Category Archives: जनवादी व नागरिक अधिकार

बंगाल में चुनाव आयोग की मिलीभगत से एसआईआर के ज़रिये चुनाव को ‘हाईजैक’ करने में जुटी फ़ासिस्ट भाजपा!

बंगाल के साथ-साथ अन्य 12 राज्यों में घोषित या अघोषित तौर पर एसआईआर की प्रक्रिया जारी है। इन तमाम राज्यों में ख़ासकर ग़रीबों, मुसलमानों, दलितों, स्त्रियों और प्रवासी मज़दूरों को निशाना बनाया जा रहा है। उत्तर प्रदेश से लेकर बंगाल और अन्य राज्यों में एसआईआर का कोई एक स्वरूप नहीं है। हर राज्य में भाजपा व मोदी सरकार अलग-अलग तरीक़ों से चुनाव आयोग के साथ मिलकर इसे अंजाम दे रही है। सवाल यह भी उठता है कि बंगाल जैसे राज्य में, जहाँ से ज़्यादातर प्रवासी मज़दूर अलग-अलग राज्यों में काम करने के लिए जाते हैं और प्राकृतिक आपदाओं समेत अन्य कारकों की वजह से उनके प्रमाण पत्र या पहचान कार्ड उनके पास नहीं है, क्या उन सबको डिटेंशन कैंप में भेज दिया जायेगा? फ़ासीवादी भाजपा की मानें तो अब “अमृतकाल” में  इस देश में ऐसा ही होगा!

महाराष्ट्र नगर निगम चुनाव: अहमदनगर नगर निगम चुनाव में भारत की क्रान्तिकारी मज़दूर पार्टी (RWPI) 17 प्रतिशत आबादी की पसन्द बनकर तीसरे स्थान पर रही

चुनाव आते-जाते रहेंगे, किन्तु मज़दूर एवं मेहनतकश वर्ग का वास्तविक संघर्ष सड़क पर है – सम्मानजनक जीवन हेतु, रोजगार-शिक्षा-स्वास्थ्य जैसे मूलभूत अधिकारों हेतु तथा पूँजीवाद और विशेषतः फ़ासीवाद के विरुद्ध क्रान्तिकारी सामाजिक आंदोलन के निर्माण हेतु। आने वाले दिनों में ज़्यादातर नगर निगमों में पुनः फ़ासीवादी भाजपा नेतृत्व वाली महायुती और कुछ एक नगर निगमों में दूसरी चुनावबाज़ पार्टीओं का शासन स्थापित होने वाला है। नगर निगमों में बिल्डरों, ठेकेदारों, दलालों, व्यापारियों और बड़े–छोटे पूँजीपतियों के हाथ में सत्ता पहले की तरह बनी रहेगी। लूट, निजीकरण, ठेकेदारी व्यवस्था, नगरीय जनसुविधाओं की कमी, बस्तियों की बदहाली, नशाख़ोरी, अपराध तथा जाति-धर्म-भाषा आधारित संघर्ष यथावत् बने रहेंगे। पूंजीपति वर्ग की लूट पहले की तरह जारी रहेगी – केवल उसकी लूट के आपसी बँटवारे में छोटा-मोटा परिवर्तन होगा।

