी बार वापसी के बाद मोदी सरकार कुछ वक़्त तक फूँक-फूँककर क़दम रख रही थी और लेबर कोड के लागू होने में देरी के पीछे राज्य सरकारों द्वारा नियम बनाये जाने में देरी का हवाला दे रही थी। हालाँकि स्पेशल इंटेन्सिव रिवीज़न (एसआईआर), वोटचोरी और ईवीएम घोटाले के बूते और चुनाव आयोग की खुली मदद और मिलीभगत के ज़रिये बिहार में पिछले महीने चुनाव जीतने और सरकार बनाने के बाद फ़ासीवादी भाजपा के हौसले काफ़ी बुलंद हो चुके थे और इसलिए सरकार ने 21 नवम्बर को अधिसूचना जारी करके इन 4 लेबर कोडों को लागू करने का ऐलान किया।

29 केन्द्रीय श्रम क़ानूनों को ख़त्म कर जिन चार लेबर कोडों को लाया गया है वे हैं :मज़दूरी पर संहिता, 2019 (The Code on Wages, 2019), ‘व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्यस्थितियों पर संहिता, 2020’ (The Occupational Safety, Health and Working Conditions Code, 2020), ‘सामाजिक सुरक्षा पर संहिता, 2020’ (The Code on Social Security, 2020) औद्योगिक सम्बन्धों पर संहिता, 2020’ (The Industrial Relations Code, 2020)

ये चार कोड पूँजीपतियों-कम्पनियों को मज़दूरों-कर्मचारि़यों को लूटने की पूरी खुली छूट देते हैं और पूँजीवाद के अन्तर्गत मज़दूर वर्ग की  असुरक्षित और अरक्षित स्थिति को और बढ़ावा देते हैं और उन्हें पूरी तरह मालिकों के रहमोकरम पर छोड़ते हैं। साथ ही मज़दूर अपने अधिकारों की रक्षा के लिए संगठित भी न हो पायें, इसका पक्का इन्तज़ाम भी चार लेबर कोड में किया गया है। ये लेबर कोड कार्यपालिका को असीमित अधिकार देकर मज़दूर वर्ग के हर प्रकार के सम्भावित दखल को ख़त्म करने के पूरे प्रावधान देते हैं। यह आम तौर पर निरंकुश राज्यसत्ताओं और विशेष तौर पर इक्कीसवीं सदी के फ़ासीवाद की ख़ासियत है कि राज्यसत्ता के क्रियाकलापों में विधायिका के मुक़ाबले निर्णयकारी शक्तियाँ कार्यपालिका को हस्तान्तरित होती जाती हैं जिस वजह से जनसमुदायों के व्यापक हिस्सों का कोई भी नियंत्रण या दखल किसी भी लिये गये फ़ैसले पर नहीं रहता है। इन लेबर कोड द्वारा यही किया जा रहा है।

कुलमिलकर कहें तो चार लेबर कोड मज़दूरों-कर्मचारियों के अधिकारों पर आजतक किया गया सबसे बड़ा हमला है। आज़ादी के दौर में ब्रिटिश हुकूमत ने ‘ट्रेड डिस्प्यूट बिल’ लाकर मज़दूरों के अधिकारों को छीना था, जिसके विरुद्ध शहीदे आज़म भगतसिंह और उनके क्रान्तिकारी साथियों ने विरोध भी संगठित किया था। यही काम आज चार लेबर कोड के ज़रिये मोदी सरकार कर रही है। यह दिखाता है कि भाजपा-संघ ने अपने पुराने आकाओं यानी अंग्रेज़ों से काफ़ी कुछ सीखा है!

ऐसे में आज देश के औपचारिकअनौपचारिक क्षेत्र में कार्यरत संगठित असंगठित मज़दूरोंकर्मचारियों के पास इन नये क़ानूनों के खिलाफ़ फ़ैसलाकुन संघर्ष छेड़ने के अलावा और कोई रास्ता नहीं है। हमें यह समझना होगा कि अब एक दिवसीय हड़तालों की रसमदायगी का वक़्त नहीं रहा! इन एकदिनीदोदिनी कवायदों से कुछ होना होता तो पहले ही हो चुका होता! आज स्थिति यह है कि ये लेबर कोड अब क़ानून का रूप ले चुके हैं और हमारे सिर पर ख़तरे की तलवार बनकर लटक रहे हैं। लेकिन अफसोस की बात है कि केन्द्रीय ट्रेड यूनियन फ़ेडरेशनें एक दिन की हड़तालों की रुटीनी क़वायद से आगे बढ़ने को तैयार ही नहीं हैं! हाल ही में दिल्ली में सम्पन्न हुई इन फ़ेडरेशनों की बैठक में 12 फरवरी 2026 को एकदिवसीय आम हड़ताल का ऐलान किया गया। यह एकदिवसीय रस्में तो पिछले 30 वर्षों से बदस्तूर निभायी जा रही हैं! इनसे अगर कोई गुणात्मक परिवर्तन होना होता तो अब तक हो चुका होता! अब जबकि ज़रूरत इन एकदिवसीय हड़तालों के सालाना प्रतीकात्मक जलसों से आगे बढ़कर कुछ वास्तविक क़दम उठाने की है, तब भी ये केन्द्रीय ट्रेड यूनियन फ़ेडरेशनें मज़दूरोंकर्मचारियों की आबादी को इन्हीं रस्मों के गोल चक्कर में उलझाये रखने का काम कर रही हैं। अब जब वक़्त व्यापक मज़दूरकर्मचारी आबादी को अनिश्चितकालीन आम हड़ताल के लिए एकजुट करने का है तब इस प्रकार की घोषणा मज़दूर वर्ग के मनोबल को ही तोड़ने का काम करेगी। आज अगर मोदी सरकार को चार लेबर कोड वापस लेने के लिए मजबूर करना है, तो सभी केन्द्रीय ट्रेड यूनियन संघों को पहलक़दमी लेकर अनिश्चितकालीन आम हड़ताल का आह्वान करना चाहिए और इन लेबर कोडों के वापस लेने तक अनिश्चितकालीन आम हड़ताल को जारी रखना चाहिए। इसी साहसिक क़दम के ज़रिये आज मज़दूर आन्दोलन के भीतर की शिथिलता और गतिरोध भी टूटेगा।

