Category Archives: मज़दूर बस्तियों से

बनारस की दालमण्डी में विनाशलीला रचता योगी सरकार का साम्प्रदायिक फ़ासीवादी बुलडोज़र

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार का साम्प्रदायिक फ़ासीवादी बुलडोज़र “विकास” की एक और परियोजना अंजाम देने में जुटा हुआ है। बनारस के दालमण्डी इलाक़े की मुख्य सड़क को चौड़ा करने के बहाने सारी दुकानों को ध्वस्त किया जा रहा है। पूरा मीडिया का तंत्र इस कार्रवाई की चटखारे ले-लेकर रिपोर्टिंग करने में लगा हुआ है। अख़बारों से लेकर टीवी चैनलों तक लगातार दालमण्डी के सवाल पर इस तरह से रिपोर्टिंग की जा रही है जिससे इसके ज़रिये अधिकतम सम्भव साम्प्रदायिक उन्माद पैदा किया जा सके। विरोध करने वालों की धार्मिक पहचान को विभिन्न तरीक़ों से मुद्दा बनाकर प्रचारित किया जा रहा है। जिस परियोजना को योगी सरकार अपनी सरकारी मशीनरी के दम पर रातों-रात अंजाम दे सकती है, उसे कई महीनों से जानबूझकर धीरे-धीरे अंजाम दिया जा रहा है ताकि साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण का तन्दूर लम्बे समय तक गर्म रखा जा सके।

बढ़ रहे प्रदूषण के बीच मोदी सरकार की जुमलेबाज़ी और ख़राब होते मज़दूर वर्ग के हालात

भारत के कई शहर एक घने, ज़हरीले धुएँ की चादर से ढके हुए हैं जिससे आँखों में जलन और गले में खराश हो रही है। यह ज़हर न उम्र देखता है, न जाति-धर्म, न ही शक्ल-सूरत—यह लगातार साँस के ज़रिये हर किसी के फेफड़ों में समा रहा है। हाँ, एक तबका जिसके पास आर्थिक सामर्थ्य है वह इससे बचने की तात्कालिक कोशिशें ज़रूर कर रहा है। हाल के आँकड़े बताते हैं कि दिल्ली-एनसीआर में एयर प्यूरीफ़ायर की बिक्री में 72% की बढ़ोतरी हुई है, वहीं महाराष्ट्र 12% के साथ दूसरे स्थान पर रहा है। यानी बढ़ रहे प्रदूषण से फ़ायदा भी पूँजीपतियों को ही हो रहा है! कुछ ऐसे भी लोग हैं जो फिलहाल शहर छोड़कर पहाड़ियों और समन्दर के किनारे बसने चले गये हैं। ज़ाहिरा तौर पर प्रदूषण के दुष्प्रभावों से बचने की ऐसी कोशिशें देश की बहुसंख्यक मेहनतकश आबादी के लिए सम्भव नहीं।

दिल्ली का जानलेवा प्रदूषण और आँगनवाड़ी केन्द्रों, बच्चों व आँगनवाड़ीकर्मियों के प्रति सरकार की अनदेखी!!

दिल्ली की आँगनवाड़ियों में लाखों बच्चे रोज़ाना जाते हैं लेकिन उनके प्रति सरकार पूरी तरह से आँख मूँद कर बैठी है! वायु प्रदूषण के बढ़ते ही सीएम ऑफ़िस के लिए 5.5 लाख के ‘एयर प्यूरिफ़ायर’ ख़रीद लिये जाते हैं लेकिन आँगनवाड़ियों और स्कूलों को खुला रखकर बच्चों को मरने के लिए छोड़ दिया जाता है। वायु प्रदूषण की चपेट में सबसे अधिक मेहनतकश आबादी और उनके घरों से आने वाले बच्चे आते हैं क्योंकि न तो उनके लिये एयर प्यूरीफ़ायर है, ना ही वे बेहतर पोषण हासिल कर सकते हैं और बीमार पड़ने पर न उन्हें बेहतर चिकित्सा सुविधा मिल पाती है। आँगनवाड़ी में जाने वाले अधिकांश बच्चे मज़दूरों-मेहनतकशों या निम्न-मध्यम वर्गीय परिवारों से आते हैं जिनके लिए उपरोक्त कारणों की वज़ह से इस जानलेवा प्रदूषण से बचने का कोई विकल्प सरकार ने नहीं छोड़ा है! आँगनवाड़ी केन्द्रों, बच्चों व आँगनवाड़ीकर्मियों के प्रति यह लापरवाही एक बार फ़िर भाजपा सरकार के जन-विरोधी, आँगनवाड़ीकर्मी-विरोधी चेहरे को हमारे सामने उजागर करती है।

आपस की बात – दिहाड़ी मज़दूरों की जिन्दगी!

