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जनता के विरोध से घबराकर उत्तर प्रदेश सरकार ने एक बार फिर लगाया एस्मा!

उत्तर प्रदेश में लगे एस्मा का खास महत्व है। इसे हमें उत्तर प्रदेश के विभिन्न विभागों में बढ़ते असंतोष को दबाने के क्रम में देखने की ज़रूरत है। इस समय उत्तर प्रदेश में गहराते आर्थिक संकट, बिजली संकट और इन संकटों की वजह से बढ़ते जनाक्रोश की परिस्थिति से निपटने के लिए एस्मा लगाया गया है। अगले साल उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। चुनावों से पहले योगी सरकार अपने कुशासन और जनविरोधी शासन के ख़िलाफ़ किसी भी तरह के प्रतिरोध को पनपने से पहले ही कुचल देने कि कोशिशें कर रही है। इसीलिए योगी सरकार कभी एस्मा लगाती है तो कभी मज़दूर कार्यकर्ताओं के ऊपर रासुका जैसा दमनकारी क़ानून लगा दिया जाता है ताकि लोग अपनी बुनियादी माँगों मसलन शिक्षा, चिकित्सा, रोज़गार, आवास, न्यूनतम वेतन आदि के लिए एकजुट और संगठित न हो सकें।

उत्तर प्रदेश की भयाक्रान्त फ़ासीवादी योगी सरकार ने मई दिवस पर आतंक का माहौल बनाने के लिए नोएडा में लगायी धारा 163 की पाबन्दियाँ

जब नोएडा में मज़दूरों का संघर्ष शुरू हुआ तब योगी सरकार के “खुशहाल उत्तर प्रदेश”, “सुखी कार्मिक”, “विकास के पथ पर अग्रसर प्रदेश”, वगैरह के सारे दावे ध्वस्त हो गये। ऊपर से अभी कुछ समय पहले ही जिन पूँजीपतियों से योगी आदित्यनाथ ने वायदा किया था कि उत्तर प्रदेश में उन्हें मज़दूरों की हड़ताल व आन्दोलन से पूर्ण मुक्ति मिलेगी, वहाँ वे 10-12 हज़ार में मज़दूरों को बेतरह खटा सकते हैं, और मज़दूरों को ज़रा भी चूँ-चपड़ नहीं करने दी जायेगी, आदि, उन पूँजीपतियों ने भी योगी सरकार पर त्यौरियाँ चढ़ा लीं। यही तो वजह है कि योगी सरकार ने ख़ुद उत्तर प्रदेश पुलिस का निर्देशन किया कि वह नोएडा में मज़दूर आन्दोलन को किसी भी तरीक़े से कुचले, वहाँ एक आतंक का राज्य क़ायम करे ताकि मज़दूर हमेशा के लिए शान्त हो जाएँ। सारे हुक़्मरानों को हमेशा यही मुग़ालता होता है कि वह दमन के बूते जनता को हमेशा के लिए गु़लामी के लिए तैयार कर सकता है। योगी आदित्यनाथ कोई अलग नहीं हैं।

नोएडा की एक फ़ैक्ट्री में लगी भीषण आग : फ़ैक्ट्री मालिकों को बचाने में लगा पुलिस-प्रशासन और गोदी मीडिया हुआ बेनक़ाब

नोएडा की इस फ़ैक्ट्री में हुई इस घटना ने न सिर्फ़ नोएडा की फ़ैक्ट्रियों में सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोल दी है बल्कि साथ ही पुलिस, प्रशासन और इस पूँजीवादी मीडिया की हक़ीक़त भी बयान कर दी है। इस फ़ैक्ट्री में काम कर रहे सभी मज़दूर ठेके पर थे, जिन्हें अलग-अलग ठेकेदारों द्वारा भर्ती किया जाता था। उनकी तनख्वाह 10-12 हज़ार रुपये ही थी। यहाँ 12-12 घण्टे की दो शिफ़्ट चलती थीं। ओवरटाइम का भुगतान भी डबल रेट से नहीं करके सिंगल रेट से ही किया जाता था। कम्पनी ने सुरक्षा व्यवस्था के सारे नियमों को दरकिनार करते हुए तमाम सुरक्षा उपकरणों को बाईपास कर रखा था। ऐसे में यह लाज़मी था कि कोई भी घटना होने पर मज़दूरों की जान को ख़तरा हो सकता था।