हम संघर्ष के रास्ते पर विस्तार से आगे चर्चा करेंगे। लेकिन फ़िलहाल के लिए यह जान लेना भी आवश्यक है कि किस वैश्विक और राष्ट्रीय परिदृश्य में मोदी सरकार द्वारा ऐसे घोर मज़दूर-विरोधी क़दम उठाये जा रहे हैं।

गहराता आर्थिक संकट, फ़ासीवाद का उभार और मज़दूर वर्ग पर बढ़ते हमले

मोदी सरकार द्वारा श्रम क़ानूनों को लचीला और निष्प्रभावी बनाने के इन क़दमों को वैश्विक परिदृश्य में भी रखकर देखने की ज़रूरत है। 1970 के दशक से पूँजीवाद ने तेज़ी का कोई विचारणीय दौर नहीं देखा है। पूँजीवादी व्यवस्था लम्बे समय से दीर्घकालिक मन्दी का शिकार है जो बीच-बीच में गहरे संकटों का भी रूप लेती रहती है। दुनियाभर के पूँजीपति सिकुड़ते मुनाफ़े और ठहरावग्रस्त व्यवस्था में जान फूँकने के लिए फिर से दुनिया को युद्ध की ओर धकेल रहे हैं और अपने देश के अन्दर मज़दूरों के लिए कारख़ानों को यातना शिविर बना रहे हैं। आर्थिक संकट, मन्दी और अर्थव्यवस्था में ठहराव के कारण बेरोज़गारी भी तेजी से बढ़ रही है और मज़दूरों का जीवन तबाह-बर्बाद हो रहा है। मुनाफ़े की औसत दर के गिरते रहने से पैदा होने वाले पूँजीवादी आर्थिक संकट से निजात पाने के लिए ही दुनिया भर के पूँजीपति मज़दूर वर्ग के बचे-खुचे अधिकारों को भी ख़त्म कर देने के लिए तमाम सरकारों पर लगातार दबाव बना रहे हैं और इसलिए “मज़बूत नेतृत्व” वाली सत्ताओं की ताजपोशी के लिए पूरा ज़ोर लगा रहे हैं।

पूँजीवाद के अपने आन्तरिक अन्तरविरोधों से जन्मने वाले आर्थिक संकट से निपटने के लिए ही पूँजीपति वर्ग को ऐसी सरकार की ज़रूरत पड़ती है, जो मन्दी के दौर में डण्डे के ज़ोर से मज़दूरों को निचोड़ने में और उनके शोषण को और सघन बनाने में उनके वफ़ादार राजनीतिक प्रतिनिधि की भूमिका निभाये और मज़दूर वर्ग की एकता को तोड़े। आर्थिक संकट का यही पूर्वाधार फ़ासीवाद के उभार को भी जन्म देता है यदि वह पूँजीपति वर्ग के राजनीतिक संकट में भी तब्दील हो जाये तो। पूँजीवादी आर्थिक संकट की ज़हरीली कोख में ही फ़ासीवादी कीड़े पलते-पनपते हैं।

यही वजह है कि दुनिया भर में आज धुर दक्षिणपंथी और फ़ासीवादी ताक़तें सत्तासीन हो रही हैं। दीर्घकालिक मन्दी के दौर में भारत के पूँजीपति वर्ग ने भी 2014 में फ़ासीवादी भाजपा का विकल्प चुना और अभी भी भाजपा समूचे पूँजीपति वर्ग की सबसे चहेती पार्टी बनी हुई है। हमारे देश में फ़ासीवादी मोदी सरकार पूँजीपति वर्ग के भारी धनबल और एकमुश्त समर्थन, केन्द्रीय एजेंसियों के इस्तेमाल, चुनाव आयोग की मिलीभगत, ईवीएम में घोटाले के ज़रिये पिछले ग्यारह वर्षों से सत्ता में बनी हुई है क्योंकि एक लम्बे दौर में भारत में फ़ासीवादी ताक़तों ने पूँजीवादी राज्यसत्ता के विभिन्न निकायों में अपनी घुसपैठ की है और इनपर अन्दर से क़ब्ज़ा किया है।

इन ग्यारह वर्षों में मोदी सरकार ने आम मेहनतकश आबादी के ऊपर तकलीफ़ों का पहाड़ लाद दिया है। सरकार ने अप्रत्यक्ष टैक्सों और पेट्रोलियम उत्पादों पर भारी करों के ज़रिये लगातार महँगाई बढ़ायी है, देश में बेरोज़गारी इस वक़्त अपने चरम पर है, छात्रों-नौजवानों-मज़दूरों के आन्दोलनों का दमन किया जा रहा है, मुसलमानों, दलितों, आम स्त्रियों के ख़िलाफ़ उत्पीड़न की घटनाओं में बेतहाशा बढ़ोत्तरी हुई है, विशेषकर आम ग़रीब मुसलमानों का जीवन दूभर कर दिया गया है, जनवादी अधिकारों को सिर्फ़ क़ाग़जों तक सीमित कर दिया गया है और इन सबके बीच पब्लिक सेक्टर कम्पनियों और प्राकृतिक संसाधनों को पूँजीपतियों को औने-पौने दामों में बेचा जा रहा है।

इस भयावह स्थिति पर हमारा ध्यान न जाये इसलिए हमें ‘हिन्दू-मुसलमान’, ‘मन्दिर-मस्जिद’ और ‘पाकिस्तान और चीन से ख़तरा’ जैसे झूठे-फ़र्ज़ी मसलों में उलझाया जाता है और आपस में लड़ाकर असली मुद्दों पर एकजुट होकर लड़ने से रोका जाता है। भाजपा और नरेन्द्र मोदी आज पूँजीपति वर्ग की ज़रूरत है और मोदी सरकार भी पूरी मेहनत और लगन से अपने मालिकों की सेवा करने में लगी हुई है। यही कारण है कि नरेन्द्र मोदी ने सत्ता में आते ही “कारोबार की आसानी” के नाम पर पूँजीपतियों को मज़दूरों की श्रम-शक्ति लूटने की खुली छूट देने का ऐलान कर दिया था। इसलिए ही चार लेबर कोड बनाये गये हैं, ताकि पूँजीपतियों के मुनाफ़े के रास्ते में आने वाले हर क़ानूनी ‘स्पीडब्रेकर’ को भी पूरी तरह हटाया जा सके। मज़दूरों ने वर्षों के वर्ग संघर्ष के दम पर जो भी अधिकार श्रम क़ानूनों के रूप में हासिल किये थे, उन्हें चार लेबर कोड के ज़रिये फ़ासीवादी मोदी सरकार छीन रही है।

