इतिहास का सबक़
इटली में फ़ासीवाद द्वारा मज़दूर वर्ग के अधिकारों पर हमला और मोदी सरकार के ‘चार लेबर कोड’
सनी
मोदी सरकार ने चार श्रम संहिताओं के ज़रिये भारत के मज़दूर वर्ग पर आज़ादी के बाद का सबसे बड़ा हमला किया है। देश के पूँजीपतियों ने 2014 के चुनाव में मोदी-संघ-भाजपा पर दाँव इसलिए ही लगाया था ताकि भारतीय ‘फ़्यूहरर’ द्वारा आर्थिक संकट का बोझ आम मेहनतकश जनता और मज़दूरों पर डाला जा सके। अदानी, अम्बानी, हिन्दुजा, थापर, गोएनका, नारायण मूर्ति आदि पूँजीपतियों ने ‘गुजरात मॉडल’ और उसके रचियता मोदी के क़सीदे इसलिए ही पढ़े थे ताकि फ़ासीवादी हुकूमत उनके मुनाफ़े पर आने वाली आँच को रोक सके। फ़ासीवाद के जिस मॉडल को भारतीय मीडिया ने ‘गुजरात मॉडल’ के चमत्कार के तौर पर पेश किया था वह और कुछ नहीं मुसोलिनी का फ़ासिस्ट-कॉर्पोरेटिस्ट मॉडल ही था जिसमें राज्यसत्ता और कॉर्पोरेट हित एक-दूसरे से घनिष्ठ रूप से नाभिनालबद्ध हो जाते हैं, राज्य द्वारा मज़दूर वर्ग और पूँजीपति वर्ग के बीच वर्ग संघर्ष की जगह वर्ग सहयोग का विचार स्थापित किया जाता है और कॉर्पोरेट घरानों यानी पूँजी को श्रम और प्रकृति के दोहन की खुली छूट दी जाती है।
गुजरात में नरेंद्र मोदी ने श्रम क़ानूनों को अपने मुख्यमंत्री कार्यकाल में कमज़ोर कर दिया था। यही ‘मास्टर स्ट्रोक’ भारत के पूँजीपति वर्ग के मन को भा गया था और उन्होंने 2014 में मोदी से देश स्तर पर यह करने की उम्मीद पाली और मोदी सरकार ने सत्तासीन होते ही अपने आकाओं की इच्छाओं के अनुसार ही श्रम क़ानूनों को ख़त्म करने या फिर निष्प्रभावी बनाने की शुरुआत कर दी थी। 2020 में ही कोरोना महामारी के दौरान जब देश ऑक्सीजन और स्वास्थ्य सेवाओं की कमी के कारण जूझ रहा था तब मोदी सरकार ने इन क़ानूनों को संसद में पारित करवाया। इस साल 21 नवम्बर को मोदी सरकार ने कहा कि ये क़ानून अब 29 श्रम क़ानूनों की जगह लेंगे लेकिन इसके अमल को फ़िलहाल अगले साल के अप्रैल माह तक के लिए टाल दिया गया है। मोदी सरकार द्वारा चार लेबर कोड लाने का मक़सद भारत के पूँजीपति वर्ग द्वारा मनमाने तरीक़े से मज़दूरों का शोषण करने की आज़ादी को पूँजीपतियों-मालिकों का क़ानूनी अधिकार बनाना है। यह भारत के मज़दूरों के बचे-खुचे श्रम अधिकारों को भी ख़त्म कर देने का क़दम है। ये चारों लेबर कोड मालिकों और कॉरपोरेट घरानों, यानी समूचे पूँजीपति वर्ग को मज़दूरों का भयंकर शोषण करने की खुली छूट देते हैं। यह हमला मज़दूर वर्ग पर फ़ासीवादी हमला है।
