Category Archives: जनवादी व नागरिक अधिकार

एसआईआर मेहनतकश जनता का मताधिकार छीनने के लिए किया गया एक घोटाला है!

पहले यह प्रक्रिया स्वयं सरकार की पहलक़दमी पर होती थी। पहले चुनाव आयोग का नारा था : ‘कोई वोटर न छूटे’। लेकिन बहुत कम लोगों ने ग़ौर किया होगा कि अब उसका नारा हो गया है : ‘कोई योग्य वोटर न छूटे’। “योग्य वोटर” कौन होगा? यह मोदी-शाह की फ़ासीवादी सरकार तय करेगी! यहाँ एक बहुत बड़ा बदलाव किया गया है। पहले इस बात की ज़िम्मेदारी राज्यसत्ता पर होती थी कि वह यह पक्का करे कि हर नये वोटर का नाम मतदाता सूची में जुड़े। इसे ‘राजकीय पहलक़दमी पर होने वाला मतदाता पंजीकरण’ कहा जाता है। दुनिया के हर देश में जहाँ पूँजीवादी जनवाद किसी न किसी हद तक काम करता है, वहाँ यही होता है। इसके बरक्स कुछ देशों में एक दूसरा मॉडल लागू किया जाता है जिसे कहा जाता है ‘व्यक्तिगत पहलक़दमी पर होने वाला मतदाता पंजीकरण’। यह आम तौर पर सर्वसत्तावादी तानाशाहियों द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला तरीक़ा है, जिसका मक़सद ही यह होता है कि बड़ी संख्या में मतदाताओं का नाम काटा जाये और उनके मताधिकार को छीन लिया जाये। इसके कारणों को हम कुछ आगे समझेंगे।

भाजपा की योगी सरकार द्वारा मालिकों और पूँजीपतियों की सेवा में मेहनतकशों-मज़दूरों पर थोपा गया अमानवीय शोषण, दमन, अन्याय और आतंक का राज

भाजपा सरकारें, केन्द्र में व हर राज्य में, मज़दूरों की सबसे बड़ी दुश्मन साबित हुई हैं। यह बात हरेक सचेत मज़दूर और मेहनतकश को पता है। न सिर्फ़ नोएडा में बल्कि बरौनी में, पानीपत में, सूरत में और हर जगह भाजपा सरकारों के राज में पूँजीपतियों के हितों को साधने के लिए मज़दूरों की हर आवाज़ का क्रूरता से दमन किया गया है। अगर आप मज़दूरों की औसत मज़दूरी की राज्यवार पड़ताल करें, तो पाएँगे कि दिल्ली को छोड़ दें (जहाँ क़ानूनी काग़ज़ी न्यूनतम मज़दूरी कुछ ज़्यादा होने के ऐतिहासिक व आर्थिक कारण हैं और जो लागू भी नहीं होती!), तो अधिकांश भाजपा-शासित राज्यों में मज़दूरों की औसत मज़दूरी सबसे निचली कतारों में आती है। सभी भाजपा-शासित राज्यों में ठेकाकरण की रफ़्तार सबसे तेज़ है। श्रम कानूनों के उल्लंघन के मामले में भी भाजपा-शासित राज्य ही सबसे आगे हैं।

मज़दूर अधिकारों की क़ीमत पर ही सही, “उद्योग का भविष्य” चमकते रहना चाहिए!

पिछले कुछ समय में हमारे देश के न्यायालयों ने एक के बाद एक कई ऐसे फैसले दिये हैं जिससे कि वे ‘न्यायिक व्यवस्था’ की नुमाइन्दगी कम बल्कि ‘अन्यायिक व्यवस्था’ की नुमाइन्दगी करते अधिक नज़र आये हैं। कई मसले देश की सुर्खियों में आये जो सीधे तौर पर न्यायालयों के जन-विरोधी चरित्र को दिखा रहे थे मगर ऐसे कई मसले सुर्खियों से भी ग़ायब रहे जो इस देश की आम मेहनतकश आबादी की ज़िंदगियों का फ़ैसला करते थे! इसी तरह का एक मसला बीते 20 अगस्त को चीफ़ जस्टिस सूर्यकान्त की अध्यक्षता में नौ न्यायाधीशों की खण्डपीठ द्वारा सुना गया। मामला उद्योग, उद्योगपतियों और मज़दूरों से जुड़ा हुआ था।

पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेन्दु अधिकारी द्वारा एसआईआर और जनगणना को जोड़े जाने का फ़ासीवादी बयान और उसके निहितार्थ

एसआईआर के बाद बंगाल में जिन 27 लाख लोगों का नाम न्यायिक निर्णयन के बाद हटाया गया है, उनमें मुसलमान ज़्यादा हो सकते हैं, लेकिन हिंदुओं की तादाद भी अच्छी-ख़ासी है! असल में न तो हिंदुओं के दुश्मन मुसलमान हैं, न ही मुसलमानों के दुश्मन हिन्दू हैं! बल्कि इन दोनों ही धर्मों से आने वाली मेहनतकश आवाम के आज सबसे बड़े दुश्मन संघ परिवार और भाजपा के दंगाई और फ़सादी हैं। इसलिए आज जब जनगणना और एसआईआर के बारे में सुवेन्दु अधिकारी ऐसी बातें बोल रहे हैं, तो उसे हमें हल्के में नहीं लेते हुए उसकी पुरज़ोर मुख़ालिफ़त करनी चाहिए। दूसरे, हम मेहनतकश लोगों को आपस में न बँटते हुए नागरिकता संशोधन क़ानून 2019 और एसआईआर जैसी फ़ासीवादी कवायदों को फ़ौरन रद्द किये जाने की माँग ज़ोर-शोर से उठानी चाहिए।

पश्चिम बंगाल में भाजपा सरकार और बुलडोज़र का आतंक!

बंगाल में नये नवेले पहुँचे “बुलडोज़र राज” ने छोटे दुकानदारों, रेहड़ी पटरी वालों, फेरीवालों की आजीविका पर गम्भीर असर डाला है। ध्वस्तीकरण अभियान चलाने से पहले, तोड़फोड़ की कार्रवाई करने से पहले कहीं भी उन्हें पर्याप्त पूर्व सूचना नहीं दी गई थी। कई छोटे व्यापारियों का कहना था कि जमींदोज़ की गईं कई दुकानें दशकों से मौजूद थीं और उन्होंने प्रशासन से उसके पुनर्वास या वैकल्पिक वेंडिंग (दुकान लगाने) की व्यवस्था की माँग की थी। लेकिन बजाय उनकी माँग पर ग़ौर फ़रमाने के सरकार ने उन्हें बुलडोज़ कर दिया। ग़ौरतलब है कि,”बुलडोज़र राज” में तमाम वैधानिक, क़ानूनी प्रक्रियाओं को धता बताते हुए, बुलडोज़र चलाया जाता है। उच्चतम न्यायालय ने नवम्बर 2024 में ध्वस्तीकरण, बुलडोज़र कार्रवाई के सम्‍बन्‍ध में दिशा-निर्देश जारी किये थे, जिसमें अनिवार्य 15 दिन की नोटिस अवधि भी शामिल है, इन तमाम कार्रवाइयों में उन दिशानिर्देशों की अवेहलना की जा रही है। विडम्बना है कि बंगाल चुनाव के दौरान झालमुड़ी खाने की नौटंकी करने वाले महामानव की सरकार बनने के बाद झालमुड़ी बेचने वालों को ही दर-बदर किया जा रहा है।

‘नोएडा के मज़दूरों और कार्यकर्ताओं की रिहाई के लिए अभियान’ (CaRWAN) के बैनर तले दिल्ली में विरोध प्रदर्शन

