वोटचोरी : फ़ासीवाद की प्रयोगशाला से निकला सत्ता हथियाने का नया हथकण्डा!
विवेक
‘वोटचोरी’ – यह शब्द भारत की राजनीति में फ़ासीवादी शक्तियों के उस हथकण्डे का पर्याय बन चुका है, जिसका इस्तेमाल कर भाजपा विभिन्न राज्यों और केन्द्र में सत्ता हथिया रही है। इस पूरी प्रक्रिया में भाजपा का साथ दे रहा है केंचुआ (केन्द्रीय चुनाव आयोग)! दूसरी तरफ देश की मुख्य विपक्षी चुनावबाज़ पार्टी कांग्रेस अपनी एक दशक की तन्द्रा तोड़ कर साक्ष्य जुटा कर, वोट चोरी की घटना को जनता के समक्ष प्रस्तुत भर कर रही है। इस बार भी राहुल गांधी ने बिहार में पहले चरण के मतदान से ठीक पहले आयोजित प्रेस कॉन्फ़्रेंस में दावा किया कि हरियाणा में 25 लाख वोटों की चोरी हुई है, जिनमें 5.21 लाख डुप्लीकेट वोटर, 93,174 अवैध वोटर, और 19.26 लाख ‘बल्क’ वोटर (एक ही पते पर कई वोटर) शामिल थे। उन्होंने यह भी कहा कि हरियाणा की मतदाता सूची में हर आठ में से एक वोटर नकली पाया गया। बिहार विधानसभा चुनाव के अप्रत्याशित नतीजे इन आरोपों को और बल देते हैं कि भाजपा, चुनाव आयोग की मिलीभगत से, विभिन्न राज्यों में बड़े पैमाने पर वोटों में सेंधमारी कर रही है।
उल्लेखनीय है कि पिछले छह महीनों में कांग्रेस की यह दूसरी प्रेस कॉन्फ़्रेंस थी जिसमें उसने वोट चोरी के मुद्दे पर साक्ष्यों के साथ खुलासे किये।
आख़िर क्यों भाजपा के लिए सत्ता में बने रहने के लिए वोटचोरी ज़रूरी बन चुकी है?
2014 में जब भाजपा केन्द्र की सत्ता में आयी थी, तब देश में एक हद तक “मोदी लहर” मौजूद थी, जो पूँजीपतियों द्वारा लुटाये गये करोड़ों-अरबों रुपये के बूते और गोदी मीडिया व आईटी सेल के आक्रामक प्रचार के बल पर तैयार हुई थी। नरेन्द्र मोदी को एक ऐसे महामानव के तौर पर पेश किया गया, जो बहुसंख्यक हिन्दू आबादी का “संरक्षक” है। भाजपा और संघ परिवार द्वारा संचालित साम्प्रदायिक फ़ासीवादी राजनीति इस उभार का आधार थी। लेकिन 2020 के आसपास आते-आते मोदी की “सशक्त नेता” वाली छवि क्षीण होने लगी थी। कोरोना काल में केन्द्र सरकार की भारी अव्यवस्था और कुप्रबन्धन ने जनमानस में गहरा असन्तोष पैदा किया। इससे पहले नोटबन्दी की नौटंकी ने आम लोगों पर बेइन्तहा तकलीफ़ें लाद दी थीं। बेरोज़गारी, महँगाई, पेपर लीक, सीएए–एनआरसी और अन्य मुद्दों पर उभरते जनआन्दोलनों ने देश में भाजपा और मोदी सरकार के ख़िलाफ़ प्रतिरोध की लहर को और मज़बूती दी। अन्तरराष्ट्रीय मंचों पर इन 4-5 सालों में भारत की विदेश नीति के चलते हुई फ़ज़ीहत ने तो शहरी मध्य वर्ग के बीच भी मोदी की लोकप्रियता को काफी नुकसान पहुँचाया है। न तो अब कोई “मोदी लहर” है और न ही ‘मोदी कल्ट’ का व्यापक प्रभाव।
जिस साम्प्रदायिक राजनीति के ज़रिये भाजपा सत्ता में पहुँची थी, उसका प्रभाव जनता के एक बड़े हिस्से में कम होने लगा था। इस गिरती लोकप्रियता का सबसे बड़ा संकेत 2024 के लोकसभा चुनाव में मिला, जहाँ भाजपा अकेले बहुमत का आँकड़ा भी नहीं छू पायी। कुछ समय के लिए तो केन्द्र में भाजपा सरकार का गठन ही संकट में पड़ गया था, लेकिन अन्ततः चंद्रबाबू नायडू और नीतीश कुमार के समर्थन के सहारे भाजपा दोबारा सत्ता में आ सकी।
