बिहार विधानसभा चुनावों में भाजपा गठबन्धन की अभूतपूर्व विजय और हमारे कार्यभार
वोट-चोरी और चुनावी धाँधली के ज़रिये जनता के बुनियादी राजनीतिक जनवादी अधिकारों को निरस्त करने के विरुद्ध जुझारू व्यापक जनान्दोलन खड़ा करो!
सम्पादकीय अग्रलेख
बिहार विधानसभा चुनावों के नतीजों में कुछ भी चौंकाने वाला नहीं था। सोशल मीडिया पर “खेला” होने का “खेला” खेलने वाले जो “खिलाड़ी” भाजपा-नीत गठबन्धन की हार की उम्मीद लगाये बैठे थे, उनके हाथों निराशा लगी है। हालाँकि अभी भी वे किसी “खेला” होने के इन्तज़ार में हैं, जैसा कि वे पिछले 11 वर्षों से लगातार कर रहे हैं! अफ़सोस कि उनके इस अदम्य आशावाद के पाँवों तले कोई ठोस ज़मीन नहीं है। सच्चाई तो यह है कि भारत के पूँजीवादी लोकतन्त्र की सभी संस्थाओं और प्रक्रियाओं के साथ साम्प्रदायिक फ़ासीवादी संघ परिवार पहले ही भयानक “खेला” कर चुका है! भाजपा और उसके सहयोगियों ने बिहार चुनाव कैसे जीता है, वह सभी विवेकवान लोगों के सामने बिल्कुल स्पष्ट है।
पहले तो विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के आधार पर उन वर्गों, जातियों व समुदायों के लाखों वोटों को ही रद्द कर दिया गया जो भाजपा के विरुद्ध विपक्षी दलों को वोट करने की प्रबल सम्भावना रखते हैं, उसके बाद लाखों फ़र्ज़ी वोटरों को वोटर लिस्ट में जोड़ दिया गया जिनके वोट भाजपा को ही जाने थे, उसके बाद चुनाव आचार संहिता की धज्जियाँ उड़ाते हुए लाखों महिलाओं को रु. 10,000 की रिश्वत बाँटी गयी और भविष्य में भी ऐसी रिश्वत की आशा उन्हें थमा दी गयी। उसके बाद देश में अलग-अलग जगहों से भाजपा ने अपने वोटरों के लिए विशेष ट्रेनें और बसें चलवाकर बिहार विधानसभा चुनावों में अपने पक्ष में वोट डलवाये। इसके अलावा, स्वतन्त्र रपटों से स्पष्ट संकेत मिले कि ईवीएम घोटाला पहले की तरह जारी रहा। इसी प्रकार के अन्य साम-दाम-दण्ड-भेद अपनाकर भाजपा ने समूचा चुनाव ही चुरा लिया। केन्द्रीय चुनाव आयोग (केचुआ) के बारे में कुछ भी बताने की आवश्यकता नहीं है, वह पहले भाजपा की गोद में बैठा था और अब भाजपा की गोद में धँस चुका है। इसलिए उससे किसी सुनवाई की उम्मीद करना निपट मूर्खता होगी। वहीं दूसरी ओर आवारा कुत्तों के मसलों पर स्वयं संज्ञान लेने वाला सर्वोच्च न्यायालय खुलेआम एक अहम राजनीतिक जनवादी अधिकार की चोरी पर धृतराष्ट्र बनकर बैठा रहा है और अभी भी बैठा हुआ है। ऐसे में, इस भयंकर धाँधली, चोरी और लूट के ख़िलाफ़ आप कहाँ शिक़ायत करेंगे, कहाँ रपट लिखवायेंगे?