भारत में लेबर कोड निर्माण की पृष्ठभूमि

यह तथ्य भी जानना उपयोगी होगा कि चार लेबर कोड को लागू अब किया गया है, पर इसके बनने की शुरुआत भाजपा की अटल बिहारी वाजपयी की सरकार के समय ही हो गयी थी। 1999 में वाजपयी सरकार ने श्रम क़ानूनों में बदलाव लाने के लिए दूसरे श्रम आयोग (Second National Labour Commission) का गठन किया। श्रम आयोग का काम था संगठित व असंगठित क्षेत्र में श्रम क़ानूनों को लचीला बनाने के लिए मसौदा तैयार करना। श्रम आयोग ने 2002 में श्रम क़ानूनों को संहिताओं में बदलने के लिए 1700 पन्नों की रिपोर्ट तैयार की। इसमें भारती़य मज़दूर संघ (भाजपा-आरएसएस की जेबी यूनियन) के भी सुझावों को जगह दी गयी थी। श्रम आयोग द्वारा पेश की गयी रिपोर्ट को देश भर की यूनियनों ने मज़दूर-विरोधी बताया था और इसके ख़िलाफ़ विरोध भी दर्ज करवाया था। हालाँकि यह विरोध एकदिवसीय-दोदिवसीय हड़तालों के रूप में प्रतीकात्मक ही रहा और सरकार को इससे कोई खास दिक़्क़त पेश नहीं आयी।

इसके बाद 2004 के चुनावों में भाजपा की हार के बाद, श्रम आयोग की रिपोर्ट को कांग्रेस सरकार ने तात्कालिक तौर पर ठण्डे बस्ते में डाल दिया। लेकिन यह कहना भी ग़लत नहीं होगा कि कांग्रेस व यूपीए सरकार के 2004-2014 तक के कार्यकाल में भी श्रम क़ानूनों की धज्जियाँ उड़ायी जाती रहीं और नवउदारवादी नीतियों को धड़ल्ले से लागू किया जाता रहा। हालाँकि यूपीए के पहले कार्यकाल के दौरान कुछ कल्याणकारी योजनाओं और क़ानूनों को भी लागू किया गया ताकि मज़दूर वर्ग के असन्तोष पर कुछ ठण्डे छींटे डालने का काम भी हो सके।

ज़ाहिरा तौर पर यह कल्याणवाद पूँजीपति वर्ग को गवारा नहीं था और इसलिए उन्होंने फ़ासीवादी भाजपा के विकल्प को एक बार फिर गम्भीरता से लेना शुरू किया। 2014 चुनावों में भाजपा के विजयी होने के पीछे पूँजीपति वर्ग का यह एकजुट समर्थन ही सबसे बड़ा कारक था। सत्ता में आते ही नरेन्द्र मोदी सरकार ने सबसे पहले श्रम क़ानूनों में बदलाव की शुरुआत की। 2014 में राजस्थान में सबसे पहले दूसरे श्रम आयोग की सिफ़ारिशों को लागू किया गया। 2015 के आर्थिक सर्वेक्षण में राजस्थान सरकार द्वारा किये गये श्रम सुधारों की भूरि-भूरि प्रशंसा की गयी। ग़ौरतलब है कि राजस्थान सरकार ने ठेका मज़दूर क़ानून की सीमा 20 से बढ़ाकर 50 मज़दूर कर दी थी। इस ‘सुधार’ के बाद से ठेके पर काम करने वाले मज़दूरों की संख्या में बहुत तेज़ी से बढ़ोतरी हुई है। जहाँ 2014-15 में ठेका मज़दूरों की संख्या कुल मज़दूरों की 39.1 फ़ीसदी थी, वहीं 2016-17 में यह बढ़कर 42.5 प्रतिशत हो गयी। यही नहीं, इन ‘सुधारों’ के लागू होने के बाद राजस्थान में बेरोज़गारी की दर भी तेज़ी से बढ़ी। जुलाई 2019 में जब देश में बेरोज़गारी की दर 7.5 फ़ीसदी थी, वहीं राजस्थान में बेरोज़गारी की दर 10.6 फ़ीसदी थी। यानी “श्रम सुधारों” से मज़दूरों का जीवन और भी ज़्यादा असुरक्षित हो गया। मोदी सरकार इसी ‘राजस्थान मॉडल’ को पूरे देश में लागू करना चाह रही थी।

2014-19 के कार्यकाल में ही 29 श्रम क़ानूनों को समाप्त कर संहिताओं में तब्दील कर देने का काम शुरू कर दिया गया और भाजपा शाषित राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हरियाणा, गुजरात व कर्नाटक में इन्हें लागू कर दिया गया। आख़िरकार जुलाई, 2019 में पहली श्रम संहिता यानी ‘मज़दूरी संहिता’ को संसद द्वारा पारित कर दिया गया। इसके बाद मोदी सरकार ने 2020 में कोविड महामारी के दौर में बाक़ी तीनों बिल संसद में पास करवाये। इस तरह चार लेबर कोड अस्तित्व में आये। संसद में पारित होने के बाद से ही मोदी सरकार इसे लागू करने के लिए उतावली थी और आख़िरकार 21 नवम्बर को चुपके से अधिसूचना जारी कर इसे लागू कर दिया गया। आइए ज़रा मोदी सरकार के इन चार लेबर कोडों को लेकर किये जा रहे खोखले दावों पर भी एक नज़र डालते हैं।

