वेनेज़ुएला पर अमेरिकी साम्राज्यवादी हमला
ट्रम्प के ज़रिये उजागर हो रहा है साम्राज्यवाद का बर्बर मानवद्रोही चेहरा
आनन्द
नये साल की शुरुआत में ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने दुनिया को अपने ख़तरनाक मंसूबों की झलक दिखला दी जब 3 जनवरी को अमेरिका ने वेनेज़ुएला की राजधानी काराकास सहित उसके कई शहरों पर ताबड़तोड़ बमबारी करके वहाँ के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी को उनके आवास से अगवा कर लिया। मादुरो और उनकी पत्नी पर नशीले पदार्थों की तस्करी के फ़र्जी आरोप में न्यूयॉर्क में मुक़दमा चलाया जा रहा है। ऐसा नहीं है कि अमेरिका ने पहली बार किसी दूसरे देश की सम्प्रभुता की धज्जियाँ उड़ायी हैं; अमेरिकी साम्राज्यवाद द्वारा दूसरे देशों पर बर्बर हमले करने, तख़्तापलट करवाने, दूसरे देशों के राष्ट्राध्यक्षों की हत्याएँ करवाने और उनको अगवा कराने का लम्बा इतिहास रहा है। वेनेज़ुएला पर किये गये मौजूदा हमले से पहले अमेरिका अकेले लातिन अमेरिका के देशों में 56 बार सैन्य हस्तक्षेप कर चुका है। परन्तु अब तक अमेरिका किसी दूसरे देश पर हमला करने के लिए किसी ‘महान ध्येय’ जैसे “लोकतन्त्र की स्थापना” या “आतंकवाद के ख़िलाफ़ जंग” का स्वांग रचता था और इस प्रकार अपने बर्बर कृत्य को जायज़ ठहराने की कोशिश करता था। लेकिन ट्रम्प काल में अमेरिकी साम्राज्यवाद दुनिया भर में अपनी दादागिरी दिखाने के लिए किसी प्रकार का ढोंग करने की भी कोई ज़रूरत नहीं समझ रहा है। ट्रम्प ख़ुले आम अन्तरराष्ट्रीय क़ानूनों को धता बताते हुए आये दिन किसी न किसी देश को धमकी दे रहा है। कभी उसके निशाने पर ग्रीनलैण्ड रहता है तो कभी क्यूबा, मेक्सिको या कोलम्बिया। वैसे देखा जाये तो संयुक्त राष्ट्र संघ और अन्तरराष्ट्रीय क़ानून पहले भी अपनी प्रासंगिकता लगातार खोते जा रहे थे, परन्तु ट्रम्प ने अपने करतूतों से इनको बिल्कुल ही बेमतलब बना दिया है।
वेनेज़ुएला पर अमेरिकी हमले की जानकारी दुनिया को देते हुए ट्रम्प ने निहायत ही बेशर्मी से कहा कि मादुरो को सत्ता से हटाने के बाद अब अमेरिका वेनेज़ुएला के शासन-प्रशासन की बागडोर अनिश्चित काल के लिए अपने हाथ में लेगा और वहाँ के तेल संसाधनों पर अपना नियन्त्रण क़ायम करेगा और अमेरिकी तेल कम्पनियाँ वेनेज़ुएला का तेल दुनियाभर में बेचेंगी। इस प्रकार ट्रम्प काल में साम्राज्यवाद के बर्बर मानवद्रोही चेहरे पर कोई पर्दा नहीं रह गया है और उसका असली रूप दुनिया के सामने है। मज़े की बात तो यह है कि साम्राज्यवाद का यह सनकी सरगना ख़ुद को “शान्ति का मसीहा” बताता है और आये दिन दुनिया में शान्ति क़ायम करने के लिए ख़ुद की पीठ थपथपाता रहता है!