मैं एक भवन निर्माण मज़दूर हूँ। मैं बिहार से रोजी-रोटी के लिए दिल्ली आया हूँ। यहाँ मुश्किल से 30 दिनों मंे 20 दिन ही काम मिल पाता है। जिसमें भी काम करने के बाद पैसे मिलने की कोई गारन्टी नहीं होती है। कहीं मिल जाते हैं तो कहीं दिहाड़ी भी मार ली जाती है। कोई-कोई मालिक तो जबरन पूरा काम करवाकर पैसे पूरे नहीं देते हैं और ज़्यादा समय तक काम करने पर उसका अलग से मज़दूरी भी नहीं देते हैं।

फ़ासिस्ट भाजपा और संघ के साम्प्रदायिक एजेण्डा और अम्बेडकर अस्पताल की आपराधिक लापरवाही के कारण नौजवान की मौत

इस घटना से यह बात स्पष्ट है। “हिन्दू हितैषी” होने का दावा करने वाली फ़ासीवादी भाजपा सरकार में एक “हिन्दू” बच्चा इलाज के बिना तड़प-तड़पकर अपना दम तोड़ देता है लेकिन ये सरकार उसको इलाज तक मुहैया नहीं कराती! कोई विधायक या सांसद इलाक़े में झाँकने तक नहीं आते हैं! साफ़ है कि आरएसएस और भाजपा हिन्दू धर्म का हवाला देकर सिर्फ़ और सिर्फ़ हमारा फ़ायदा उठाना चाहते हैं, धर्म के नाम पर हमें बाँटना चाहती है और आम मेहनतकश आबादी के युवाओं को अपनी साम्प्रदायिक फ़ासीवादी राजनीति का एक मोहरा बनाना चाहती है। हमारे इलाक़े में आरएसएस अपने साम्प्रदायिक ऐजेण्डे को पूरा करने के लिए ऐसे कार्यक्रम आयोजित करवाता रहता है, हमें “धर्म” और “राष्ट्र” की पट्टी पढ़ाता है। लेकिन साम्प्रदायिक फ़ासीवादी “राष्ट्र” ग़रीब मेहनतकशों की जगह क्या है, वह तमाम घटनाओं से रोज़-ब-रोज़ ज़ाहिर होता ही रहता है और इस घटना से भी ज़ाहिर हो गया।

पंजाब में प्रवासियों के ख़िलाफ़ भड़कायी जा रही नफ़रत से किसको होगा फ़ायदा ?

तर्क-विवेक और न्यायबोध को एक ओर रखकर एक प्रवासी मज़दूर के दोष का ठीकरा सभी प्रवासियों पर फोड़ा जाने लगा। देखते-देखते पंजाब में रहने वाले लाखों प्रवासी श्रमिकों में भय की लहर दौड़ गयी और उन्हें डर के साये में धकेल दिया गया। यह पूरा मामला दर्शाता है कि लोगों की निम्न राजनीतिक चेतना का फ़ायदा उठाकर उनका ध्यान उनके असली मुद्दों से भटकाना कितना आसान है।

दिल्ली के शाहाबाद डेरी इलाक़े में छठ घाट पर डूबने से युवक की मौत

यह घाट बारिश के मौसम में नाले और बरसात के पानी से भर जाता है। बार-बार प्रशासन को बोलने के बावजूद इसपर कोई कार्रवाई नहीं की जाती। पाँच मन्दिर, शाहबाद डेरी में झुग्गियों के पीछे खुला मैदान स्थित है। यहाँ लोग पूरे दिन फैक्टरियों, कारखानों, और कोठियों में खटकर आने के बाद इस गर्मी और उमस के मौसम में बाहर टहलते हैं। कोई खुली जगह न होने के कारण बच्चे इसी पाँच मन्दिर के मैदान में खेलते-कूदते हैं। कुछ घटनाएँ ऐसी भी सामने आई जहाँ बच्चे तालाब में डूबते-डूबते बचे हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए इस तालाब को नियमित तौर पर खाली करवाये जाने की माँग भी ज्ञापन में रखी गयी ताकि तालाब में डूबने से लेकर बीमारियों के पनपने के ख़तरे को टाला जा सके। इसके साथ ही यह माँग भी उठायी गयी कि तालाब के इर्द-गिर्द सुरक्षा हेतु चारदीवारी बनायी जाये और ख़राब पड़ी लाइट को जल्द से जल्द ठीक कराया जाये।

