मोदी सरकार के चार लेबर कोड क्या हैं और ये मज़दूर-विरोधी क्यों हैं?
अनन्त
बीते 21 नवम्बर को केन्द्र की फ़ासीवादी मोदी सरकार ने मज़दूर-विरोधी चार श्रम संहिताओं (लेबर कोड) को लागू करने के लिए अधिसूचना जारी की। इनमें से एक संहिता, मज़दूरी संहिता, 2019 में पारित की गयी थी; जबकि अन्य तीन—औद्योगिक सम्बन्ध संहिता, सामाजिक सुरक्षा संहिता, तथा पेशागत सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्यस्थितियों पर संहिता— साल 2020 में संसद के दोनों सदनों में पारित हुई थीं। यह वही कोरोना महामारी का दौर था, जब सरकार द्वारा अनियोजित ढंग से लगाये गये लॉकडाउन के कारण करोड़ों मज़दूर सड़कों पर हज़ारों किलोमीटर पैदल चलने के लिए मजबूर हुए थे। इन संहिताओं के तहत पुराने 29 केन्द्रीय श्रम कानूनों को समाप्त कर उन्हें समाहित करते हुए एक नया ढाँचा तैयार किया गया है। टीवी, अख़बार से लेकर सोशल मीडिया तक सरकार के भोंपू उछल-उछल कर इन संहिताओं के गुणगान गा रहे हैं। सरकार इसे स्वतंत्रता के बाद के सबसे व्यापक और प्रगतिशील “श्रमोन्मुख सुधारों” में से एक बता रही है। हम मज़दूरों के भी एक हिस्से में इस बात को लेकर भ्रम है कि सरकार इन नयी संहिताओं के साथ मज़दूरों का शायद भला कर रही है। इसलिए इन लेबर कोडों की असलियत समझना हम सभी मज़दूरों-कर्मचारियों के लिए बेहद ज़रूरी है तभी हम इनके मज़दूर-विरोधी चरित्र को ठीक से जान पायेंगे और इनके विरुद्ध जुझारू संघर्ष खड़ा कर पायेंगे।
इन लेबर कोडों को लागू करने के पीछे सरकार खोखले तर्क दे रही है कि बीसवीं सदी में लागू किये गये पुराने श्रम क़ानून अब नये ज़माने के अनुरूप नहीं है। कई श्रम क़ानून 1930 के दशक से 1950 के दशक के बीच— यानी स्वतंत्रता-पूर्व और स्वतंत्रता के शुरुआती वर्षों में— बनाये गये थे, जब डिजिटल अर्थव्यवस्था या गिग अर्थव्यवस्था जैसी अवधारणाएँ मौजूद नहीं थीं। आज डिजिटल अर्थव्यवस्था या गिग अर्थव्यवस्था के जमाने में नये श्रम कानूनों की ज़रूरत है। सरकार इस प्रचार में लगी हुई है कि ये बदलाव एक तरफ़ मज़दूरों के लिए बेहतर हैं और दूसरी तरफ़ ‘इज़ ऑफ डूइंग बिजनेस’ को बढ़ावा देंगे! मतलब श्रम और पूँजी दोनों को फ़ायदा होगा! यह कोरी लफ़्फ़ाज़ी के अलावा और कुछ नहीं है। सच्चाई यह है कि ये चारों कोड पूँजीपतियों, मालिकों, कम्पनियों और प्रबन्धन को मज़दूरों-कर्मचारि़यों को लूटने की पूरी खुली छूट देते हैं और उनको आधुनिक गुलामों में तब्दील करने के क़ानूनी दस्तावेज़ है। पूँजीवाद के अन्तर्गत मज़दूर वर्ग की असुरक्षित और अरक्षित स्थिति को ये श्रम संहिताएँ और अधिक बढ़ावा देती हैं तथा मज़दूर अपने अधिकारों की रक्षा के लिए संगठित भी न हो पायें, इसका पक्का प्रबन्ध भी मोदी सरकार द्वारा चार लेबर कोड में किया गया है।
मोदी सरकार का दावा है कि इन लेबर कोडों के ज़रिये वह श्रम कानूनों का दायरा विस्तारित कर रही है। यानी जिन श्रमिकों या प्रतिष्ठानों पर पहले श्रम क़ानून लागू नहीं होते थे, अब उन्हें भी इन नयी संहिताओं के दायरे में शामिल किया जायेगा। उदाहरण के लिए गिग वर्कर और प्लेटफ़ॉर्म वर्कर (जैसे स्विगी, उबर, ज़ोमैटो आदि के डेलीवेरी एजेंट) को पहली बार किसी श्रम क़ानून के तहत पहचान दी जायेगी। फिक्स्ड-टर्म रोज़गार, घरेलू कामगार, ठेका श्रमिक आदि को औपचारिक रूप से श्रम संहिताओं के दायरे में लाया जायेगा। कुछ नियमों को छोटे प्रतिष्ठानों (जहाँ कम संख्या में मज़दूर काम करते हैं) पर भी लागू किया जायेगा। यह भी कोरी जुमलेबाज़ी के अलावा कुछ नहीं है। सच्चाई यह है कि चारों श्रम संहिताएँ एक बहुत बड़ी श्रमिक आबादी को क़ानूनी दायरे से बाहर धकेल रही हैं, जो पहले श्रम क़ानूनों के अन्तर्गत आते थे क्योंकि नये कोडों के अन्तर्गत क़ानूनी सुरक्षा के तहत आने की सीमा को ही मनमाने ढंग से व्याख्यायित किया गया है। साथ ही, ‘फ़िक्सड टर्म इम्प्लोयमेंट’ के ज़रिये स्थायी रोज़गार के अधिकार को ही छीन लिया गया है। अब कम्पनी मज़दूरों को दिन, महीने के लिए भी क़ानूनी तौर पर रख सकती है यानी ठेका प्रथा को पूरी तरह क़ानूनी बना दिया गया है।
दरअसल, आधुनिकीकरण, तर्कशीलता तथा दायरे के विस्तार की लफ्फ़ाज़ी के नीचे ये नयी संहिताएँ व्यवस्थित रूप से मज़दूर वर्ग पर हमला कर रही हैं। नये क़ानून के नाम पर जो वास्तविक अधिकार वैधानिक तौर पर मज़दूरों को प्राप्त थे, उनका मर्म ख़त्म कर, उन्हें केवल झुनझुने में तब्दील करने का काम किया जा रहा है। ये नयी संहिताएँ श्रमिक सुरक्षा को कमज़ोर करती हैं, असुरक्षा को बढ़ाती हैं और श्रम कानूनों के नाम पर जो सीमित क़ानूनी ताक़त मज़दूरों के पास थी, उन्हें अब खुले तौर पर मालिकों के पक्ष में स्थानांतरित करती हैं। सच तो यह है कि श्रम कानूनों को तमाम तरह के संशोधनों के साथ पहले की सरकारें भी कमज़ोर करती रही हैं। व्यवहार में वे आम तौर पर कागज़ी ही साबित होते रहे हैं। यह भी सच है की श्रम क़ानूनों के ठोस अनुपालन की कोई व्यवस्था नहीं रही है। श्रम विभाग आम तौर पर मालिकों के पक्ष में ही काम करता रहा है। हालाँकि मज़दूर आन्दोलन का इतिहास बताता है कि जब मज़दूर संगठित होकर संघर्ष करते थे और क़ानूनी लड़ाइयाँ लड़ते थे तो इन क़ानूनों को एक हद तक अपने पक्ष में लागू करवाने में सफलता भी हासिल कर लेते थे। लेकिन इन नयी संहिताओं के साथ अब मज़दूरों-कर्मचारियों के लिए स्थिति बेहद दुरूह हो जायेगी। व्यवहार में मज़दूरों से जो पहले छीना जा रहा था, अब मोदी सरकार उसे ही वैधानिक जामा पहनाकर नया विधान रच रही है और मालिकों को शोषण करने की नंगी क़ानूनी आज़ादी दे रही है। दरअसल देश के पूँजीपति वर्ग ने 2014 में इसी काम के लिए भाजपा और नरेंद्र मोदी को सत्ता तक पहुँचाया था और उनके चुनाव प्रचार पर अरबों रुपये उड़ाये थे।