वेनेज़ुएला पर अमेरिकी साम्राज्यवादी हमले की वजह
ट्रम्प ने वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी पर नशीले पदार्थों की तस्करी में शामिल होने का हास्यास्पद आरोप लगाया है। हालाँकि सभी जानते हैं कि यह इस शर्मनाक साम्राज्यवादी अपहरण को क़ानूनी जामा पहनाने की तिकड़म से ज़्यादा कुछ नहीं है। अमेरिका की कई संस्थाएँ ख़ुद इस बात की तस्दीक़ करती हैं कि अमेरिका में हो रही नशीले पदार्थों की तस्करी में वेनेज़ुएला की सरकार की कोई भूमिका नहीं है। यह आरोप बस अमेरिका में मादुरो पर मुक़दमे का ड्रामा करने के लिए लगाया गया है। मज़े की बात यह है कि अभी हाल ही में ट्रम्प ने एक अन्य लातिन अमेरिकी देश होन्दुराज़ के एक पूर्व राष्ट्रपति, जो कोकेन की तस्करी के मामले में अमेरिकी जेल में क़ैद था, को माफ़ी दे दी थी! इस प्रकरण से यह ज़ाहिर होता है कि ट्रम्प को अमेरिका में नशीले पदार्थों की तस्करी से कोई ख़ास दिक़्क़त नहीं है। वेनेज़ुएला पर हमले की असली वजह ट्रम्प ने ख़ुद बतायी जब उसने कहा कि हम वेनेज़ुएला के तेल संसाधनों पर नियन्त्रण करके उसे बेचेंगे और पैसा कमायेंगे।
ग़ौरतलब है कि वेनेज़ुएला में विश्व के किसी भी अन्य देश से ज़्यादा (300 अरब बैरल से अधिक) तेल के ज्ञात भण्डार हैं। तेल के अकूत भण्डार की ही वजह से अमेरिकी साम्राज्यवाद की गिद्ध दृष्टि वेनेज़ुएला पर रही है। दो दशक पहले वेनेज़ुएला के तत्कालीन राष्ट्रपति ह्यूगो चावेज़ द्वारा एक्सॉनमोबिल और शेवरॉन जैसी अमेरिकी तेल कम्पनियों को वेनेज़ुएला से निकाल बाहर करने के बाद से वेनेज़ुएला अमेरिकी राष्ट्रपतियों की आँख की किरकिरी बना हुआ था। मादुरो का अपहरण करवाकर ट्रम्प ने यह दिखला दिया है कि वह अमेरिकी साम्राज्यवादी हितों को साधने के लिए किसी भी अन्य अमेरिकी राष्ट्रपति से ज़्यादा बेशर्म कारनामे अन्जाम देने की कूव्वत रखता है।
वेनेज़ुएला पर अमेरिकी साम्राज्यवादी हमले को साम्राज्यवादी दुनिया में लगातार तीखी होती अन्तरसाम्राज्यवादी प्रतिस्पर्द्धा की रोशनी में भी देखने की ज़रूरत है। अब इसमें कोई विवाद नहीं है कि पिछले दो दशकों के दौरान चीन व रूस के नेतृत्व में उभरे साम्राज्यवादी धड़े के सामने अमेरिकी साम्राज्यवाद आर्थिक दृष्टि से लगातार कमज़ोर पड़ता जा रहा है। मैन्युफ़ैक्चरिंग के क्षेत्र में चीन पहले ही अमेरिका को पछाड़ चुका है और वह इलेक्ट्रिक वाहनों, रोबोटिक्स, आर्टिफ़िशियल इण्टेलिजेंस और हाईटेक जैसे क्षेत्रों में भी अमेरिका को कड़ी टक्कर दे रहा है। अमेरिका और चीन के बीच जारी व्यापार युद्ध भी इस अन्तर-साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्द्धा में अमेरिका के पिछड़ने का ही नतीजा है। अमेरिकी साम्राज्यवाद के स्पष्ट रूप से आर्थिक पतन के बावजूद अमेरिका अभी भी दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य शक्ति है। ट्रम्प अमेरिका की इस सैन्य शक्ति के सहारे अमेरिकी साम्राज्यवाद के पुराने दिन वापस लाने की कोशिशों में लगा हुआ है। हालाँकि उसे यह भी पता है कि अमेरिका पहले की तरह पूरी दुनिया में अपना वर्चस्व क़ायम करने की कूव्वत खो चुका है। इसीलिए ट्रम्प ने पूरी दुनिया के बजाय महज़ पश्चिमी गोलार्द्ध में अमेरिकी वर्चस्व को क़ायम करने का लक्ष्य बनाया है।
