उत्तर प्रदेश औद्योगिक संशोधन क़ानून : मुँह में राम बगल में छुरी

प्रसेन

फ़ासीवादी योगी सरकार ‘मुँह में राम बगल में छुरी’ कहावत को बार-बार चरितार्थ करती रहती है। अभी हाल ही में योगी ने मज़दूरों का गुणगान करते हुए कहा था कि, “मज़दूर केवल ईंट-पत्थर जोड़ने वाले नहीं होते बल्कि भविष्य की नींव रखने वाले होते हैं, चाहे काशी विश्वनाथ कॉरीडोर हो या महाकुम्भ का आयोजन! खुद प्रधानमन्त्री मोदी ने काशी में मज़दूरों के चरण पखारे थे।” दुनिया के सारे फ़ासिस्टों की तरह भारतीय फ़ासिस्टों के चरित्र में एक बात समान रूप से पायी जाती है कि जब फ़ासिस्टों को मेहनतकशों के हक़ों पर कोई नया डाका डालना होता है या कोई मज़दूर-विरोधी नया क़ानून लाना होता  है, तो पहले वे मज़दूरों की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हैं, उनके योगदान को ‘राष्ट्र’ के विकास या धर्म/आस्था से जोड़ते हैं। योगी सरकार का ऊपर का बयान और उसके बाद हाल ही में योगी सरकार द्वारा पारित किया गया ‘कारख़ाना (उत्तर प्रदेश संशोधन) अधिनियम, 2024’ इसी की एक बानगी है।

ग़ौरतलब है कि 3 अक्तूबर को योगी सरकार द्वारा कारख़ाना (उत्तर प्रदेश संशोधन) विधेयक, 2024 को उत्तर प्रदेश अधिनियम संख्या 14, 2025 के रूप में लागू कर दिया गया है। इस नये अधिनियम के प्रमुख बदलाव और संशोधन ध्यान देने योग्य हैं।

पहला, राज्य सरकार अब कारख़ानों में अधिकतम दैनिक काम के घण्टों को 8 घण्टे से बढ़ाकर 12 घण्टे तक कर सकती है। मज़दूर की सहमति से मज़दूर बिना ब्रेक लिए 6 घण्टे लगातार काम कर सकता है। यद्यपि काम के घण्टे सप्ताह में 48 से ज़्यादा नहीं हो सकते। दूसरा, ओवरटाइम काम की त्रैमासिक (तीन महीने की) सीमा को 75 घण्टे से बढ़ाकर 144 घण्टे कर दिया गया है। तीसरा, महिलाओं को अब कारख़ानों में रात 7 बजे से सुबह 6 बजे के बीच (नाइट शिफ्ट में) काम करने की अनुमति है, बशर्ते उनकी सुरक्षा और सुविधाओं के लिए विशेष इन्तज़ाम किए जाएँ, जैसे कि पर्याप्त रोशनी, सीसीटीवी कैमरे, सुरक्षित परिवहन और हेल्पलाइन नम्बर। चौथा, व्यापार सुगमता (ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस) को बढ़ावा देने के लिए, सरकार 13 राज्य क़ानूनों में कई प्रावधानों को अपराधमुक्त कर रही है, जिसमें श्रम क़ानूनों से सम्बन्धित आपराधिक प्रावधान भी शामिल हैं।

यह बदलाव/संशोधन मामूली नहीं हैं। अगर पहले बदलाव पर बात की जाये तो यह वास्तव में मई दिवस के शहीदों और मज़दूर वर्ग द्वारा पूँजीपति वर्ग और उसकी सरकार से सैकड़ों साल पहले जीते गये ऐतिहासिक ‘8 घण्टे काम, 8 घण्टे आराम और 8 घण्टे मनोरंजन’ के नारे के तहत 8 घण्टे काम के क़ानूनी अधिकार को छीन लेना है। देश की व्यापक मेहनतकश आबादी का 95 प्रतिशत से अधिक आबादी असंगठित क्षेत्र में काम कर रही है, जहाँ पर मज़दूरों के बिखराव, बदले उत्पादन प्रणाली के अनुरूप यूनियन के अभाव के चलते 8 घण्टे काम का नियम तथा अन्य श्रम क़ानून पहले भी लागू नहीं होते थे। लेकिन पूँजीपतियों के लिए यह तब भी एक क़ानूनी रुकावट का काम करता था और मज़दूरों के संगठित होने की सूरत में इसे लागू करने का दवाब भी काम करता था। लेकिन अब योगी सरकार ने पूँजीपतियों द्वारा मेहनत की लूट में नाममात्र की रुकावट को भी किनारे लगा दिया है।

