भारतीय संविधान के 75 साल
संविधान का हवाला देकर फ़ासीवाद से मुक़ाबले की ख़ामख्याली फ़ासीवाद-विरोधी संघर्ष के लिए घातक सिद्ध होगी!
वारुणी
बीते 26 नवम्बर को संविधान के 75 साल पूरे हुए और इस अवसर पर माकपा, भाकपा और भाकपा माले ने ‘संविधान बचाओ’ का नारा देते हुए प्रतिक्रियावादी और फ़ासीवादी ताक़तों से संघर्ष करने की न सिर्फ़ बातें की बल्कि आम जन के बीच ‘संविधान बचाओ’ अभियान भी ज़ोरों शोरों से चलाया (मतलब कि जितना ज़ोर अब इन संशोधनवादियों में बाक़ी है!)। ये तमाम सामाजिक-जनवादी ताक़तें फ़ासीवादी भाजपा और संघ का मुक़ाबला अब संविधान से करेंगी! माकपा तो पहले ही लोकसभा चुनावों के अपने घोषणापत्र में लिख चुकी थी कि भाजपा आरएसएस असल में संविधान की “आत्मा” पर हमला कर रहे हैं! माकपा के अनुसार संविधान जिन धर्मनिरपेक्ष और समाजवादी मूल्यों पर आधारित है, उसे भाजपा ख़त्म कर रही है। हालाँकि संविधान के इन “मूल्यों” की असलियत को ख़ुद देश के सुप्रीम कोर्ट ने बेलागलपेट बयान कर दिया था कि यह समाजवादी लुक़मा असल में और कुछ नहीं बल्कि कल्याणकारी व राजकीय पूँजीवाद की नीतियाँ हैं, इसे वास्तव में समाजवाद समझकर डरने की कोई आवश्यकता नहीं है! माकपा अब लोगों के जीवन की बदतर स्थितियों को ठीक करने के लिए उन्हीं कल्याणकारी नीतियों की ओर लौटने की वकालत करती है। उनके अनुसार, लोगों की ये बदतर होती स्थितियाँ बस क्रोनी कैपिटलिज़्म (मतलब पूँजीपतियों के साथ राज्य के भ्रष्ट लेन-देन वाला पूँजीवाद) और साम्प्रदायिक-कॉरपोरेट गठजोड़ का नतीज़ा है, और इससे निपटने के लिए वह महज़ कुछ चुनावी जोड़-तोड़ कर भाजपा को सत्ता से हटाने की वकालत करती हैं। भाकपा भारत में फ़ासीवाद की स्थापना को स्वीकार करने के बाद अपने को ‘संविधान बचाओ’ तक ही सीमित रखती है और संविधान प्रदत्त “धर्मनिरपेक्ष, कल्याणकारी” और संघीय ढाँचे की वकालत करती है। दूसरी तरफ़ भाकपा माले लिबरेशन द्वारा अपने ‘लिब-लिब’ चरित्र का प्रदर्शन सबसे बेशर्मी से किया गया । इसने बीते 26 नवम्बर से दो महीने लम्बे ‘संविधान बचाओ’ अभियान को पूरे देश भर में चलाया! अपने दो माह लम्बे ‘संविधान बचाओ’ अभियान के तहत भाकपा माले लिबरेशन ने कई स्थानों पर संविधान की प्रस्तावना के शिलापट्ट का उद्घाटन भी किया और बिहार में कई जिलों में तिरंगा रैलियाँ निकालीं! ये भी संविधान के “सिद्धान्तों और आदर्शों” को बचाने के लिए ‘संविधान बचाओ-लोकतन्त्र बचाओ’ का नारा देते फिरते हैं। इनके अनुसार संविधान बचाकर ही आज भाजपा- आरएसएस जैसी ताक़तों से लड़ा जा सकता है।
