काकोरी ऐक्शन के क्रान्तिकारियों के शहादत दिवस पर
धार्मिक बँटवारे की साज़िशों को नाकाम करो! एकजुट होकर संघर्ष करो!!
ज्ञान
17 और 19 दिसम्बर की तारीख़ को काकोरी ऐक्शन के क्रान्तिकारियों ने अपनी शहादत से अमर बना दिया है। देश के इन चार बहादुर बेटों के नाम थे – राम प्रसाद ‘बिस्मिल’, अशफ़ाक़उल्ला खान, राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी और रोशन सिंह। 9 अगस्त, 1925 को लखनऊ के निकट काकोरी में क्रान्तिकारियों ने ट्रेन में जा रहे अंग्रेज़ी सरकार के ख़ज़ाने को लूट लिया था। यह घटना लूट और अन्याय पर टिकी अंग्रेज़ी हुकूमत के गालों पर एक करारा तमाचा थी। इस घटना से बौखलायी ब्रिटिश सरकार ने इन क्रान्तिकारियों की धरपकड़ शुरू की। इसके बाद 1927 में 17 दिसम्बर के दिन गोण्डा में राजेन्द्र नाथ लाहिड़ी और 19 दिसम्बर को गोरखपुर में राम प्रसाद बिस्मिल, फ़ैज़ाबाद में अशफ़ाक़ उल्ला ख़ान और इलाहाबाद में रोशन सिंह को अंग्रेज़ों ने फाँसी दी थी। कई अन्य क्रान्तिकारियों को काला पानी और कठोर कारावास की सज़ा मिली। चन्द्रशेखर आज़ाद अंग्रेज़ों के हाथ नहीं आये। ये सभी क्रान्तिकारी हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (एचआरए) से जुड़े हुए थे।
आज इन क्रान्तिकारियों की शहादत को लगभग एक सदी पूरा होने वाली है। लेकिन एक सदी बाद भी एचआरए के इन शहीद क्रान्तिकारियों के सपने अधूरे हैं। इन शहीदों ने केवल आवेश में आकर शहादत नहीं दी थी बल्कि उनके पास ऐसा समाज बनाने का सपना था, जो बराबरी और न्याय पर टिका हुआ समाज हो। लेकिन आज हमारे देश में आज़ादी के इतने वर्ष बाद भी बराबरी और न्याय की ये सारी बातें केवल किताबी बातें बनकर रह गयी हैं। इसका अन्दाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अभी हाल में ही आयी ‘ग्लोबल इनइक्वैलिटी रिपोर्ट’ के मुताबिक़ देश की ऊपर की 10% आबादी के पास देश की कुल आय का 40% इकट्ठा होता है जबकि नीचे की 50% आबादी मात्र 15% में गुज़ारा करती है। स्थिति यह है कि शिक्षा, चिकित्सा, रोज़गार जैसे ज़रूरतों को पूरा करना भी बड़ी आबादी के लिए मुश्किल होता जा रहा है। यह हालात विशेष तौर पर पिछले ग्यारह साल के मोदी-शाह राज में बद से बदतर हुए हैं।
एचआरए के इन शहीदों की दूसरी महत्वपूर्ण विरासत थी एक सच्ची धर्मनिरपेक्षता पर टिके समाज की विरासत। राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ और अशफ़ाक़ उल्ला ख़ान दो अलग-अलग धर्मों को मानने वाले क्रान्तिकारी थे, लेकिन राष्ट्रीय मुक्ति आन्दोलन में इन क्रान्तिकारियों ने अपनी दोस्ती से एक मिसाल क़ायम की थी। यह वही दौर था जब अंग्रेज़ ‘फूट डालो, राज करो’ की नीति पर देश की जनता को आपस में ही बाँटने में लगे हुए थे और इस काम में ‘हिन्दू महासभा’ और ‘मुस्लिम लीग’ जैसे संगठन उनका साथ दे रहे थे। ऐसे दौर में हमारे देश के इन क्रान्तिकारियों ने न केवल अंग्रेज़ों की इस नीति का पर्दाफ़ाश किया बल्कि देश की जनता को ऐसी सभी साम्प्रदायिक ताक़तों से सावधान रहने का सन्देश दिया। फाँसी से पहले अपने आख़िरी सन्देश में इन शहीदों ने कहा था – “यदि देशवासियों को हमारे मरने का ज़रा भी अफ़सोस है तो वे जैसे भी हो, हिन्दू-मुस्लिम एकता स्थापित करें। यही हमारी आख़िरी इच्छा थी, यही हमारी यादगार हो सकती है।”
आज देश में सत्ताधारी भाजपा और संघ परिवार ने देश की बड़ी आबादी के बीच में साम्प्रदायिकता का ज़हर घोलने में कोई कोर-कसर नहीं रख छोड़ी है। आज हर छोटे-बड़े मौक़े पर साम्प्रदायिक उन्माद की आग में पूरे देश को झुलसाया जा रहा है। एक तरफ़ धीरेन्द्र शास्त्री जैसे ढोंगी साम्प्रदायिक बाबाओं को साम्प्रदायिक उन्माद भड़काने के नाम पर नफ़रती यात्राएँ और आयोजन करने की खुली छूट दी जा रही है, तो दूसरी तरफ़ राज्य मशीनरी का इस्तेमाल करके साम्प्रदायिक-फ़ासीवादी एजेण्डों को साधा जा रहा है। ऐसे दौर में हमें यह तय करना होगा कि हमारी विरासत अंग्रेज़ों की ‘फूट डालो और राज करो’ की विरासत होगी, जिसे साम्प्रदायिक फ़ासीवादी भाजपा और संघ परिवार आज हमारे देश में आगे बढ़ा रहे हैं या हमारी विरासत वह होगी जो हमें काकोरी ऐक्शन के इन शहीद क्रान्तिकारियों ने सौंपी है। देश के नौजवानों और आम मेहनतकश आबादी को काकोरी ऐक्शन के शहीदों के शहादत दिवस पर उनकी इस विरासत को आगे बढ़ाने का संकल्प लेना चाहिए।
मज़दूर बिगुल, दिसम्बर 2025