भाजपा-नीत राजग गठबन्धन ने चुनाव कैसे जीता? इसकी तैयारी तो महीनों पहले शुरू की जा चुकी थी। आर्थिक और सामाजिक तौर पर सबसे पिछड़े प्रदेशों में से एक होने के बावजूद केन्द्र की सत्ता हथियाने के मद्देनज़र बिहार हर पूँजीवादी चुनावी दल के लिए सबसे महत्वपूर्ण राज्यों में से एक है। नतीजतन, प्रदेश में मोदी-शाह की केन्द्र सरकार और नीतीश कुमार की राज्य सरकार की बढ़ती अलोकप्रियता को देखकर अमित शाह और उनके इशारों पर काम करने वाले केचुआ ने छह महीने पहले ही राजग की जीत की पटकथा लिखनी शुरू कर दी थी। शुरुआत हुई थी विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर के साथ। सभी जानते थे और कइयों ने स्पष्ट तौर पर कहा भी था कि छह महीने के भीतर बिहार जैसे भारी जनसंख्या वाले राज्य में एसआईआर सही ढंग से किया ही नहीं जा सकता है। लेकिन सही ढंग से एसआईआर करना किसे था?! एसआईआर का मक़सद क्या था यह उसके नतीजों से साफ़ हो जाता है।
एसआईआर का परिणाम यह हुआ कि 1 अगस्त को पंजीकृत मतदाताओं की संख्या 7.89 करोड़ से घटकर 7.24 करोड़ रह गयी। इसके बाद, अन्तिम सूची से पहले 3.66 लाख नाम और हटाये गये और 21.53 लाख नये नाम जोड़े गये। नतीजतन, मतदाताओं की संख्या हो गयी 7.42 करोड़। यानी, लगभग आधे करोड़ लोगों को मतदाता सूची से हटा दिया गया! यह सब “घुसपैठियों” को निकालने के नाम पर किया गया हालाँकि कोई घुसपैठिया मिला नहीं! वैसे भी एसआईआर को घुसपैठियों की पहचान करने का कोई अधिकार नहीं है, यह ख़ुद भारत सरकार मानती है। वास्तव में, मोदी-शाह जोड़ी एन.आर.सी. की नापाक साज़िश को ही अब एसआईआर के ज़रिये लागू करवा रही है। “घुसपैठियों” का नकली भय दिखाने का काम मोदी-शाह सरकार पिछले दशक भर से करती रही है, जिसका असली मक़सद है भारत के मुसलमान नागरिकों के बुनियादी राजनीतिक अधिकारों को छीन लेना और उनके प्रति देश में एक साम्प्रदायिक माहौल तैयार करना। इसी साम्प्रदायिकता के तन्दूर पर अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेंकने का काम भाजपा अपने जन्म से ही अलग-अलग तरीक़ों से करती रही है।
तमाम जाँच रपटों के अनुसार, जिन लोगों का नाम मतदाता सूची से एसआईआर द्वारा मिटा दिया गया वे आम तौर पर मुसलमान, दलित, ग़रीब पिछड़े व ग़रीब दलित व पिछड़े परिवारों से आने वाली स्त्रियाँ हैं और इसके अलावा बड़ी संख्या में प्रवासी मज़दूर भी इसमें शामिल हैं। ये बातें विस्तृत जाँच होने पर और भी साफ़ हो जायेंगी।
बहरहाल, प्रति सीट मिटाये गये मतदाताओं की औसत संख्या बनती है 26,749 जबकि इस बार बिहार विधानसभा चुनावों में जीत-हार का औसत अन्तर था 20,940। यानी, अधिकांश सीटों में जीत-हार का फ़ैसला एसआईआर के द्वारा विपक्ष के लिए वोट करने वाले सम्भावित मतदाताओं के नाम भारी संख्या में मिटाकर पहले ही कर दिया गया था। कुल 174 सीटों में जीत-हार का अन्तर मिटाये गये मतदाताओं की संख्या से कम रहा। इनमें से 75 सीटें ऐसी हैं जो पिछले चुनावों में भाजपा-नीत राजग गठबन्धन हारा था, लेकिन इस बार जीत गया है! भाजपा-नीत गठबन्धन द्वारा जीती गयी कुल 202 सीटों में से 128 सीटें ऐसी थीं जहाँ एसआईआर द्वारा मिटाये गये वोटरों की संख्या सबसे ज़्यादा थी। यानी, अगर एसआईआर की चुनावी धाँधली न होती तो भाजपा चुनाव जीत ही नहीं सकती थी। ख़ुद अमित शाह का आकलन 160 सीटें जीतने का था! लेकिन केचुआ के ज्ञानेश बाबू ने स्वामी-भक्ति में अतिरेकपूर्ण उत्साह दिखला दिया!
इसके अलावा, भारी संख्या में फ़र्जी वोटरों के नाम जोड़कर भी भाजपा-नीत गठबन्धन की पार्टियों को फ़ायदा पहुँचाया गया। यहाँ तक कि चुनावों के दौरान ही वोटरों की संख्या 7.42 करोड़ से बढ़कर 7.45 करोड़ हो गयी! यानी, 3 लाख अतिरिक्त वोट आ गये! बड़ी संख्या में भाजपा के कार्यकर्ताओं और समर्थकों से, जिनमें कई भाजपा नेता, विधायक, मन्त्री आदि भी शामिल थे, दो या उससे ज़्यादा बार वोट डलवाया गया, जिसकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर मौजूद हैं। कई भाजपाई जो दूसरे राज्यों में वोट कर चुके थे, उनसे बिहार विधानसभा चुनावों में फिर से वोट डलवाया गया। ईवीएम मशीनों को बदले जाने, उनके काम न करने, ईवीएम स्ट्रांग रूम में 24 घण्टे चलने वाले कैमरों के बन्द हो जाने की रपटें पूरे प्रदेश से वोटिंग के बाद आती रहीं। याद रहे, आज तक भी क़रीब 19 लाख ग़ायब ईवीएम मशीनों का कोई पता नहीं चला है। इसके अलावा, चुनाव आचार संहिता का खुलेआम उल्लंघन करते हुए लाखों महिलाओं में रु. 10,000 की ख़ैरात सरकारी ख़ज़ाने से बाँटकर उनके वोट ख़रीदने का काम भी रंगा-बिल्ला की जोड़ी ने खुलेआम किया। जब समूचा केचुआ ही जेब में बैठा हो, तो डर किस बात का!?