बिहार विधानसभा चुनावों में भाजपा गठबन्धन की अभूतपूर्व विजय और हमारे कार्यभार

इसमें कोई शक़ नहीं है कि जनता में उसके मताधिकार के बुनियादी राजनीतिक अधिकार को प्रभावत: रद्द किये जाने की मोदी-शाह शासन की साज़िशों को लेकर असन्तोष है। लेकिन साथ ही कोई राजनीतिक नेतृत्व, दिशा और कार्यक्रम न होने के कारण उनमें एक प्रकार की हताशा और तटस्थता का भाव भी है। ज़ाहिर है, विकल्पों के अभाव में जब जनता के अधिकार लगातार छीने जाते हैं तो शान्ति की प्रतीतिगत स्थिति हमेशा बनी नहीं रहती है। जनता का यह गुस्सा और असन्तोष कभी न कभी फूटकर सड़कों पर बहता है। लेकिन बिना किसी राजनीतिक नेतृत्व और संगठन के ऐसे विस्फोट कोई स्थायी समाधान नहीं पेश कर पाते। वे अक्सर ज़्यादा से ज़्यादा एक जनविद्रोह की शक़्ल ले पाते हैं, जैसा कि बांग्लादेश, श्रीलंका और नेपाल में हुआ। लेकिन शासक वर्ग ऐसे विद्रोहों से उसके शासन और राज्यसत्ता में पैदा होने वाले उथल-पुथल और विक्षोभ को जल्द ही क़ाबू में कर लेता है। तात्कालिक तौर पर, कोई सुधारवादी दिखने वाला चेहरा जनता के सामने आगे कर दिया जाता है ताकि जनता के गुस्से के झटके को सोखा जा सके। श्रीलंका में जेवीपी की सरकार, बांग्लादेश में मोहम्मद यूनुस की अन्तरिम सरकार और नेपाल में सुशीला कार्की की अन्तरिम सरकार लाकर यही किया गया था। बुनियादी राजनीतिक, सामाजिक व आर्थिक व्यवस्था में कोई परिवर्तन नहीं आया। जनता भी अपने गुस्से को ऐसी विद्रोही अभिव्यक्ति देने के बाद भ्रम का शिकार होकर घरों को वापस लौट जाती है और पूँजीपति वर्ग का शासन बरक़रार रहता है। इसलिए महज़ पूँजीवाद की कुछ अभिव्यक्तियों व लक्षणों पर स्वत:स्फूर्त विरोध और विद्रोह करने से चीज़ें नहीं बदलती हैं। उसके लिए एक क्रान्तिकारी राजनीति, संगठन और विचारधारा की आवश्यकता होती है। दुनियाभर में आज इन क्रान्तिकारी तत्वों के अभाव में ही विभिन्न स्वत:स्फूर्त पूँजीवाद-विरोधी विद्रोह और विरोध-आन्दोलन ज़्यादा से ज़्यादा कुछ तात्कालिक राहत व सुधार प्राप्त करके समाप्त हो जा रहे हैं। वास्तव में, 2007 में वैश्विक महामन्दी की शुरुआत के बाद से ही दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में हम बार-बार यह होता देख रहे हैं।

वोटचोरी : फ़ासीवाद की प्रयोगशाला से निकला सत्ता हथियाने का नया हथकण्डा!

आज की तारीख़ में जनता को उनके वास्तविक मुद्दों पर संगठित कर सड़कों पर उतरने का माद्दा किसी भी चुनावबाज़ पार्टी  में नहीं है। ये तमाम पार्टियाँ असल में पूँजीपति वर्ग के ही विभिन्न धड़ों की नुमाइन्दगी करती हैं। इसलिए इनसे ज़्यादा उम्मीद करना ही बेमानी है। आज मतदान के राजनीतिक जनवादी अधिकार पर हो रहे फ़ासीवादी हमले के विरुद्ध भी क्रान्तिकारी शक्तियों को आम जनता को गोलबन्द और संगठित करना होगा, राजनीतिक जनवाद के अधिकार की हिफ़ाज़त के इस मुद्दे को भी अपने हाथों में लेना होगा और इसके लिए एक जनान्दोलन खड़ा करना होगा। जनता के मताधिकार की रक्षा के लिए खड़ा हुआ आन्दोलन देश में फ़ासीवाद-विरोधी संघर्ष की अहम कड़ी होगी।

एसआईआर के फ़र्जीवाड़े से लाखों प्रवासी मज़दूरों, मेहनतकशों, स्त्रियों, अल्पसंख्यकों के मताधिकार के हनन के बीच बिहार विधानसभा चुनाव – जनता के सामने क्या है विकल्प?

दूसरी ख़ास बात जिस पर ध्यान दिया जाना चाहिए वह यह है कि एसआईआर के ज़रिये मोदी-शाह जोड़ी ने वास्तव में वह काम करने का प्रयास किया है जो जनता के जुझारू आन्दोलनों के कारण वे देश में राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) और नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के ज़रिये नहीं कर पायी थी। वास्तव में, चुनाव आयोग को नागरिकता की वैधता जाँचने, उसे क़ायम रखने या रद्द करने का कोई अधिकार नहीं है। 2003 एसआईआर के दिशा-निर्देश स्पष्ट शब्दों में यह बात कहते हैं कि नागरिकता निर्धारित करने का अधिकार सिर्फ़ गृह मन्त्रालय को है। शाह का गृह मन्त्रालय देशव्यापी जनविरोध के कारण देश के पैमाने पर एनआरसी नहीं करवा सका, तो अब यह काम चोर-दरवाज़े से एसआईआर के ज़रिये करवाया जा रहा है। यही कारण है कि जब सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने वाले पक्षों ने 2003 के दिशा-निर्देशों को ज़ाहिर करने की बात की तो केचुआ ने कहा कि उसको वह दिशा-निर्देशों वाली फ़ाइल नहीं मिल रही है! यह भी मोदी-राज की एक ख़ासियत है! वही फ़ाइलें मिलती हैं जिसका फ़ायदा मोदी-शाह उठा सकते हैं! बाक़ी या तो ग़ायब हो जाती हैं, या फिर जल जाती हैं!