प्रोफेसर नंदिता नारायण ने कहा, “मुझे आकृति, हिमांशु और योगेश जैसे छात्रों पर गर्व है। आज की पीढ़ी के छात्रों को ऐसा ही करना चाहिए। केवल अपने करियर के बारे में सोचने के बजाय उन्होंने अपनी शिक्षा का उपयोग उत्पीड़ित लोगों की आवाज़ बनने के लिए किया। सभा में उपस्थित छात्रों को सम्बोधित करते हुए प्रो. नंदिता ने विश्वविद्यालयों में जनवादी स्पेस के सिकुड़ने पर भी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा, “यह वास्तव में परेशान करने वाली बात है कि योगेश को यूपी पुलिस के सिविल ड्रेस में आए पुलिसकर्मियों द्वारा नॉर्थ कैंपस के अन्दर से अगवा किया गया और विश्वविद्यालय प्रशासन ने इस पर कोई कार्रवाई नहीं की।” सामाजिक कार्यकर्ता नौरीन ने नोएडा मज़दूर आन्दोलन के बाद यूपी पुलिस द्वारा चलाए गए “विच हंट” पर विस्तार से बाते रखी। यूपी पुलिस की स्पेशल टास्क फोर्स ने निजी स्थानों, लाइब्रेरी और कई जगहों पर ग़ैरक़ानूनी तरीक़े से छापेमारी की और बिना किसी उचित प्रक्रिया के युवाओं को अगवा कर अवैध रूप से गिरफ़्तार किया। नौरीन ने यह भी बताया कि ट्रैकिंग और निगरानी अभी भी जारी है। यूपी पुलिस के अधिकारी अब भी दिल्ली में महिला छात्रों का पीछा कर रहे हैं, उन्हें धमका रहे हैं। उन्होंने कहा, “ पुलिस ने मुझे भी अगवा किया था, मेरी धार्मिक पहचान के कारण प्रताड़ित किया, मुझे बांग्लादेशी तक कहा।”

कॉकरोच जनता पार्टी और उसकी लोकप्रियता : भारतीय जनता में व्‍यवस्‍था और मौजूदा सरकार के प्रति बढ़ते गुस्‍से व असन्‍तोष और साथ ही विकल्‍पहीनता की अभिव्‍यक्ति 

कॉकरोच जनता पार्टी की अचानक बढ़ी भारी लोकप्रियता के पीछे मुख्‍य कारण यह है कि हमारे देश का शासक वर्ग, उसकी राज्‍यसत्‍ता और उसके विभिन्‍न अंग-उपांग मेहनतकश जनता की तक़लीफ़ों के प्रति आश्‍चर्यजनक असंवेदनशीलता दिखा रहे हैं और उनका रवैया काफ़ी हद तक पुराने फ्रांस की रानी मैरी एन्‍त्‍वानेत जैसा हो चुका है जिसने पूछा था कि “अगर जनता के पास खाने के लिए रोटी नहीं है, तो वह केक क्‍यों नहीं खा लेती?” उसी प्रकार, भूख और कुपोषण की कगार पर खड़ी भारी बहुसंख्‍यक मेहनतकश और आम मध्‍यवर्गीय आबादी को बताया जा रहा है कि “सब चंगा सी”, “मेलोडी खाओ खुद जान जाओ”, “देश शान्ति और विकास के पथ पर अग्रसर है”, आदि। वहीं दूसरी ओर, खाता-पीता उच्‍च मध्‍य वर्ग और उच्‍च वर्ग नशे में बुरी तरह से टल्‍ली है। यह नशा है उपभोक्‍तावाद, खाऊ-पियू-अघाऊ संस्‍कृति का जिसमें चूर यह वर्ग निरन्‍तर “खाओ-पियो-ऐश करो मितराँ” गाने पर उन्‍मादी नृत्‍य करता रहता है। उसे न सिर्फ़ सुई से लेकर जहाज़ तक बनाने वाली और हर सेवा पैदा करने वाली जनता के दुख-दर्द से कोई लेना-देना नहीं है, बल्कि वह उसकी खिल्‍ली भी उड़ाता है। प्राचुर्य और धनाढ्यता का उसका यह अश्‍लील प्रदर्शन भी आँसुओं के समन्‍दर में खड़ी मेहनतकश जनता के धैर्य को परख रहा है।

नोएडा और मानेसर के मज़दूर संघर्षों में कौन “बाहरी” और कौन “भीतरी”

जब भी कहीं मज़दूरों की कोई हड़ताल या आन्दोलन शुरू होता है, तो उसमें सक्रिय ट्रेड यूनियन कार्यकर्ताओं और मज़दूर संगठन के राजनीतिक कार्यकर्ताओं पर पुलिस प्रशासन और सरकार “बाहरी तत्व” होने की तोहमत लगाते हैं। उनके अनुसार, जो स्वयं उस शहर या औद्योगिक क्षेत्र में कारखाने में काम नहीं करता, उसे मज़दूरों के मसले पर बोलने का या उनके आन्दोलन में शिरक़त करने का कोई अधिकार नहीं है। यह हुक्मरानों का पुराना “तर्क” है। बल्कि कहना चाहिए कि कुतर्क है। नोएडा के मज़दूर आन्दोलन में सक्रिय मज़दूर कार्यकर्ताओं, श्रम अधिकार कार्यकर्ताओं, छात्र कार्यकर्ताओं और उसका समर्थन करने वाले बुद्धिजीवियों मसलन सत्यम वर्मा, आदित्य आनन्द, रूपेश राय, हिमांशु ठाकुर, सृष्टि, आकृति आदि पर नोएडा पुलिस ने यही “बाहरी” होने का आरोप लगाया। उसी प्रकार मानेसर में गिरफ्तार कार्यकर्ता साथियों श्यामबीर और हरीश पर भी ये ही आरोप लगाये गये हैं। तो हमें इस आरोप का पूरा कुतर्क समझ लेना चाहिए।