विपक्षी दल कांग्रेस द्वारा किये गये भण्डाफोड़ के अनुसार हरियाणा के विधानसभा चुनावों में भी 50 लाख वोटों की चोरी की गयी थी। राहुल गाँधी के इस आरोप को भाजपा और केचुआ बस ख़ारिज कर दे रहे हैं, अपने चमचे नौकरशाहों से राहुल गाँधी के विरुद्ध पत्र लिखवा रहे हैं, लेकिन इन आरोपों को ग़लत साबित करने के लिए कोई प्रति-प्रमाण नहीं पेश कर पा रहे हैं क्योंकि ऐसे कोई प्रमाण मौजूद ही नहीं हैं। यह देश का हर विवेकवान नागरिक अच्छी तरह से समझ रहा है कि चुनावी धाँधली द्वारा भाजपा लगातार चुनाव चोरी कर रही है।
अभी चुनाव आयोग ने न्यायपालिका को बताया कि 2024 के लोकसभा चुनावों से जुड़ी सारी फ़ुटेज चुनाव आयोग ने नष्ट कर दी है! क्यों? ऐसे डाटा का स्टोरेज करना इतना भी महँगा नहीं है कि सरकार उसे नष्ट कर दे। ऊपर से राजनीतिक जनवाद के एक बुनियादी अधिकार यानी मत देकर सरकार चुनने के अधिकार को ही चोर-दरवाज़े से छीन लिये जाने का प्रश्न हो, तो निश्चित ही इतना ख़र्च उठाया जा सकता है और उठाया जाना चाहिए। लेकिन 2024 के फ़ुटेज नष्ट किये जाने से ही स्पष्ट हो जाता है कि दाल में कुछ काला नहीं बल्कि पूरी दाल ही काली है।
निश्चित ही, भाजपा-नीत गठबन्धन की भारी चुनावी धाँधली के आधार पर हासिल की गयी जीत के पीछे दो सामान्य कारक भी हमेशा की तरह मौजूद हैं : पहला, मन्दी के दौर में पूँजीपति वर्ग के बहुलांश का भाजपा के मोदी-शाह शासन को भारी एकजुट समर्थन जो उन्हें मुनाफ़े की औसत दर के संकट से निजात दिलाने के लिए तानाशाहाना तरीक़े से आम मेहनतकश जनता को दबाकर उनकी औसत आय और औसत मज़दूरी को गिराने का काम पिछले 11 वर्षों से कर रहा है और बड़ी पूँजी को लूट-खसोट की पूरी छूट दे रहा है; और दूसरा, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (जिसका चुनावी फ्रण्ट भाजपा है) का काडर-आधारित फ़ासीवादी संगठन होना जो अनुशासित तरीक़े से फ़ासीवादी एजेण्डा, राजनीति और विचारधारा का प्रचार गली-गली और गाँव-गाँव तक में करता है, उनके झूठे प्रचारों व नैरेटिव को सच के तौर पर स्थापित करने का काम करता है, अपनी संस्थाओं के ज़रिये ‘वफ़ादारी नेटवर्क’ जनसमुदायों के बीच खड़ा करता है, निरन्तर साम्प्रदायिक प्रोपगैण्डा करता है और मुसलमानों के रूप में एक नक़ली दुश्मन की छवि निर्मित कर व्यापक हिन्दू आबादी को एक छद्म भय में रखता है।
पूँजीपति वर्ग के भारी व एकजुट आर्थिक समर्थन और पिछले एक सदी में निर्मित संघ परिवार के काडर-आधारित व्यापक संगठन के बिना भाजपा वोट-चोरी व चुनावी धाँधली का उपरोक्त कुकर्म करने में क़ामयाब नहीं हो सकती थी। उसके फ़ासीवादी कार्यक्रम का लक्ष्य है पूँजीवादी लोकतन्त्र का खोल बचाये रखते हुए उसकी अन्तर्वस्तु को लगातार क्षरित किया जाय। इसके लिए लम्बे दौर में पूँजीवादी राज्यसत्ता के समस्त निकायों में आन्तरिक घुसपैठ के ज़रिये उसे हाईजैक करना और समाज के पोरों में अपनी फ़ासीवादी संस्थाओं के ज़रिये पकड़ बनाना इस कार्यक्रम में अपनायी जाने वाले आम रणनीति है और वोट–चोरी और चुनावी धाँधली उसकी इसी आम रणनीति का मौजूदा विशिष्ट अंग मात्र है।