क़रीब दो महीने पहले ट्रम्प प्रशासन द्वारा जारी सुरक्षा सम्बन्धी एक दस्तावेज़ में ट्रम्प प्रशासन ने कुख़्यात मुनरो डॉक्ट्रिन को फिर से लागू करने की बात कही है जिसके तहत पूरे अमेरिकी महाद्वीप में किसी दूसरी ताक़त के वर्चस्व को ख़त्म कर निर्विवाद रूप से अमेरिकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को क़ायम करने का लक्ष्य रखा गया है। ग़ौरतलब है कि पिछले दो दशकों के दौरान वेनेज़ुएला सहित लातिन अमेरिका के अन्य देशों में चीन ने बुनियादी ढाँचे सहित अर्थव्यवस्था के कई सेक्टरों में ज़बर्दस्त निवेश किया है और उन देशों के साथ बड़े पैमाने पर व्यापारिक सम्बन्ध स्थापित किये हैं। वेनेुज़ुएला के तेल का सबसे बड़ा ख़रीदार भी चीन ही है। वेनेज़ुएला की चीन व रूस के साम्राज्यवादी धड़े से घनिष्ठता इस तथ्य से भी दिखती है कि वह अमेरिका के बरक्स ब्रिक्स देशों के गठबन्धन में भी शामिल होने की आकांक्षा रखता है और चीन के साथ व्यापार में अमेरिकी डॉलर के बजाय चीन की मुद्रा युआन का इस्तेमाल करता है जिसकी वजह से विश्व व्यापार में अमेरिकी डॉलर के वर्चस्व को चुनौती मिल रही है। यही नहीं वेनेज़ुएला सहित लातिन अमेरिका के कई देश रूस व चीन से हथियारों और सुरक्षा उपकरणों की ख़रीद भी करते आये हैं। इन सभी कारणों से ही वेनेज़ुएला और लातिन अमेरिका के अन्य देश ट्रम्प के निशाने पर हैं।
सवाल यह उठता है कि अमेरिकी साम्राज्यवादी हमले के बाद वेनेज़ुएला का भविष्य क्या होने वाला है। मादुरो के अपहरण के बाद हालाँकि अभी भी वहाँ मादुरो की पार्टी सत्ता में है, लेकिन कार्यकारी राष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिग्ज़ के कुछ बयानों से इस बात के कयास लगाये जा रहे हैं कि यह पार्टी अमेरिकी साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ व्यापक जन-लामबन्दी करने के बजाय उसके साथ समझौते का रुख़ अपना रही है। ट्रम्प प्रशासन ने भी यह कहा है कि वह वेनेज़ुएला की नयी सरकार के साथ काम कर रहा है और अमेरिकी कम्पनियाँ वेनेज़ुएला के तेल पर नियन्त्रण करना शुरू कर चुकी हैं। यदि यह सच है तो यह वेनेज़ुएला के भविष्य के लिए बेहद ख़तरनाक संकेत है। वैसे भी अमेरिका द्वारा वेनेज़ुएला पर इतनी आसानी से हमला करके उसके राष्ट्रपति को अगवा करवाने की घटना अपने आप में वहाँ की सरकार की साम्राज्यवाद-विरोधी रणनीति के बारे में बड़े सवाल खड़े करती है। अमेरिकी नौसेना पिछले कई महीनों से कैरेबियन सागर में अपनी तैनाती कर रही थी और वेनेज़ुएला से जाने वाले तेल के जहाज़ों पर हमले कर रही थी। यह स्पष्ट था कि अमेरिका कभी भी वेनेज़ुएला पर सीधा हमला कर सकता है। इसके बावजूद अभी तक वेनेज़ुएला की सरकार ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि सम्भावित अमेरिकी साम्राज्यवादी हमले से निपटने के लिए क्या कोई तैयारी थी और अगर थी तो आख़िर चूक कहाँ हुई।
बॉलिवेरियन क्रान्ति का भविष्य
