पूँजीपतियों के मुनाफ़े के लिए अरावली पर्वत श्रृंखला को तबाह करने पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर

विवेक

एक विचित्र से प्रतीत होने वाले घटना क्रम में सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फ़ैसले में केंद्र सरकार की एक कमिटी द्वारा प्रस्तावित अरावली की पहाड़ियों की संशोधित परिभाषा को सही ठहराया है। इस नयी संशोधित परिभाषा के अनुसार केवल वही भू-आकृतियाँ अरावली की पहाड़ियाँ मानी जायेंगी, जो अपने स्थानीय भू-परिवेश से कम से कम 100 मीटर ऊँची हों, तथा ऐसी दो या अधिक पहाड़ियों के समूह, जो एक-दूसरे से 500 मीटर की दूरी के भीतर स्थित हों, अरावली पर्वत श्रेणी का हिस्सा माने जायेंगे।

एक आधिकारिक रिपोर्ट के मुताबिक, अरावली की क़रीब 90 फ़ीसदी भू संरचनाएं (या पहाड़ियाँ) 100 मीटर की इस सीमा से नीचे आती हैं, जिसकी वजह से अब उनको मिलने वाली क़ानूनी सुरक्षा एक तरह से ख़त्म हो चुकी है। परिणामस्वरूप, अरावली पर्वत श्रृंखला का एक बड़ा भाग चन्द मुट्ठीभर धन्नासेठों के मुनाफ़े के लिए दोहन किये जाने की कगार पर आ चुका है। भारतीय वन सर्वेक्षण  ने यह माना है कि अरावली श्रेणी का केवल 8 से 10 फ़ीसदी हिस्सा ही 100 मीटर की इस नयी सीमा से ऊपर है, इसकी वजह से अरावली के संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र का अधिकांश भाग खनन, निर्माण और रियल एस्टेट जैसे उपक्रमों द्वारा दोहन के लिए खुल चुका है।

अरावली निम्न व मध्यम ऊँचाई के पहाड़ियों की श्रृंखला है जो भारत के उत्तर पश्चिमी भू भाग में फैली हुई है। यह दुनिया के सबसे प्राचीन मोड़दार पर्वतीय तंत्रों में से एक है, जिसका निर्माण प्राक कैंब्रियन युग (आज से 2 अरब साल पहले) के दौरान हुआ था  और यहाँ मौजूद घास के मैदान, घाटियाँ और वन एक जटिल और संवेदनशील परिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करते हैं। यह पर्वत श्रेणी पेड़-पौधों व अन्य जीवों की अनेकों प्रजातियों का आश्रय स्थल है। खुद केन्द्र सरकार की रिपोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के हालिया फ़ैसले में यह बात मानी गयी है कि अरावली पर्वत श्रेणी मरुस्थलीकरण और थार रेगिस्तान को पूर्व दिशा में गंगा के मैदानों, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की ओर बढ़ने से रोकता है। इसके अतिरिक्त अरावली प्रदूषण से ग्रस्त राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के लिए हरित फेफड़ों का काम करता है, और सिर्फ़ इतना ही नहीं, यह प्रदूषित भू जल के शुद्धिकरण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

अरावली का महत्व

जैसा कि ऊपर कहा गया है कि अगर अरावली के पहाड़ और उसके घने जंगलों को नष्ट कर दिया गया तो इसके भयावह परिणाम उत्तर भारत के बड़े हिस्सों को भुगतने होंगे। दिल्ली, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई हिस्से धूल के मैदानों में तब्दील हो जायेंगे। यहाँ तक कि हिमाचल प्रदेश और उत्तराखण्ड जैसे पर्वतीय राज्य भी इससे अछूते नहीं रहेंगे। थार मरुस्थल से आने वाली गर्म, शुष्क हवाओं के लिए बाधा बनकर उत्तर भारत के लिए अरावली जलवायु नियंत्रक की भूमिका निभाता है। बड़े पैमाने पर अरावली के जंगलों की कटाई और खनन के कारण यह प्राकृतिक बैरियर ख़त्म होता जायेगा, जिससे नर्म और शुष्क वायु धारा आगे की ओर बढ़ेगी। इससे दक्षिण पश्चिम मानसून पर नकारात्मक असर पड़ेगा और हिमालय के पश्चिमी व मध्य भागों में जमने वाली बर्फ़ की मात्रा भी घटेगी। अगर बर्फ़ कम जमेगी, तो ग्लेशियर भी कम होते जायेंगे, जिससे हिमालय से निकलने वाली नदियों जैसे गंगा और यमुना पर भी संकट आएगा।