ऐसे में हमें क्या करना चाहिए? हम मज़दूरों, ग़रीब किसानों और आम मेहनतकशों को भी यह अच्छी तरह से समझ लेना चाहिए कि भयंकर पैमाने पर चुनावी धाँधली हो रही है, मताधिकार को ही चोर-दरवाज़े से छीना जा रहा है और एक ऐसी स्थिति पैदा की जा रही है, जिसमें चुनावों का कोई मतलब ही न रह जाये। पूँजीवादी लोकतन्त्र कम-से-कम औपचारिक तौर पर यह राजनीतिक जनवादी अधिकार जनता को देता है कि वह अपने जनप्रतिनिधि चुन सकें। निश्चित तौर पर, पूँजीवादी लोकतन्त्र में मिलने वाले इस राजनीतिक जनवादी अधिकार के बावजूद जनता कभी आम तौर पर अपने सच्चे जनप्रतिनिधियों को नहीं जितवा पाती क्योंकि केवल राजनीतिक जनवाद आम मेहनतकश जनता के लिए कभी पर्याप्त नहीं होता।
जब तक कि समाज में समस्त संसाधनों व उत्पादन के साधनों पर मुट्ठीभर धन्नासेठों का मालिकाना और नियन्त्रण हो, महज़ औपचारिक राजनीतिक जनवाद से जनता को आर्थिक व सामाजिक न्याय और बराबरी नहीं मिल सकती। यही वजह है कि अगर पारदर्शिता के साथ और नियमपूर्वक हों तो भी पूँजीवादी चुनावों में पूँजीपति वर्ग के धनबल और बाहुबल का खेल चलता है। इतने बड़े निर्वाचक मण्डल बनाये गये हैं कि उनमें आम जनता के सच्चे प्रतिनिधि खड़े ही नहीं हो सकते, खड़े हो जायें तो जीत नहीं सकते और अगर आपवादिक रूप से जीत जायें तो उन्हें संसद-विधानसभाओं में पूँजीपति वर्ग के बाक़ी प्रतिनिधि काम नहीं करने देते। पूँजीवादी चुनाव ऐसे ही हो सकते हैं। कहीं आपवादिक तौर पर, क्रान्तिकारी मज़दूर पार्टी तो भूल जायें, अगर कोई लोकरंजकतावादी निम्न-बुर्जुआ ‘समाजवादी’ पार्टी भी चुनावों के ज़रिये बहुमत में आ जाये (आज तो यह भी लगभग असम्भव ही है) और सरकार बना ले, तो सेना-पुलिस व नौकरशाही आर्थिक शक्तिमत्ता और सम्पत्ति से लैस पूँजीपति वर्ग की शह पर उसका तख़्तापलट कर देते हैं और आम तौर पर इसमें साम्राज्यवादी ताक़तों की पूरी मदद ली जाती है, जैसा कि 1973 में चीले में अयेन्दे की सरकार के साथ हुआ था। क्योंकि साम्राज्यवाद का भी हित इसी में होता है कि तमाम देशों में पूँजीपति वर्ग की ही कोई सत्ता क़ाबिज़ रहे। केवल चुनाव जीतकर सरकार बना लेने से समाज में मौजूद उत्पादन सम्बन्धों में कोई परिवर्तन नहीं आता क्योंकि उसे क़ायम रखने वाली राज्यसत्ता के सभी स्थायी निकाय पहले के समान बने रहते हैं और साथ ही जनता की क्रान्तिकारी पहलक़दमी भी महज़ चुनावों से निर्बन्ध नहीं होती। इसीलिए सर्वहारा वर्ग का दूरगामी लक्ष्य महज़ चुनावों को जीतकर सरकार बनाना नहीं है क्योंकि क्रान्तिकारी सर्वहारा वर्ग समझता है कि सरकार पूँजीपति वर्ग की राज्ययसत्ता का केवल एक अस्थायी निकाय है, उसकी कार्यपालिका का औपचारिक अंग है। लेकिन वास्तव में कार्यपालिका की भूमिका निभाते हैं नौकरशाही, सेना, पुलिस, अर्द्धसैनिक बल, आदि जो पूँजीपति वर्ग के शासन को प्रबन्धित करने वाले स्थायी निकाय होते हैं। जब तक एक सर्वहारा क्रान्ति के ज़रिये समूची पूँजीवादी राज्यसत्ता का ही ध्वंस नहीं किया जाता, एक क्रान्तिकारी सर्वहारा राज्यसत्ता क़ायम नहीं की जाती, तब तक सर्वहारा वर्ग के नेतृत्व में आम मेहनतकश जनता के हितों के लिए काम करने वाली समाजवादी व्यवस्था का निर्माण नहीं हो सकता है।
