रोज़गार मिशन नहीं, पक्के रोज़गार की गारण्टी चाहिए!
मोदी सरकार द्वारा ग्रामीण रोज़गार गारण्टी क़ानून (मनरेगा) को ख़त्म करने की चाल को नाकाम करो!
क्रान्तिकारी मनरेगा मज़दूर यूनियन
16 दिसम्बर को केन्द्र सरकार ने लोकसभा में एक और मज़दूर विरोधी विधेयक पेश किया। लोकसभा में पास होने के बाद 18 दिसम्बर की आधी रात में यह राज्यसभा में भी ध्वनि मत द्वारा पास कर दिया गया। नवम्बर माह में ही चार श्रम संहिताओं को लागू करने की अधिसूचना जारी कर देश के मज़दूरों और कर्मचारियों पर सीधा हमला किया गया था। अब ‘विकसित भारत – रोज़गार और आजीविका की गारण्टी मिशन (ग्रामीण) विधेयक, 2025 (VB-G RAM G)’ लाकर ग्रामीण व खेतिहर मज़दूरों पर हमला किया जा रहा है। यह विधेयक ‘महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारण्टी अधिनियम, 2005 (मनरेगा)’ को स्थानापन्न करने के मक़सद से लाया गया है।
फ़ासीवादी भाजपा सरकार नाम बदलने की राजनीति का एक और उदाहरण पेश करते हुए न केवल मनरेगा योजना का नाम बदल रही है, बल्कि असल में उसकी अन्तर्वस्तु पर कुठाराघात कर रही है। 2014 में विशेष तौर पर बड़े पूँजीपतियों और आम तौर पर देश के पूँजीपति वर्ग के भारी समर्थन से सत्ता में आयी मोदी सरकार ने शुरू से ही अपने पूँजीपति-मालिकों के हितों के अनुसार नीतियाँ लागू की हैं। मौजूदा लोकसभा सत्र में मनरेगा को समाप्त करने की प्रक्रिया और चार श्रम संहिताओं (लेबर कोड) की अधिसूचना जारी करने का उद्देश्य पूरी तरह स्पष्ट है—शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में समूचे पूँजीपति वर्ग को मज़दूरों का मनमाने ढंग से शोषण करने की क़ानूनी छूट देना और मज़दूरों-कर्मचारियों के बचे-खुचे श्रम अधिकारों को भी ख़त्म कर देना।
मनरेगा को समाप्त करना और कृषि के पीक सीज़न में 60 दिनों की तथाकथित ‘काम बन्दी’ लागू करना, दरअसल धनी किसानों और ग्रामीण पूँजीपति वर्ग को सस्ते मज़दूरों की निरन्तर सप्लाई सुनिश्चित करने की योजना है। तथ्य यह साबित करते रहे हैं कि मनरेगा के चलते ग्रामीण मज़दूरों की सौदेबाज़ी की ताक़त बढ़ी थी और वे दिहाड़ी मज़दूरी को लेकर बेहतर मोल-भाव कर पा रहे थे। लेकिन मनरेगा के ख़त्म होने से और 60 दिनों के ‘कार्य बन्दी’ के बाद बेरोज़गार मज़दूरों को मजबूरी में कम मज़दूरी पर काम करने के लिए बाध्य किया जायेगा। यही मोदी सरकार की वास्तविक मंशा है—ग्रामीण और शहरी श्रम बाज़ार को पूँजीपतियों के पक्ष में पूरी तरह झुका देना।
गम्भीर बात यह है कि इस नये विधेयक को लाने से पहले केन्द्र सरकार ने मज़दूरों, ट्रेड यूनियनों और राज्य सरकारों से कोई परामर्श नहीं किया। ऊपर की लच्छेदार भाषा के पीछे सच्चाई यह है कि एक्ट की जगह योजना (स्कीम) लाने की इस राजनीति के पीछे असल मंशा माँग-आधारित क़ानून को ख़त्म कर उसे बजट-सीमित योजना में बदलना है, जिसमें सरकार की कोई क़ानूनी जवाबदेही नहीं होगी। दूसरा, ग्राम सभा और ब्लॉक स्तर पर निर्धारित होने वाले कामों में हस्तक्षेप के ज़रिये मोदी सरकार इस क़ानून को दरअसल वास्तविकता में निष्प्रभावी बनाने की साज़िश कर रही है। साथ ही, अब से मोदी सरकार यह अधिसूचित करेगी कि किस राज्य में काम होगा है और किन राज्यों में नहीं जो सीधे तौर पर भाजपा-शासित राज्यों को लाभ देगी।