लेबर कोड को लेकर मोदी सरकार के झूठे दावे और उनकी सच्चाई

फ़ासीवादी मोदी सरकार लेबर कोड लाने को इस रूप में प्रचारित कर रही है कि इसके लागू होने के बाद मज़दूरों की ज़िन्दगी स्वर्ग हो जायेगी! सरकार व गोदी मिडिया द्वारा चार लेबर कोड को स्वतन्त्र भारत में मज़दूरों के लिए किया गया “सबसे बड़ा सुधार” बताया जा रहा है। सोशल मीडिया से लेकर टीवी-अख़बार तक लेबर कोड की प्रशंसा व सरकारी प्रचार से भरे पड़े हैं। मोदी सरकार को यह इसलिए भी करना पड़ रहा है कि मज़दूरों-कर्मचारियों की एक बड़ी आबादी इस बात को समझ रही है कि यह मज़दूर-विरोधी और पूँजी-परस्त नये क़ानून उनके लिए कितने ख़तरनाक हैं। आइये, इन झूठे दावों की असलियत जानते हैं।

पहला झूठ। संगठित व असंगठित क्षेत्र के 50 करोड़ मज़दूरों को न्यूनतम वेतन मिलेगा।

सच्चाई यह है कि मोदी सरकार न्यूनतम वेतन की क़ानूनी व्यवस्था को ख़त्म करने की फ़िराक़ में है। न्यूनतम मज़दूरी के स्थान पर ‘फ़्लोर लेवल मज़दूरी’ की अवधारणा पेश की गयी है जो कि न्यूनतम मज़दूरी से बेहद कम है। फ़्लोर लेवल मज़दूरी की बात सीधे-सीधे मज़दूरों-कर्मचारियों के न्यूनतम मज़दूरी के क़ानूनी अधिकार के खिलाफ़ जाती है और ऐसी किसी भी अवधारणा को सिरे से ख़ारिज कर देना चाहिए। फ़्लोर लेवल मज़दूरी की बात जानबूझकर इन नये कोडों में डाली गयी ताकि किसी भी मालिक या नियोक्ता के लिए न्यूनतम वेतन देने को बाध्यताकारी न बनाया जा सके। यानी अब मज़दूरी फ़्लोर लेवल के आधार पर तय होगी, जो औसत मज़दूरी से बेहद कम है।

सरकार द्वारा प्रतिदिन के लिए तल-स्तरीय मज़दूरी 178 रुपये तय की गयी है। यानी, इस ‍न्यूनतम मज़दूरी के हिसाब से महीने में 26 दिन काम करने वाले की मासिक मज़दूरी होगी महज़ 4,628 रुपये! इसके अनुसार जिन राज्यों में न्यूनतम वेतन सापेक्षिक तौर पर अधिक मिलता है, वहाँ भी अब इसे कम करने के दरवाज़े खोल दिये गये हैं। अगर फ़्लोर लेवल पर मज़दूरी दी जायेगी तब दिल्ली, केरल, तमिलनाडु जैसे राज्यों में वेतन कम कर दिया जायेगा, जहाँ वेतन अन्य राज्यों की तुलना में अधिक है। इसके अलावा मज़दूरी की परिभाषा के अन्तर्गत केवल मूल या आधार वेतन (बेसिक पे) को शामिल किया है। हर प्रकार के भत्तों को वेतन की परिभाषा से बाहर रखा गया है।

दूसरा झूठ। नये कोडों के ज़रिये पहली बार सभी श्रमिक क़ानूनी दायरे और सुरक्षा के अन्तर्गत आयेंगे।

सच्चाई यह है कि चारों श्रम संहिताएँ एक बहुत बड़ी श्रमिक आबादी को क़ानूनी दायरे से बाहर धकेल रही हैं, जो पहले श्रम क़ानूनों के अन्तर्गत आते थे क्योंकि नये कोडों के अन्तर्गत क़ानूनी सुरक्षा के तहत आने की सीमा को ही मनमाने ढंग से व्याख्यायित किया गया है। मसलन ‘ओएचएस’ संहिता केवल उन्हीं कारखानों में लागू होगी, जहाँ 20 या ज़्यादा मज़दूर काम करते हो (और जहाँ बिजली का प्रयोग होता है) या जहाँ 40 या ज़्यादा मज़दूर काम करते हो (और जहाँ बिजली का प्रयोग नहीं होता है)। 2017-18 के ऐनुअल सर्वे आफ़ इण्डस्ट्री के अनुसार 47.1 प्रतिशत कारख़ाने ऐसे हैं, जहाँ 20 तक मज़दूर काम करते हैं। 33.8 प्रतिशत कारख़ानों में 20-99 मज़दूर काम करते हैं। इसके अनुसार देखा जाये तो मज़दूरों की एक बहुत बड़ी आबादी इस क़ानून के कानून के दायरे से बाहर हो जायेगी।

इसके अलावा, नयी श्रम संहिताओं के तहत अब बड़े प्रतिष्ठानों में स्थायी मजदूरों की नौकरी की सुरक्षा भी ख़तरे में आ जायेगी। पुराने औद्योगिक विवाद अधिनियम के अन्तर्गत 100 या 100 से अधिक मज़दूरों वाले प्रतिष्ठानों में लेऑफ़, छँटनी और तालाबन्दी के लिए सरकार की अनुमति लेनी पड़ती थी। नयी संहिता में इस सीमा को बढ़ाकर 300 मज़दूरों तक कर दिया गया है। परिणामस्वरूप 100 से 300 मज़दूरों वाले मध्यम आकार के प्रतिष्ठानों में कार्यरत मज़दूरों की बड़ी संख्या को कभी भी काम से निकाला जा सकता है। इसके अलावा सरकार जब चाहे इस सीमा को बढ़ा सकती है और इसके लिए इस कोड में ही प्रावधान किया गया है। इसके अलावा ‘ओएचएस’ संहिता ठेका मज़दूरों के लिए बने क़ानून को भी लचीला बना देती है। यह क़ानून ठेकेदार तभी लागू कर सकता है, जब उसके मातहत 50 या इससे ज़्यादा मज़दूर काम कर रहे हो। ठेका प्रथा क़ानून में यह संख्या 20 तक थी। यानी ठेका मज़दूरों का बड़ा तबका किसी भी प्रकार की सुरक्षा व सुविधा से वंचित कर दिया गया है।

तीसरा झूठ। ‘फ़िक्सड टर्म इम्प्लॉयमेंट’ के तहत काम कर रहे मज़दूरों को नियमित कामगारों के समान लाभ और सामाजिक सुरक्षा मिलेगी।

सच्चाई यह है कि ‘फ़िक्सड टर्म इम्प्लॉयमेंट’ के ज़रिये स्थायी रोज़गार के अधिकार को ही छीन लिया गया है। अब कम्पनी मज़दूरों को दिन, महीने के लिए भी क़ानूनी तौर पर रख सकती है यानी ठेका प्रथा को पूरी तरह क़ानूनी बना दिया गया है और मज़दूरों को हर प्रकार की वैधानिक सुरक्षा से वंचित कर दिया गया है। मोदी राज में अब यह ‘न्यू नॉर्मल’ बन जायेगा!