लद्दाख में जनवादी व लोकप्रिय माँगों को लेकर चल रहे जनान्दोलन का बर्बर दमन

यह सच है कि सोनम वांगचुक सहित लद्दाख के आन्दोलन से जुड़े तमाम लोगों ने अनुच्छेद 370 को हटाने का समर्थन किया था। यह भी सच है कि सोनम वांगचुक की राजनीति एक सुधारवादी एनजीओपन्थ की राजनीति है और उन्होंने कश्मीरियों के दमन के ख़िलाफ़ कभी कुछ नहीं बोला। परन्तु आज जब फ़ासिस्ट राज्यसत्ता लद्दाख के लोगों के न्यायसंगत और जनवादी आन्दोलन का दमन करने पर उतारू है तो मज़दूर वर्ग के लिए यह लाज़िमी हो जाता है कि वह उनके आन्दोलन का समर्थन करे। दमन-उत्पीड़न की किसी एक भी घटना पर चुप्पी दरअसल आम तौर पर शासक वर्गों के दमन, उत्पीड़न और हिंसा के अधिकार को वैधता प्रदान करती है। ऐसे में, आज भारत में आम मेहनतकश आबादी को भी लद्दाख में चल रहे घटनाक्रम पर सर्वहारा नज़रिये से सही राजनीतिक अवस्थिति अपनाने की आवश्यकता है।

मतदाता सूची संशोधन, 2025 : जनता के मताधिकार को चुराने के लिए भाजपा का हथकण्डा और पीछे के दरवाज़े से एनआरसी लागू करने की नयी साज़िश

इस पूरी प्रक्रिया को लागू करने की असली मंशा पीछे के दरवाज़े से NRC को लागू करने की भी है। NRC के द्वारा देश की मेहनतकश जनता के एक विचारणीय हिस्से से उसकी नागरिकता छीनने की साज़िश मोदी सरकार ने 6 साल पहले ही रची थी लेकिन उस समय जनान्दोलनों के दबाव के कारण वह उसे लागू नहीं कर पाई थी। आज चुनाव आयोग द्वारा पिछले दरवाज़े से उसी NRC को लागू करने की कोशिश की जा रही है। इसके द्वारा लोगों से पहले वोट देने का अधिकार छीना जायेगा उसके बाद उसे विदेशी व घुसपैठिया साबित कर उसके सारे जनवादी अधिकारों को छीन लिया जायेगा। इस मौक़े पर भी देश की मुख्य धारा की मीडिया (गोदी मीडिया ) सरकार के पक्ष में राय का निर्माण करने के अपने कर्तव्य को बख़ूबी निभा रही है। सुबह-शाम चीख-चीखकर मीडिया के एंकर इसे “देशहित” में बता रहे हैं।

भारतीय संविधान के 75 साल – संविधान का हवाला देकर फ़ासीवाद से मुक़ाबले की ख़ामख्याली फ़ासीवाद-विरोधी संघर्ष के लिए घातक सिद्ध होगी!