इतिहास में मुड़कर देखें तो हम पाते हैं कि हर फ़ासिस्ट हुकूमत ने मज़दूर वर्ग पर हमला किया है। इटली और जर्मनी में फ़ासीवाद और नात्सीवाद ने 20वीं शताब्दी के पूर्वार्ध में जब सत्ता हासिल की, तो उनके द्वारा संसद को भंग कर दिया और मज़दूरों के हक़ अधिकारों पर बुलडोज़र चढ़ा दिया गया। इटली में फ़ासीवादी मुसोलिनी ने मज़दूरों के हक़-अधिकारों को किस तरह कुचला इससे सबक़ लेकर हम अपनी लड़ाई को समझ सकते हैं। हालाँकि हमें अपने देश-काल की परिस्थितियों के हिसाब से नयी रणनीतियाँ भी बनानी होगी क्योंकि इक्कीसवीं सदी के फ़ासीवादी उभार की हूबहू तुलना या सादृश्य निरूपण बीसवीं सदी के फ़ासीवादी उभार से करने के अपने राजनीतिक जोखिम हैं। आज फ़ासीवादी शक्तियों को परास्त करना इस देश के मज़दूर वर्ग के सामने उपस्थित प्रधान कार्यभार है। इसलिए हमें यह भी समझना होगा कि आज फ़ासीवादी शक्तियों का उभार बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में उनके उभार के समान कोई आकस्मिक घटना नहीं है। चूँकि साम्राज्यवाद के नव उदारवादी दौर में मन्दी और आर्थिक संकट एक दीर्घकालिक परिघटना बन चुकी हैं इसलिए ही इस दौर में फ़ासीवादी शक्तियाँ पूँजीपति वर्ग की भी एक हद तक स्थायी ज़रूरत बन चुके हैं। यही कारण है कि आज फ़ासीवाद एक सतत जारी परियोजना के तौर पर विद्यमान रहेगा। फ़ासीवाद सत्तासीन हो या न हो वह इस दीर्घकालिक मन्दी के दौर में पूँजीपति वर्ग के हितों की सेवा करता है और मज़दूर वर्ग के हर प्रतिरोध का दमन करता है। इसलिए आज फ़ासीवादी आन्दोलन और राजनीति को बेहतर समझने के लिए हमें इतिहास में 20वीं सदी के फ़ासीवादी आन्दोलन और राजनीति का भी अध्ययन करना होगा।
इटली में फ़ासीवादी आन्दोलन की शुरुआत 1919 में हुई थी। फ़ासीवादी उभार क्रान्तिकारी मज़दूर आन्दोलन की हार के बाद पैदा हुआ। पहले विश्वयुद्ध में युद्ध में क्षति उठाने के बावजूद भी इटली के पूँजीपति वर्ग को अपेक्षित “पुरस्कार” नहीं मिला था। देश के निम्न मध्य वर्ग और सैनिकों में प्रतिक्रिया का माहौल था। आर्थिक संकट के चलते यह प्रतिक्रिया फ़ासीवादी प्रतिक्रिया में तब्दील हो सकती थी। आर्थिक संकट के कारण मुनाफ़े के कम होने पर पूँजीपति वर्ग ने मुसोलिनी की फ़ासिस्ट पार्टी को अपना समर्थन दे दिया। मुसोलिनी पहले इतालवी समाजवादी पार्टी में शामिल था। 1903 से 1914 तक वह समाजवादी पार्टी का एक महत्वपूर्ण नेता था। उसने ख़ुद फ़ासिस्ट पार्टी के संगठन के तौर-तरीक़े यहीं सीखे। मुसोलिनी ने समाजवादी पार्टी छोड़ दी और वह बाद में जॉर्ज सोरेल नामक एक संघाधिपत्यवादी चिन्तक और फ्रेडरिख नीत्शे नामक प्रतिक्रियावादी जर्मन दार्शनिक के प्रभाव में आया। इन “विचारों का मेल करके ही इटली में जेण्टाइल नामक फ़ासीवादी चिन्तक की सहायता से मुसोलिनी ने पूरे फ़ासीवादी सिद्धान्त की रचना की। यह सिद्धान्त मज़दूर-विरोधी, पूँजी के पक्ष में खुली तानाशाही, अधिनायकवाद, जनवाद-विरोध, कम्युनिज़्म-विरोध और साम्राज्यवादी विस्तार की खुले तौर पर वकालत करता था।” (अभिनव, 2010, फ़ासीवाद क्या है और इससे कैसे लड़ें?)