चौथा झूठ। 8 घण्टे का कार्यदिवस ही लागू होगा। कामगारों की “सहमति” के बिना ओवरटाइम नहीं करवाया जा सकता।

श्रम संहिताओं के तहत ओवरटाईम की स्पष्ट व्याख्या जानबूझकर नहीं की गयी है। ओवरटाइम की परिभाषा को ख़त्म करके “पूरक कार्य” और “अनिरन्तर काम” की लच्छेदार भाषा के बहाने ओवरटाइम के लिए मिलने वाली अतिरिक्त मज़दूरी को ख़त्म करने की साज़िश की गयी है। सेक्शन 14 में कहा गया है कि सामान्य दिन के काम के घण्टों से अधिक काम करना ओवरटाइम कहलायेगा, जबकि सामान्य दिन के काम के घण्टे सरकार के नोटिफ़िशन के ज़रिये तय होंगे। अगर सरकार सामान्य दिन में 10 घण्टे काम का नोटिफ़िकेशन जारी करती है, तो 10 घण्टे के बाद किया जाने वाला काम ओवरटाइम कहलायेगा। यानी ओवरटाइम बेगार काम करवाना अब एक सामान्य बात हो जायेगी।

पाँचवा  झूठ। आज़ादी के 70 सालों में पहली बार ऐसा होगा जब संगठित व असंगठित क्षेत्र के 50 करोड़ मज़दूरों को सामाजिक सुरक्षा के दायरे में लाया जायेगा।

सच्चाई यह है कि सामाजिक सुरक्षा संहिता में पहली बार मज़दूरों को संगठित व असंगठित की श्रेणी में बाँटा गया है। इस कोड के तहत संगठित क्षेत्र में कार्यरत सीमित आबादी को ही सामाजिक सुरक्षा कोड के तहत आने वाली सुविधाएँ मिलेंगी। वहीं दूसरी तरफ़ 93 प्रतिशत असंगठित व अनौपचारिक मज़दूर, भले ही वह औपचारिक क्षेत्र में कार्यरत हों, उन्हें सरकार द्वारा ‘सामाजिक सुरक्षा फ़ण्ड’ के ज़रिये सामाजिक सुरक्षा मुहैया करा़यी जायेगी। इसके लिए मज़दूरों को ऑनलाइन पोर्टल पर पंजीकरण करना होगा और नियमित उसे अपडेट रखना होगा। अगर नियमित अपडेट नहीं रखा गया, तो उन्हें सामाजिक सुरक्षा के तहत कोई सुविधा नहीं मिलेगी। यानी जो मज़दूर डिजिटली साक्षर नहीं है, वह इन सुविधाओं से वंचित ही रहेगा। एनएसएसओ 2020-2021 डाटा के अनुसार भारत में सिर्फ़ 2.5 प्रतिशत लोग ही डिजिटली साक्षर हैं। इस हिसाब से मज़दूरों का एक बड़ा हिस्सा पहले ही सामाजिक सुरक्षा के दायरे से बाहर हो जायेगा। अगर ‘सामाजिक सुरक्षा फ़ण्ड’ की बात की जाये, तो इसपर लेबर कोड में कोई ठोस बात नहीं की गयी है कि मज़दूरों को इसके तहत क्या सुविधा मिलेगी, उन्हें यह किस प्रकार हासिल होगा।

छठा झूठ। सभी मज़दूरों को समय पर वेतन मिलेगा।

इसकी असलियत यह है कि मज़दूरी संहिता के सेक्शन 17 के तहत नियोक्ता वेतन का भुगतान दिन, हफ़्ते या महीने के अनुसार कर सकता है। इससे कम्पनियाँ अपनी ज़रूरत मुताबिक मज़दूरों को दिन, हफ़्ते या महीने के आधार पर रख सकती हैं। यानी सब मज़दूरों को अलग-अलग समय पर वेतन दिया जायेगा।

सातवाँ झूठ। असंगठित क्षेत्र के साथ-साथ प्लेटफ़ॉर्म व गिग वर्करों को ईएसआईसी की सुविधा मिलेगी।

सच्चाई यह है कि ईएसआईसी का क़ानून उसी जगह लागू होगा, जहाँ 10 या इससे लोग काम करते हैं। सामाजिक सुरक्षा कोड के तहत कम्पनी चाहे तो इसे नहीं भी लागू कर सकती है। इसके लिए वहाँ कार्यरत अधिकतम मज़दूरों की “सहमति” लेनी होगी और कम्पनी के डायरेक्टर जनरल को पत्र लिखना होगा। इसके साथ ही इस कोड के तहत ईएसआईसी में पंजीकरण करने की ज़िम्मेदारी नियोक्ता की नहीं होगी, बल्कि ख़ुद मज़दूर को श्रम सुविधा पोर्टल के ज़रिये अपना पंजीकरण करना होगा। यानी ईएसआईसी लागू न करने का रास्ता भी अब कम्पनियों के लिए खोल दिया गया है।

आठवाँ झूठ। लेबर कोड लागू होने के बाद श्रम क़ानूनों का सरलीकरण होगा।

हक़ीकत यह है कि सरलीकरण के नाम पर मज़दूरों को मिलने वाले सारे क़ानूनी अधिकार ख़त्म कर दिये गये हैं या उन्हें निष्प्रभावी बना दिया गया। जैसे : स्थायी रोज़गार की कोई सुरक्षा नहीं है। यहाँ तक कि कि श्रम विभाग की भूमिका को भी ख़त्म कर दिया गया है और उसकी जगह एक ट्रिब्युनल स्थापित किया गया है जिसके रजिस्ट्रार को असीमित शक्तियाँ प्रदान की गयी हैं।