हमें यह बात भी अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि मज़दूर वर्ग को श्रम क़ानूनों के तौर पर जो अधिकार मिले थे, वे इसलिए नहीं मिले थे कि सरकारें मज़दूरों की हितैषी थीं या खैरात में उन्हें ये हक़ दे रही थीं। बल्कि इसके पीछे कारण यह था कि 19वीं और 20वीं सदी में देश तथा दुनिया भर के मज़दूरों ने मालिकों और सरकारों के ख़िलाफ़ शानदार संघर्ष लड़कर, सड़कों पर अपना खून बहाकर, वे हक़ अधिकार हासिल किये थे और सरकारों को क़ानून बनाने के लिए मजबूर किया था। दूसरा, पूँजीवादी राज्य अगर श्रम क़ानूनों के रूप में ये न्यूनतम अधिकार भी नहीं देता, तो मज़दूर वर्ग का गुस्सा विद्रोहों की शक्ल भी अख़्तियार कर सकता था, जिससे पूँजीपति वर्ग हमेशा भयाक्रान्त रहता है। रूस की 1917 की अक्तूबर मज़दूर क्रान्ति का हौवा दुनिया भर के हुक्मरानों को वैसे ही इस दौर में खूब सता रहा था।
मोदी सरकार जब यह कहती है कि पुराने क़ानून नये ज़माने के अनुरूप नहीं है, तो इसका मतलब यह है कि वह आज मेहनत की लूट में किसी भी तरह की कोई अड़चन नहीं चाहती है। पूँजीपति वर्ग द्वारा मुनाफ़ा कमाने की अन्धी हवस में वह कोई वैधानिक बाधा नहीं चाहती है। जब वह कहती है कि वह “ईज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस” को बढ़ावा देना चाहती है, तो इसका केवल यही अर्थ है कि मज़दूर चूँ-चपड़ किये बिना, गर्दन नीची झुका कर कोल्हू के बैल की तरह काम करते रहें। वह भूल जाये, किसी भी श्रम अधिकार के बारे में, यूनियन बनाने के बारे में, हड़ताल करने के बारे में, यहाँ तक कि श्रम न्यायालय जाकर किसी भी तरह शिक़ायत करने या माँग रखने के बारे में! श्रम न्यायालय, जो पहले से ही पक्षपात और भ्रष्टाचार के लिए कुख्यात थे, जो आम तौर पर मालिकों के पक्ष में ही तुरतुरी बजाते थे, अब लगभग निष्प्रभावी कर दिये गये हैं। पहले उनके पास नाम के लिए ही सही कुछ कार्रवाई करने की गुंजाइश थी और जब मज़दूर अपनी यूनियनों के नेतृत्व में संगठित होकर दबाव बनाते थे, तो उन्हें श्रम कानून का पालन करने के लिए मजबूर भी कर सकते थे, लेकिन अब नयी संहिताओं के द्वारा उस गुंजाइश को भी वैधानिक तौर पर ख़त्म किया जा रहा है।
आज जब हमारे देश में फ़ासीवादी ताक़तें सत्ता पर काबिज़ हैं, दुनिया भर के कई देशों में भी धुर-दक्षिणपंथी पार्टियाँ आज सत्ता के शीर्ष पर हैं और पूँजीवादी व्यवस्था अभूतपूर्व संकट का शिकार है, तब ऐसी परिस्थिति में मालिक वर्ग श्रमिकों के आख़िरी हक़-हुकूक भी छीन लेना चाहता है, मुनाफ़े बढ़ाने के लिए बेलगाम तरीक़े से मज़दूरों को निचोड़ डालना चाहता है और इसलिए इस रास्ते में किसी भी तरह का वैधानिक व्यवधान नहीं चाहता है। ये श्रम संहिताएँ पूँजी की इसी ज़रूरत का दस्तावेज़ हैं।
आइए एक-एक करके इन श्रम संहिताओं से परिचित होते हैं और देखते हैं कि ये किस प्रकार मज़दूरों के हितों और अधिकारों पर हमले कर रही हैं।
मज़दूरी पर संहिता, 2019 (The Code on Wages, 2019)
सबसे पहले मज़दूरी संहिता, 2019 पर बात करते हैं। इसके अन्तर्गत चार पुराने केन्द्रीय क़ानूनों—वेतन भुगतान अधिनियम 1936, न्यूनतम वेतन अधिनियम 1948, बोनस भुगतान अधिनियम 1965 और समान पारिश्रमिक अधिनियम 1976—को समाप्त कर समाहित कर लिया गया है।
इस संहिता के अन्तर्गत मज़दूरी की परिभाषा को केवल ‘बेसिक पे’ यानी आधार वेतन तक सीमित रखा गया है। किसी भी प्रकार के भत्तों को इस परिभाषा में शामिल नहीं किया गया है। इसके साथ ही सबसे महत्वपूर्ण बदलाव न्यूनतम मज़दूरी तय करने के मानकों में किया गया है। पुराने न्यूनतम वेतन अधिनियम के तहत न्यूनतम मज़दूरी 1957 के 15वें भारतीय श्रम सम्मेलन और सुप्रीम कोर्ट के रेप्टाकोस ब्रेट्ट एण्ड कं. बनाम मज़दूर केस में निर्धारित मानदण्डों के अनुसार तय किया जाता था। यह, पहला, भोजन की ज़रूरत, दूसरा, कपड़ों की बुनियादी ज़रूरत, तीसरा, आवास की ज़रूरत, चौथा, ईंधन, रोशनी और अन्य घरेलू आवश्यकताओं, पाँचवाँ, बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य, मनोरंजन, बुढ़ापे के इन्तज़ाम और आकस्मिक ज़रूरतों को आधार बना कर न्यूनतम मज़दूरी तय करता था। केन्द्र और राज्य सरकारें तो वैसे भी इन निर्देशों का पालन नहीं करती थीं, लेकिन अब मोदी सरकार ने उसी को क़ानूनी जामा पहना दिया है। यहाँ तक कि सरकार द्वारा नियुक्त की गयी विशेषज्ञ समिति ने भी न्यूनतम मज़दूरी तय करने के लिए इन दिशा-निर्देशों के साथ छेड़छाड़ करते हुए कैलोरी की ज़रूरी खपत को 2700 की बजाय 2400 पर रखा है और तमाम बुनियादी चीज़ों की लागत भी 2012 की क़ीमतों के आधार पर तय की है। यानी इस नयी श्रम संहिता में न्यूनतम मज़दूरी तय करने के इन पुराने मानदण्डों को शामिल नहीं किया गया है। कुलमिलाकर कहें तो अब मज़दूरी निर्धारण सरकार की मर्ज़ी के मुताबिक होगा। या यूँ कहें कि कारख़ानेदारों, मालिकों, और नौकरशाहों की मर्ज़ी से होगा।
मज़दूरी कोड में न्यूनतम मज़दूरी की दर समयानुसार (टाइम वर्क) और मात्रानुसार (पीस वर्क) तय होगी और वेतनकाल घण्टे, दिन या महीने के हिसाब से हो सकता है। यह नियम सुप्रीम कोर्ट के न्यूनतम मज़दूरी सम्बन्धी फै़सलों की धज्जियाँ उड़ाता है। सुप्रीम कोर्ट ने यह कई बार दोहराया है कि न्यूनतम मज़दूरी व्यक्ति की सभी आवश्यकताओं के हिसाब से तय होनी चाहिए, न केवल मज़दूरों की साधारण शारीरिक ज़रूरतों व उत्पादन के आधार पर। सुप्रीम कोर्ट के अनुसार न्यूनतम मज़दूरी तय करते समय आहार-पोषण, पहनने-रहने, इलाज का ख़र्च, पारिवारिक ख़र्च, शिक्षा, ईंधन, त्योहारों, और समारोहों के ख़र्च, बुढ़ापे और अन्य ख़र्चों का ध्यान रखा जाना चाहिए। मगर इसे कोड में दरकिनार कर दिया गया है।
राष्ट्रीय फ़्लोर–लेवल न्यूनतम मज़दूरी (NFLMW)