यदि ये तमाम पार्टियाँ किसी निरंकुश तानाशाह/फ़ासीवादी ताक़त द्वारा संविधान को ख़त्म करने की बात कर रही हैं, तो बताते चलें कि वास्तव में मोदी सरकार को अपनी जनविरोधी नीतियों को लागू करने के लिए कभी संविधान में कोई संशोधन करने की आवश्यकता नहीं पड़ी है। उलटे इस संविधान में वे सारे प्रावधान पहले से ही मौजूद थे, जो मोदी सरकार को उन तमाम जनविरोधी नीतियों को लागू करने का अधिकार देते हैं, जो उसने लागू की हैं! फ़ासीवादी ताक़तें आम तौर पर संविधान और नियम-क़ायदे का उल्लंघन किये बिना ही सत्ता में पहुँचती हैं। जर्मनी में हिटलर का सत्ता में आना या भारत में मोदी के सत्तासीन होना, इसकी मिसालें हैं। दूसरी बात आज के दौर के फ़ासीवाद को इस बात की ज़रूरत ही नहीं है कि वह संविधान या बुर्जुआ जनवादी संस्थाओं को रूप के धरातल पर यानी औपचारिक तौर पर ख़त्म कर दे। एकाधिकारी पूँजीवाद के युग के नवउदारवादी दौर में जिस प्रकार जनवादी मूल्यों का क्षरण हुआ है, और ख़ुद बुर्जुआ वर्ग की बची-खुची बुर्जुआ जनवादी अन्तर्वस्तु का विघटन हुआ है उसने यह सम्भव बना दिया है कि फ़ासीवादी ताक़तें अपने तमाम मंसूबों को बिना बुर्जुआ जनवाद के खोल का परित्याग किये अंजाम दे सकती हैं। बीसवीं सदी के फ़ासीवाद को भले ही बुर्जुआ राज्यसत्ता के बुर्जुआ जनवादी अस्तित्व-रूप, यानी संसद, विधानसभाओं, चुनावों आदि को रद्द करने की ज़रूरत पड़ी हो, लेकिन आज के नवउदारवादी दौर में फ़ासीवाद को आम तौर पर बुर्जुआ जनवाद के खोल को नष्ट करने की ज़रूरत नहीं। दूसरी बात यह कि फासीवादी ताकतें भी अपने अतीत से सबक लेते हुए भी बुर्जुआ जनवादी अस्तित्व-रूप को नष्ट करने की हिमायत नहीं करतीं। जिस रूप में जर्मनी और इटली में बुर्जुआ राज्यसत्ता के जनवादी अस्तित्व रूप को ख़त्म कर नंगी तानाशाही लागू करने की वजह से फ़ासीवादी ताक़तों का उस देश के राजनीतिक परिदृश्य से लम्बे समय के लिए पूरी तरह सफ़ाया हो गया था, आज फ़ासीवादी ताक़तें ऐसी स्थिति दुबारा से नहीं बनने देना चाहेंगी। और चूँकि नवउदारवादी दौर में निरंकुश राज्यसत्ता के उदय के साथ फ़ासीवादी ताक़तों को अपने मंसूबों को पूरा करने के लिए बुर्जुआ जनवादी खोल किसी भी प्रकार की बाधा उत्पन्न नहीं करता, इसलिए उसे इस खोल का परित्याग करने की ज़रूरत ही नहीं है। आज चाहे वह श्रम क़ानूनों को ख़त्म कर देने की नीति हो, या उपासना स्थल क़ानून को तब्दील करने की बात हो, या फ़िर जन-विरोधी नागरिकता क़ानून को लागू करने की बात हो, या भारतीय दण्ड संहिता में तब्दीली की बात हो या फ़िर वह ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ करवाने की बात हो – यह सारे जन-विरोधी क़दम और जनवादी अधिकारों को ख़त्म करने के हथकण्डे बिल्कुल संवैधानिक तरीक़े से अपनाये जा रहे हैं!