इन सबसे बढ़कर सबसे मुख्य बात यह है कि आज भी भाजपा को देश के पूँजीपति वर्ग का एकमुश्त समर्थन हासिल है। इसके अलावा उसके पास संघ परिवार की शक्ल में काडर-आधारित संगठन का ऐसा ढाँचा और विचारधारा है जो उसे अन्य सभी ग़ैर-फ़ासीवादी दलों से आगे कर देता है। इसी संघ परिवार की मौजूदगी की वजह से पिछले लम्बे अरसे में फ़ासीवादी भाजपा ने न सिर्फ़ समाज के पोर-पोर में जड़ें मज़बूत की हैं बल्कि राज्यसत्ता के अलग-अलग निकायों और तमाम सरकारी और संवैधानिक संस्थाओं व प्रक्रियाओं में भीतर तक पैठ बनाकर, उन्हें अन्दर से खोखला कर दिया है। जो थोड़ी-बहुत जनवादी अन्तर्वस्तु इन पूँजीवादी जनवादी संस्थाओं में थी, वह भी अब लगातार ख़त्म होती जा रही है। जनवाद का केवल खोल बचा है। ये सारी संस्थाएँ अब फ़ासीवादी भाजपा के अधीनस्थ होकर इसके पक्ष में काम कर रही है।
इसलिए अब जब भाजपा की लोकप्रियता जनता के बीच घट रही है और साम्प्रदायिक प्रचार और ध्रुवीकरण के बल पर हिन्दू वोट बैंक साधने का दाँव पुराना पड़ने लगा है, तब भाजपा सत्ता में बने रहने के लिए इन सरकारी संस्थाओं का इस्तेमाल कर वोटचोरी जैसे कारनामों को अंजाम दे रही है। इसके पहले ईवीएम घोटाले के ज़रिये भी भाजपा यह काम करती रही थी।
पहले भी चुनावों में अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए भाजपा पर ईवीएम में धाँधली के आरोप लगते रहे थे। जब यह मामला व्यापक जनशंका और सार्वजनिक बहस का विषय बन गया, तो भाजपा – केन्द्रीय चुनाव आयोग की मिलीभगत से – अब ईवीएम घोटाले के साथ ही मतदाता सूची में ही सेंधमारी करने की दिशा में सक्रिय हो गयी है। यह जनता के सबसे बुनियादी राजनीतिक अधिकार पर प्राणान्तक हमला है।
बिहार में एसआईआर के ज़रिये वोटचोरी का नया प्रयोग और विपक्षी दलों की अकर्मण्यता
बिहार में भाजपा–जदयू की जीत केन्द्र में एनडीए की सरकार को बरकरार रखने के लिए ज़रूरी लग रही थी। अगर यहाँ सत्ता बदलकर नीतीश कुमार फिर से राजद के साथ जाते, तो केन्द्र की एनडीए सरकार भी अस्थिर हो सकती थी। इसी सम्भावित संकट को रोकने के लिए भाजपा के लिए बिहार में “हर हाल में जीत” सुनिश्चित करना बेहद ज़रूरी था। इसलिए इस बार वोटचोरी की पटकथा चुनाव से 6 माह पूर्व ही लिखी जानी शुरू हो चुकी थी।
मतदाता सूची में सेंधमारी के लिए भाजपा के इशारे पर केंचुआ (केन्द्रीय चुनाव आयोग) ने आनन-फ़ानन में बिहार में विशेष मतदाता पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया शुरू कर दी थी। एक अगस्त को जारी हुई ड्राफ़्ट सूची में 65 लाख मतदाताओं के नाम हटाये गये। इस दौरान मुस्लिम आबादी वाले ज़िलों में सबसे अधिक नाम हटाये गये। जब अन्तिम सूची प्रकाशित हुई तब 3.66 लाख और नाम हटाये गये तथा 21.53 लाख नये मतदाता जोड़े गये। 30 सितम्बर की अन्तिम मतदाता सूची में कुल संख्या 7.42 करोड़ रही – जो एसआईआर शुरू होने के पहले की संख्या से 47 लाख कम थी!
अन्तिम सूची से हटाये गये 3.66 लाख मतदाताओं को आपत्ति दर्ज कराने का कोई अवसर तक नहीं दिया गया, जिससे यह सन्देह और गहरा होता है कि इन नामों को चुनकर हटाया गया। चुनाव आयोग का तर्क था कि एसआईआर का उद्देश्य उन लोगों के नामों की पहचान कर उन्हें हटाना था जो पड़ोसी देशों – म्यांमार, बांग्लादेश, नेपाल आदि – से अवैध रूप से आकर बिहार में रह रहे थे। लेकिन विडम्बना यह है कि खुद चुनाव आयोग ने स्वीकार किया कि बिहार में ऐसा एक भी अवैध प्रवासी मतदाता नहीं मिला!