नयी संहिता में पहली बार क़ानूनी ढाँचे के तहत ‘राष्ट्रीय फ़्लोर स्तर न्यूनतम मज़दूरी’ (NFLMW) की अवधारणा प्रस्तुत की गयी है, जिसे केन्द्र सरकार तय करेगी। इसके तहत यह प्रावधान है कि कोई भी वेतन NFLMW से नीचे निर्धारित नहीं किया जा सकता। लेकिन इसमें सबसे हास्यास्पद बात यह है कि वर्तमान में भारत सरकार द्वारा तय की गयी तल-स्तरीय मज़दूरी मात्र 178 रुपये प्रतिदिन है! यानी, इस न्यूनतम मज़दूरी के हिसाब से महीने में 26 दिन काम करने वाले की मासिक आमदनी होगी महज़ 4,628 रुपये! यह राशि ख़ुद इसी सरकार की विशेषज्ञ समिति द्वारा सुझायी गयी 9,750 रुपये से 11,622 रुपये की न्यूनतम मासिक आमदनी से बेहद कम है, और आर्थिक सर्वेक्षण 2017 में सुझाये गये 18,000 रुपये के मासिक वेतन का एक-चौथाई मात्र है। सातवें वेतन आयोग ने भी सरकारी कर्मचारियों के लिए न्यूनतम मूल वेतन 18,000 रुपये ही तय किया है। लगभग सभी राज्य सरकारों द्वारा तय न्यूनतम मज़दूरी इस तल-स्तरीय मज़दूरी से कहीं अधिक है। अब नयी मज़दूरी संहिता की रोशनी में वे न्यूनतम वेतन बढ़ाने के लिए बाध्य नहीं होंगे, उल्टे वे इसे घटा सकते हैं, और ऐसा करना नयी संहिता के अनुरूप ही होगा।
उदाहरण के लिए दिल्ली में कुशल मज़दूर का एक दिन का न्यूनतम वेतन 804 रुपये है और बिहार में 500 रुपये है, तो मज़दूरी कोड के अनुसार दिल्ली का न्यूनतम वेतन घटाया जा सकता है।
नयी संहिता के तहत अब न्यूनतम मज़दूरी सलाहकार बोर्डों की सिफ़ारिशें—ये त्रिपक्षीय निकाय होते हैं, जिनमें सरकार, नियोक्ता और मज़दूरों के प्रतिनिधि शामिल होते हैं—सरकार पर बाध्यकारी नहीं होंगी। न्यूनतम मज़दूरी तय करने के किसी परिभाषित पैमाने की अनुपस्थिति में NFLMW को कार्यपालिका मनमाने ढंग से तय कर सकती है, जिसके कारण न्यूनतम वेतन को बढ़ाना बेहद कठिन हो जायेगा।
पुराने न्यूनतम वेतन अधिनियम के तहत, किसी भी मज़दूर को दिया जाने वाला वेतन न्यूनतम वेतन से कम नहीं हो सकता था; यदि ऐसा किया जाता, तो उसे जबरिया श्रम (forced labour) माना जाता और यह एक फ़ौजदारी अपराध होता, जिसकी सज़ा जेल तक हो सकती थी। इसके उलट, नयी संहिताएँ न्यूनतम वेतन न देने की आपराधिक जवाबदेही समाप्त कर देती हैं। साथ ही अब सरकार द्वारा निरीक्षण नहीं होगा, बल्कि नियोक्ताओं द्वारा स्वयं प्रमाणन किया जायेगा कि वे क़ानूनी दायित्वों का पालन कर रहे हैं! नतीजतन, एक तरफ़ बँधुआ मज़दूरी का रास्ता खुलेगा और दूसरी तरफ़ न्यूनतम मज़दूरी देने की बाध्यता को सुनिश्चित करने का कोई तन्त्र नहीं रहेगा। यानी अब मज़दूरों को न्यूनतम वेतन के नीचे बेगार खटाना वैधानिक तौर पर मुमकिन होगा। आम मज़दूर अपने जीवन के अनुभव से जानता है कि ज़्यादातर कल-कारख़ानों में मज़दूरों को न्यूनतम वेतन से कम पर काम कराया जाता है। एक आँकड़े के मुताबिक वर्तमान में लगभग 45 प्रतिशत मज़दूरों को निर्धारित न्यूनतम मज़दूरी से कम मज़दूरी मिलती है। अब उनकी संख्या में बेतहाशा बढ़ोत्तरी होगी।
इसके अतिरिक्त, लगभग 80 लाख मज़दूर—जिनमें अधिकांश महिलाएँ हैं—जो भारत सरकार की विभिन्न योजनाओं को ज़मीनी स्तर पर लागू करने के लिए अलग-अलग विभागों में कार्यरत हैं, जैसे आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और सहायिकाएँ, आशा कार्यकर्ता, मिड-डे मील कर्मी, शिक्षामित्र आदि—उन्हें मज़दूर के रूप में मान्यता ही नहीं दी गयी है। उन्हें भी मज़दूरी संहिता के दायरे में शामिल नहीं किया जायेगा। इसके अलावा ग्रामीण मज़दूरों, घरेलू कामगारों, मनरेगा मज़दूरों आदि को भी इस संहिता में कोई जगह नहीं दी गयी है।
इसके अलावा, ओवरटाईम की स्पष्ट व्याख्या इस संहिता में नहीं की गयी है। ओवरटाइम की परिभाषा को ख़त्म करके “पूरक कार्य” और “अनिरन्तर काम” की लच्छेदार भाषा के बहाने ओवरटाइम के लिए मिलने वाली अतिरिक्त मज़दूरी को ख़त्म करने की चाल चली गयी है। सेक्शन 14 में कहा गया है कि सामान्य दिन के काम के घण्टों से अधिक काम करना ओवरटाइम कहलायेगा, जबकि सामान्य दिन के काम के घण्टे सरकार के नोटिफ़िशन के ज़रिये तय होंगे। अगर सरकार सामान्य दिन में 10 घण्टे काम का नोटिफ़िकेशन जारी करती है, तो 12 घण्टे के बाद किया जाने वाला काम ओवरटाइम कहलायेगा। फ़ैक्ट्री एक्ट में 8 घण्टे के बाद कि़या जाने वाले काम को ओवरटाइम कहा गया था। इसके ज़रिये कम्पनियों को छूट दी गयी है कि 8 घण्टे की तीन शिफ़्ट के बजाय 12 घण्टे की शिफ़्ट में मज़दूरों से काम करवा सकती है। कर्नाटक व कई राज्यों में सरकार ने 8 के बजाय 12 घण्टे काम के नियम को लागू भी कर दिया है। फ़ैक्ट्री एक्ट के तहत बिना ब्रेक दिये 5 घण्टे से अधिक मज़दूरों को काम नहीं कराया जा सकता था। मज़दूरी संहिता में इसपर कोई बात ही नहीं की गयी है। यानी अब कम्पनी बिना ब्रेक दिये कितने भी घण्टे काम करवा सकती है।
मज़दूरी संहिता में लेबर इंस्पेक्टर की जगह इंस्पेक्टर-कम-फैसिलिटेटर नियुक्त किया जायेगा, जिसका काम कम्पनियों पर कार्रवाई करने के बजाय उन्हें सुझाव देना होगा! साथ ही कम्पनियों का निरीक्षण ऑनलाइन किया जा सकेगा जिससे कारख़ाने में अचानक किये जाने वाले निरीक्षण की प्रथा ख़त्म हो जायेगी। कम्पनी में निरीक्षण करने के लिए पहले नियोक्ता को सूचित करना होगा! साथ ही क़ानून का उल्लंघन करने पर फैसिलिटेटर कम्पनी पर कार्रवाई नहीं कर सकता, बल्कि ‘ग़लती’ सुधारने का मौक़ा दिया जायेगा! मज़दूरी संहिता में कम्पनियाँ श्रम क़ानून लागू कर रही हैं, यह बताते हुए ख़ुद को सेल्फ सर्टिफिकेट भी दे सकती है। साथ ही कम्पनी का ऑडिट थर्ड पार्टी द्वारा करवाया जा सकता है। मज़दूरों द्वारा कम्पनी के ख़िलाफ़ शिकायत करना भी मुश्किल कर दिया गया है। अगर मज़दूरों को शिकायत करनी हो, तो वह ऑनलाइन समाधान पोर्टल पर करनी होगी।
इसके अलावा मज़दूरी संहिता में बोनस के भुगतान को भी लचीला बना दिया गया है। 1965 के बोनस भुगतान क़ानून ने नयी कम्पनियों को बोनस न देने की छूट दी थी, लेकिन वर्तमान कोड में ‘नयी कम्पनी’ किसे कहा जा सकता है, इसे अस्पष्ट बनाकर लगभग सभी कम्पनियों को बोनस देने से छुटकारा दिलाने की योजना है। इस कोड में कम्पनियों की अनुमति के बिना उनकी बैलेंस शीट उजागर करने पर सरकारी अधिकारियों पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया है। तर्क यह दिया गया है कि “कम्पनियों पर विश्वास करना चाहिए!” यानी अब अगर कम्पनी कहेगी कि हमें घाटा हो रहा है, इसलिए हम मज़दूरों-कर्मचारियों को बोनस नहीं देंगे, तो सरकार इस पर विश्वास कर लेगी और बोनस माँगने वाले मज़दूरों को फटकार लगायेगी!