असल में आज जिस प्रकार राज्यसत्ता के तमाम अंगों में मसलन नौकरशाही, पुलिस, सेना, न्यायपालिका में फ़ासीवादी ताक़तों ने घुसपैठ कर अपनी फ़ासीवादी पकड़ मज़बूत की है कि उन्हें अपने बहुदलीय संसदीय जनवादी प्रणाली, संविधान और संसद को ख़त्म करने की ज़रूरत नहीं! यही वजह है कि जहाँ एक तरफ संसदीय वामपन्थी और सामाजिक जनवादी संविधान का हवाला दे रहे हैं, वहीँ दूसरी तरफ़ भाजपा भी इसी लुक़मे का इस्तेमाल कर रही है। मोदी सरकार ने संविधान के 75 साल पूरे होने पर ‘हमारा संविधान हमारा स्वाभिमान’ अभियान शुरू किया है। भाजपा पार्टी दो सप्ताह से राष्ट्रव्यापी संविधान गौरव अभियान चलाते हुए संवैधानिक मूल्यों की “हिफ़ाज़त” में लगी है! इसमें भाजपा-संघ परिवार पूरी तरह से अम्बेडकर को अपने फ़ासीवादी प्रोपोगैण्डा में सहयोजित करने में लगा हुआ है। फ़ासीवादी प्रचार का यही चरित्र होता है कि वह अपने मूल में व्यवहारवादी (प्रैग्मैटिस्ट) होता है, यानी उसे जब जो जैसे इस्तेमाल करना होता है, वह उन प्रतीकों या व्यक्तित्वों का वैसे इस्तेमाल करता है। वह एक ख़ास तबके को काल्पनिक शत्रु के रूप में निर्मित करता है, जिसे वह हर समस्या की जड़ बताता है। भारत के परिप्रेक्ष्य में यह अल्पसंख्यक मुस्लमान आबादी है। अपने गढ़े गए इसी काल्पनिक शत्रु के बरक्स फ़ासीवादी ताक़तें एक शुद्ध रूप से विचारधारात्मक समुदाय का निर्माण करती हैं। “हिन्दू राष्ट्र” की स्थापना की बात करते हुए वे एक ऐसे समुदाय को गढ़ती हैं, जिसके सदस्यों में इसके अतिरिक्त कुछ भी साझा नहीं कि वे मुसलमान नहीं हैं। उन्हें अपने इस ‘हिन्दू राष्ट्र’ में दलितों और पिछड़ी जातियों को भी सहयोजित करना है, ठीक इसलिए ही वे अम्बेडकर का नाम इस्तेमाल कर रही हैं और संविधान के मूल्यों की रक्षा का हवाला देकर पिछड़ी जाति से आने वाले लोगों को अपने फ़ासीवादी प्रचार का निशाना बना रही है। और अम्बेडकर की व्यवहारवादी विचारधारा के कारण कहीं न कहीं उनके प्रतीक का यह सहयोजन सम्भव भी हो जाता है।
हम साफ़ देख सकते हैं कि भाजपा को संविधान का हवाला देने और उसकी दुहाई देने में कोई समस्या नहीं, उलटे फ़ायदा है। और संविधान में पहले से ही वे सारे प्रावधान मौजूद हैं जो भाजपा जैसी फ़ासीवादी ताक़तों को अपने मंसूबों को लागू करने के लिए चाहिए! जिस संविधान का हवाला देकर तमाम तथाकथित वामपन्थी पार्टियाँ जनवाद, धर्मनिरपेक्षता और समानता व समाजवादी मूल्यों को बचाने की बात कर रही हैं, असल में वह संविधान अपने आप में बेहद सीमित जनवाद को मुहैय्या कराता है। ख़ुद संविधान बनने की प्रक्रिया ही गैर-जनवादी रूप से पूरी हुई, जहाँ देश के मात्र 11.5 प्रतिशत अभिजातों द्वारा चुनी गयी संविधान सभा ने संविधान निर्माण का काम किया। यह संविधान सभा सार्विक मताधिकार के आधार पर चुनी ही नहीं गयी थी। जिस संविधान को कुछ लोग जनवाद की “पवित्र पुस्तक” बताने में लगे हैं, उसमें आदर्शों की तमाम लफ़्फ़ाज़ियाँ दुनिया के विभिन्न संविधानों से हूबहू उतार ली गयी हैं, लेकिन जहाँ तक