शाहबाद डेरी में घरेलू कामगार महिलाओं को शिक्षित-प्रशिक्षित करने के लिए चल रही है दिल्ली घरेलू कामगार यूनियन की रात्रि पाठशाला

घरेलू कामगार महिलाओं में से अधिकतर महिलाएँ अशिक्षित हैं। इसलिए दिल्ली घरेलू कामगार यूनियन द्वारा महिलाओं को राजनीतिक रूप से शिक्षित-प्रशिक्षित करने के लिए यूनियन पाठशाला और अक्षर ज्ञान सिखाने के लिए रात्रि पाठशाला का आयोजन किया जा रहा है। यहाँ अक्षरज्ञान महज़ साक्षरता का प्रश्न नहीं है, बल्कि अपने आप को मुक्त करने के बारे में ज्ञान को प्राप्त करने का रास्ता है, उसका औज़ार है। लेकिन यूनियन पाठशाला में महज़ पढ़ना-लिखना ही नहीं सिखाया जाता है। यूनियन पाठशाला में देश-दुनिया के तमाम ज़िन्दा सवालों पर बातचीत की जाती है। जिस समाज में हम रहते हैं वह हमें चीज़ों को शासक वर्ग के नज़रिये से देखने का आदी बना देता है। इसमें स्कूल, कॉलेज, धर्म, मीडिया, क़ानून आदि सबका हाथ होता है। ये सभी शासक वर्ग की विचारधारा के उपकरण हैं और हमें शासक वर्ग के नज़रिये से दुनिया को देखने की आदत डलवाते हैं।

‘बंगलादेशी घुसपैठियों’ के नाम पर देशभर में मेहनतकश ग़रीब जनता पर पुलिस, प्रशासन और संघी संगठनों की गुण्डागर्दी व बर्बरता

पहली बात तो यह कि हर वह व्यक्ति जो इस देश में रहता है या आता है, सिर्फ़ पेट लेकर नहीं आता बल्कि दो हाथ भी लेकर आता है और मेहनत-मशक्क़त करता है और अपने हक़ का खाता है, वह यहाँ बस सकता है क्योंकि वह परजीवी नहीं बल्कि इसी समाज में अपने श्रम से भौतिक सम्पदा का सृजन कर रहा है। अगर किसी बंगलादेशी को देश से बाहर करना चाहिए तो वह बंगलादेश की ज़ालिम भूतपूर्व शासक शेख़ हसीना है, जिसे भारत की मोदी सरकार ने पनाह दे रखी है! वह तो बस यहाँ ऐश कर रही है! लेकिन निशाना मज़दूरों को बनाया जा रहा है, जिनमें से अधिकांश तो बंगलादेश से आये भी नहीं हैं, वे बस मुसलमान हैं और बांग्लाभाषी हैं।

हिण्डन नदी के किनारे बसे नोएडा-ग्रेटर नोएडा में लाखों लोग भीषण गर्मी में बिना बिजली के रहने को मजबूर!

दरअसल पूँजीवादी व्यवस्था में सरकार-प्रशासन से लेकर धन्नासेठों-अमीरज़ादों की जमातों तक मेहनतकश आबादी को इन्सान समझा ही नहीं जाता। इनके लिए ये बस काम करने वाली चलती-फिरती मशीन हैं, 12-14 घण्टे मज़दूरी करने वाले ग़ुलाम हैं और इसलिए ये मज़दूरों को कीड़े-मकोड़ों की तरह जीने के लिए छोड़ देते हैं। सत्ता में चाहे किसी भी चुनावबाज़ पार्टी की सरकार आ जाये, ये सभी तमाम अमीरों और पूँजीपतियों से चन्दे लेते हैं और इसलिए जीतकर आने के बाद तन-मन-धन से उनकी ही सेवा में लगे होते हैं। लेकिन इनमें भी फ़ासीवादी भाजपा यह काम सबसे अधिक तत्परता के साथ करती है और उत्तर प्रदेश की योगी सरकार तो इसमें काफ़ी ज़्यादा माहिर है। इसी का फ़ायदा तमाम बिचौलिये, दलाल और बाहुबली उठाते हैं जो लोगों की मजबूरी का इस्तेमाल कर अपना निजी फ़ायदा निकालते हैं। इन इलाक़ों में तो स्थानीय बाहुबली भी भाजपा का ही सदस्य है।