नौवाँ झूठ। निश्चित अवधि के लिए काम कर रहे कर्मचारी एक साल काम करके भी ग्रैच्युटी निकाल सकते हैं।

असल में ग्रैच्युटी के क़ानून को लचीला बना दिया गया है, ताकि कम्पनियाँ चाहें तो एक साल में ही कामगारों को काम से निकाल सकती हैं। अगर पुनः उसी कामगार को वापस काम पर रखा भी जाता है, तब उसे नये कामगार की श्रेणी में शामिल किया जायेगा।

इसके अलावा लेबर कोड में गिग व प्लेटफ़ॉर्म वर्करों के साथ भी धोखा किया गया है। लेबर कोड के अनुसार इन वर्करों के लिए ‘वेलफ़ेयर फ़ण्ड’ बनाया जायेगा और आधार कार्ड से इनके काम को जोड़ा जायेगा। एक तो, इसमें स्पष्ट नहीं किया गया है कि कैसे इससे इन मज़दूरों को सामाजिक सुरक्षा मिलेगी; दूसरा, सरकार हमसे ही टैक्स लेकर हमारे लिये लिए ही ‘वेलफ़ेयर फ़ण्ड’ बनायेगी! इन गोल-मोल बातों को बारीक़ी से समझें तो बड़ी चालाकी से नियोक्ताओं को जवाबदेही के कटघरे से बाहर कर दिया गया है, यानी कम्पनी-प्रबन्धन की कोई ज़िम्मेदारी नहीं है। गिग-प्लेटफ़ॉर्म वर्कर्स को सरकार ने जानबूझकर मज़दूर का दर्जा ही नही नहीं दिया है, ताकि उन्हें सभी अधिकारों से वंचित रखा जा सके। यानी इन मज़दूरों के प्रति इनके मालिकों की कोई ज़िम्मेदारी नहीं होगी। साथ ही लेबर कोड में स्कीम वर्करों जैसे कि आँगनवाड़ीकर्मी, आशकर्मी, मिड डे मील वर्कर, घरेलू कामगारों की पूरी तरह अनदेखी की गयी है। उन्हें न्यूनतम वेतन से लेकर अन्य किसी भी सामाजिक सुरक्षा के दायरे से बाहर रखा गया है। लेबर कोड में निर्माण मज़दूरों के लिए भी काफ़ी लच्छेदार भाषा का प्रयोग किया गया है। जैसे उन्हें नियुक्ति पत्र मिलेगा, सामाजिक सुरक्षा मिलेगी, समय पर वेतन मिलेगा आदि। पर असल में निर्माण मज़दूरों को पीएफ़, ईएसआई से लेकर अन्य सुविधाएँ कैसे मिलेंगी, इसपर कोई ठोस बात नहीं की गयी। इसके अलावा ग्रामीण मज़दूरों, मनरेगा मज़दूरों आदि की करोड़ों की मज़दूर आबादी को किसी भी क़ानूनी मान्यता व अधिकार के दायरे से बाहर रखा गया है।

कुल मिलाकर कहा जाये तो लेबर कोड को लेकर मोदी सरकार द्वारा जो प्रचार किया जा रहा है, वह पूरी तरह झूठ और फ़रेब पर आधारित है।

लेबर कोड लागू होने के बाद मज़दूरोंकर्मचारियों पर क्या असर होगा?

आज हमारे देश में संगठित-औपचारिक क्षेत्र में क़रीब 10 करोड़ मज़दूर-कर्मचारी काम कर रहे हैं। संगठित क्षेत्र के मज़दूरों के लिए आमतौर पर श्रम क़ानून लागू हुआ करते थे। अब तक संगठित क्षेत्र के मज़दूरों-कर्मचारियों को जितने अधिकार प्राप्त थे, जैसे आठ घण्टे का कार्यदिवस, डबल रेट से ओवरटाइम, पीएफपीएफ़, ग्रैचुय्टी आदि, इन चार लेबर कोड के ज़रिये उन सबको या तो ख़त्म कर दिया गया है या फिर निष्प्रभावी बना दिया गया है। संगठित क्षेत्र में पहले से ही घटते पक्के रोज़गार के अवसर और अधिकार को और अधिक अस्थायी रूप देने की कोशिश इन चार लेबर कोड्स के ज़रिये की गयी है। ‘फ़िक्स टर्म इम्प्लॉयमेंट’ के ज़रिये सीधे-सीधे स्थायी रोज़गार के अधिकार पर ही डाका डालने का काम किया गया है। दरअसल मोदी सरकार की मंशा संगठित क्षेत्र के मज़दूरों-कर्मचारियों के हालात को भी असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों जैसे अरक्षित बना देने की है ताकि पूँजीपतियों को ‘ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस’ (धन्धा करने में आसानी) का अधिकार दिया जा सके!। संगठित क्षेत्र पहले से ही सिकुड़ता जा रहा है। अब चार लेबर कोड के ज़रिये मोदी सरकार संगठित क्षेत्र के मज़दूरों को असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों में तब्दील करने का पूरा इन्तज़ाम कर चुकी है।

वहीं, असंगठित-अनौपचारिक क्षेत्र में 43 करोड़ मज़दूर कार्यरत हैं। असंगठित-अनौपचारिक क्षेत्र के मज़दूरों को भी जो अधिकार पहले काग़ज़ी तौर पर प्राप्त थे, उन्हें भी इन लेबर कोडों के ज़रिये छीन लिया गया है। वैसे तो असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों के लिए पुराने श्रम क़ानून भी बिरले ही लागू होते थे, लेकिन जहाँ कहीं भी मज़दूर एकजुट होकर लड़ते थे, वहाँ उन्हें अपने संघर्ष के दम पर ये क़ानूनी हक़ एक हद तक हासिल भी होते थे। मज़दूर आन्दोलन के इतिहास पर एक निगाह डालें तो हम पाते हैं कि जब कभी असंगठित क्षेत्र के मज़दूर भी संगठित होकर लड़े हैं, तब उन्होंने श्रम क़ानूनों को कुछ हद तक अपने पक्ष में लागू भी करवाया है। लेकिन अगर अब असंगठित क्षेत्र के मज़दूर एकजुट हो भी जायें, तो उनके पास क़ानूनी अधिकार के लिए लड़ने का रास्ता भी नहीं बचेगा।

अब हम मज़दूरोंकर्मचारियों के पास क्या रास्ता है?