स्पष्ट है कि ‘विशेष मतदाता पुनरीक्षण’ का फ़ायदा भाजपा को बिहार चुनाव में मिला। कुल 174 सीटों में जीत का अन्तर मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान हटाये गये मतदाताओं की संख्या से कम रहा। इन 174 सीटों में से 75 सीटें ऐसी थीं जहाँ से एनडीए पिछले चुनाव में जीत नहीं पायी थी, लेकिन इस बार ये 75 सीटें उसे मिली हैं। एनडीए द्वारा जीती गयी 202 सीटों में से 128 ऐसी थीं, जहाँ सबसे ज़्यादा मतदाताओं के नाम हटाये गये थे। ये वही सीटें हैं जहाँ ‘डिलिट किए वोटरों’ की संख्या जीतने के मार्जिन से ज़्यादा है। अर्थात, एसआईआर के ज़रिये अगर बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम नहीं हटाये जाते तो इन 128 सीटों के परिणाम अलग भी हो सकते थे।
बिहार में किये गये एसआईआ के प्रयोग से मिली चुनावी जीत के बाद केंचुआ ने अब देश के बारह केन्द्र शासित प्रदेशों और राज्यों में एसआईआर करवाने की घोषणा की है। यह समझना मुश्किल नहीं है कि एसआईआर के बहाने कितने बड़े पैमाने पर मतदाता सूची में धाँधली का खेल चलेगा।
लेकिन इतना सबकुछ होने के बावजूद कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दल केन्द्रीय चुनाव आयोग व भाजपा के खिलाफ़ सड़कों पर उतरकर आन्दोलन खड़ा करने के बजाय केवल बयानबाज़ी तक ही सीमित रहे। बिहार विधानसभा चुनाव में एसआईआर के ज़रिये हुई वोटचोरी के असर को साफ देखा जा सकता है। बावजूद इसके विपक्षी दल कोई जुझारू क़दम उठाने से बच रहे हैं।
बहुत मुमकिन है कि आने वाले कुछ माह में राहुल गांधी एक और प्रेस कॉन्फ़्रेंस कर बिहार विधानसभा चुनाव में हुई धाँधली के नये साक्ष्य सार्वजनिक करें। लेकिन ऐसा करने पर भी शायद वही स्थिति दोहरायी जायेगी। देश की जनता का एक हिसा विशेषकर युवाओं की एक बड़ी आबादी इस तथ्य को भली-भाँति समझ रही है कि भाजपा चुनावों में धाँधली कर सत्ता हथिया रही है और इस काम में देश का चुनाव आयोग उसकी मदद कर रहा है। इसलिए अब सिर्फ़ धाँधली के साक्ष्य जनता के सामने रखने से परिस्थियाँ नहीं बदलेगी। विपक्षी दलों को चाहिए कि बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों को जनादेश मानने से इनकार करें और अपनी जीती हुई सीटों से इस्तीफ़ा दें। केन्द्रीय चुनाव आयोग व भाजपा के इस नापाक गठजोड़ के ख़िलाफ़ सड़कों पर उतरकर आन्दोलन करें। हालाँकि उनकी चुनावी राजनीति की सीमाएँ देखते हुए इसकी सम्भावना कम ही है कि वे ऐसा कर पायेंगी।
आज की तारीख़ में जनता को उनके वास्तविक मुद्दों पर संगठित कर सड़कों पर उतरने का माद्दा किसी भी चुनावबाज़ पार्टी में नहीं है। ये तमाम पार्टियाँ असल में पूँजीपति वर्ग के ही विभिन्न धड़ों की नुमाइन्दगी करती हैं। इसलिए इनसे ज़्यादा उम्मीद करना ही बेमानी है। आज मतदान के राजनीतिक जनवादी अधिकार पर हो रहे फ़ासीवादी हमले के विरुद्ध भी क्रान्तिकारी शक्तियों को आम जनता को गोलबन्द और संगठित करना होगा, राजनीतिक जनवाद के अधिकार की हिफ़ाज़त के इस मुद्दे को भी अपने हाथों में लेना होगा और इसके लिए एक जनान्दोलन खड़ा करना होगा। जनता के मताधिकार की रक्षा के लिए खड़ा हुआ आन्दोलन देश में फ़ासीवाद-विरोधी संघर्ष की अहम कड़ी होगी।
मज़दूर बिगुल, नवम्बर 2025