वेनेज़ुएला की मौजूदा सरकार के समझौतापरस्त रवैये से इतना तो स्पष्ट दिख रहा है कि तथाकथित बोलिवेरियन क्रान्ति जो ढाई दशक पहले ह्यूगो चावेज़ के करिश्माई नेतृत्व में शुरू हुई थी वह एक भँवरजाल में जा फँसी है। यह क्रान्ति वेनेज़ुएला में दशकों तक अमेरिकी साम्राज्यवादी हस्तक्षेप के ख़िलाफ़ जनविद्रोह की अभिव्यक्ति थी। वैसे तो 1914 में तेल की खोज होने से पहले से ही वेनेज़ुएला में पहले स्पेनी और फिर अमेरिकी साम्राज्यवाद की दख़ल रही थी परन्तु तेल की खोज होने के बाद अमेरिकी साम्राज्यवाद ने वेनेज़ुएला पर ख़ास निशाना साधा। उसके बाद दशकों तक वेनेज़ुएला में तानाशाहों की सत्ता रही जिनके ज़रिये अमेरिकी साम्राज्यवाद ने उस देश के तेल संसाधनों पर अपना नियन्त्रण बनाये रखा। 1958 में वहाँ एक जनबग़ावत हुई जिसकी बदौलत मारकोस पेरेज़ हिमेनेज़ नामक तानाशाह की सत्ता का पतन हुआ और एक सीमित लोकतन्त्र की स्थापना हुई। 1970 के दशक में वैश्विक तेल संकट के दौर में वेनेज़ुएला ने तेल के क्षेत्र का राष्ट्रीयकरण किया। परन्तु उसके बाद भी वेनेज़ुएला की अर्थव्यवस्था आर्थिक संकट और भ्रष्टाचार के भँवर में फँसी रही। 1989 में वेनेज़ुएला के तत्कालीन राष्ट्रपति कार्लोस आन्द्रेस पेरेज़ ने आईएमएफ़ द्वारा निर्देशित ढाँचागत समायोजन की नवउदारवादी नीतियों को लागू करने की शुरुआत की जिसके तहत कल्याणकारी नीतियों में कटौती, निजीकरण और मौद्रिक अवमूल्यन किया गया। इन नीतियों के लागू होने के बाद बढ़ती महँगाई और आर्थिक तंगी की वजह से वेनेज़ुएला में एक बार फिर से जनविद्रोह फूट पड़ा जिसे ‘काराकाज़ो’ का नाम दिया गया।
1998 में भारी बहुमत से ह्यूगो चावेज़ का सत्ता में आना इसी जनविद्रोह का ही नतीजा था। सत्ता में आने के बाद चावेज़ की सरकार ने नया संविधान बनाया जो जनपक्षधर था और जनता को व्यापक अधिकार देता था। चावेज़ ने तमाम कल्याणकारी नीतियों को भी लागू करने की शुरुआत की। इन जनपक्षधर क़दमों से चावेज़ अमेरिकी साम्राज्यवाद के आँख की किरकिरी बन गये। 2002 में अमेरिकी साम्राज्यवाद ने चावेज़ की सत्ता को अपदस्थ करने की साज़िश रची और जो चावेज़ के समर्थन में उमड़े जनसैलाब की वजह से अन्तत: नाकाम रही। उसके बाद चावेज़ सरकार द्वारा विदेशी तेल कम्पनियों को देश निकाला देने, कुछ निजी कम्पनियों का राष्ट्रीयकरण करने, कुछ इलाक़ों में ज़मीन का सामूहिकीकरण करके कम्यून स्थापित करने, नि:शुल्क शिक्षा, स्वास्थ्य और आवास मुहैया कराने और शासन-प्रशासन में जन-भागीदारी बढ़ाने के लिए तमाम जन-संस्थाओं का निर्माण करने जैसे कई जनपक्षधर क़दम उठाये थे। इन क़दमों के बाद वेनेज़ुएला में चावेज़ की सत्ता को इक्कीसवीं सदी के समाजवाद का मॉडल कहा जाने लगा था। हालाँकि हकीक़त यह थी कि वह समाजवाद का कोई मॉडल नहीं था क्योंकि चावेज़ के समय भी वहाँ निजी पूँजीपतियों द्वारा मज़दूरों का शोषण करके मुनाफ़ा कमाने पर कोई रोक नहीं लगायी गयी थी और निजी सम्पत्ति का उन्मूलन करने की कोई योजना नहीं थी। इसलिए चावेज़ की सत्ता को किसी भी प्रकार से सर्वहारा का अधिनायकत्व यानी समाजवादी सत्ता नहीं कहा जा सकता था। इसके अलावा चावेज़ की पार्टी ‘फ़िफ्थ रिपब्लिक मूवमेण्ट’ (एमवीआर’) जिसका 2007 में ‘यूनाइटेड सोश्लिस्ट पार्टी ऑफ़ वेनेज़ुएला’ में विलय हो गया, कोई क्रान्तिकारी कम्युनिस्ट पार्टी भी नहीं है। दरअसल चावेज़ की सत्ता वेनेज़ुएला के तेल राजस्व का इस्तेमाल जनता के पक्ष में करने का कल्याणकारी बुर्जुआ राज्य का ही एक ख़ास क़िस्म का मॉडल था जिसमें समाजवाद के कुछ तत्व मौजूद थे और जिसे अमेरिकी साम्राज्यवाद के प्रति अपने सुसंगत विरोध के चलते जनता का समर्थन भी प्राप्त था। चावेज़ के पास वेनेज़ुएला की अर्थव्यवस्था की तेल पर अतिशय निर्भरता को कम करने की भी कोई योजना नहीं थी। परन्तु इसमें कोई दो राय नहीं कि चावेज़ के दौर में वेनेज़ुएला 21वीं सदी में साम्राज्यवाद-विरोध का झण्डा समझौताहीन ढंग से थामे हुए था।