मूल अन्तर्वस्तु का सवाल है, इसकी आधे से अधिक धाराएँ औपनिवेशिक भारत के 1935 के ‘गवर्नमेंट ऑफ़ इण्डिया एक्ट’ से ज्यों की त्यों उठायी गयी हैं। अभी हाल में “गुलामी की मानसिकता से मुक्ति” का हवाला देकर अमित शाह द्वारा भारतीय दण्ड संहिताओं में बदलाव करना भी कोई गै़र-संवैधानिक प्रक्रिया के ज़रिये नहीं हुआ। इन दण्ड संहिताओं में तब्दीली करके बेरोज़गारी, महँगाई और ग़रीबी से तंग जनता के बढ़ते जनाक्रोश के ख़तरे को देख फ़ासीवादी भाजपा द्वारा पहले ही उसे कानूनसम्मत तरीके से कुचल डालने के इन्तेज़ामात किये जा रहे हैं। और यह सब बुर्जुआ संवैधानिक फ्रेमवर्क के भीतर ही हो रहा है। साफ़ है कि भाजपा को अपने फ़ासीवादी मंसूबों को पूरा करने के लिए न तो पूँजीवादी जनवाद के खोल को त्यागने की ज़रूरत है और न ही संविधान पर हमला करने की।
दूसरी ओर जिस संविधान को समाजवाद के मूल्य पर आधारित पवित्र ग्रन्थ बताया जाता है, उसकी सच्चाई तो खुद हाल में सुप्रीम कोर्ट ने बयां कर दी थी। यह समाजवाद और कुछ नहीं बल्कि कल्याणकारी पूँजीवादी राज्य का नमूना है। इस नेहरूकालीन राजकीय पूँजीवाद को समाजवाद कहना या तो एक मूर्खता है या संशोधनवादी पार्टियों की धूर्तता! भारतीय संविधान में उल्लिखित धर्मनिरपेक्षता भी अपने ऐतिहासिक अर्थों में धर्मनिरपेक्षता है ही नहीं। धर्मनिरपेक्षता का भारतीय संस्करण ‘सर्व-धर्म-सद्भाव’ बन गया है। और इसी ‘सर्व धर्म सद्भाव’ का नतीज़ा है कि पीछे 76 सालों में धर्म को राजनीति के साथ मिलाया जाता रहा है और धर्म का राजनीतिक इस्तेमाल हर पार्टियों ने किया है। धर्मनिरपेक्षता या सेक्युलरिज़्म का असल मतलब होता है राजनीति और सामाजिक जीवन से धर्म का पूर्णतः विलगाव। धर्म हर किसी का निजी मसला हो और राजनीति व सामाजिक जीवन से उसका कोई रिश्ता न हो। लेकिन भारत में ऐसा कभी नहीं रहा। राजनीति, शिक्षा और सार्वजनिक जीवन में धर्म की दखलन्दाजी फासिस्टों के सत्तारूढ़ होने के पहले भी थी, राजनीति में धर्म का खुलेआम इस्तेमाल होता था और धार्मिक ध्रुवीकरण की आँच पर कांग्रेस सहित अन्य बुर्जुआ पार्टियाँ भी अपनी रोटियाँ सेंका करती थीं।
अच्छे से अच्छा बुर्जुआ जनवादी संविधान भी अपने मूल में बुर्जुआ वर्ग के शासन का ही आधार-ग्रन्थ होता है। संविधान में दिये गये जितने अधिकार है, उनके कार्यान्वयन की यदि बात करें तो आबादी में वर्गीय स्तर पर आप जितने नीचे जायेंगे, संविधान और जनवाद की बातें उतनी ही हवा-हवाई होती जाएँगी। कांग्रेस की सरकार ने भी इसी संविधान का इस्तेमाल कर मज़दूरों, मेहनतक़शों, दलितों, आदिवासियों, स्त्रियों के क्रान्तिकारी आन्दोलनों को कुचलने का बखूबी काम किया। चाहे वह मारुति के मज़दूरों का दमन हो या आँगनवाड़ी महिलाकर्मियों पर थोपा गया एस्मा क़ानून हो, या क्रान्तिकारी जन आन्दोलनों को कुचलने के लिए दिया गया कोई क़ानूनी तर्क हो – यह सब इसी बात को दिखाता है कि अंततः यह संविधान बुर्जुआ वर्ग की ही सेवा में लगा होता है। जनता को यह बेहद सीमित अधिकार देता है। इसलिए क्रान्तिकारी मज़दूर वर्ग के लिए ‘संविधान बचाओ’ का नारा कोई रणनीतिक क्षितिज या लक्ष्य नहीं है।