इसके अतिरिक्त, अगर अरावली से वनावरण नष्ट हो गये तो खनन और मृदा अपरदन के कारण धातु व खनिज युक्त धूल कणों की बड़ी मात्रा मुक्त होगी। ये धूल कण बिना किसी बाधा के हिमालय के हिमाच्छादित हिस्सों और ग्लेशियरों पर बैठने लगेंगे, जिससे बर्फीली सतह की परावर्तन क्षमता घट जायेगी। परिणाम स्वरूप ऊष्मा का अवशोषण बढ़ता जायेगा और ग्लेशियर पिघलने की गति में तेज़ी आयेगी – ऐसी परिघटना पिछले कुछ समय से हिमालय में लगातार देखने को मिल रही है। इतना ही नहीं, अरावली के जंगलों केे नष्ट होने से उत्तर भारत के इलाकों में तापमान में वृद्धि होगी। यह बढ़ती गर्मी उत्तर में हिमालय के निचले इलाकों को भी प्रभावित करेगी। बढ़ते तापमान से ग्लेशियर पिघलेंगे, जिससे हिमनद झीलों के जलस्तर में अचानक हुई वृद्धि से बाढ़ की स्थिति पैदा होगी और संवेदनशील पर्वतीय पारिस्थितिकी तंत्र पर इसका इतना भयावह असर होगा, जो कि अपरिवर्तनीय होगा। सीधे शब्दों में कहें तो हिमालय के निचले हिस्सों में तबाही मच जायेगी। अभी जो डिस्टोपियाई विज्ञान कथा जैसा प्रतीत हो रहा है, वह जल्द ही यथार्थ में तब्दील हो जायेगा।

देश की प्राकृतिक सम्पदा की लूट आसान करने के लिए क़ानूनों में बदलाव की क़वायद

अरावली के पर्वतों की परिभाषा बदलकर इसके जंगलों को काटने का खुला क़ानूनी परमिट देने की घटना को किसी एकल, पृथक या आकस्मिक घटना के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह भारतीय राज्यसत्ता के लम्बे ऐतिहासिक पथ का ही हिस्सा है, जिसने शासक वर्गों के हितों को ध्यान में रखते हुए, मध्य और पूर्वी भारत, पश्चिमी घाट और हिमालय के क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर जंगलों की कटाई और खनन की गतिविधियों को अंजाम देने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है। राज्यसत्ता के संरक्षण में और पूँजी के हितों में की गयी इन पर्यावरण-विरोधी कार्यवाहियों के कारण बड़े पैमाने पर आदिवासियों और अन्य वनाश्रित समुदायों को अपने क्षेत्रों से बेदखल होना पड़ा है और वहाँ के पारिस्थितिकी तंत्र को भी नुकसान उठाना पड़ा है।

लेकिन, हालिया वर्षों में मोदी सरकार ने इस परिपाटी को नये पर्यावरण-विरोधी नीतियों और कानूनों को लाकर और भी तीव्र कर दिया है, जिसके तहत पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण के बरक्स संरचनागत विकास के नाम पर प्राकृतिक सम्पदा के दोहन की गतिविधियों को प्रश्रय दिया जा रहा है। फॉरेस्ट कंजरवेशन एक्ट 2023, ड्राफ्ट इनवायरमेंट इंपेक्ट नोटिफिकेशन, 2020 और खनन के लिए कोल ब्लॉक के आवंटन जैसे केन्द्र सरकार द्वारा लिए गये फ़ैसले मौजूदा सरकार की मंशा को दर्शाते है। समेकिकता में देखा जाये तो, इन नयी नीतियों ने पर्यावरण के बचाव के नियामकों को कमज़ोर कर दिया है और बड़े पैमाने पर जंगलों की कटाई से लेकर दूसरे गहन पूँजी निवेश वाली परियोजनाओं के क्रियान्वयन को आसान बना दिया है। इस अप्रोच से पर्यावरण पर पड़ने वाले दुष्परिणाम हसदेव, तालाबीरा और देहिंग पटकाई के उदाहरणों के ज़रिये हमारे सामने है, जहाँ पर्यावरनीय विनाश के साथ-साथ बड़े पैमाने पर लोगों का विस्थापन भी हुआ है।

हर गुजरते दिन के साथ, मोदी सरकार ऐसी नीतियाँ लेकर आ रही है, जिससे इस संकट ग्रस्त पूँजीवादी व्यवस्था में कृत्रिम और तात्कालिक तौर पर ही सही पूँजीपतियों की मुनाफ़े की दर बनी रहे। इसके लिए जैव विविधता संरक्षण के नियामकों को कमज़ोर करना, किसी क्षेत्र की प्राकृतिक सम्पदा का दोहन करने को आसान बनाना, सबसे माकूल रणनीति रही है। लेकिन, इस मुनाफ़ा केन्द्रित विकास मॉडल का सबसे बड़ा भुग्तभोगी बहुसंख्यक मेहनतकश तबका ही रहा है, जिसे इस कभी न रुकने वाले पर्यावरणीय दोहन की बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है।