हमें फ़ासीवादी मोदी सरकार द्वारा इन लेबर कोडों को लागू करने की असल मंशा समझनी होगी। अपने आन्दोलनों और संघर्षों के बूते हासिल किये गये हमारे सभी हकों पर मोदी सरकार का यह सबसे बड़ा फ़ासीवादी हमला है। यह मज़दूरों-कर्मचारियों की पूरी मेहनतकश आबादी को ग़ुलामों में तब्दील करने की फ़ासीवादी क़वायद है। ये चार लेबर कोड पूँजीपति वर्ग को मज़दूरों का शोषण करने की पूरी क़ानूनी आज़ादी देते हैं और मज़दूर वर्ग अपने हकों की हिफाज़त भी न कर पाएँ, इसका भी पुख्ता क़ानूनी इन्तज़ाम करते हैं। इसलिए अब वक़्त आ गया है जब ‘आर या पार’ की लड़ाई के लिए देश का मज़दूर वर्ग अपनी कमर कस ले।

यह वक़्त है कि भारत के सभी संगठित असगठित मज़दूरकर्मचारी एक साथ संगठित होकर लड़ें और फ़ासीवादी मोदी सरकार के इस हमले का संगठित होकर जवाब दें। यह वक़्त है जब सभी केन्द्रीय ट्रेड यूनियनोंसंघों (ज़ाहिरा तौर पर बीएमएस को छोड़कर जो इस वक़्त भी मोदी सरकार के सुर में सुर मिला रही है) कम्पनियोंपेशों आदि की यूनियनों को अपने आपसी मतभेद भुलाकर एक साथ आना चाहिए। सबको एक साथ मिलकर अनिश्चितकालीन आम हड़ताल का आह्वान करना चाहिए और इन लेबर कोड्स के वापस लेने तक अनिश्चितकालीन आम हड़ताल को जारी रखना चाहिए। आज इससे कम कोई भी क़दम मोदी सरकार और मालिकोंपूँजीपतियों के हौसले और बुलंद करेगा और उनको अपने मंसूबों में पूरी तरह से कामयाब होने देगा।

आज सभी केन्द्रीय ट्रेड यूनियन फ़ेडरेशनों को इस निर्णायक क़दम को उठाने के लिए तत्काल पहल लेनी चाहिए। बैंक, रेलवे, बीमा, डाक, परिवहन समेत सरकारी निजी सेक्टरों के संगठित मज़दूरोंकर्मचारियों में इन फ़ेडरेशनों से जुड़ी यूनियनें मौजूद हैं। अगर ये चाहें तो मोदी सरकार के इस हमले को बिलकुल रोका जा सकता है। लेकिन इसके लिए एकदिवसीय हड़तालों की रस्मअदायगी से आगे बढ़ना होगा।  अनिश्चितकालीन आम हड़ताल का आह्वान ही वह निर्णायक क़दम है जिसके द्वारा मोदी सरकार को घुटनों पर लाया जा सकता है। यही समय है मोदी सरकार को मज़दूरों की ताक़त का एहसास कराने का और मज़दूरों के सबसे बड़े हथियार अनिश्चितकालीन आम हड़ताल के इस्तेमाल करने का। अब तक यह बात होती थी कि इस हथियार को बड़े मौक़े पर प्रयोग करेंगे। अब इससे बड़ा कोई मौक़ा भारत के मज़दूर वर्ग के लिए नहीं हो सकता। अब एक मिनट भी और इन्तज़ार नहीं कर सकते हैं। पानी सिर के ऊपर से जा चुका है!

अब हर साल की तरह एकदो दिनी हड़ताल की रस्मअदायगी का वक़्त नहीं रहा और इससे कुछ फ़र्क पड़ेगा। 30 सालों से ऐसी एकदो दिनी हड़तालें हो ही रही हैं, उनसे कोई फ़र्क पड़ना होता तो बहुत पहले ही पड़ चुका होता। यही कारण है कि ठेकाकरण-अस्थायीकरण बढ़ रहा है और संगठित मज़दूरों की संख्या कम होती जा रही है। अब जन्तर-मन्तर या आज़ाद मैदान में एकदिनी प्रदर्शन का वक़्त नहीं रहा। 2020 में इन चार कोड्स के पारित होने के बाद से भी कई बार एकदिवसीय हड़तालें की गयीं, उससे क्या फ़र्क पड़ा? ये चारों कोड्स कानून के तौर पर आज लागू हो चुके हैं! मोदी सरकार को चार लेबर कोड वापस लेने के लिए मजबूर करना है, तो मज़दूर-कर्मचारी आबादी को अनिश्चितकालीन आम हड़ताल के लिए एकजुट करना ही होगा। इसके लिए केन्द्रीय ट्रेड यूनियनों व संघों को पहलक़दमी लेनी पड़ेगी क्योंकि अभी भी उनके पास ही संगठित मज़दूरों-कर्मचारियों की ताक़त सबसे ज़्यादा है। लेकिन अगर अब भी केन्द्रीय ट्रेड यूनियन फ़ेडरेशनें एकदिनी हड़ताल करके अपनादायित्व निर्वाहकर लेंगी तो यह बात भी स्पष्ट हो जायेगी कि उनका मज़दूरोंकर्मचारियों के हितों से कुछ लेनादेना नहीं है और मोदी सरकार के साथ मिलकर मज़दूर वर्ग पर इस हमले को अंजाम देने की कार्यवाई में वे भी बराबर ज़िम्मेदार होंगी। सच तो यह ही कि ये केन्द्रीय यूनियनें अगर अनिश्चितकालीन आम हड़ताल का आह्वान करें तो पूरे देश के मज़दूर-कर्मचारी और स्वतंत्र यूनियनें उनके साथ खड़ी होंगी।