औद्योगिक सम्बन्ध संहिता, 2020 (The Industrial Relations Code, 2020)
सरकार तीन पुराने श्रम क़ानूनों – (the Industrial Disputes Act, 1947, the Trade Unions Act, 1926 अँड the Industrial Employment (Standing Orders) Act, 1946) औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947, ट्रेड यूनियन अधिनियम 1926 और औद्योगिक रोज़गार अधिनियम 1946 को हटाकर उनकी जगह औद्योगिक सम्बन्ध श्रम संहिता लेकर आयी है। नरेन्द्र मोदी का कहना है कि औद्योगिक विवाद सही शब्द नहीं है क्योंकि मज़दूरों और पूँजीपतियों के बीच तो कोई विवाद वास्तव में है ही नहीं! उनके बीच दोस्ताना सम्बन्ध है जहाँ पूँजीपति मज़दूरों के अभिभावक के समान हैं और उनकी हर फ़िक्र को अपना समझते हैं! इसी से साफ़ है कि अपने पूँजीपति-आकाओं को ख़ुश करने में प्रधानमंत्री कितने तल्लीन हैं।!
औद्योगिक सम्बन्ध संहिता का बड़ा हमला पक्के रोज़गार के अधिकार पर है। यह कोड वैसे तो कहता है कि निश्चित अवधि के कर्मचारियों (फ़िक्स्ड टर्म एम्प्लॉयी) को वेतन, लाभ और कार्य-स्थितियों के मामलों में स्थायी कर्मचारियों के तर्ज़ पर समानता दी जायेगी। सामाजिक सुरक्षा संहिता में भी निश्चित अवधि के कर्मचारियों को ईपीएफ़, ईएसआई, ग्रेच्युटी आदि जैसे लाभ देने की बात की गयी है। लेकिन असल झोल यह है कि अब सरकार स्थायी रोज़गार को ही समाप्त कर रही है और उसके स्थान पर अल्पकालिक अनुबंधों वाले निश्चित अवधि के रोज़गार को स्थायी कर रही है। इस बात पर कोई सीमा नहीं है कि किसी मज़दूर को कितनी बार निश्चित अवधि के अनुबंध पर रखा जा सकता है। सरल शब्दों में कहें तो, नयी संहिता स्थायी और मूल (पेरिनियल और कोर) कामों में “स्थायी अस्थायित्व” को वैध बना देती है तथा स्थिर रोज़गार को नष्ट करती है।
इस संहिता का दूसरा बड़ा हमला मज़दूरों की रोज़गार सुरक्षा पर है। अब मालिकों द्वारा बिना किसी डर के मज़दूरों की छँटनी, छुट्टी, निष्कासन करना, तालाबन्दी करना आसान हो गया है। पुराना औद्योगिक विवाद अधिनियम,1947 मज़दूरों को छँटनी, बन्दी और तालाबन्दी से सुरक्षा प्रदान करता था, उसके तहत 100 श्रमिकों से अधिक के कारख़ाने को बन्द करने से पहले सरकारी अनुमति की आवश्यकता थी। लेकिन अब नये नियमों के मुताबिक 300 तक मज़दूरों वाले कारख़ानों में मालिक बिना सरकारी अनुमति के छँटनी कर सकते हैं। परिणामस्वरूप 100 से 300 मज़दूरों वाले मध्यम आकार के प्रतिष्ठानों में कार्यरत मज़दूरों की बड़ी संख्या को कभी भी काम से निकाला जा सकता है। 100 या 100 से कम मज़दूरों वाले प्रतिष्ठान में कार्यरत श्रमिक आबादी तो पहले भी ऐसी किसी भी क़ानूनी सुरक्षा के दायरे से बाहर थी। लेकिन अब इसका असर उद्योग के बहुत बड़े हिस्से—लगभग 87 प्रतिशत से अधिक—पर पड़ेगा। इसके अलावा सरकार जब चाहे इस सीमा को बढ़ा सकती है और इसके लिए कोड की धारा 77 (1) में प्रावधान किया गया है।
इसके साथ ही यह बड़े प्रतिष्ठानों को 300 से कम मजदूरों वाली छोटी इकाइयों में तोड़ने के लिए एक बड़ा प्रलोभन होगा और इस तरह यह सुनिश्चित करेगा कि उनमें कार्यरत मज़दूरों को नौकरी की सुरक्षा नहीं होगी और वे रोज़गार की कठोर शर्तों को स्वीकार करने के लिए मजबूर होंगे। पहले छँटनी के बाद, जब भी पुनः रिक्तियाँ पैदा होती तब छँटनी किये गये मज़दूरों को पुनर्नियोजन में प्राथमिकता का अधिकार था। इसके लिये कोई समय सीमा नहीं थी (पुरानी धारा 25H)। नये कोड की धारा 72 में, इस अधिकार को छँटनी की तारीख़ से केवल एक वर्ष तक सीमित कर दिया गया है। बड़े पैमाने पर छँटनी के बाद से एक वर्ष बीत जाने के बाद, नियोक्ता छँटनी किये गये मज़दूरों को पुनः काम पर रखने के किसी भी दायित्व से मुक्त हो जाता है। यह नियोक्ताओं को आसानी से उच्च वेतन वाले मज़दूरों से छुटकारा पाने और बाद में उनके स्थान पर नये कम वेतन वाले मज़दूरों को नौकरी पर रखने की अनुमति देगा।
कुलमिलाकर इसका अर्थ यह निकलता है कि मालिकों व नियोक्ताओं के लिए मज़दूरों को “हायर एण्ड फ़ायर” करना वैधानिक तौर पर आसान बना दिया गया है। वे अब बिना किसी सरकारी निगरानी के, बिना कारण बताये, मनमानी बर्ख़ास्तगी के लिए किसी जवाबदेही या दण्ड का सामना किये बिना, श्रमिकों को मनचाहे ढंग से नौकरी से निकाल सकते हैं। इसके परिणामस्वरूप 90 प्रतिशत से अधिक श्रमिक किसी भी प्रकार की सुरक्षा से वंचित हो जायेंगे।
इस संहिता का तीसरा हमला यूनियन बनाने के अधिकार पर है। यूनियन पंजीकृत कराना पहले ही किसी टेढ़ी खीर से कम नहीं था, अब इसकी प्रक्रिया को और भी जटिल तथा लगभग असम्भव बना दिया गया है। नये प्रावधान के मुताबिक किसी ट्रेड यूनियन के पंजीकरण के लिए “औद्योगिक प्रतिष्ठान या उससे संबद्ध उद्योग” में कार्यरत श्रमिकों में से कम-से-कम 10 प्रतिशत या 100 श्रमिक — जो भी कम हो — आवश्यक होंगे, और यही अनुपात हर समय उसके सदस्यों के रूप में बना रहना चाहिए। यह न्यूनतम अनुपात केवल पंजीकरण के समय ही नहीं, बल्कि हर समय बनाये रखना अनिवार्य है। यदि यह शर्त पूरी नहीं होती है, तो यूनियन का पंजीकरण रद्द किया जा सकता है। सच तो यह है कि ट्रेड यूनियन अधिनियम, 1926 के तहत, पहले केवल 7 सदस्यों के साथ यूनियन का पंजीकरण हो सकता था, लेकिन 2001 में वाजपेयी सरकार ने इसमें एक बड़ा मज़दूर-विरोधी संशोधन करते हुए पंजीकरण के लिए कम-से-कम 10 प्रतिशत या 100 श्रमिक जो भी कम हो, के प्रावधान को शर्त बना दिया था। इसके अलावा, अब नये कोड के तहत यदि यूनियन का पंजीकरण हो भी जाये तो भी उससे मान्यताप्राप्त यूनियन बनने के लिए 30 प्रतिशत मज़दूरों को अपना सदस्य दिखाना होगा। यानी 10 प्रतिशत या 100 श्रमिक वाले पुराने प्रावधान को भी वस्तुतः अब 30 प्रतिशत सदस्यता वाला प्रावधान बना दिया है क्योंकि इतनी संख्या दिखाये बगैर यूनियन को मान्यता ही नहीं मिलेगी और वह मालिकों और प्रबन्धन के समक्ष किसी भी सामूहिक मोलभाव की प्रक्रिया में शामिल हो ही नहीं पायेगी।
