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बिहार विधानसभा चुनावों में भाजपा गठबन्धन की अभूतपूर्व विजय और हमारे कार्यभार

इसमें कोई शक़ नहीं है कि जनता में उसके मताधिकार के बुनियादी राजनीतिक अधिकार को प्रभावत: रद्द किये जाने की मोदी-शाह शासन की साज़िशों को लेकर असन्तोष है। लेकिन साथ ही कोई राजनीतिक नेतृत्व, दिशा और कार्यक्रम न होने के कारण उनमें एक प्रकार की हताशा और तटस्थता का भाव भी है। ज़ाहिर है, विकल्पों के अभाव में जब जनता के अधिकार लगातार छीने जाते हैं तो शान्ति की प्रतीतिगत स्थिति हमेशा बनी नहीं रहती है। जनता का यह गुस्सा और असन्तोष कभी न कभी फूटकर सड़कों पर बहता है। लेकिन बिना किसी राजनीतिक नेतृत्व और संगठन के ऐसे विस्फोट कोई स्थायी समाधान नहीं पेश कर पाते। वे अक्सर ज़्यादा से ज़्यादा एक जनविद्रोह की शक़्ल ले पाते हैं, जैसा कि बांग्लादेश, श्रीलंका और नेपाल में हुआ। लेकिन शासक वर्ग ऐसे विद्रोहों से उसके शासन और राज्यसत्ता में पैदा होने वाले उथल-पुथल और विक्षोभ को जल्द ही क़ाबू में कर लेता है। तात्कालिक तौर पर, कोई सुधारवादी दिखने वाला चेहरा जनता के सामने आगे कर दिया जाता है ताकि जनता के गुस्से के झटके को सोखा जा सके। श्रीलंका में जेवीपी की सरकार, बांग्लादेश में मोहम्मद यूनुस की अन्तरिम सरकार और नेपाल में सुशीला कार्की की अन्तरिम सरकार लाकर यही किया गया था। बुनियादी राजनीतिक, सामाजिक व आर्थिक व्यवस्था में कोई परिवर्तन नहीं आया। जनता भी अपने गुस्से को ऐसी विद्रोही अभिव्यक्ति देने के बाद भ्रम का शिकार होकर घरों को वापस लौट जाती है और पूँजीपति वर्ग का शासन बरक़रार रहता है। इसलिए महज़ पूँजीवाद की कुछ अभिव्यक्तियों व लक्षणों पर स्वत:स्फूर्त विरोध और विद्रोह करने से चीज़ें नहीं बदलती हैं। उसके लिए एक क्रान्तिकारी राजनीति, संगठन और विचारधारा की आवश्यकता होती है। दुनियाभर में आज इन क्रान्तिकारी तत्वों के अभाव में ही विभिन्न स्वत:स्फूर्त पूँजीवाद-विरोधी विद्रोह और विरोध-आन्दोलन ज़्यादा से ज़्यादा कुछ तात्कालिक राहत व सुधार प्राप्त करके समाप्त हो जा रहे हैं। वास्तव में, 2007 में वैश्विक महामन्दी की शुरुआत के बाद से ही दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में हम बार-बार यह होता देख रहे हैं।

मतदाता सूची संशोधन, 2025 : जनता के मताधिकार को चुराने के लिए भाजपा का हथकण्डा और पीछे के दरवाज़े से एनआरसी लागू करने की नयी साज़िश

इस पूरी प्रक्रिया को लागू करने की असली मंशा पीछे के दरवाज़े से NRC को लागू करने की भी है। NRC के द्वारा देश की मेहनतकश जनता के एक विचारणीय हिस्से से उसकी नागरिकता छीनने की साज़िश मोदी सरकार ने 6 साल पहले ही रची थी लेकिन उस समय जनान्दोलनों के दबाव के कारण वह उसे लागू नहीं कर पाई थी। आज चुनाव आयोग द्वारा पिछले दरवाज़े से उसी NRC को लागू करने की कोशिश की जा रही है। इसके द्वारा लोगों से पहले वोट देने का अधिकार छीना जायेगा उसके बाद उसे विदेशी व घुसपैठिया साबित कर उसके सारे जनवादी अधिकारों को छीन लिया जायेगा। इस मौक़े पर भी देश की मुख्य धारा की मीडिया (गोदी मीडिया ) सरकार के पक्ष में राय का निर्माण करने के अपने कर्तव्य को बख़ूबी निभा रही है। सुबह-शाम चीख-चीखकर मीडिया के एंकर इसे “देशहित” में बता रहे हैं।

“सामाजिक न्याय” के अलमबरदारों का अवसरवादी गँठजोड़ फ़ासीवादी राजनीति का कोई विकल्प नहीं दे सकता