“संविधान बचाओ” का नारा अपने आप में इसी व्यवस्था की चौहद्दी के भीतर हमारे संघर्ष को समाप्त कर देने वाला नारा है। हमें समझना होगा कि फ़ासीवाद के विरुद्ध लड़ाई में जब हम किसी प्रकार के बुर्जुआ जनवाद की पुनर्स्थापना की बात करते हैं तो वह फ़ासीवाद के विरुद्ध चल रही लड़ाई में बेहद घातक और आत्मघाती सिद्ध हो सकता है। हमें यह समझना होगा कि फ़ासीवाद का विकल्प किसी किस्म का शुद्ध-बुद्ध बुर्जुआ जनवाद नहीं हो सकता। असल में फ़ासीवाद आज के दीर्घकालिक मन्दी के दौर में एक कमोबेश स्थायी परिघटना बन चुका है। पूँजीवादी संकट आज एक दीर्घकालिक मन्दी का रूप ले चुका है, जो नियमित अन्तरालों पर महामन्दी के रूप में भी फूटती रहती है। आज तेज़ी के दौर बेहद कम हैं, छोटे हैं और काफ़ी अन्तरालों पर आते हैं और अक्सर वास्तविक उत्पादक अर्थव्यवस्था में तेज़ी के बजाय सट्टेबाज़ वित्तीय पूँजी के बुलबुलों की नुमाइन्दगी करते हैं। ऐसे में, बुर्जुआ वर्ग का प्रतिक्रिया और निरंकुशता की ओर झुकाव, टुटपुँजिया वर्गों के बीच सतत् असुरक्षा और परिणामतः प्रतिक्रिया की ज़मीन लगातार मौजूद रहती है और वर्ग-संघर्ष के ख़ास नाज़ुक मौक़ों पर यह एक पूँजीपति वर्ग व पूँजीवादी राज्य के राजनीतिक संकट की ओर ले जाने की सम्भावना से परिपूर्ण स्थिति सिद्ध होती है।

‘कैसा है यह लोकतन्त्र और यह संविधान किसकी सेवा करता है’ पुस्तक से एक अंश

राज्यसत्ता का असली स्वरूप तब सामने आता है जब जनता अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करती है और कोई आन्दोलन संगठित होता है। ऐसे में विकास प्रशासन और कल्याणकारी प्रशासन का लबादा खूँटी पर टाँग दिया जाता है और दमन का चाबुक हाथ में लेकर राज्यसत्ता अपने असली खूनी पंजे और दाँत यानी पुलिस, अर्द्ध-सुरक्षा बल और फ़ौज सहित जनता पर टूट पड़ती है। पुलिस से तो वैसे भी जनता का सामना रोज़-मर्रे की जिन्दगी में होता रहता है। पुलिस रक्षक कम और भक्षक ज़्यादा नज़र आती है। आज़ादी के छह दशक बीतने के बाद भी आलम यह है कि ग़रीबों और अनपढ़ों की तो बात दूर, पढ़े लिखे और जागरूक लोग भी पुलिस का नाम सुनकर ही ख़ौफ़ खाते हैं। ग़रीबों के प्रति तो पुलिस का पशुवत रवैया गली-मुहल्लों और नुक्कड़-चौराहों पर हर रोज़ ही देखा जा सकता है। भारतीय पुलिस टॉर्चर, फ़र्जी मुठभेड़, हिरासत में मौत, हिरासत में बलात्कार आदि जैसे मानवाधिकारों के हनन के मामले में पूरी दुनिया में कुख़्यात है।

बढ़ती बेरोज़गारी के शिकार छात्रों-युवाओं पर टूटता फ़ासीवादी कहर – बिहार और उत्तराखण्ड में छात्रों पर बरसी लाठियाँ

फ़ासीवादी भाजपा सरकार छात्रों-युवाओं के लिए काल साबित हुई है। बेरोज़गारी के इस तूफ़ान ने करोड़ों छात्रों के भविष्य को अन्धकारमय बना दिया है। देश में अपराधों का रिकार्ड रखने वाली संस्था एनसीआरबी के आँकड़ों को देखें तो पता चला चलता है कि केवल वर्ष 2022 में 1 लाख 12 हज़ार छात्रों ने आत्महत्या की है। एक तरफ़ बेरोज़गारी जब विकराल रूप लेती जा रही है तो वहीं पर भर्तियों में भी तमाम तरीक़े के नये नियम लागू करके परिक्षाओं में चयन की प्रक्रिया को बेहद जटिल और मुश्किल बनाया जा रहा है। इसका ताज़ा उदाहरण इसी साल सितम्बर में झारखण्ड में हुई उत्पाद सिपाही भर्ती परीक्षा का है जिसमें दौड़ के नियमों में बदलाव करके 60 मिनट में 10 किलोमीटर दौड़ने का प्रावधान किया गया जबकि ये पहले 6 मिनट में 1600 मीटर था। इसका नतीज़ा ये हुआ कि दौड़ने के दौरान ही 12 छात्रों की मौत हो गयी।