बनारस की दालमण्डी में विनाशलीला रचता योगी सरकार का साम्प्रदायिक फ़ासीवादी बुलडोज़र
ध्रुव
उत्तर प्रदेश की योगी सरकार का साम्प्रदायिक फ़ासीवादी बुलडोज़र “विकास” की एक और परियोजना अंजाम देने में जुटा हुआ है। बनारस के दालमण्डी इलाक़े की मुख्य सड़क को चौड़ा करने के बहाने सारी दुकानों को ध्वस्त किया जा रहा है। पूरा मीडिया का तंत्र इस कार्रवाई की चटखारे ले-लेकर रिपोर्टिंग करने में लगा हुआ है। अख़बारों से लेकर टीवी चैनलों तक लगातार दालमण्डी के सवाल पर इस तरह से रिपोर्टिंग की जा रही है जिससे इसके ज़रिये अधिकतम सम्भव साम्प्रदायिक उन्माद पैदा किया जा सके। विरोध करने वालों की धार्मिक पहचान को विभिन्न तरीक़ों से मुद्दा बनाकर प्रचारित किया जा रहा है। जिस परियोजना को योगी सरकार अपनी सरकारी मशीनरी के दम पर रातों-रात अंजाम दे सकती है, उसे कई महीनों से जानबूझकर धीरे-धीरे अंजाम दिया जा रहा है ताकि साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण का तन्दूर लम्बे समय तक गर्म रखा जा सके।
ग़ौरतलब है कि इस परियोजना की ज़द में लगभग 10 मस्जिदों समेत 150 से अधिक पुरानी इमारतें व घर आने वाले हैं। सरकार इसे काशी विश्वनाथ मन्दिर तक बेहतर पहुँच और ट्रैफ़िक सुधार का हिस्सा बता रही है; जबकि काशी विश्वनाथ के कॉरीडोर की परियोजना पहले ही पूरी हो चुकी है और मन्दिर तक पहुँचने के लिए चौड़ी सड़क बनायी जा चुकी है। लेकिन हिन्दू आबादी की “धार्मिक भावना” के तुष्टीकरण का कार्ड खेलते हुए और मन्दिर तक पहुँचने के नाम पर सुगम रास्ता तैयार करने का हवाला देते हुए इलाक़े की अल्पसंख्यक आबादी को निशाना बनाया जा रहा है ताकि इसी बहाने पूरे इलाक़े में साम्प्रदायिक उन्माद की आग लगायी जा सके। अभी बहुत समय नहीं बीता जब इसी इलाक़े में ज्ञानवापी मस्जिद के नाम पर साम्प्रदायिक नफ़रत फैलाने की कोशिश की गयी थी। इस इलाक़े में सदियों से छोटे दुकानदार, बुनकर, मेहनतकश परिवार, जिनमें से बड़ी आबादी मुस्लिम समुदाय से है, अपनी रोज़मर्रा की ज़िन्दगी साथ-साथ जी रहे हैं। दालमण्डी की गलियों में आये दिन बुलडोज़र खड़ा करके इस आबादी के बीच योगी सरकार के ख़ौफ़ को स्थापित करने की कोशिश की जा रही है। इस साम्प्रदायिक एजेण्डे के ख़िलाफ़ जो भी आवाज़ उठाने की कोशिश कर रहा है, योगी सरकार उसका लगातार दमन कर रही है। इस मामले में अब तक दो नामजद व्यक्तियों मोहम्मद सलीम और इमरान उर्फ़ बबलू सहित लगभग 30 अज्ञात महिलाओं और पुरुषों के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया गया है।
वैसे तो पिछले लम्बे समय से दालमण्डी की मुख्य सड़क को चौड़ा करने की बातें शुरू हो गयी थीं लेकिन बीते 22 जुलाई 2025 को योगी सरकार ने दालमण्डी की नयी सड़क से चौक थाने तक लगभग 650 मीटर लम्बी सड़क को लगभग 17 मीटर चौड़ा करने का अन्तिम आदेश जारी किया। ‘द टाइम्स ऑफ इण्डिया’ की रिपोर्ट के अनुसार इसकी कुल अनुमानित लागत 215.88 करोड़ रुपये है, जिसमें से लगभग 200 करोड़ रुपये प्रभावित भवनों के मुआवज़े के लिए निर्धारित किये गये हैं। परियोजना के तहत सड़क के दोनों ओर से 8.5-8.5 मीटर का हिस्सा काटा जायेगा, जिससे वर्तमान चौड़ाई 2.5-5 मीटर से बढ़कर 17 मीटर हो जायेगी। अप्रैल 2025 में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर डीपीआर तैयार किया गया था, और 2 करोड़ रुपये की प्रारम्भिक