पिछले साल जब जनता पार्टी से छिटके कई दलों के नेता भाजपा के विरुद्ध गठबन्धन बनाने के मकसद से दिल्ली में जुटे थे तभी से इतना तो तय था कि बुनियादी तौर पर एक ही नस्ल का होने के बावजूद अलग-अलग रंगों वाले ये परिन्दे बहुत लम्बे समय तक साथ-साथ नहीं उड़ सकते। फिलहाल अस्तित्व का संकट उन्हें एक साथ आने के लिए भले ही प्रेरित कर रहा हो, लेकिन इनकी एकता बन पाना मुश्किल है। इन छोटे बुर्जुआ दलों की नियति है कि ये केन्द्र में कांग्रेसनीत या भाजपानीत गठबन्धनों के पुछल्ले बनकर सत्ता-सुख में थोड़ा हिस्सा पाते रहें और कुछ अलग-अलग राज्यों में जोड़-तोड़ कर सरकारें चलाते रहें। पुरानी जनता पार्टी फिर से बन नहीं सकती और बन भी जाये तो बहुत दिनों तक बनी नहीं रह सकती। काठ की हाँड़ी सिर्फ़ एक ही बार चढ़ सकती है। सबसे बड़ी बात यह कि नवउदारवादी नीतियों पर आम सहमति के साझीदार ये सभी दल भी हैं और इनका साम्प्रदायिकता-विरोध चुनावी शतरंज की बिसात पर चली गयी महज़ एक चाल से अधिक कुछ भी नहीं है।

”विकासमान” बिहार में दम तोड़ते ग़रीबों के बच्चे!

तमाम बीमारियों से होने वाली ये मौतें दरअसल हत्याएँ हैं जो इस व्यवस्था द्वारा की जा रही हैं। यहाँ दवाइयाँ गोदामों में बेकार पड़ी रहती हैं और दूसरी तरफ दवाइयों के बिना मौतें होती रहती हैं। कुपोषण से मौतें हो रही हैं और उधर गोदामों में अनाज सड़ रहा है। सरकार और एन.जी.ओ. बीमारियों के इलाज़ के लिए कुछ-कुछ कर रहे हैं लेकिन बीमारियाँ कहाँ से पैदा हो रही हैं इसका जवाब इनके पास नहीं है, या जवाब होते हुए भी वे चुप हैं। अगर सभी को साफ़-सुथरा घर, स्वच्छ वातावरण, पौष्टिक आहार उपलब्ध हो तो लोग बहुत कम बीमार पड़ेंगे। मुनाफ़ा आधरित व्यवस्था में दवा कम्पनियाँ तो चाहती ही हैं कि लोग बीमार पड़ें ताकि उनकी दवाएँ ख़ूब बिकें! इसी काम के लिए डॉक्टरों को भी उनका हिस्सा दे दिया जाता है! नेता-मन्त्री, अफ़सर और मीडिया को भी उनका हिस्सा मिल जाता है जिससे काम बेरोकटोक चलता रहे। कुछ टुकड़े तमाम एन.जी.ओ. को व्यवस्था के दामन से ख़ून के धब्‍बों को साफ़ करने के लिए भी दे दिये जाते हैं।

फार्बिसगंज हत्याकाण्ड : नीतीश कुमार सरकार के ”सुशासन” का असली चेहरा!

पुलिस ने गाँव वालों को उनके घरों तक खदेड़-खदेड़ कर मारा। 18 वर्षीय मुस्तफा अंसारी को पुलिस ने चार गोलियाँ मारीं जिससे वह मृतप्राय अवस्था में ज़मीन पर गिर पड़ा। लेकिन इतने से उनकी हैवानियत शान्त नहीं हुई। सुनील कुमार नाम का पुलिस वाला ज़मीन पर पड़े अधमरे मुस्तफा के चेहरे पर कूद-कूदकर अपने पैरों से उसे कुचलने और अपने बूटों से उस पर पागलों की तरह प्रहार करने लगा जबकि वहाँ खड़े पुलिस वालों से लेकर प्रशासनिक अधिकारियों तक सब के सब तमाशबीन की तरह देखते रहे। पुलिस फायरिंग का शिकार दूसरा शख्स मुख्तार अंसारी था जिसे सिर में तीन और एक गोली जाँघ में लगी। पगलाई पुलिस ने गर्भवती माँ और सात माह के बच्चे तक को नहीं बख्शा। 6 माह की गर्भवती शाज़मीन खातून को 6 गोलियों (चार सिर में) से छलनी करने के बाद पुलिस के एक सिपाही ने ज़मीन पर पड़ी लाश पर राइफल की बट से वार कर उसके सिर को फाड़ डाला और उसका दिमाग़ बाहर आ गया। 7 माह के नौशाद अंसारी की दो गोलियाँ लगने से मौत हो गयी। इसके अलावा फायरिंग में आधा दर्जन से भी अधिक लोग घायल हुए। मरने वालों में सभी मुस्लिम थे।