फ़ासीवादी पार्टी ने 1919 से ही स्वतंत्र और कम्युनिस्टों से सम्बद्ध यूनियनों और उनके प्रतिनिधियों पर खुलेआम हमले करने शुरू कर दिये। डेनियल गेरों ने इटली में फ़ासीवाद पर चर्चा करते हुए बताया कि सबसे पहले फ़ासीवाद ने इटली में खेतिहर मज़दूर यूनियनों पर हमला किया। खेतिहर मज़दूरों की ‘रेड लीग’ यूनियन के दफ़्तरों और खेतिहर मज़दूरों के को-ऑपरेटिव के दफ़्तरों को तहस-नहस किया गया। इस काम में फ़ासीवादियों को बड़े भूस्वामियों का समर्थन मिला। मुसोलिनी ने ख़ुद बताया कि फ़ासिस्ट यूनियन क्रान्तिकारी ट्रेड यूनियनों पर हमला करके स्थापित हुई थी। बकौल मुसोलिनी: “यूनियनें कैसे पैदा हुई थीं? जन्म तिथि: 1921, स्थान: पो वैली, परिस्थितियाँ: क्रान्तिकारी दुर्गों की तबाही और फतह।” (मुसोलिनी द्वारा 1926 में सीनेट को दिये भाषण से और डेनियल गेरों द्वारा अपनी पुस्तक ‘फ़ासिज़्म एण्ड बिग बिज़नेस’ में उद्धृत)
मालिकों और फ़ासिस्टों ने मज़दूरों को फ़ासिस्ट यूनियन की सदस्यता लेने पर भी मजबूर किया। भूस्वामियों ने फ़ासिस्ट यूनियन से जुड़े मज़दूरों को काम देकर फ़ासिस्ट यूनियन को बढ़ावा दिया। इस दौरान फ़ासिस्टों ने कुछ यूनियन नेताओं को भी मरवाया। फ़ासिस्ट संगठनों ने भूस्वामियों के साथ मिलकर प्रवासी मज़दूरों को कम मज़दूरी पर काम पर रखवाया और स्वतंत्र और क्रान्तिकारी यूनियनों के भूस्वामियों के साथ कॉण्ट्रैक्ट ख़त्म कर दिये गये। हालाँकि, औद्योगिक मज़दूरों के बीच फ़ासिस्ट सत्ता हासिल करने के बाद ही अपनी पकड़ बना पाये। 1922 ‘रोम पर चढ़ाई’ कर फ़ासिस्टों ने इटली में अपनी सरकार बना ली थी। इसके बाद फ़ासिस्टों ने पुलिस और मालिकान के संरक्षण में जमकर ‘रेड यूनियनों’ पर हमले किये। 1923 में फ़ासिस्ट सरकार ‘फ़ासिस्ट ग्रैण्ड काउंसिल’ ने मालिकों की एसोसिएशन (जनरल फेडेरेशन ऑफ़ इण्डस्ट्री) को फ़ासिस्ट यूनियनों से सम्बन्ध बनाने का प्रस्ताव रखा। इसके आधार पर ही “कीगी पैलेस” समझौता सम्पन्न हुआ जिसमें मालिकों ने फ़ासिस्ट यूनियनों को आधिकारिक स्वीकृति दे दी। 1924 में सरकार ने स्थानीय प्रशासन को यह ताक़त भी दे दी कि वे किसी भी यूनियन के नेता को यूनियन से निकाल सकते थे। साथ ही प्रशासनिक अधिकारियों को यह शक्ति भी मिली कि वे भंग की गयी यूनियनों के दफ़्तर और सम्पत्ति को ज़ब्त कर सकते थे।