राशि जारी हुई। अक्टूबर 2025 से ध्वस्तीकरण शुरू हो चुका है, जिसमें 13 भवन तोड़े जा चुके हैं, जबकि कुल 187 संरचनाएँ प्रभावित बतायी जा रही हैं। हालाँकि इस सबके पीछे असली कहानी पूर्वांचल की मुस्लिम आबादी के बड़े हिस्से की आर्थिक रीढ़ को तोड़ देने की कोशिश है, ताकि उनके अन्यीकरण की फ़ासीवादी साज़िश को सुगमता से अंजाम दिया जा सके। काशी विश्वनाथ कॉरीडोर के निर्माण के दौरान भी ऐसा ही हुआ था, जहाँ 300 से अधिक दुकानें-घर तोड़े गये थे और उनमें अधिकांश मुस्लिम समुदाय से जुड़े लोगों के थे।
दालमण्डी में सड़क चौड़ीकरण के नाम पर जो कार्रवाई हो रही है, यह कोई पहली कार्रवाई नहीं है। योगी सरकार का बुलडोज़र मॉडल लगातार ग़रीब-गुरबा आबादी को रौंदते हुए और साम्प्रदायिक उन्माद पैदा करते हुए “विकास” का एक नया मॉडल तैयार करता जा रहा है। वाराणसी में ही पहले भी कश्मीरीगंज और आदमपुर की पुरानी दुकानों को बिना नोटिस दिये हटा दिया गया था। लखनऊ में अकबरी गेट और अमीनाबाद के आसपास बुलडोज़र चलाकर “विकास” के नाम पर दर्जनों छोटे कारोबार उजाड़ दिये गये। इलाहाबाद में भी कई मुस्लिम मोहल्लों के घरों को काग़ज़ पूरे होने के बावजूद “अवैध” कहकर तोड़ दिया गया। कानपुर के बाबूपुरवा और बेकनगंज में भी यही मॉडल लागू किया गया, जहाँ सड़क चौड़ीकरण के नाम पर दुकानें गिरा दी गयीं। यह सिलसिला साफ़ दिखाता है कि सरकार का टारगेट हमेशा वही इलाक़े होते हैं जहाँ ग़रीब-मेहनतकश या मुसलमानों की आबादी ज़्यादा है।
ज़ाहिर है कि योगी सरकार के ‘राज’ में उत्तर प्रदेश की जनता भयंकर तबाही-बदहाली में जी रही है। शिक्षा, स्वास्थ्य या रोज़गार जैसे सभी मामलों में उत्तर प्रदेश एक फिसड्डी राज्य बना हुआ है। भाजपा के ही साँसद द्वारा राज्यसभा में दी गयी जानकारी के अनुसार उत्तर प्रदेश में लगभग 46.36 % बच्चे भूख और कुपोषण के शिकार हैं और 34 ज़िलों में यह दर 50 % से अधिक है। नीति आयोग के आँकड़े दिखाते हैं कि उत्तर प्रदेश स्वास्थ्य सुविधाओं के मामले में देश में लगभग सबसे नीचे है, जहाँ मातृ मृत्यु दर राष्ट्रीय औसत से दोगुनी है और ग़रीब परिवार इलाज के अभाव में रोज़ाना मौत और कर्ज़ के बीच फँसे रहते हैं। युवा भयंकर बेरोज़गारी की मार झेल रहे हैं। लाखों नौजवान वर्षों से परीक्षाओं, पेपर लीक और अधर में लटकी भर्तियों के बीच अपना भविष्य खोते जा रहे हैं। यह प्रदेश देश का सबसे बड़ा प्रवासी मज़दूर आपूर्तिकर्ता राज्य बन चुका है, जहाँ काम न मिलने के कारण लोग रोज़गार की तलाश में बड़े शहरों और दूसरे राज्यों में पलायन करने को मजबूर हैं।
इन तमाम बुनियादी सवालों पर आम जनता का ध्यान ना जाये इसलिए योगी सरकार अपने साम्प्रदायिक फ़ासीवादी राजनीति के एजेण्डे के तहत ‘बुलडोज़र राज’ की नीति अपनाती है। यही कारण है कि बुलडोज़र की कार्रवाई अक्सर उन्हीं ग़रीब इलाक़ों, ख़ासकर मुस्लिम बस्तियों, पर दिखायी देती है जहाँ पर सरकार को आम जनता के बीच साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण को बढ़ावा देने का मौक़ा ज़्यादा मिल सकता है। आज आम जनता को जाति-धर्म की पहचान से इतर एकजुट होकर योगी सरकार के बुलडोज़र राज के ख़िलाफ़ सड़कों पर उतरने की ज़रूरत है। तभी हम इनकी साम्प्रदायिक फ़ासीवादी राजनीति के समूचे एजेण्डे के ख़िलाफ़ एक मुक्कमल लड़ाई लड़ सकते हैं।
मज़दूर बिगुल, दिसम्बर 2025