और अन्त में

आज, न सिर्फ़ दिल्ली बल्कि उत्तर भारत का एक बड़ा हिस्सा गैस चैंबर बन चुका है, जहाँ आम नागरिकों का दम धुंध और धुएं की घनी चादर के तले घुट रहा है और उनकी जीवन प्रत्याशा घटती जा रही है। ऐसे समय में, सुप्रीम कोर्ट का यह फ़ैसला जिसमें अरावली को पुनर्व्याख्यायित कर उसके दोहन को कानूनी वैधता प्रदान करता है,  सरकार की पर्यावरण-विरोधी नीतियों के ही समर्थन में जाकर खड़ा होता है।

आज यह फ़ासीवादी राज्यसत्ता पूँजीपतियों के हितों को ध्यान में रखते हुए प्राकृतिक सम्पदा के दोहन को कानूनी वैधता प्रदान करने के लिए नये कानून बनाने से भी नहीं हिचक रही है। चाहे दिल्ली में रेखा गुप्ता के नेतृत्व वाली सरकार का सैकड़ों पेड़ों को काटने का आदेश हो या बिहार में अदानी को एक रु की दर से 1050 एकड़ ज़मीन को लीज़ पर देने का मामला हो – हम ऐसी घटनाओं को हर दिन होता हुआ देख रहें हैं।

यह विडंबना ही है कि रेखा गुप्ता के नेतृत्व वाली दिल्ली सरकार ने खुद यह माना है कि अरावली के पहाड़ों पर हो रहे अवैध खनन, निर्माण और डंपिंग के कारण मरुस्थलीकरण का खतरा बढ़ा है। लेकिन अपने कपट और पाखण्ड की दशकों पुरानी विरासत को ज़िन्दा रखते हुए भाजपा की कथनी और करनी में अन्तर ठीक उसी तरह स्पष्ट है जैसे दिल्ली और स्वच्छ वायु में!

सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला प्रथम दृष्टया पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण के सम्बन्ध में बहुत कुछ सकारात्मक कहता हुआ प्रतीत होता है लेकिन अन्त में इन सारी बातों का कोई अर्थ नहीं निकलता। इस फ़ैसले में कई बार पारिस्थितिकी तंत्र के संवदेनशील होने और उसके संरक्षण की बात की गयी है, लेकिन फिर भी अपने अन्तिम निष्कर्ष में इन अति प्राचीन पहाड़ों से उनके वैधानिक रक्षा के प्रावधानों को ही समाप्त कर इन्हें बाज़ार की शक्तियों के हवाले कर दिया गया है। हरियाणा के उदाहरण से हम सब परिचित हैं, जहाँ अरावली श्रेणी के एक हिस्से के नष्ट होने के कारण भू जल के स्तर में गिरावट हुई है, मरुस्थलीकरण बढ़ा है और बड़े पैमाने पर जैव विविधता का विनाश हुआ है।

अगर हम आज इन घटनाओं से संबंधित उपलब्ध आंकड़ों का विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि पर्यावरण-विरोधी इन अपराधों का सबसे अधिक प्रभाव मेहनतकश जनता पर ही पड़ा है। चूँकि पारिस्थितिकी तंत्र को बचाने की लड़ाई को, उस पूँजीवादी व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष से अलग करके नहीं देखा जा सकता है, जिसका एक मात्र उद्देश्य अपना मुनाफ़ा बढ़ाना है, इसलिए अब वक़्त आ चुका है कि लोग इसके लिए एकजुट होकर, ऐसे हरेक पर्यावरण-विरोधी फ़ैसले का विरोध करें।

हमारा जीवन उस हवा पर निर्भर करता है, जिसमें हम साँस लेते है, उस पानी पर निर्भर करता है, जिसे हम पीते हैं और उस खाद्यान्न पर निर्भर करता है, जिसका हम सेवन करते हैं। जब इन तीनों को सोचे-समझे तरीके से नष्ट किया जाता रहे, लोगों को साफ हवा और स्वच्छ पानी भी नसीब न हो, खाने का अनाज तक प्रदूषित हो जाये, तब ऐसे हालात में हम चुप नहीं बैठ सकते हैं। हमें आगे आकर अपने पर्यावरण को बचाने के इस संघर्ष में अपनी भूमिका चुननी होगी। पारिस्थितिकी तंत्र को बचाना अब कोई विकल्प नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व को बचाये रखने का प्रश्न बन चुका है! इसलिए, जनस्वास्थ्य और पारिस्थितिकी तंत्र के सन्तुलन की कीमत पर पूँजीवादी मुनाफ़ाखोरी की मशीनरी को प्रश्रय देने वाली वाली इस पर्यावरण-विरोधी फ़ासीवादी सत्ता के ख़िलाफ़ एक सतत और निरंतर संघर्ष आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। अरावली के वर्तमान मुद्दे पर आज हमारी यह तात्कालिक माँग होनी चाहिए कि अरावली पर्वत श्रेणी की परिभाषा में कोई बदलाव नहीं किया जाये और अरावली में हो रहे अवैध खनन पर तत्काल रोक लगा कर, इसके संरक्षण के लिए वैज्ञानिक आधार पर कार्यक्रम चलाये जाये।

 

मज़दूर बिगुल, दि‍सम्बर 2025

 

 

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