इसके बाद भी फ़ासिस्ट ताक़तें यूनियनों और उनकी शक्ति को पूरी तरह नष्ट नहीं कर पायी थीं। 1925 में फ़ासिस्टों ने मज़दूरों पर हमले को नये चरण में पहुँचाया और मज़दूर वर्ग की संगठित शक्ति को पूरी तरह कुचलने का काम किया। 1925 में “विडोनी पैलेस” समझौते में पूँजीपतियों ने फ़ासिस्ट यूनियनों के साथ समझौता कर उन्हें यूनियन प्रतिनिधित्व का एकाधिकार प्रदान किया। फ़ैक्ट्री समितियों को भंग कर दिया गया। हड़ताल करने का हक़ ख़त्म कर दिया गया और स्वतन्त्र यूनियनों की सम्पत्ति ज़ब्त कर ली गयी। 1926 तक आते-आते फ़ासिस्ट यूनियनों के अलावा सभी यूनियनों को प्रतिबन्धित कर दिया गया और श्रम संघों को भंग कर दिया गया। फ़ासिस्ट यूनियनों को सरकारी संस्था बना दिया गया और इन्हें केवल नाम के स्तर पर सक्रिय रखा गया।
मुसोलिनी ने 11 मार्च, 1926 में अपने भाषण में कहा था: “फ़ासिस्ट यूनियनवाद एक रोबदार शक्ति है, एक शक्तिशाली जन आन्दोलन जो पूरी तरह फ़ासीवाद और सरकार द्वारा नियंत्रित है और एक ऐसा जन आन्दोलन है जो आज्ञा का पालन करता है।” (डेनियल गेरों द्वारा अपनी पुस्तक ‘फ़ासिज़्म एण्ड बिग बिज़नेस’ में उद्धृत)
इस दौरान राज्य ही मज़दूरों और पूँजीपतियों के बीच एकमात्र मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा था और खुले तौर पर पूँजीपतियों के पक्ष में नीतियाँ बनायी गयी। लेबर कोर्ट से लेकर मध्यस्थता की संस्थाएँ मालिकों के पक्ष में काम करती थीं। मुसोलिनी ने स्वयं पूँजीपतियों की फ़ेडेरेशन के अध्यक्ष से इस तथ्य को स्वीकारते हुए कहा: “मिस्टर बेन्नी जब तक मैं सत्ता में हूँ, मालिकों को श्रम न्यायालयों से घबराने की ज़रूरत नहीं है।” (डेनियल गेरों द्वारा अपनी पुस्तक ‘फ़ासिज़्म एण्ड बिग बिज़नेस’ में उद्धृत)
1927 में ‘लेबर चार्टर’ लागू किया जिसमें मज़दूरों के अधिकारों को पूरी तरह बुलडोज़र चलाकर कुचल दिया गया। पूँजीपतियों की फ़ेडेरेशन ने इस क़दम का ज़ोर-शोर से स्वागत किया। इस दौर में दूसरी तरफ़ बड़ी पूँजी के ऊपर से कर ख़त्म किये जा रहे थे और पब्लिक सेक्टर कम्पनी और सरकारी सम्पत्ति को कौड़ी के भाव में पूँजीपतियों को दिया जा रहा था। ‘लेबर चार्टर’ के तहत हर कम्पनी और सेक्टर में फ़ासिस्ट यूनियन को मिलाकर कॉर्पोरेशन्स बनायी गयी। इन कॉर्पोरेशनों में “मालिक और मज़दूरों को मिलकर” राष्ट्र के लिए उत्पादन करना था। इसके तहत मज़दूरों को सैन्य अनुशासन में काम करना पड़ता था। मालिक को यह हक़ मिल गया कि वह अपनी फ़ैक्ट्री में ख़ुद वेतन तय कर सकता था और जो वह तय करेगा वह मज़दूरों के लिए क़ानूनी रूप से बाध्यताकारी था। केवल फ़ासिस्ट पार्टी से जुड़ी एक छोटी सी मज़दूर आबादी को वेतन और अन्य सुविधाओं का फ़ायदा मिला और बाक़ी मज़दूर आबादी रोम के आधुनिक ग़ुलामों की तरह फ़ासिस्ट इटली में खटती रही। यूनियन के प्रतिनिधि भी फ़ासिस्ट पार्टी द्वारा चुने जाते थे। साथ ही, फ़ासीवाद ने मज़दूरों को फ़ासीवादी यूनियनों और कॉर्पोरेशन में नियंत्रित रखने और उन्हें किसी भी क़िस्म से क्रान्तिकारी राजनीति से जुड़ने से रोकने की पुरज़ोर कोशिश की।