उत्तर प्रदेश में एसआईआर का खेल और डिटेंशन कैम्प बनाने की फ़ासिस्ट साज़िश

आम मेहनतकश आबादी, ग़रीब दलित, मुसलमानों, स्त्रियों, प्रवासी मज़दूरों, झुग्गियों और सड़कों पर रहने वाली और घुमन्तू आबादी का एक बड़ा हिस्सा इस साज़िश का शिकार होगा। एक बड़ी आबादी जिसका नाम एसआईआर के ज़रिये काटा जायेगा उसके लिए अपनी नागरिकता को साबित करना मुश्किल होगा। उन्हें डिटेंशन कैम्पों में ठूँस दिया जायेगा। यह आबादी न तो यह साबित कर पायेगी कि वह बांग्लादेश की या किसी और देश की है और न ही उनकी कोई वापसी होगी। उन्हें मताधिकार आदि से वंचित कर दोयम दर्जे के नागरिक के तौर पर इन डिटेंशन कैंपों में रखा जायेगा। वैसे तो चार लेबर कोड के लागू होने के बाद तो हर कारखाना-फ़ैक्ट्री डिटेंशन कैम्प जैसे ही होंगे। लेकिन इस डिटेंशन कैंप में रहने वाले लोगों के कोई नागरिक अधिकार नहीं होंगे। उन्हें अम्बानी-अदानी के कारखानों में जानवरों से बदतर हालात में खटाया जायेगा। यानी अपने देश के नागरिकों को ही नागरिकता से वंचित कर फ़ासिस्ट उन्हें अपने “असली नागरिक” यानी अम्बानी-अदानी जैसे पूँजीपतियों की ग़ुलामी में लगा देंगे!

इलाहाबाद विश्वविद्यालय में छात्र आन्दोलन को मिली शानदार जीत के मायने

फ़ासीवादी मोदी सरकार के सत्तासीन होने के बाद से ही देशभर में लोकतान्त्रिक आवाज़ों और जनवादी स्पेस का गला घोंटा जा रहा है। देश की सभी संस्थाओं में ऊपर से नीचे तक फ़ासीवादी जकड़बन्दी लगातार मज़बूत होती जा रही है। भाजपा सरकार द्वारा मेहनतकश जनता पर हमले का दौर बदस्तूर जारी है। चार लेबर कोड मेहनतकशों पर अब तक का सबसे बड़ा फ़ासीवादी हमला है। इसी तरह कुछ साल पहले मोदी सरकार द्वारा लागू ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020’ मेहनतकश अवाम के घरों के बच्चों पर एक बड़ा हमला था। जैसे-जैसे नयी शिक्षा नीति पर अमल हो रहा है, वैसे-वैसे उसकी सच्चाई भी आम जनता के सामने खुलती जा रही है। विश्वविद्यालयों में बेतहाशा फ़ीस वृद्धि हो रही है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पिछले चार सालों में नियमित कोर्स के लिए छः गुना से ज़्यादा फ़ीस बढ़ायी जा चुकी है और हर साल 10 फ़ीसदी की फ़ीस वृद्धि की जा रही है।

उत्तर प्रदेश औद्योगिक संशोधन क़ानून : मुँह में राम बगल में छुरी

योगी सरकार द्वारा श्रम क़ानूनों में किया गया बदलाव मज़दूरों के ऐतिहासिक तौर पर जीते गये 8 घण्टे काम के अधिकार को छीन लेता है। जबकि वर्तमान तकनीकी प्रगति और श्रम की उत्पादकता में वृद्धि को देखते हुए काम के घण्टों की क़ानूनी सीमा 8 घण्टे से काफ़ी कम होनी चाहिए। इतना ही नहीं 8 घण्टे की तीन शिफ़्ट को 12 घण्टे की दो शिफ़्ट में बदल देने से मज़दूरों की एक तिहाई आबादी बेरोज़गार होकर मज़दूरों की रिज़र्व आर्मी को बढ़ायेगी जो दूरगामी तौर पर मज़दूरों की पूँजीपतियों से मोल-भाव करने की उनकी ताक़त को और घटायेगी। 12 घण्टे की शिफ्ट (जिसमें बिना रुके 6 घण्टे काम करने का नियम शामिल है) मज़दूरों को न केवल शारीरिक तौर बहुत नुक़सान पहुँचायेगी वरन उनकी सामाजिक-राजनीतिक सक्रियता की सम्भावना को भी सीमित करेगी। महिला मज़दूरों को रात की शिफ़्ट में काम करवाने की अनुमति इसलिए दी गयी है ताकि मालिकों को सस्ता से सस्ता श्रम 24 घण्टे उपलब्ध हो सके। हालाँकि इन नियमों के लागू होने से पहले भी बहुत से कारख़ानों में नियमों को ताक पर रखकर महिलाओं की नाइट शिफ़्ट चल रही थी।