लेकिन क्या इसका अर्थ यह है कि हम पूँजीवादी लोकतान्त्रिक चुनावों को भंग कर देने के पक्ष में हैं या पूँजीवादी लोकतान्त्रिक चुनावों में मिलने वाले राजनीतिक अधिकार को निष्प्रभावी बना दिये जाने के प्रति हम तटस्थ रहते हैं? कतई नहीं! वजह यह कि राजनीतिक जनवाद के ज़रिये सर्वहारा वर्ग अपने वर्ग संघर्ष को सबसे प्रभावी तरीक़े से आगे बढ़ाता है, वह जनता के अन्य वर्गों के बीच क्रान्तिकारी विचारों का प्रचार कर उन्हें जागरूक, गोलबन्द और संगठित करने का काम करता है और एक क्रान्तिकारी पार्टी को सर्वहारा वर्ग के हिरावल और जनता के क्रान्तिकारी कोर के तौर पर खड़ा करता है। अगर सर्वहारा वर्ग के पास कोई राजनीतिक स्पेस नहीं होगा, तो पहले उसे इस राजनीतिक स्पेस के लिए लड़ना ही होगा। राजनीतिक जनवाद की लड़ाई इसलिए सर्वहारा वर्ग के लिए महत्वपूर्ण है। वह देश और दुनिया में कहीं भी होने वाले दमन, उत्पीड़न, राजनीतिक जनवाद के हनन के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाता है क्योंकि हर रूप में शोषण, दमन और उत्पीड़न का विरोध करके और उसके विरुद्ध लड़कर ही सर्वहारा वर्ग एक राजनीतिक वर्ग बन सकता है, जो समूची मेहनतकश जनता को क्रान्तिकारी नेतृत्व दे एक समाजवादी क्रान्ति की ओर ले जा सकता है। यही वजह है कि क्रान्तिकारी सर्वहारा वर्ग मज़दूर वर्ग के संघर्षों को महज़ उसकी विशिष्ट आर्थिक माँगों तक सीमित करने देने की संसदीय वामपंथी व संशोधनवादी दलों की अर्थवादी लाइन का विरोध करता है। राजनीतिक जनवाद के हर सवाल पर संघर्ष करके, शोषण और दमन के हर मसले पर शासक वर्गों की मुख़ालफ़त करके ही सर्वहारा वर्ग व्यापक मेहनतकश जनता को जागरूक, गोलबन्द और संगठित कर सकता है और उसके क्रान्तिकारी नेतृत्व की भूमिका को निभा सकता है।
इसलिए आज भी मताधिकार के बेहद महत्वपूर्ण राजनीतिक जनवादी अधिकार के प्रभावत: छीन लिये जाने के विरुद्ध सर्वहारा वर्ग और जनता की ताक़तों को पुरज़ोर तरीक़े से आवाज़ उठानी होगी। इसके लिए एक ओर क्रान्तिकारी कम्युनिस्ट संगठनों व ग्रुपों को, चाहे वे क्रान्ति का कोई भी कार्यक्रम मानते हों, चाहे वे कोई भी रणनीति व आम रणकौशल मानते हों, एक फ़ासीवाद-विरोधी मोर्चे में साथ आना चाहिए। वहीं दूसरी ओर, ऐसे मोर्चे को पूँजीवादी विपक्ष के उन दलों के साथ भी रणकौशलात्मक विशिष्ट और मुद्दा-आधारित मोर्चा बनाना चाहिए जो वोट-चोरी और चुनावी धाँधली के समूचे गोरखधंधे के विरुद्ध सड़कों पर उतर कर जनता को गोलबन्द करने और उनके साथ लड़ने के लिए तैयार हों। कहने की आवश्यकता नहीं है कि ऐसे मोर्चे में क्रान्तिकारी सर्वहारा वर्ग को अपनी राजनीतिक स्वतन्त्रता के साथ काम करना चाहिए और इस राजनीतिक स्वतन्त्रता के साथ एक बुनियादी राजनीतिक जनवादी अधिकार के प्रश्न पर लड़ने को तैयार सभी विपक्षी दलों से भी विशिष्ट रणकौशलात्मक मोर्चा अवश्य ही बनाना चाहिए।