फ़ासीवाद ने मुसोलिनी के नेतृत्व में मज़दूरों की यूनियनों को तबाह किया, फ़ैक्ट्री में मज़दूरों के प्रतिनिधित्व को ख़त्म कर दिया, यूनियन के कॉण्ट्रैक्ट को ख़त्म कर दिया, हड़ताल के हक़-अधिकारों को ख़त्म कर दिया और वेतन तय करने का प्राधिकार मालिकों के हाथ में चला गया। यह तब तक चलता रहा जब तक कि इटली की जनता ने मुसोलिनी की हुकूमत को उखाड़ नहीं फेंका और उसे मारकर उसकी लाश को चौराहे पर लटका दिया।
भारत में चार श्रम संहिताओं के ज़रिये मोदी सरकार ने हड़ताल के अधिकार पर हमला किया है तथा यूनियन बनाने के हक़ को कमज़ोर कर दिया है। इटली में फ़ासिस्ट यूनियन की तर्ज़ पर ही भारत में ‘भारतीय मज़दूर संघ’ को फ़ासीवादियों द्वारा खड़ा किया है जो पूरी तरह से एक सरकारी यूनियन ही है। इटली के उदाहरण से भारत में समानता साफ़ देखी जा सकती हैं लेकिन भारत के फ़ासिस्टों को यह याद है कि मुसोलिनी का अन्त में क्या हश्र हुआ था! इतिहास से सबक़ लेते हुए इसलिए उन्होंने इटली की तरह संसद, जनवादी संस्थाओं का और श्रम क़ानूनों का समूल नाश नहीं किया है। लेकिन आज के दौर में फ़ासीवादियों द्वारा पूँजीवादी राज्यसत्ता की जनवादी अन्तर्वस्तु को लगातार नष्ट करते हुए भी इसके खोल को बरक़रार रखने के वस्तुगत कारण भी हैं। आज के नवउदारवादी पूँजीवाद के दौर में पूँजीवादी राज्यसत्ता में उतनी भी जनवादी सम्भावनाएँ बची नहीं जितनी कि बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में थीं और उन्हें ध्वस्त करना भी इसलिए फ़ासीवादी शक्तियों के लिए आवश्यक नहीं रह गया है।
भारत में श्रम क़ानूनों को ख़त्म कर चार लेबर कोड लागू करना मज़दूर वर्ग पर फ़ासीवादी हमला ही है जिसे मोदी सरकार हिटलर और मुसोलिनी की ही तरह लागू कर रही है, हालाँकि हूबहू उस तरह नहीं जैसे मुसोलिनी ने किया। इन फ़ासिस्टों को चार लेबर कोड वापस लेने के लिए मजबूर करने के लिए हमें सड़कों पर उतारने के लिए तैयार होना होगा। अब समय है कि संगठित-असंगठित क्षेत्र के मज़दूर साथ आकर अनिश्चितकालीन हड़ताल कर फ़ासिस्ट सरकार को इन लेबर कोड को वापस लेने पर मजबूर करे। साथ ही, हम मज़दूरों को इतिहास की लड़ाइयों से सबक़ लेकर फ़ासिस्टों को निर्णायक तौर पर हराने के लिए भी तैयारी करनी होगी। बीसवीं शताब्दी में फ़ासिस्टों को नेस्तनाबूत करने का काम मज़दूर वर्ग के लौह-मुष्ठ ने ही किया था और 21वीं सदी में भी यह मज़दूर वर्ग ही है जो फ़ासीवादी साँप के फन को कुचलेगा।
मज़दूर बिगुल, दिसम्बर 2025