शिक्षा के निजीकरण की भेंट चढ़ गया यूपी के छात्र उज्जवल का जीवन

 उज्जवल ने अपने वीडियो सन्देश में इस पूँजीवादी व्यवस्था का असली चेहरा उजागर कर दिया था। उसकी यह मृत्यु केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उन तमाम आम घरों के छात्रों की भी है, जो आज बढ़ती फ़ीसों, घटती सीटों और घटते अवसरों की मार झेल रहे हैं। आज अधिकांश कैम्पसों में छात्रावासों की कमी, महंगी कैण्टीनें, खराब मेस, मेडिकल सुविधाओं का अभाव, साइकिल स्टैण्ड की कमी, शिक्षकों की कमी एक आम परिदृश्य है। लड़कियों के लिए “पिंक टॉयलेट” या “पिंक हॉल” जैसी घोषणाओं का महज़ दिखावा किया जा रहा है जबकि सच इस नौटंकी से कोसों दूर है। यह सब मिलकर बताता है कि शिक्षा किस तरह से आम छात्रों की पहुँच से बाहर होती चली जा रही है।

‘आई लव मुहम्मद’ विवाद और उसका फ़ासीवादी साम्प्रदायिक इस्तेमाल

कानपुर में मुस्लिमों पर एकतरफ़ा कार्यवाई के बाद पुलिस ने सफ़ाई देते हुए कहा कि यह कार्यवाई ‘आई लव मुहम्मद’ पर नहीं बल्कि नई परम्परा शुरू करने और माहौल ख़राब करने के लिए की गयी है।  लेकिन सवाल यह है कि माहौल ख़राब करने में हिन्दू संगठन के लोग भी ज़िम्मेदार थे लेकिन उन पर कोई कार्यवाई क्यों नहीं हुई? अपनी धार्मिक आस्था के अनुसार पोस्ट डालना कैसे गुनाह हो गया? बजरंग दल से लेकर कई कट्टरपंथी हिन्दू संगठनों ने ‘आई लव महादेव’ से लेकर ‘आई लव योगी’ तक के पोस्टर, बैनर लगाये और सोशल मीडिया पर पोस्ट डाली। लेकिन तब इस “नई परम्परा” पर कोई कार्यवाई नहीं हुई। सोशल मीडिया पर मुस्लिम-विरोधी साम्प्रदायिक पोस्ट की बाढ़ आ गयी लेकिन इस पर भी कोई कार्यवाई नहीं हुई। हाथरस में एक प्रदर्शन में तो ‘आई लव यूपी पुलिस’, ‘आई लव योगी’ और ‘आई लव महादेव’ के बैनर लेकर लोग नारे लगा रहे थे- ‘यूपी पुलिस तुम लट्ठ बजाओ, हम तुम्हारे साथ हैं’! क्या इससे माहौल ख़राब नहीं होता?

योगी-राज में उत्तर प्रदेश में जातिवादी गुण्डों का कहर

आज देश में होने वाली जातिगत उत्पीड़न की घटनाओं में उत्तर-प्रदेश पहले नम्बर पर आता है। इस बात से समझा जा सकता है कि जातिवादी गुण्डों और अपराधियों के मन में कानून का डर बैठा है या संरक्षण पाने का विश्वास! ‘राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो’ के 2022 के आँकड़ों के अनुसार यूपी में दलितों के ख़िलाफ़ अपराध के 15,368 मामले दर्ज हुए जो देश में कुल दलित-विरोधी अपराधों का 26.7% है। वहीं इन घटनाओं में 2021 की तुलना में 16% की वृद्धि हुई है। शायद जातिगत उत्पीड़न में उत्तर प्रदेश के प्रथम स्थान और वृद्धि को ही देखकर नरेन्द्र मोदी ने कहा था कि ‘योगी का कानून व्यवस्था मॉडल देश के लिए उदाहरण है।’ इसी मॉडल को राजस्थान और मध्य-प्रदेश की भाजपा सरकारों ने अपना लिया है, तभी तो ये राज्य दलितों के ख़िलाफ़ अपराध के मामले में दूसरे और तीसरे नम्बर पर हैं।

उत्तर प्रदेश में विलय के नाम पर हज़ारों सरकारी स्कूल बन्द करने की शुरुआत

सरकारी विद्यालयों में एक तरफ़ तो आधारभूत ढाँचे की समस्या बड़े पैमाने पर है दूसरी तरफ़ इन विद्यालयों में शिक्षकों की भी भारी कमी है। सरकारी आँकड़ों के अनुसार उत्तर प्रदेश के सरकारी स्कूलों में 1,15,905 शिक्षकों की कमी है। हर साल हज़ारों शिक्षक सेवानिवृत्त हो रहे हैं लेकिन पिछले 7 सालों से शिक्षकों की कोई भर्ती नहीं निकाली गयी है। केन्द्रीय शिक्षा मन्त्रालय की हालिया रिपोर्ट के अनुसार राज्य के 5,695 सरकारी स्कूल केवल एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं। शिक्षकों की भारी कमी की वज़ह से सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता में लगातार गिरावट आ रही है।