नोएडा के मज़दूर आन्दोलन और गिरफ्तार सामाजिक कार्यकर्ताओं व बुद्धिजीवियों के बारे में उत्तर प्रदेश पुलिस की विचित्र ‘सत्य कथाएँ’ और वास्तविक सच्चाई

देश में शायद ही कोई ऐसा हो जो यह न जानता हो कि नोएडा के मज़दूर आन्दोलन के दौरान सैंकड़ों मज़दूरों और 7 सामाजिक कार्यकर्ताओं, पत्रकारों, बुद्धिजीवियों और छात्र कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया है। इन पर शुरू में उत्तर प्रदेश पुलिस और गोदी मीडिया ने “पाकिस्तानी एजेण्ट” होने का आरोप लगा दिया! इस पर जनता के बड़े हिस्से की हँसी छूट गयी। इसके बाद इनको “नक्सली” बताने का प्रयास भी किया गया। इस पर भी जनता अपनी हँसी मुश्किल से ही रोक पायी, पर कुछ लोग फिर फक से हँस दिये! लेकिन ज्यादा बड़ा चुटकुला सुनने का मन हो तो आप उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा अब तक गिरफ्तार सामाजिक कार्यकर्ताओं की ज़मानत का विरोध करने वाले लिखित आवेदन और रिमाण्ड दस्तावेज़ देख सकते हैं। हम आपको विस्तार से उत्तर प्रदेश पुलिस के ये चुटकुले सुनाते हैं। ये चुटकुले उत्तर प्रदेश पुलिस के आला अधिकारियों और उनके तहत काम करने वाले पुलिसकर्मियों की मानसिक स्थिति और क्षमताओं के बारे में भी काफ़ी-कुछ बताते हैं। आइये, अब तक उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा अदालत में पेश कुछ दस्तावेज़ों की पड़ताल करें। पुलिस की भाषा पढ़कर हँसी आ सकती है क्योंकि एक दसवीं पास लड़का भी इससे बेहतर भाषा लिख सकता है।

उत्तर प्रदेश की भयाक्रान्त फ़ासीवादी योगी सरकार ने मई दिवस पर आतंक का माहौल बनाने के लिए नोएडा में लगायी धारा 163 की पाबन्दियाँ

जब नोएडा में मज़दूरों का संघर्ष शुरू हुआ तब योगी सरकार के “खुशहाल उत्तर प्रदेश”, “सुखी कार्मिक”, “विकास के पथ पर अग्रसर प्रदेश”, वगैरह के सारे दावे ध्वस्त हो गये। ऊपर से अभी कुछ समय पहले ही जिन पूँजीपतियों से योगी आदित्यनाथ ने वायदा किया था कि उत्तर प्रदेश में उन्हें मज़दूरों की हड़ताल व आन्दोलन से पूर्ण मुक्ति मिलेगी, वहाँ वे 10-12 हज़ार में मज़दूरों को बेतरह खटा सकते हैं, और मज़दूरों को ज़रा भी चूँ-चपड़ नहीं करने दी जायेगी, आदि, उन पूँजीपतियों ने भी योगी सरकार पर त्यौरियाँ चढ़ा लीं। यही तो वजह है कि योगी सरकार ने ख़ुद उत्तर प्रदेश पुलिस का निर्देशन किया कि वह नोएडा में मज़दूर आन्दोलन को किसी भी तरीक़े से कुचले, वहाँ एक आतंक का राज्य क़ायम करे ताकि मज़दूर हमेशा के लिए शान्त हो जाएँ। सारे हुक़्मरानों को हमेशा यही मुग़ालता होता है कि वह दमन के बूते जनता को हमेशा के लिए गु़लामी के लिए तैयार कर सकता है। योगी आदित्यनाथ कोई अलग नहीं हैं।