2013 में चावेज़ की असामयिक मृत्यु के बाद मादुरो द्वारा सत्ता सँभालने के बाद से ही ‘बॉलिवेरियन क्रान्ति’ अपने ढलान की ओर बढ़ने लगी थी। 2014 में विश्व बाज़ार में तेल की क़ीमतों में हुई भारी गिरावट ने वेनेज़ुएला की अर्थव्यवस्था की कमर तोड़कर रख दी। उसके बाद से वेनेज़ुएला की अर्थव्यवस्था संकट से गुज़र रही है और बेरोज़गारी व महँगाई लगातार बढ़ती गयी है। अमेरिका द्वारा लगायी गयी पाबन्दियों ने भी वेनेज़ुएला की अर्थव्यवस्था की हालत बद से बदतर करने में योगदान दिया। पिछले एक दशक के दौरान वेनेज़ुएला से लाखों लोग देश छोड़ने को मजबूर हुए हैं। मादुरो ने चावेज़ की कई नीतियों को पलटते हुए सरकारी कम्पनियों के निजीकरण को बढ़ावा दिया और सामूहिक खेती की व्यवस्था समाप्त कर निजी खेती पर बल दिया। शिक्षा, स्वास्थ्य और आवास में भी निजीकरण को बढ़ावा दिया गया। यही नहीं मादुरो के शासन काल में ही शेवरान जैसी अमेरिकी कम्पनियों पर लगा प्रतिबन्ध वापस ले लिया गया था। इस प्रकार चावेज़ के दौर में वेनेज़ुएला में समाजवाद के जो थोड़े-बहुत तत्व मौजूद थे उनकी भी मादुरो के दौर में तिलांजलि दे दी गयी। आर्थिक क्षेत्र के अलावा मादुरो के शासन काल में वेनेज़ुएला में शासन-प्रशासन के निकायों और तमाम संस्थाओं में जनता की भागीदारी और चौकसी में भी कमी आयी है जिसकी वजह से वहाँ नौकरशाही और भ्रष्टाचार की प्रवृत्तियाँ भी तेज़ी से बढ़ी हैं। ऐसे में अगर मादुरो की सत्ता अमेरिकी साम्राज्यवादी हमले को रोकने के लिए कोई कारगर क़दम नहीं उठा पायी तो इसमें ताज्जुब की बात नहीं है।
अगर वेनेज़ुएला की मौजूदा सरकार अपने देश पर अमेरिकी क़ब्ज़े के ख़िलाफ़ कारगर प्रतिरोध न कर पाये तब भी वेनेज़ुएला सहित समूचे लातिन अमेरिका की जनता ख़ामोश नहीं बैठेगी। जिस प्रकार लातिन अमेरिका के लोग अतीत में साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ बहादुरी से लड़ते आये हैं उसी प्रकार आने वाले दिनों में भी उनके प्रतिरोध के नये अध्याय रचे जायेंगे। ट्रम्प के नेतृत्व में अमेरिकी साम्राज्यवाद की आक्रामकता समूचे महाद्वीप में जनसंघर्षों की आग में घी डालने का काम करेगी और साथ ही साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ दुनियाभर में जन प्रतिरोध भी बढ़ने ही वाला है। जिस प्रकार ग़ज़ा में साम्राज्यवाद की शह पर ज़ायनवादियों द्वारा की जा रही बर्बरता के ख़िलाफ़ दुनियाभर में साम्राज्यवाद की छीछालेदर हो रही है, उसी प्रकार आने वाले दिनों में लातिन अमेरिका में बढ़ती अमेरिकी साम्राज्यवादी दादागिरी के ख़िलाफ़ भी दुनियाभर में जनसैलाब सड़कों पर दिखायी देना तय है। स्पष्ट है कि साम्राज्यवाद की बढ़ती आक्रामकता उसके घटते वर्चस्व की निशानी है। मज़दूर वर्ग को साम्राज्यवाद के संकट की इस परिस्थिति का लाभ उठाकर आम मेहनतकश जनता के बीच साम्राज्यवाद-विरोधी प्रचार को तेज़ करके साम्राज्यवाद के विकल्प के रूप में समाजवाद को स्थापित करने का आह्वान करने की ज़रूरत है।
मज़दूर बिगुल, जनवरी 2026