लेकिन दिक्कत यह है कि अभी तक कोई विपक्षी दल इस प्रश्न पर सड़कों पर उतरकर जुझारू तरीक़े से लड़ने के लिए तैयार नहीं दिख रहा है। एक पूँजीवादी राजनीतिक विशेषज्ञ परकला प्रभाकर ने विपक्षी दलों से कहा है कि उनके साँसदों और विधायकों को इस्तीफ़ा दे देना चाहिए और चुनावों में तब तक हिस्सेदारी नहीं करनी चाहिए जब तक कि चुनावी धाँधली बन्द नहीं की जाती, केचुआ को मोदी-शाह के चंगुल से मुक्त नहीं कराया जाता और चुनावी व्यवस्था में सुधार नहीं किया जाता। तब तक चुनावों में भागीदारी करके वे चुनावी घोटाले को वैधता प्रदान कर रहे हैं। इस सलाह के हर बिन्दु से सहमत हुए बिना यह मानना होगा कि इसमें सत्यांश है। जब तक पूँजीवादी विपक्षी दल इस चुनावी धाँधली को मुद्दा बनाकर सड़कों पर नहीं उतरते तब केवल चुनावों में हिस्सेदारी करके वे इस चुनावी धाँधली को वैधता ही प्रदान करेंगे। चुनावों में भागीदारी का अर्थ भी तभी होगा जब ये दल वोट-चोरी और चुनावी धाँधली के विरुद्ध सड़कों पर आन्दोलनरत होकर यह कार्य करें।
लेकिन भाजपा और संघ परिवार द्वारा की जा रही व्यवस्थित चुनावी धाँधली का मुक़ाबला करने के लिए आन्दोलन खड़ा करने हेतु इन दलों के पास कोई मज़बूत सांगठनिक ढाँचा मौजूद नहीं है। साथ ही, भाजपा ने सभी विपक्षी दलों के भीतर भी घुसपैठ कर रखी है, जिसे ख़त्म किये बिना कोई भी विपक्षी पूँजीवादी दल पार्टी में फूट का ख़तरा उठाये बिना ऐसा क़दम उठाने की क्षमता नहीं रखता है। अमित शाह न सिर्फ़ भाजपा की रणनीति तय करने का काम करते हैं, बल्कि आंशिक तौर पर वह अन्य पूँजीवादी चुनावी दलों की रणनीति निर्माण में भी अपने एजेण्टों के ज़रिये हस्तक्षेप करते हैं। ऐसे में, इस समय राहुल गाँधी बिहार विधानसभा चुनावों में हुई चुनावी धाँधली को साक्ष्य समेत बेनक़ाब करने का वायदा मात्र कर रहे हैं और अन्य राज्यों में एसआईआर को रोकने के लिए प्रयास करने की बात कर रहे हैं। लेकिन जनता का एक अच्छा-ख़ासा हिस्सा अब इस चुनावी धाँधली से वाक़िफ़ है और किसी नये साक्ष्य को प्रस्तुत कर देने मात्र से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ने वाला है। इतना स्पष्ट है कि पूँजीवादी विपक्षी दल जनता के इस बुनियादी राजनीतिक अधिकार, यानी मताधिकार की हिफ़ाज़त के लिए कोई जुझारू लड़ाई लड़ने की क्षमता, मूलत: और मुख्यत:, खो चुके हैं। जनता का कोई स्वत:स्फूर्त आन्दोलन उन्हें उनकी इच्छा या क्षमता के विपरीत अवश्य सड़कों पर उतरने को मजबूर कर सकता है, लेकिन तब भी ऐसे आन्दोलन में जनता की क्रान्तिकारी ऊर्जा का स्वत:स्फूर्त विस्फोट मुख्य प्रेरक तत्व की भूमिका निभायेगा।
यह नवउदारवादी दौर में आम तौर पर पूँजीवादी पार्टियों की स्थिति को बयान करता है, यह सिर्फ़ भारत में पूँजीवादी पार्टियों की पुंसत्वहीनता का प्रश्न नहीं है। इसके विपरीत, नवउदारवादी दौर की दूसरी ख़ासियत यह है कि बढ़ती सामाजिक व आर्थिक असुरक्षा और अनिश्चितता के आम ऐतिहासिक व राजनीतिक सन्दर्भ में यह शक्तिशाली फ़ासीवादी व नवफ़ासीवादी आन्दोलनों और पार्टियों के उभार की ज़मीन तैयार करता है, जो बीसवीं सदी के जर्मन नात्सी या इतालवी फ़ासीवादी शासन के समान पूँजीवादी लोकतन्त्र के खोल को, यानी संसदीय व्यवस्था, चुनाव आदि को औपचारिक तौर पर भंग नहीं करते, बल्कि उस खोल को बरक़रार रखते हुए उसकी अन्तर्वस्तु को लगातार नष्ट करते हैं। नतीजतन, काग़ज़ों पर पूँजीवादी