इसके साथ ही ट्रेड यूनियन के पंजीकरण में पंजीकरण अधिकारी (रजिस्ट्रार) की भूमिका बढ़ा दी गयी है। उसे किसी ट्रेड यूनियन का पंजीकरण देने, उससे इन्कार करने या यहाँ तक कि उसका पंजीकरण रद्द करने तक के मनमाने अधिकार दे दिये गये हैं। ट्रेड यूनियनों की सदस्यता का सत्यापन उसके द्वारा किया जायेगा। इसका अर्थ यह है कि रजिस्ट्रार, यूनियन में शामिल हुए श्रमिकों की रोज़गार स्थिति की पुष्टि नियोक्ता से करेगा। यानी कारखाना प्रबन्धन के सामने यह बात गोपनीय नहीं रहेगी कि यूनियन बनाने की गतिविधि में कौन-कौन से श्रमिक शामिल हैं। खुद रजिस्ट्रार मालिकान व प्रबन्धन के साथ ऐसे श्रमिकों की जानकारी साझा करेगा! ज़ाहिरा तौर पर, इसके बाद यूनियन पंजीकरण की कार्रवाई में शामिल श्रमिकों को डराने-धमकाने या काम से निकालने में प्रबन्धन ज़रा भी देर नहीं करेगा।
सत्यापन के उद्देश्य से रजिस्ट्रार, यूनियन पदाधिकारियों और सदस्यों के सम्बन्ध में क़ानून में निर्धारित दस्तावेज़ों के अतिरिक्त अन्य दस्तावेज़ भी माँग सकता है। इस सत्यापन प्रक्रिया को पूरा करने के लिए रजिस्ट्रार के लिए कोई समय-सीमा निर्धारित नहीं की गयी है और न ही विलम्ब की स्थिति में यूनियन के स्वतः पंजीकरण का कोई प्रावधान है, जैसा कि कारख़ाने के पंजीकरण के लिए कर दिया गया है जहाँ एक निश्चित अवधि में यदि रजिस्ट्रार कारखाने का पंजीकरण नहीं करता है तो पंजीकरण स्वतः हो जाएगा! पूँजी के प्रति मोदी सरकार की यह भक्ति और निष्ठा देखते ही बनती है! परिणामस्वरूप, श्रमिकों को अपनी यूनियन के पंजीकरण के लिए वर्षों तक प्रतीक्षा करनी पड़ सकती है। इसके अलावा, ऐसे श्रमिक जो यूनियन के पूर्णकालिक कार्यकर्ता तथा यूनियन पदाधिकारी हो सकते हैं, उनकी संख्या घटा दी गयी है।
ट्रेड यूनियन अधिनियम, 1926 के तहत किसी एक औद्योगिक प्रतिष्ठान में एक से अधिक यूनियनें अस्तित्व में रह सकती थीं। प्रबन्धन को हर यूनियन की बात सुननी होती थी, उनके साथ समझौते की टेबल पर बैठना होता था। इसके विपरीत, औद्योगिक सम्बन्ध संहिता, 2020 के तहत यदि किसी औद्योगिक प्रतिष्ठान में केवल एक पंजीकृत यूनियन मौजूद है, तब भी इसे एकमात्र वार्ता यूनियन के रूप में तभी मान्यता दी जायेगी यदि उसके पास मज़दूरों की कम से कम 30 प्रतिशत सदस्यता हो। यदि किसी प्रतिष्ठान में एक से अधिक पंजीकृत यूनियन है, तो जिस ट्रेड यूनियन के पास कुल श्रमिकों में से कम-से-कम 51 प्रतिशत सदस्य होंगे (जिसे 2019 के विधेयक में प्रस्तावित 75 प्रतिशत से घटाया गया है), वही एकमात्र वार्ताकार यूनियन (नेगोशिएटिंग यूनियन) मानी जायेगी। यानी प्रबन्धन केवल और केवल उसी से बात करेगा जो यूनियन यह शर्त पूरी करेगी। यदि किसी भी यूनियन के पास 51 प्रतिशत सदस्यता नहीं है मतलब अगर कोई भी यूनियन इस मापदण्ड पर खरी न उतरती हो तब फिर उस सूरत में एक वार्ताकार परिषद (नेगोशिएटिंग काउंसिल) गठित की जायेगी जिसमें सिर्फ़ उन्हीं यूनियनों के प्रतिनिधि बैठेंगे जिनके पास संस्थान के कम से कम 20 प्रतिशत मज़दूरों की सदस्यता हो। ग़ौरतलब है कि पहले सदस्यता की यह सीमा 10 प्रतिशत मजदूरों की थी। इससे एक तरफ़ छोटी और संघर्षशील यूनियनों को हाशिये पर धकेलने का रास्ता खुलता है तो दूसरी तरफ़ प्रबन्धन अपनी जेबी यूनियनें खड़ी कर किसी भी एक यूनियन को वार्ताकार यूनियन बनने से रोक सकता है। व्यवहार में, अधिकांश प्रतिष्ठानों—विशेषकर बड़े प्रतिष्ठानों—में 51 प्रतिशत सदस्यता हासिल करना लगभग असम्भव है। यानी अगर कहीं ट्रेड यूनियन पंजीकृत हो भी गयी, रजिस्ट्रार ने उसका पंजीकरण रद्द नहीं भी किया, तो भी वह मज़दूरों के पक्ष में मालिकान तथा प्रबन्धन से मोलभाव कर पाने की स्थिति में हो, यह अब और भी मुश्किल हो गया है।
यानी वार्ता परिषद की इस नई प्रणाली के तहत, जिन यूनियनों को मान्यता प्राप्त नहीं है (या नवगठित यूनियन) सभी अधिकारों से वंचित है, भले ही उनके पास यूनियन पंजीकरण के लिए आवश्यक 10 प्रतिशत से अधिक सदस्यता हो। वे प्रतिष्ठान के अन्दर सदस्यता एकत्र नहीं कर सकते हैं या किसी भी ट्रेड यूनियन गतिविधि का संचालन नहीं कर सकते हैं। वे कोई माँग नहीं उठा सकते हैं और न ही हड़ताल का सहारा ले सकते है और कम्पनी को यह क़ानूनी अधिकार होगा कि वह समझौता कार्यवाहियों में भी उनके साथ बातचीत न करे। वे प्रतिष्ठान में श्रम क़ानूनों के उल्लंघन के बारे में श्रग विभाग को कोई शिकायत भी नहीं कर सकेंगे।
बडे प्रतिष्ठानों में जब असंगठित मज़दूर एक यूनियन में संगठित होने लगेंगे, तो प्रबन्धन के लिए यह क़ानूनी रूप से आसान होगा कि वह अपने पक्ष के मज़दूरो को एक और यूनियन बनाने के लिए प्रोत्साहित करे और उसे ही वार्ता यूनियन के रूप में मान्यता दे। एक बार प्रबन्धन के अनुकूल यूनियन को मान्यता दे दी गयी, तो किसी भी नई यूनियन के लिए ख़ुद को स्थापित करना और मान्यता प्राप्त करना बेहद मुश्किल होगा क्योंकि मजदूरों की माँगों पर क़ानूनी रूप से आन्दोलन करने की सीमित सम्भावना है। यह संहिता ऐसे अधिकाँश प्रतिष्ठानों में प्रबन्धन-समर्थक यूनियनों या नाममात्र यूनियनों का होना सुनिश्चित करेगा।
चौथा हमला स्थायी आदेश अधिनियम, 1946 से जुड़े बदलावों के साथ किया गया है। पहले 100 से अधिक श्रमिकों के प्रतिष्ठानों में स्थायी आदेश अधिनियम के तहत सेवा शर्तों को लिखित और स्पष्ट करना अनिवार्य था। अब नये क़ानून में स्थायी आदेश लागू होने की सीमा 100 से बढ़ाकर 300 मज़दूर कर दी गयी है। इससे बड़ी संख्या में मज़दूर अब लिखित सेवा शर्तों के दायरे से बाहर हो जायेंगे। नतीजतन, ठेका, अस्थायी और अनिश्चित रोज़गार को बढ़ावा मिलेगा।
