ईरान में तख़्तापलट की कोशिश में नाकाम रहने के बाद अमेरिका अब हमला करके पूरे क्षेत्र को युद्ध की आग में झोंकने पर आमादा
बेशक ईरान में जारी उथल-पुथल की जड़ में वहाँ के समाज का आन्तरिक संकट ही है। परन्तु इस संकट के गहराने में और उसका फ़ायदा उठाकर वहाँ अराजकता फैलाने में साम्राज्यवादी ताक़तों की भूमिका को कतई नज़रअन्दाज़ नहीं किया जा सकता। ग़ौरतलब है कि डोनाल्ड ट्रम्प ने अमेरिकी राष्ट्रपति के अपने पहले कार्यकाल में ही अमेरिका और ईरान के बीच 2015 में हुए नाभिकीय समझौते को निरस्त कर दिया था और ईरान के ऊपर पाबन्दियाँ थोप दी थीं। उसके बाद यूरोपीय साम्राज्यवादी देशों ने भी ईरान पर प्रतिबन्ध लगा दिये थे। चूँकि ईरान की अर्थव्यवस्था का आधार स्तम्भ तेल व गैस का निर्यात है इसलिए अमेरिका व यूरोपीय देशों द्वारा थोपे गये प्रतिबन्धों की वजह से वहाँ की अर्थव्यवस्था में पहले से जारी संकट और गहराता गया है। पिछले साल इज़रायल और ईरान के बीच 12 दिनों तक चली जंग और फिर ईरान पर अमेरिकी हमले की वजह से वहाँ राजधानी तेहरान सहित कई शहरों में बुनियादी ढाँचा और तमाम इमारतें ध्वस्त हो गयीं जिसकी वजह से आर्थिक संकट और तीखा हो गया। उसके पहले पश्चिमी एशिया में ईरान के सहयोगियों की हार या उनके कमज़ोर होने की वजह से रणनीतिक दृष्टि से भी ईरान कमज़ोर हुआ है। सीरिया में बशर अल असद की सत्ता के पतन और लेबनॉन में हिज़बुल्लाह के कमज़ोर होने की वजह से पश्चिमी एशिया में ईरान के वर्चस्व में कमी आयी है। हालाँकि ईरान की निकटता रूस व चीन की साम्राज्यवादी धुरी से है और ये दोनों साम्राज्यवादी देश उसे हथियारों, सैन्य उपकरणों और सैटेलाइट तस्वीरों के ज़़रिये मदद करते हैं, हालाँकि इसकी सम्भावना फिलहाल कम है कि वे खुलकर ईरान के पक्ष में युद्ध में उतरेंगे।






