अव्वलन, मनरेगा क़ानून स्वयं एक आधा-अधूरा क़ानून है, जो महज 100 दिन के रोज़गार की गारण्टी तक सीमित है। मनरेगा क़ानून में 100 दिन का रोज़गार ही अपने आप में मज़दूरों के साथ एक मज़ाक जैसा था क्योंकि ‘रोज़गार’ का अर्थ ही होता है ऐसा काम जो कोई भी व्यक्ति रोज़ करता हो। वास्तविक माँग तो वर्ष के 365 दिन पक्के रोज़गार की गारण्टी की होनी चाहिए। नये विधेयक में 125 दिन रोज़गार देने की बात कही जा रही है, हालाँकि यह भी केवल एक और नया जुमला है। हक़ीक़त यह है कि पिछले पाँच वर्षों में मनरेगा के तहत एक मज़दूर को औसतन सिर्फ़ 50.35 दिन ही काम मिला है। यह कोई निराधार दावा नहीं, बल्कि सरकार द्वारा संसद में दी गयी स्वीकारोक्ति है। जब आज मज़दूर को आधा काम भी नहीं मिल रहा, तो 125 दिन का ढोल पीटना मज़दूरों की आँखों में धूल झोंकने के अलावा कुछ नहीं है। इसलिए मोदी सरकार का यह नया दावा ज़मीन की सच्चाई से नहीं, बल्कि चुनावी और मीडिया-प्रचार की राजनीति से प्रेरित है। एक तरफ़ मनरेगा गम्भीर अनियमितताओं तथा भ्रष्टाचार का शिकार रहा है, दूसरी तरफ़ इसके तहत लगातार रोज़गार समाप्त किया जा रहा है। सरकार की मज़दूर-विरोधी नीतियों के चलते गाँवों में सड़क मरम्मत, स्कूलों और खेल मैदानों की देखभाल, तालाब–नहरों की सफ़ाई, श्मशान भूमि के रखरखाव जैसे अधिकांश कच्चे कार्य या तो बन्द कर दिये गये हैं या बेहद सीमित कर दिये गये हैं।
इसका नतीजा यह है कि मनरेगा के तहत रोज़गार लगभग समाप्ति की कगार पर पहुँच गया है। गाँवों में बढ़ती महँगाई के बीच मज़दूरों के लिए अपने परिवार का पालन-पोषण करना बेहद कठिन हो गया है। ऐसे हालात में मनरेगा ही ग्रामीण मज़दूरों के लिए एक अहम सहारा था, लेकिन सरकार अब, बजाय इसके बजट और कार्य दिवसों में बढ़ोतरी के, इस योजना को ही तिलांजलि दे रही है। ऐसे में जब ज़रूरत थी कि सरकार मनरेगा की कमियों-खामियों को दूर करके उसे 100 दिन की रोज़गार गारण्टी योजना से आगे बढ़ाते हुए सही एवं वास्तविक अर्थों में रोज़गार के अधिकार का क़ानून बनाती- यानी ग्रामीण और शहरी—दोनों क्षेत्रों में सभी मज़दूरों के लिए पक्का और साल भर का रोज़गार सुनिश्चित करने वाला क़ानून बनाती- तब मज़दूर विरोधी फ़ासीवादी मोदी सरकार ने मनरेगा योजना को ही निरस्त करने के लिए नया विधेयक पेश कर दिया।
मनरेगा तथा ‘VB-G RAM G’ के बीच बुनियादी अन्तर