पाँचवाँ महत्वपूर्ण हमला हड़ताल के अधिकार पर किया गया है। हड़ताल मज़दूरों का सामूहिक मोल-भाव करने का हथियार होता है। प्रबन्धन को अपनी माँगो को स्वीकार करने के लिए मजबूर करने के लिये मज़दूरों के पास हडताल पर जाने का अधिकार ही सबसे महत्वपूर्ण और अन्तिम हथियार है। यह संहिता मजदूरों की लगभग हर हड़ताल को अवैध बनाती है। अब व्यवहारिक तौर पर वैध तरीके से कोई भी हड़ताल कर पाना सम्भव नहीं रह जायेगा। हड़ताल करने की शर्तें ऐसी कर दी गयीं हैं कि हड़ताल करना अपराध माना जायेगा, जिसके एवज में जुर्माना से लेकर सज़ा तक हो सकती है। पुराने औद्योगिक विवाद अधिनियम में धारा 22 केवल जन/सार्वजनिक उपयोगी सेवाओं पर लागू होती थी जिनमें हड़ताल से पहले 14 दिन का नोटिस आवश्यक था। धारा 23 के तहत अन्य उद्योगो में किसी नोटिस की आवश्यकता नहीं थी और केवल न्यायालय, न्यायाधिकरण आदि के समक्ष कार्यवाही चलने के दौरान कोई हडताल नहीं करने पर प्रतिबन्ध था। नये कोड में पुरानी धाराओं 22 और 23 को नयी धारा 62 (1) के रूप में मिला दिया गया है और सभी प्रतिष्ठानो पर लागू किया गया है। इसलिए अब किसी भी प्रकार के उद्योग में हड़ताल के लिये 14 दिनों का नोटिस देना होगा। फिर नोटिस मिलने के बाद समझौता अधिकारी समझौता कार्यवाही शुरू करेगा और सुलह (conciliation) की कार्यवाही के दौरान तथा उसके समाप्त होने के सात दिन बाद तक, और औद्योगिक न्यायाधिकरण की कार्यवाही के दौरान तथा उसके समाप्त होने के 60 दिन बाद तक हड़ताल पर प्रतिबंध रहेगा। इसके अलावा, किसी भी समझौते के प्रभावी रहने की अवधि में भी हड़ताल निषिद्ध होगी। वार्ता विफल होने की सूरत में, समझौता अधिकारी विफलता की रिपोर्ट सरकार को भेजेगा जो इसे एक न्यायाधिकरण के पास फ़ैसला करने के लिए भेज देगी और जब तक मामला न्यायाधिकरण में है, कोई हड़ताल नहीं होगी। दूसरी ओर, समझौता कार्यवाही की विफलता के बाद, नये क़ानून के तहत, प्रबन्धन भी मामले को सीधे ट्रिब्यूनल मे ले जा सकता है (धारा 53(6)) और इसलिए भी कोई हड़ताल सम्भव नहीं होगी। वास्तव में हर हड़ताल को ही अब अवैध हड़ताल घोषित किया जा सकता है।
अब इन नियमों की तुलना ज़रा इससे करें। 300 से कम कामगारों वाले किसी प्रतिष्ठान में मालिक अथवा नियोक्ता एक महीने के भीतर तालाबन्दी की घोषणा कर उसे पूरा कर लेंगे, जबकि उस प्रतिष्ठान के श्रमिकों को इस तालाबन्दी के ख़िलाफ़ “क़ानूनी” रूप से हड़ताल करने के लिए दो महीने तक इन्तज़ार करना पड़ेगा! सुलह अथवा न्यायाधिकरण की कार्यवाहियों के दौरान हड़ताल करने पर पाबन्दी लगायी गयी है। व्यवहारतः मालिक अथवा नियोक्ता इन कार्यवाहियों को सालों तक खींच सकते हैं, नतीजतन इस अवधि में श्रमिक किसी भी प्रकार का “वैध” आन्दोलन या हड़ताल नहीं कर पाएँगे।
इसके अलावा, यदि किसी प्रतिष्ठान के 50 प्रतिशत से अधिक श्रमिक सामूहिक रूप से आकस्मिक अवकाश लेते हैं, तो उसे भी हड़ताल माना जायेगा—अर्थात बिना पूर्व सूचना के संगठित अनुपस्थिति तक को अवैध करार दिया जायेगा। कोई भी मज़दूर जो अवैध हड़ताल पर जाता है, कोई भी व्यक्ति जो हड़ताल के लिए वित्तीय सहायता देता है या अन्यथा हड़ताल में मदद करता है, उसे नौकरी से बर्ख़ास्त होने के अलावा बडा ज़ुर्माना लग सकता है या जेल भी जाना पड़ सकता है।
औद्योगिक सम्बन्ध संहिता में, एक महत्वपूर्ण मज़दूर विरोधी परिवर्तन ‘उद्योग’ की परिभाषा में किया गया है। किसी धर्मार्थ, सामाजिक या परोपकारी सेवा में पूरी तरह या पर्याप्त रूप से लगे संगठनों के स्वामित्व या प्रबन्धन वाले संस्थानों को उद्योग की परिभाषा से बाहर रखा गया है। उदाहरण के लिए, कुछ राज्यों में स्कूलों में मध्याह्न भोजन देने का ठेका समाज सेवा करने वाले धर्मार्थ, परोपकारी संगठनों को दिया गया है। इसलिए इसे एक उद्योग के रूप में नहीं माना जायेगा और इस भोजन को तैयार करने और परोसने के काम में लगे मज़दूरो को उनके अधिकारों से वंचित कर दिया जाएगा। अस्पतालों, स्कूलों, कॉलेजों, मन्दिर के ट्रस्टों, आश्रमों आदि मे कार्यरत मज़दूरों के मामले में भी ऐसा होगा, जिनके स्वामित्व या प्रबन्धन का दावा धर्मार्थ संगठनों द्वारा किया जाता है। यहाँ तक कि बाबा राम देव के कॉर्पोरेट उद्योग सम्भवतः इस श्रेणी में आ सकते हैं क्योंकि किसी भी गतिविधि को केन्द्र सरकार द्वारा उद्योग नहीं होने के रूप में अधिसूचित किया जा सकता है!
इस कोड के तहत पहले की तरह लेबर कोर्ट नहीं होंगे और केवल राष्ट्रीय न्यायाधिकरण या एक क्षेत्र के लिए औद्योगिक न्यायाधिकरण होंगे। पुराने औद्योगिक सम्बन्ध अधिनियम के तहत, लेबर कोर्ट और औद्योगिक न्यायाधिकरणों की अध्यक्षता न्यायिक अधिकारियों (जजों) द्वारा की जाती थी। नयी संहिता में, औद्योगिक न्यायाधिकरणों में 2 सदस्य होंगे एक न्यायिक और एक प्रशासनिक। कुछ मुद्दों पर वे अकेले भी मामलों को सुन सकते हैं और फ़ैसला कर सकते है यानी प्रशासनिक सदस्य (कोई सेवानिवृत्त सरकारी अधिकारी) अकेले मज़दूरो के मुद्दो पर निर्णय ले सकते हैं, जिसका प्रभावी रूप से अर्थ है कि मज़दूरों के पक्ष में निर्णय की सम्भावना न के बराबर हो जाती है।
एप्रेण्टिस अधिनियम में भी संशोधन करके नये लेबर कोड के आने से पहले ही सरकार द्वारा प्रशिक्षुओं की पुरानी प्रणाली को समाप्त कर दिया गया था। प्रशिक्षुता पूरी होने के बाद प्रशिक्षुओं को नौकरी पर रखने की नियोक्ता की ज़िम्मेदारी को हटा दिया गया था, सरकार अब प्रशिक्षु के वजीफ़े का आंशिक भुगतान देगी और प्रशिक्षु को पूर्णकालिक मज़दूर की तरह काम करना होगा। दूसरी ओर, जबकि पुराने औद्योगिक विवाद अधिनियम में मज़दूर की परिभाषा में प्रशिक्षु शामिल थे, नये औद्योगिक सम्बन्ध संहिता में मज़दूर की परिभाषा में विशेष रूप से प्रशिक्षुओं को शामिल नहीं किया गया है। अतः प्रशिक्षु बन्धुआ मज़दूरों की तरह होंगे जो पूर्णकालिक रूप से कार्य कर रहे हैं, लेकिन उन्हें न्यूनतम मज़दूरी का अधिकार या अन्य कोई भी अधिकार व संरक्षण प्राप्त नहीं होंगे। इस अवधारणा को सरकार द्वारा अपनी विभिन्न ‘कौशल विकास’ योजनाओं तक विस्तारित किया गया है, जिसमें युवाओं को एक वर्ष के लिए मामूली वज़ीफ़े पर पूर्णकालिक काम करने के लिए निजी औद्योगिक प्रतिष्ठानों में प्रशिक्षुओ के रूप में भेजा जाता है, जिसके बाद उन्हें एक कौशल प्रमाण पत्र दिया जाता है, जिसका नौकरी के बाज़ार में कोई मूल्य नहीं है!