सच है कि तमाम कमियों के बावजूद भी यह संविधान हमें सीमित ही सही लेकिन जनवादी अधिकार देता है। हालाँकि ये अधिकार भी जनता के संघर्षों के कारण ही मिले हैं। और इसी अतिसीमित, रहे-सहे जनवादी अधिकारों पर भी फ़ासीवादी भाजपा संघ परिवार डाका डाल रहे हैं और जनता को उनके जनवादी अधिकारों से वंचित कर रहे हैं, तो बेशक आज इन सीमित सही, पर जनवादी संवैधानिक अधिकारों की हिफ़ाज़त के लिए सड़कों पर उतर कर लड़ना होगा। क्योंकि जनवादी अधिकारों पर हो रहा हर हमला मज़दूर वर्ग पर भी हमला है। मज़दूर वर्ग को राजनीतिक रूप से संगठित होने के लिए भी सबसे मुफ़ीद स्थिति व्यापक जनवाद की स्थिति में ही होगी। इसलिए हमें अपने जनवादी और नागरिक अधिकारों की लड़ाई कतई नहीं छोड़नी चाहिए। और एक सुसंगत जनवाद के लिए हमेशा संघर्ष करना चाहिए। इस लड़ाई में संवैधानिक निदानों और प्रावधानों का बेशक भरपूर इस्तेमाल करना चाहिए, संवैधानिक वायदों-करारों से फ़ासिस्टों के विश्वासघात को भी उजागर करना चाहिए और संविधान-प्रदत्त अतिसीमित ही सही लेकिन उन जनवादी अधिकारों के भी अपहरण के ख़िलाफ़ संघर्षरत रहना चाहिए। लेकिन इस प्रक्रिया में संविधान को जनवाद की “पवित्र पुस्तक” कतई नहीं बनाया जा सकता है। न ही इस लड़ाई को महज़ जनवादी अधिकारों की लड़ाई तक सीमित कर देना चाहिए। क्योंकि असल में जनवादी अधिकारों पर हो रहे ये हमले एक फ़ासीवादी सत्तारूढ़ पार्टी द्वारा किये जा रहे हमले हैं।
‘संविधान बचाओ’ के नारे से फ़ासीवाद से मुक़ाबले की ख़ामख्याली हमें कत्तई नहीं पालनी चाहिए। आज तमाम संशोधनवादी व संसदीय वामपन्थी पार्टियाँ ठीक यही काम कर रही हैं! वे ऐसा क्यों कर रही हैं? क्योंकि वे इस मुगालते में हैं कि फ़ासीवाद को सत्ता के उखाड़ करके किसी प्रकार के शुद्ध-बुद्ध बुर्जुआ जनवाद को स्थापित किया जा सकता है। इसलिए ही माकपा, भाकपा सरीखी पार्टियाँ वापस उसी कल्याणकारी राज्य की और रुख करने की बात कर रही हैं, जिसका युग बीत चुका है और जो तब भी मेहनतकश अवाम को कुछ ख़ैरात के अलावा कुछ नहीं देता था। असल में सामाजिक जनवादी पार्टियों की यही समस्याएँ थी जिसने जर्मनी और इटली फ़ासीवाद की प्रतिरोध्य उभार को अप्रतिरोध्य उभार में तब्दील कर दिया था। एक तरफ़ यही पार्टियाँ अर्थवाद और ट्रेडयूनियनवाद की राजनीति करते हुए मज़दूर वर्ग को एक राजतीतिक वर्ग के रूप मे संगठित होने से रोकती हैं। और दूसरी तरफ़ ये आम जनता को संविधान और बुर्जुआ जनवाद का हवाला देकर इसी व्यवस्था की चौहद्दी तक सीमित रखती हैं। असल में फ़ासीवाद के पैदा होने की ज़मीन ही यहीं से तैयार होती है, जब ये नकली लाल झण्डे वाली पार्टियाँ और वर्ग सहयोगवाद, मज़दूरवाद व अर्थवाद की वकालत करने वाले संगठनों की नीति मज़दूर वर्ग को राजनीतिक वर्ग के रूप में विकसित होने में बाधाएँ खड़ी करती हैं। हमें इन तमाम नकली लाल झण्डे वाली पार्टियों से सचेत हो जाना चाहिए। आज