लोकतन्त्र बना रहता है, लेकिन उसके द्वारा प्रदत्त तमाम राजनीतिक अधिकार, संस्थाएँ व प्रक्रियाएँ प्रभावत: बेमानी हो जाते हैं। विशेष तौर पर, 2014 से हम भारत में यही प्रक्रिया देखते आ रहे हैं। इसके पीछे फ़ासीवादी संगठन द्वारा बुर्जुआ राज्यसत्ता के निकायों में योजनाबद्ध घुसपैठ और समाज के पोरों में फ़ासीवादियों द्वारा की गयी लम्बी घुसपैठ खड़ी है। हम ‘बिगुल’ के पन्नों पर इस प्रक्रिया के बारे में 2009 से लगातार लिखते आ रहे हैं और पिछले 16 वर्षों ने हमारी इन बातों को सारत: सही सिद्ध किया है।
इसमें कोई शक़ नहीं है कि जनता में उसके मताधिकार के बुनियादी राजनीतिक अधिकार को प्रभावत: रद्द किये जाने की मोदी-शाह शासन की साज़िशों को लेकर असन्तोष है। लेकिन साथ ही कोई राजनीतिक नेतृत्व, दिशा और कार्यक्रम न होने के कारण उनमें एक प्रकार की हताशा और तटस्थता का भाव भी है। ज़ाहिर है, विकल्पों के अभाव में जब जनता के अधिकार लगातार छीने जाते हैं तो शान्ति की प्रतीतिगत स्थिति हमेशा बनी नहीं रहती है। जनता का यह गुस्सा और असन्तोष कभी न कभी फूटकर सड़कों पर बहता है। लेकिन बिना किसी राजनीतिक नेतृत्व और संगठन के ऐसे विस्फोट कोई स्थायी समाधान नहीं पेश कर पाते। वे अक्सर ज़्यादा से ज़्यादा एक जनविद्रोह की शक़्ल ले पाते हैं, जैसा कि बांग्लादेश, श्रीलंका और नेपाल में हुआ। लेकिन शासक वर्ग ऐसे विद्रोहों से उसके शासन और राज्यसत्ता में पैदा होने वाले उथल-पुथल और विक्षोभ को जल्द ही क़ाबू में कर लेता है। तात्कालिक तौर पर, कोई सुधारवादी दिखने वाला चेहरा जनता के सामने आगे कर दिया जाता है ताकि जनता के गुस्से के झटके को सोखा जा सके। श्रीलंका में जेवीपी की सरकार, बांग्लादेश में मोहम्मद यूनुस की अन्तरिम सरकार और नेपाल में सुशीला कार्की की अन्तरिम सरकार लाकर यही किया गया था। बुनियादी राजनीतिक, सामाजिक व आर्थिक व्यवस्था में कोई परिवर्तन नहीं आया। जनता भी अपने गुस्से को ऐसी विद्रोही अभिव्यक्ति देने के बाद भ्रम का शिकार होकर घरों को वापस लौट जाती है और पूँजीपति वर्ग का शासन बरक़रार रहता है। इसलिए महज़ पूँजीवाद की कुछ अभिव्यक्तियों व लक्षणों पर स्वत:स्फूर्त विरोध और विद्रोह करने से चीज़ें नहीं बदलती हैं। उसके लिए एक क्रान्तिकारी राजनीति, संगठन और विचारधारा की आवश्यकता होती है। दुनियाभर में आज इन क्रान्तिकारी तत्वों के अभाव में ही विभिन्न स्वत:स्फूर्त पूँजीवाद-विरोधी विद्रोह और विरोध-आन्दोलन ज़्यादा से ज़्यादा कुछ तात्कालिक राहत व सुधार प्राप्त करके समाप्त हो जा रहे हैं। वास्तव में, 2007 में वैश्विक महामन्दी की शुरुआत के बाद से ही दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में हम बार-बार यह होता देख रहे हैं।