व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्यस्थितियों पर संहिता, 2020 (The Occupational Safety, Health and Working Conditions Code 2020; OHS Code)
व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्यस्थितियों पर संहिता, 2020 (ओएचएस संहिता) को सुरक्षा, स्वास्थ्य, कार्यस्थिति से जुड़े 13 पुराने क़ानूनों को ख़त्म करके बनाया गया है। नाम के उलट, इस कोड में मज़दूरों की सुरक्षा के साथ और ज़्यादा खिलवाड़ किया गया है। इस संहिता के तहत फ़ैक्ट्री अधिनियम, 1948 के द्वारा दी गयी ‘कारख़ाने’ की परिभाषा में महत्वपूर्ण बदलाव किया गया है। यह केवल उन्हीं प्रतिष्ठानों को ‘कारख़ाना’ मानती है, जहाँ उत्पादन प्रक्रिया में बिजली का प्रयोग होता है और 20 या उससे अधिक श्रमिक कार्यरत हैं, अथवा जहाँ बिजली का प्रयोग नहीं होता और 40 या उससे अधिक मज़दूर काम करते हैं। जबकि पुराने अधिनियम में यह सीमा ठीक इसकी आधी थी। ऑटोमोबाइल सेक्टर जैसे आधुनिक उद्योगों की तीसरे-चौथे टियर की अनेक फैक्ट्रियाँ, जो आवश्यक छोटे-छोटे कल-पुर्ज़े बनाती हैं, वहाँ 20 से कम श्रमिक काम करते हैं। 2017-18 के ‘ऐनुअल सर्वे आफ़ इण्डस्ट्री’ के अनुसार 47.1 प्रतिशत कारख़ाने ऐसे हैं, जहाँ 20 तक मज़दूर काम करते हैं। 33.8 प्रतिशत कारख़ानों में 20-99 मज़दूर काम करते हैं। नयी परिभाषा के अनुसार ऐसे प्रतिष्ठान अब श्रम संहिताओं के दायरे से बाहर हो जायेंगे।
नयी संहिता के तहत श्रमिकों की सुरक्षा के साथ गम्भीर खिलवाड़ किया गया है। कारख़ानों में सुरक्षा के इन्तज़ाम पहले ही खस्ताहाल थे, अब उनकी स्थिति और भी बदतर होने वाली है। आइए सबसे पहले ‘ओएचएस’ संहिता के तहत कारख़ाना पंजीकरण की प्रक्रिया पर एक नज़र डालें। अब कोई भी प्रतिष्ठान केवल ऑनलाइन आवेदन के माध्यम से कारख़ाने का पंजीकरण प्राप्त कर सकता है। पंजीकरण अधिकारी, आवेदन प्राप्त होने पर, प्रतिष्ठान का पंजीकरण करेगा और प्रमाण-पत्र जारी करेगा। संहिता में ऐसा कोई अनिवार्य प्रावधान नहीं है कि प्रमाण-पत्र जारी करने से पहले अधिकारी क़ानून में निर्धारित सुरक्षा मानकों के अनुरूप परिसर और सुविधाओं का भौतिक निरीक्षण करे। यानी सुरक्षा प्रबन्धों को नज़रअन्दाज़ करने की वैधानिक छूट कारखाना मालिकों को मिल गयी है। इसके अतिरिक्त, यदि निर्धारित अवधि के भीतर पंजीकरण अधिकारी प्रमाण-पत्र जारी नहीं करता है, तो प्रतिष्ठान को स्वतः पंजीकृत मान लिया जायेगा और एक ऑटो-जनरेटेड पंजीकरण प्रमाण-पत्र जारी कर दिया जायेगा। ज़रा इसकी तुलना श्रमिक यूनियनों के पंजीकरण की जटिल और अनिश्चित प्रक्रिया से कीजिये—इन संहिताओं का वर्गीय चरित्र साफ़ नज़र आयेगा।
यही नहीं, अब सेफ़्टी कमेटियाँ केवल उन्हीं कारख़ानों में अनिवार्य होंगी, जहाँ 500 या उससे अधिक श्रमिक कार्यरत हों। खतरनाक उद्योगों के लिए यह सीमा 250 श्रमिक तय की गयी है। पुराने क़ानून में यह स्पष्ट रूप से निर्धारित था कि श्रमिक कितनी सीमा तक रासायनिक, विषैली या ख़तरनाक परिस्थितियों में काम कर सकते हैं। नये क़ानून में यह स्पष्टता समाप्त कर दी गयी है और इसे राज्य सरकारों के विवेक पर छोड़ दिया गया है।
इस संहिता द्वारा ठेकेदारी प्रथा को और अधिक मज़बूत किया गया है। अब 50 मज़दूरों तक की आपूर्ति करने वाले ठेकेदार इस संहिता के दायरे से बाहर रहेंगे, जबकि पहले यह सीमा 20 मज़दूरों की थी। अब ठेका श्रमिकों से वैधानिक रूप से स्थायी प्रकृति का कार्य कराया जा सकेगा। पहले ठेका श्रमिकों के भुगतान के समय मुख्य नियोक्ता के अधिकृत प्रतिनिधि की उपस्थिति अनिवार्य थी, लेकिन अब यह अनिवार्यता समाप्त कर दी गयी है। इसके अलावा इस संहिता में ठेकेदार को भी नियोक्ता के तौर पर शामिल किया गया है। यह प्रमुख नियोक्ता को मज़दूरों के प्रति सारी ज़िम्मेदारियों से मुक्त करने का रास्ता खोल देता है। इस कोड के मुताबिक कम्पनी की मुख्य गतिविधि में ठेका मज़दूरों से काम करवाया जा सकता है। मुख्य गतिविधि क्या है, यह सरकार के प्राधिकरण द्वारा तय किया जायेगा। यानी अब ठेका मज़दूरों को किसी भी प्रकार के काम में लगाया जा सकता है। अब ठेका मज़दूर ‘समान कार्य का समान वेतन’ की माँग क़ानूनी तौर पर भी नहीं उठा पायेंगे। कोड के मुताबिक़, अगर कोई ठेकेदार, मज़दूरों के लिए तय किये गये काम के घण्टे, वेतन और अन्य ज़रूरी सुविधाओं की शर्तें नहीं पूरी कर पाता, तो भी उस ठेकेदार को ‘कार्य-विशिष्ट’ लाइसेंस दिया जा सकता है।
अब तक लागू क़ानूनों के अन्तर्गत शाम 7 बजे से सुबह 6 बजे के दरम्यान महिला श्रमिकों से काम कराना प्रतिबन्धित था। अब महिला श्रमिकों की तथाकथित “सहमति” के आधार पर उनसे रात की पाली में भी काम कराया जा सकेगा। लेकिन उनकी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी मालिकों की नहीं होगी! दूसरी ओर, कारख़ाना परिसर में पालनाघर (क्रेच) सुविधा के नियम को भी कमज़ोर किया गया है। पहले यह सुविधा 30 महिला श्रमिकों वाले कारखानों में अनिवार्य थी, अब इसे बढ़ाकर 50 कर दिया गया है। साथ ही इसमें मालिकों को क्रेच खोलने की ज़िम्मेदारी से भी छूट दी गयी है। मालिक चाहे तो किसी एनजीओ की जगह या आँगनवाड़ी केन्द्र को भी क्रेच के तौर पर इस्तेमाल कर सकता है।
नये क़ानून में साप्ताहिक और त्रैमासिक ओवरटाइम की पूर्व निर्धारित सीमा समाप्त कर दी गयी है। अब यह राज्य सरकारों के ऊपर छोड़ दिया गया है कि वे तय करें कि मज़दूरों को ओवरटाइम के नाम पर कितना निचोड़ा जायेगा। सवैतनिक वार्षिक अवकाश के नियमों को भी बदल दिया गया है। पहले 240 दिनों में 12 सवैतनिक अवकाश मज़दूर ले सकते थे। अब 180 दिनों में 9 सवैतनिक अवकाश ही ले सकते हैं।
सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 (The Code on Social Security, 2020)
सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 पुराने 9 श्रम कानूनों को समाप्त कर उनके स्थान पर लागू किया जा रहा है। करोड़ों असंगठित मज़दूर तो पहले ही हर तरह की सामाजिक सुरक्षा से वंचित हैं। बड़ी कम्पनियों में काम करने वाले लगभग 90 प्रतिशत से ज़्यादा मज़दूर ईएसआई, पीएफ़, स्वास्थ्य बीमा, पेंशन आदि से वंचित रहते हैं। इस कोड में सरकार ने बातें तो बड़ी लच्छेदार की हैं जिनसे किसी को भ्रम हो सकता है कि सरकार मज़दूरों को सामाजिक सुरक्षा देने के लिए काम कर रही है। मगर वास्तविकता इसके ठीक विपरीत है।
इस संहिता में मज़दूरों को संगठित व असंगठित की श्रेणी में बाँट दिया है। संगठित क्षेत्र के मज़दूरों को मिलने वाली सुविधाओं को कमज़ोर किया गया है। अनौपचारिक मज़दूर (भले ही संगठित क्षेत्र में कार्यरत हो) को सामाजिक सुरक्षा पाने के लिए अब सरकार के भरोसे रहना होगा। नयी सामाजिक सुरक्षा संहिता के तहत श्रमिकों, कर्मचारियों को सभी सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का लाभ लेने के लिए आधार कार्ड द्वारा ऑनलाइन पंजीकरण को अनिवार्य कर दिया गया है। इसे नियमित अपडेट न करने की सूरत में पंजीकरण रद्द कर दिया जायेगा। अब अनौपचारिक मज़दूरों की ईपीएफ देनदारी नियोक्ताओं अथवा कम्पनी मालिकों की नहीं होगी, बल्कि सरकार द्वारा न्यूनतम सहायता के रूप में होगी। अनौपचारिक, असंगठित, गिग, प्लेटफ़ॉर्म मज़दूरों के लिए ईएसआई-ईपीएफ को अनिवार्य अधिकार के रूप में नहीं दिया गया है, केवल “योजना” का वादा किया गया है। सरकार का कहना है कि वह “ऐसे श्रमिकों के लिए सामाजिक सुरक्षा योजनाएँ बना सकती है”। यानी कम्पनी मालिक अथवा नियोक्ता ईएसआई-पीएफ देने से मुक्त है, और सरकार द्वारा देनदारी भी किसी कानूनी बाध्यता के तहत नहीं है।
गौरतलब बात यह है कि इस स्कीम के तहत क्या सुविधाएँ दी जायेंगी और मज़दूर तक इसे कैसे पहुँचाया जायेगा, इसका कोड में कहीं भी ज़िक्र नहीं है। साथ ही कोड में कहा गया है कि इसके लिए ‘राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा फ़ण्ड’ का गठन किया जायेगा। देखा जाये तो इसका गठन 2011 में ही किया गया था। 2015-16 में मोदी सरकार ने 607 करोड़ रुपये सामाजिक सुरक्षा फ़ण्ड के लिए जारी किये (अर्जुनसेन गुप्ता कमेटी के अनुसार जी.डी.पी का 0.39 प्रतिशत सामाजिक सुरक्षा में ख़र्च किया जाना चाहिए, इस हिसाब से मोदी सरकार द्वारा जारी की गयी राशि बेहद कम है) पर उसका लाभ किसी मज़दूर तक नहीं पहुँचा। यानी असंगठित-अनौपचारिक मज़दूरों की बड़ी आबादी अब क़ानूनी तौर पर सामाजिक सुरक्षा से वंचित हो जायेगी।
ईपीएफ में नियोक्ता तथा श्रमिक के द्वारा जमा की जाने वाली राशि को 12% से घटाकर 10% कर दिया गया है। मान लिजिए आपका वेतन 10 हज़ार है। पहले 12 प्रतिशत पीएफ़ कटने के बाद आपको 8800 रुपये मिलते थे, अब 10 प्रतिशत पीएफ़ कटने के बाद आपको 9000 रुपये मिलेंगे। नियोक्ता को भी 10 प्रतिशत ही देना होगा। यानी आपके पीएफ़ में पहले 2400 रुपये जमा होते, पर अब 2000 रुपये ही जमा होंगे। इससे होगा यह कि तात्कालिक तौर पर आपके हाथ में पैसा कुछ अधिक होगा, पर असल में आपके पीएफ़ में कटौती होगी। दूसरी तरफ़ कम्पनियों को इसमें सीधा-सीधा फ़ायदा होगा और उन्हें 2 प्रतिशत कम रक़म जमा करनी होगी। इसके साथ ही सरकार यदि चाहे तो यह प्रतिशत और घटा सकती है। इसी प्रकार ईएसआई में भी दोनों पक्षों की देनदारी घटा दी गयी है।
यही नहीं, यदि किसी प्रतिष्ठान में श्रमिकों का बहुलांश और प्रबन्धन ईएसआई-पीएफ की योजना से बाहर आना चाहता है, तो ऐसा करना अब सम्भव है। कहने की कोई ज़रूरत नहीं कि आज जहाँ कारखानों में श्रमिकों को पहचान पत्र तक नहीं दिया जाता, वहाँ कागज़ों पर बहुलांश श्रमिकों की वही “राय” होगी जो, प्रबन्धन चाहेगा। ग़ौरतलब है कि नियोक्ता अथवा मालिका द्वारा ईएसआई-पीएफ में अपना हिस्सा जमा ना करने पर सज़ा का प्रावधान हटा दिया गया है।
अगर मज़दूर ठेके पर काम कर रहा है, तो ईएसआई देने की ज़िम्मेदारी ठेकेदार की होगी, प्रमुख नियोक्ता को का इससे कोई लेना-देना नहीं होगा। यानी अब कम्पनियों के लिए ईएसआईसी लागू न करने का रास्ता भी अब खोल दिया गया है।
ग्रैच्युटी के क़ानून को भी लचीला बना दिया गया है, ताकि कम्पनियाँ चाहे तो एक साल में ही कामगारों को काम से निकाल सकती हैं। अगर पुनः उसी कामगार को वापस काम पर रखा भी जाता है, तब उसे नये कामगार की श्रेणी में शामिल किया जायेगा। सामाजिक सुरक्षा संहिता में कामगार स्त्रियों की बड़ी आबादी को मातृत्व लाभों से वंचित कर दिया गया है। प्रसूति के ठीक पहले और बाद में स्त्रियों से काम कराने पर रोक लगायी गयी है। लेकिन इसी में आगे कहा गया कि जो स्त्री “अपनी प्रसूति के ठीक पहले के 12 महीनों के दौरान कम से कम 80 दिनों तक किसी प्रतिष्ठान में काम कर चुकी होगी” वह मातृत्व लाभ पाने की हक़दार होगी। बताने की ज़रूरत नहीं कि ज़्यादातर मज़दूर स्त्रियाँ इसके दायरे से बाहर हो जायेंगी।
उपरोक्त चर्चा से आप समझ चुके होंगे कि ये चारों लेबर कोड वास्तव में कितने ख़तरनाक हैं। फ़ासीवादी मोदी सरकार द्वारा इन लेबर कोडों को लागू करना मज़दूरों-कर्मचारियों के सभी अधिकारों की हत्या है। ये अपने संघर्षों और क़ुर्बानियों के दम पर हासिल किये गये अबतक के हमारे सभी हकों पर मोदी सरकार का सबसे बड़ा फ़ासीवादी हमला है। यह मज़दूरों-कर्मचारियों की पूरी मेहनतकश आबादी को ग़ुलामों में तब्दील करने का एक फ़ासीवादी उपक्रम है। यह वक़्त है कि भारत के सभी संगठित व असगठित मज़दूर-कर्मचारी एक साथ संगठित होकर लड़ें और फ़ासीवादी मोदी सरकार के इस हमले का संगठित होकर जवाब दें। यह वक़्त है जब हम एकदिवसीय हड़तालों की रसमदायगी से आगे बढ़ें और एक निर्णायक संघर्ष का बिगुल फूँक दें। यह वक़्त है जब सभी केन्द्रीय ट्रेड यूनियनों-संघों व कम्पनियों-पेशों आदि की यूनियनों को साथ मिलकर अनिश्चितकालीन आम हड़ताल का आह्वान करना चाहिए और इन लेबर कोड्स के वापस लेने तक अनिश्चितकालीन आम हड़ताल को जारी रखना चाहिए। मोदी सरकार को अगर चार लेबर कोड वापस लेने के लिए मजबूर करना है, तो मज़दूर-कर्मचारी आबादी को अनिश्चितकालीन आम हड़ताल के लिए एकजुट करना ही होगा।
मज़दूर बिगुल, दिसम्बर 2025