इनकी असलियत को समझने की ज़रूरत है और इनका जनता के बीच पर्दाफ़ाश करने की ज़रूरत है। असल में इन तमाम संसदीय वामपन्थी पार्टियों के लिए फ़ासीवाद से मुक़ाबला बस एक चुनावी जोड़-तोड़ की रणनीति तक सीमित रहता है। भाजपा से मुक़ाबले के नाम पर कभी ये कांग्रेस की गोद में जाकर बैठते हैं, तो कभी ‘जय लालू-लाल सलाम’ के घटिया नारे लगते हुए बेशर्मी से पूँजीवादी पार्टियों की पूँछ में कंघी करते फिरते हैं।
“संविधान बचाओ” का नारा अपने आप में इसी व्यवस्था की चौहद्दी के भीतर हमारे संघर्ष को समाप्त कर देने वाला नारा है। हमें समझना होगा कि फ़ासीवाद के विरुद्ध लड़ाई में जब हम किसी प्रकार के बुर्जुआ जनवाद की पुनर्स्थापना की बात करते हैं तो वह फ़ासीवाद के विरुद्ध चल रही लड़ाई में बेहद घातक और आत्मघाती सिद्ध हो सकता है। हमें यह समझना होगा कि फ़ासीवाद का विकल्प किसी किस्म का शुद्ध-बुद्ध बुर्जुआ जनवाद नहीं हो सकता। असल में फ़ासीवाद आज के दीर्घकालिक मन्दी के दौर में एक कमोबेश स्थायी परिघटना बन चुका है। पूँजीवादी संकट आज एक दीर्घकालिक मन्दी का रूप ले चुका है, जो नियमित अन्तरालों पर महामन्दी के रूप में भी फूटती रहती है। आज तेज़ी के दौर बेहद कम हैं, छोटे हैं और काफ़ी अन्तरालों पर आते हैं और अक्सर वास्तविक उत्पादक अर्थव्यवस्था में तेज़ी के बजाय सट्टेबाज़ वित्तीय पूँजी के बुलबुलों की नुमाइन्दगी करते हैं। ऐसे में, बुर्जुआ वर्ग का प्रतिक्रिया और निरंकुशता की ओर झुकाव, टुटपुँजिया वर्गों के बीच सतत् असुरक्षा और परिणामतः प्रतिक्रिया की ज़मीन लगातार मौजूद रहती है और वर्ग-संघर्ष के ख़ास नाज़ुक मौक़ों पर यह एक पूँजीपति वर्ग व पूँजीवादी राज्य के राजनीतिक संकट की ओर ले जाने की सम्भावना से परिपूर्ण स्थिति सिद्ध होती है। ऐसे में, फ़ासीवाद का उभार आपदा-समान, अचानक और तीव्र गति से होने वाली घटना का स्वरूप नहीं लेता, बल्कि उसे एक लम्बे ऊष्मायन काल यानी पकने के बेहद लम्बे दौर से पहचाना जाता है, जिसमें वह राज्यसत्ता का आन्तरिक ‘टेकओवर’ करता है और समाज की पोर-पोर में आणविक व्याप्ति को अंजाम देता है, बुर्जुआ जनवाद के राज्य-रूप का परित्याग नहीं करता, लेकिन उसकी अन्तर्वस्तु को लगातार नष्ट करता रहता है। विशिष्ट स्थितियों में फ़ासीवादी शक्तियाँ सरकारी सत्ता से बाहर भी जा सकती हैं। लेकिन इसका अर्थ उसका पूर्ण विध्वंस नहीं होता। बल्कि समाज और राज्यसत्ता में अपनी सुदृढ़ स्थितियों को फ़ासीवाद बनाये रखता है और दीर्घकालिक संकट की आम स्थितियों में वह फिर से सरकारी सत्ता में भी लौटता है। चूँकि इक्कीसवीं सदी का फ़ासीवाद इस रूप में अब एक निरन्तर ज़ारी परियोजना बन चुका है, इसलिए आज फ़ासीवाद का निर्णायक ध्वंस समाजवादी क्रान्ति के साथ ही सम्भव है। फ़ासीवाद के बदले कोई बुर्जुआ जनवाद या कल्याणकारी राज्य को स्थापित करने की सोच से ज़्यादा घातक पूरे फ़ासीवाद विरोधी रणनीति के लिए और कुछ भी नहीं।
मज़दूर बिगुल, फरवरी 2025
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