मनरेगा एक सार्वभौमिक माँग-आधारित अधिकार है। यानी इसके तहत देश भर के ग्रामीण क्षेत्रों में एक श्रमिक को काम माँगने पर 15 दिनों के अन्दर रोज़गार देना अथवा रोज़गार न दे पाने की सूरत में बेरोज़गारी भत्ता देना बाध्यताकारी था। लेकिन अब नये विधेयक में रोज़गार की गारण्टी सार्वभौमिक नहीं रह गयी है, बल्कि गारण्टी का स्वरूप सार्वभौमिकता से बदलकर विवेकाधीन प्रावधानों में परिवर्तित कर दिया गया है। यह अब केन्द्र सरकार की अधिसूचना पर निर्भर होगा, जिन क्षेत्रों के लिए केन्द्र सरकार अधिसूचना जारी करेगी केवल उन्हीं क्षेत्रों में अब रोज़गार का अधिकार मिलेगा। यानी जिन इलाक़ों को केन्द्र अधिसूचित नहीं करेगा, वहाँ काम का कोई अधिकार नहीं रहेगा। विडम्बना है कि मनरेगा क़ानून को हटाकर लायी गयी यह योजना काम की गारण्टी देने का दावा तो करती है लेकिन इस बात की कोई गारण्टी नहीं देती कि वह गारण्टी वास्तव में लागू भी होगी।
मनरेगा में यदि तय समय में काम न मिले तो बेरोज़गारी भत्ता देना अनिवार्य था। लेकिन नयी योजना में बेरोज़गारी भत्ता देने का कोई स्पष्ट, बाध्यताकारी प्रावधान नहीं है, जिससे राज्य की जवाबदेही समाप्त हो जाती है। नयी योजना के तहत बजट आवंटन पर भी बड़ा हमला किया गया है। जहाँ मनरेगा में बजट मज़दूरों की माँग के अनुसार तय होता था, वहीं VB-G RAM G राज्यों के लिए तयशुदा “मानक आवंटन” थोपता है। इसका अर्थ हुआ, पहले किसी राज्य में वहाँ के श्रमिकों द्वारा जितना काम माँगा जाता था, उस अनुसार केन्द्र सरकार पैसा देने के लिए बाध्य थी। अब केन्द्र सरकार एक मानक आवंटन थोप देगी। यदि उस आवंटित राशि से अधिक काम माँगा गया तो अब केन्द्र सरकार की उसे लेकर कोई ज़िम्मेदारी नहीं होगी, यह काम अभ राज्य देखें, वरना श्रमिक कहीं और काम देख लें, उनके रोज़गार की गारण्टी सरकारें नहीं लेती है! तय बजट से ज़्यादा खर्च का बोझ राज्यों पर डालकर दरअसल अब रोज़गार के दिन घटाने की खुली छूट दी जा रही है।
पहले जहाँ केन्द्र सरकार पूरा खर्च वहन करती थी, अब वह खर्च में हिस्सेदारी करेगी। यानी एक हिस्सा केन्द्र सरकार देगी और एक हिस्सा राज्य सरकारों को देने के लिए कहा जायेगा। खर्च साझा करने का अनुपात अधिकांश राज्यों के लिए 60:40 कर दिया गया है, जिसमें केन्द्र सरकार की हिस्सेदार 60% है। अब वे राज्य जो पहले ही मनरेगा बजट के लिए उपेक्षित रहते थे (यानी अधिकतर ग़ैर-भाजपा शासित राज्य), वे अब किस तरह इस खर्च का वहन करेंगे समझा जा सकता है। राज्य सरकारें तो पहले ही इस दिशा में कोई खास दिलचस्पी नहीं लेती थीं। ऐसी स्थिति में राज्य सरकारें अब काम की माँग दर्ज ही नहीं करेंगे, ताकि खर्च न बढ़े। अन्ततोगत्वा इसका असर दूर-दराज़ के ग्रामीण श्रमिकों पर सबसे अधिक पड़ेगा।