हम संगठित क्षेत्र के मज़दूरकर्मचारी साथियों से कहेंगे कि वे ज़रूर अपनी यूनियन में इसपर बात करें। अपने यूनियन नेतृत्व से तत्काल इस दिशा में क़दम बढ़ाने के लिए कहें। अगर हम अब भी इसमें देर करेंगे और केवल एकदिवसीय प्रतीकात्मक हड़तालों तक हड़ताल के अमोघ अस्त्र की ताक़त को सीमित कर देंगे तो मज़दूरों-कर्मचारियों को ख़ुद को और आने वाली पीढ़ी को ग़ुलामी के लिए तैयार कर लेना चाहिए। पहले ही इस काम में बहुत देर हो चुकी है। अनिश्चितकालीन आम हड़ताल ही वह अचूक शस्त्र है जिसका इस्तेमाल करके आज फ़ासीवादी मोदी सरकार को अपने क़दम पीछे हटाने के लिए मजबूर किया जा सकता है। आप तत्काल अपने यूनियन नेतृत्व पर इस दिशा में ठोस कार्यवाई के लिए दबाव बनाएँ।

हम असंगठित क्षेत्र के मज़दूर साथियों से भी कुछ ज़रूरी बातें साझा करना चाहते हैं। आप यह मत सोचिए कि चार लेबर कोड्स का मसला आपका मसला नहीं है। आप सोच रहे होंगे कि आपके लिए क़ानून पहले भी बिरले ही लागू होते थे, तो अब क्या नया फ़र्क पड़ेगा? साथियो, फ़र्क पड़ता है! यह बात सच है कि काग़ज़ पर लिखे क़ानून पहले भी लागू नहीं होते थे, लेकिन जब तक क़ानून मौजूद थे, तो एकजुट होकर लड़कर हम उन्हें लागू करवा सकते थे। पूरे देश के मज़दूर आन्दोलन में इसके कई उदाहरण हैं कि जब असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों ने भी संगठित होकर और संघर्ष के बूते एक हद तक अपने क़ानूनी अधिकार लागू करवाये। लेकिन अब अगर हम संगठित भी हो जायें, तो लड़ाई के क़ानूनी रास्ते भी बन्द किये जा चुके हैं। इसलिए इन नयी श्रम संहिताओं के ज़रिये हमारे संगठित होकर संघर्ष करने के अधिकार पर भी हमला किया जा रहा है और हमारी स्थिति को और भी अरक्षित बनाया जा रहा है। मालिकों-पूँजीपतियों को हमारा शोषण करने का क़ानूनी अधिकार देकर हमें हमेशा कच्चे कर्मचारी या मज़दूर के तौर पर ही खटने के लिए छोड़ दिया गया है। चार लेबर कोड लागू होने के बाद अब काग़ज़ों पर लिखे क़ानूनी अधिकार भी नहीं रहे। इसलिए हमें भी इन क़ानूनों के विरुद्ध संघर्ष में और अनिश्चितकालीन आम हड़ताल में बढ़चढ़कर भागीदारी करनी होगी।

साथ ही औपचारिक-अनौपचारिक क्षेत्र में कार्यरत सभी संगठित-असंगठित मज़दूरों-कर्मचारियों को यह बात भी स्पष्ट होनी चाहिए कि जो क़ानून पहले भी मौजूद थे, वे मज़दूरों-कर्मचारियों को जायज़ हक़ व बेहतर सम्मानजनक जीवन देने के लिए कत्तई काफ़ी नहीं थे। दरअसल इन चार लेबर कोड्स को वापस लेने के लिए जो संघर्ष होगा, वह एक लम्बी लड़ाई की शुरुआत होगी। ज़ाहिरा तौर पर पुराने श्रम का़नूनों में भी ऐसे बदलाव किये जाने चाहिए, जिससे समूचे मज़दूर वर्ग को लाभ हो। जैसे : सबको रोज़गार का अधिकार मिले, स्थायी रोजगार मिले और ठेका प्रथा ख़त्म हो, नियमित प्रकृति के काम में अस्थायी भर्ती पर रोक हो, न्यूनतम वेतन कम से कम 30,000/- रुपये हो, रोज़गार मिलने की सूरत में बेरोज़गारी भत्ता मिले, सभी कामगारों को ईएसआई, पीएफ़, पेंशन आदि सुविधाएँ मिलें। ट्रेड यूनियन बनाने के क़ानून का सरलीकरण हो। एस्मा जैसे मज़दूरविरोधी क़ानून को ख़त्म किया जाये और हड़ताल करने के अधिकार को अपराध बनाया जाये। ज़ाहिरा तौर पर ये सभी संघर्ष भी भविष्य में लड़े जायेंगे। पर अभी पहला तात्कालिक संघर्ष का मुद्दा यह है कि तानाशाहाना ढंग से लागू किये गये इन फ़ासीवादी लेबर कोड्स को वापस लेने के लिए मोदी सरकार को एकजुट होकर झुकाया जाये।

आज समूचा मज़दूर वर्ग संगठित और एकजुट होकर ही मोदी सरकार को यह चेतावनी दे  सकता है कि इन वह मज़दूर-विरोधी श्रम संहिताओं को थोपने की हिमाक़त न करे। अगर हम तत्काल इन श्रम संहिताओं के ख़िलाफ़ लड़ने के लिए एकजुट नहीं होते, अगर हम अनिश्चितकालीन आम हड़ताल का रास्ता अपनाकर मोदी सरकार को इन श्रम संहिताओं को वापस लेने के लिए बाध्य करने के वास्ते संघर्ष की आज ही शुरुआत नहीं करते हैं, तो कल बहुत देर हो जायेगी। इसलिए देश की सभी यूनियनों और संगठनों से अपील है कि एक हो जाओ! एक होकर इन फ़ासीवादी लेबर कोड्स को वापस लिये जाने तक अनिश्चितकालीन आम हड़ताल का आह्वान करो!

 

मज़दूर बिगुल, दि‍सम्बर 2025

 

 

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