ऐसे में चिन्ता की बात यह है कि दुनिया के अधिकांश देशों में और हमारे देश में भी कोई ऐसी देशव्यापी क्रान्तिकारी मज़दूर पार्टी मौजूद नहीं है, जो मौजूदा समय के अनुसार सही कार्यक्रम और सही राजनीतिक लाइन से लैस हो। ऐसी पार्टी का निर्माण करना आज का सबसे बुनियादी कार्यभार है। लेकिन आज जो राजनीतिक स्थिति देश में मौजूद है, उसके मद्देनज़र ऐसी पार्टी के निर्माण के समय तक फ़ासीवाद-विरोधी जुझारू जनान्दोलनों को खड़ा करने के कार्यभार को निलम्बित नहीं किया जा सकता है। वस्तुत:, ऐसे जनान्दोलनों को खड़ा करने की प्रक्रिया में ही ऐसी पार्टी का निर्माण भी किया जा सकता है। क्योंकि सही राजनीतिक लाइन और कार्यक्रम स्वयं ऐसे आन्दोलनों की प्रक्रिया में ही निर्मित होते हैं, जनता के बीच प्राधिकार स्थापित करते हैं और सांगठनिक रूप धारण करते हैं। राजनीतिक लाइन व कार्यक्रम के सहीपन की परख इसी प्रक्रिया में हो सकती है। यह क्रान्तिकारी जनदिशा का बुनियादी उसूल है। सही विचार आसमान से नहीं टपकते। वे सामाजिक व्यवहार से और सामाजिक व्यवहार में संलग्न मेहनतकश जनता के बीच से ही पैदा होते हैं और इसी प्रक्रिया में क्रान्तिकारी पार्टी का काम जनता के बीच बिखरे, अव्यवस्थित, अविकसित सही विचारों को संगठित करना, व्यवस्थित करना, विकसित करना और उन्हें एक संश्लेषित करके एक सही राजनीतिक लाइन का स्वरूप देना होता है।
ऐसे जनान्दोलनों को खड़ा करने के लिए छोटी-बड़ी सभी क्रान्तिकारी सर्वहारा ताक़तों को आज एक फ़ासीवाद-विरोधी संयुक्त मोर्चा बनाने की ज़रूरत है। साथ ही, पूँजीवादी विपक्ष को भी व्यापक जनदबाव पैदा कर ऐसे क्रान्तिकारी फ़ासीवाद-विरोधी मोर्चे के साथ विशिष्ट मुद्दा-आधारित एकता बनाने के लिए मजबूर किया जाना चाहिए। लेकिन ऐसे किसी भी मोर्चे में क्रान्तिकारी शक्तियों को अपनी राजनीतिक स्वतन्त्रता को पूरी तरह बरक़रार रखना चाहिए क्योंकि ऐसे जनान्दोलन की बागडोर अगर पूँजीवादी विपक्षी दलों के भरोसे छोड़ दी जाती है तो उसकी नियति में बिखर जाना ही लिखा होगा। इन पूँजीवादी दलों के सामने ऐसे मोर्चे में दो ही रास्ता होगा: या तो उन्हें जनता की जायज़ राजनीतिक माँगों का समर्थन करना होगा और उनके आन्दोलन का पुरज़ोर तरीक़े से साथ देना होगा या फिर अपने जनविरोधी चरित्र को जनता के सामने पूरी तरह से बेनक़ाब कर देना होगा। जनता भी समूची राजनीतिक परिस्थिति और उसमें मौजूद शक्तियों का एक सही आकलन इसी प्रक्रिया में विकसित करती है। आज क्रान्तिकारी सर्वहारा वर्ग के लिए यही राजनीतिक कार्यक्रम प्रासंगिक है और यही उसके वर्ग संघर्ष को अगली मंज़िल में ले जाता सकता है।
इसलिए आज का तात्कालिक राजनीतिक कार्यभार यह है कि सभी क्रान्तिकारी सर्वहारा शक्तियाँ एक आम फ़ासीवाद-विरोधी मोर्चे में साथ आयें, चुनावी धाँधली और अन्य पूँजीवादी जनवादी अधिकारों के फ़ासीवादी मोदी-शाह सत्ता द्वारा हनन के विरुद्ध एक जुझारू जनान्दोलन खड़ा करें, मुद्दा-आधारित विशिष्ट फ़ासीवाद-विरोधी मोर्चे में शामिल होने के लिए अन्य विपक्षी पूँजीवादी दलों पर नीचे से जनदबाव पैदा करें और उनके द्वारा जनता से किये जाने वाले हर विश्वासघात को जनता के समक्ष उजागर करें, इस प्रक्रिया में समूची पूँजीवादी व्यवस्था, पूँजीपति वर्ग और उसके दलों की सच्चाई को जनता के सामने उजागर करें। इन कार्यभारों को पूरा करने के लिए क्रान्तिकारी मज़दूर पार्टी खड़ा करने के प्रयासों में संलग्न सर्वहारा क्रान्तिकारी शक्तियों को पहलक़दमी की भूमिका निभानी चाहिए।
मज़दूर बिगुल, नवम्बर 2025