मनरेगा के तहत क्या काम कराये जायेंगे यह तय करने का अधिकार ग्राम सभा और पंचायतों का था। अब ग्राम सभा और ब्लॉक लेवल पर निर्धारित होने वाले कामों में हस्तक्षेप के ज़रिये मोदी सरकार इस क़ानून को दरअसल वास्तविकता में निष्प्रभावी बनाने की साज़िश कर रही है। इसके अलावा अब मानरेगा के कामों के देख-रेख के लिए यूनियन या जन संगठनों के प्रतिनिधियों से बनी काउंसिल किसी मतलब की नहीं रहेगी। अब काउंसिल के अलावा एक अधिकारियों की कमिटी इस कार्यक्रम की देख-रेख करेगी और इसका अध्यक्ष मुख्य सचिव या अतिरिक्त मुख्य सचिव होगा।
नयी योजना के तहत अब श्रमिकों की बायोमेट्रिक हाज़िरी लगेगी। उन्हें आधार-आधारित भुगतान किया जायेगा। काम की सैटेलाइट से निगरानी होगी आदि, आदि। दरअसल यह तकनीक के नाम पर श्रमिकों का बहिष्करण होगा। बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण, जियो-रेफरेंसिंग और डिजिटल निगरानी को अनिवार्य कर लाखों मज़दूरों को काम और मज़दूरी से बाहर किया जायेगा जिसके नतीजे NMMS और ABPS में पहले ही सामने हैं। यदि नेटवर्क नहीं रहा या मज़दूर का फिंगर प्रिंट मैच नहीं किया, तो उनकी मज़दूरी अटक जायेगी। ठेकेदार व सरकारी बाबू तकनीकी हवाला देकर अपना पल्ला झाड़ लेंगे। साथ ही, अब कार्यस्थल का समय 12 घण्टे का होगा जबकि नरेगा के तहत 8 घण्टे का था। तो इसका मतलब है कि मनरेगा के तहत जो कार्यदिवस पूर्वाह्न 9 बजे से अपराह्न 5 बजे तक का था, ‘जी राम जी’ में वह पूर्वाह्न 7 से अपराह्न 7 तक होगा।
इस योजना में एक और बड़ी राहत गाँवों के पूँजीपति फार्मरों और धनी किसानों के लिए है। मनरेगा साल भर काम की बात करता था। अब इसमें एक ‘ब्लैकआउट’ फेज़ दिया गया है जिसका लाभ निश्चित तौर पर बड़े व धनी किसानों को होगा। कृषि के चरम मौसम में 60 दिनों का काम निषेध होगा। यानी जिस समय मज़दूर मनरेगा कामों के बरक्स अपने दिहाड़ी के लिए मोल भाव कर सकते थे, अब उनसे यह मोल भाव करने की क्षमता छिनी जा रही है।
VB‑G RAM G कोई सुधार नहीं, बल्कि स्त्री और ग्रामीण मज़दूरों के दशकों के संघर्ष से हासिल किये गये अधिकारों पर हमला है। जिस वक़्त चार लेबर कोड से शहरी व औद्योगिक मज़दूरों व कर्मचारियों को गुलामी की तरफ धकेला जा रहा है, उसी वक़्त ग्रामीण ग़रीबों के रोज़गार की सीमित गारण्टी भी ख़त्म की जा रही है। इसलिए हमें यह समझना होगा कि ग्रामीण और शहरी मज़दूरों के हक़-अधिकारों पर हो रहे इन हमलों की असली दुश्मन पूँजीपतियों की नुमाइंदगी करने वाली फ़ासीवादी मोदी सरकार है। ऐसे में, अब ज़रूरी है कि हम अपनी फ़ौलादी एकता बनाकर संगठित और निर्णायक जवाब दें। आज पूरा मज़दूर वर्ग यदि संगठित और एकजुट होकर खड़ा हो, तभी वह मोदी सरकार को यह स्पष्ट चेतावनी दे सकता है कि वह रोज़गार की गारण्टी (मनरेगा) को ख़त्म करने और मज़दूर-विरोधी श्रम संहिताओं को थोपने की हिमाक़त न करे। यदि हम इन मज़दूर-विरोधी कदमों के ख़िलाफ़ फ़ौरन एकजुट होकर संघर्ष शुरू नहीं करते, यदि हम अनिश्चितकालीन आम हड़ताल का रास्ता अपनाकर सरकार को ये फ़ैसले वापस लेने के लिए बाध्य नहीं करते, तो कल बहुत देर हो जायेगी!
मज़दूर बिगुल, दिसम्बर 2025