यही नहीं, पहले जो ओवरटाइम 8 घण्टे के बाद शुरू होता था वह अब 12 घण्टे के बाद शुरू होगा। यानी मज़दूरों को 8 घण्टे काम के बाद डबल रेट से मिलने वाला ओवरटाइम का भुगतान अब क़ानूनी तौर पर 12 घण्टे के बाद शुरू होगा। जबकि 12 घण्टे के बाद दूसरी शिफ़्ट शुरू होने पर फिर से 12 घण्टे सिंगल रेट से मज़दूरों का ख़ून चूसने की पूँजीपतियों को क़ानूनी आज़ादी होगी। डबल रेट से मिलने वाले काम के घण्टों के भुगतान को क़ानूनी तौर पर सिंगल रेट के घण्टों में ही शामिल कर दिया गया है। इतना ही नहीं, बिना ब्रेक लिए 6 घण्टे के काम के नियम से मज़दूरों की मेहनत को चूसने की निरन्तरता को 4 घण्टे से बढ़ाकर 6 घण्टे कर दी गयी है। योगी सरकार ने “दरियादिली” दिखाते हुए इस नियम में मज़दूरों की “सहमति” लेना जोड़ा है। यह “सहमति” वास्तव में मज़दूरों के बर्बर शोषण को “लोकतान्त्रिक” आड़ देने की कोशिश है। पूँजीवादी व्यवस्था के अन्तर्गत मज़दूरों की “सहमति” किस प्रकार ली जाती है इससे हर मज़दूर भली-भाँति वाक़िफ़ है! सच्चाई यह है कि व्यवहारतः शासक वर्ग ने पूँजीपतियों को 6 घण्टे तक बिना रुके मुनाफ़े की चक्की में मज़दूरों को पेरने की क़ानूनी सहमति दी है। इसी तरह सप्ताह में काम के घण्टे 48 से ज़्यादा न होने देने की फ़ासीवादी योगी सरकार की “ज़िद” वास्तव में मज़दूरों के साथ एक भद्दा मज़ाक के अलावा और कुछ नहीं है क्योंकि नये  अधिनियम के तहत एक तरफ़ सप्ताह में 48 घण्टे काम की क़ानूनी सीमा रखी गयी है, वहीं दूसरी तरफ़ ओवरटाइम के घण्टों की सीमा तीन महीने में 75 से बढ़ाकर 144 घण्टे कर दी गयी है।

इस तरह योगी सरकार द्वारा श्रम क़ानूनों में किया गया बदलाव मज़दूरों के ऐतिहासिक तौर पर जीते गये 8 घण्टे काम के अधिकार को छीन लेता है। जबकि वर्तमान तकनीकी प्रगति और श्रम की उत्पादकता में वृद्धि को देखते हुए काम के घण्टों की क़ानूनी सीमा 8 घण्टे से काफ़ी कम होनी चाहिए। इतना ही नहीं 8 घण्टे की तीन शिफ़्ट को 12 घण्टे की दो शिफ़्ट में बदल देने से मज़दूरों की एक तिहाई आबादी बेरोज़गार होकर मज़दूरों की रिज़र्व आर्मी को बढ़ायेगी जो दूरगामी तौर पर मज़दूरों की पूँजीपतियों से मोल-भाव करने की उनकी ताक़त को और घटायेगी। 12 घण्टे की शिफ्ट (जिसमें बिना रुके 6 घण्टे काम करने का नियम शामिल है) मज़दूरों को न केवल शारीरिक तौर बहुत नुक़सान पहुँचायेगी वरन उनकी सामाजिक-राजनीतिक सक्रियता की सम्भावना को भी सीमित करेगी। महिला मज़दूरों को रात की शिफ़्ट में काम करवाने की अनुमति इसलिए दी गयी है ताकि मालिकों को सस्ता से सस्ता श्रम 24 घण्टे उपलब्ध हो सके। हालाँकि इन नियमों के लागू होने से पहले भी बहुत से कारख़ानों में नियमों को ताक पर रखकर महिलाओं की नाइट शिफ़्ट चल रही थी।

इसी तरह इन संशोधनों/बदलावों के तहत ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस यानी पूँजीपतियों द्वारा मज़दूरों के बेरोकटोक शोषण (उनकी ज़िन्दगी को ख़तरे में डालकर) और प्रकृति के अन्धाधुन्ध दोहन को सुगम बनाने के लिए फ़ासीवादी योगी सरकार द्वारा पुराने 10 क़ानूनों के तहत 200 से अधिक अनुपालनों को अपराध की श्रेणी से बाहर किया गया है। ऐसे मामलों में अब जेल की जगह मात्र ज़ुर्माना लगेगा। और जुर्माने की राशि भी बहुत “तर्कसंगत” रखी गयी है। वैसे तो जब ऐसे मामले अपराध की श्रेणी में आते थे तब भी बहुत कम मामलों में ही कोई सज़ा पूँजीपतियों को हो पाती थी लेकिन अब फ़ासीवादी योगी सरकार ने पूँजीपतियों को नाममात्र के क़ानूनी झंझट से भी मुक्त कर दिया है। आख़िर प्रधानमन्त्री मोदी द्वारा काशी में मज़दूरों के “चरण पखारने” का कुछ मतलब तो निकलना चाहिए था न!

इस नये क़ानून के तहत कुछ बदलाव ग़ौरतलब हैं। अग्नि निवारण और आपातकालीन सेवा अधिनियम, 2022 की धारा 13 के तहत बिना वॉरेण्ट के गिरफ़्तारी के प्रावधान को भी प्रशासनिक जुर्माने से बदल दिया गया है। उत्तर प्रदेश से लेकर विभिन्न राज्यों में पूँजीपतियों की मुनाफ़े की होड़जनित ‘लापरवाही’ (असल में जानबूझकर) के चलते आये-दिन आग लगती है, दुर्घटनाएँ होती रहती हैं और दुर्घटना होने पर समय रहते आपात सुविधायें न होने के चलते मज़दूर मरते रहते हैं। लेकिन उत्तर प्रदेश की फ़ासीवादी सरकार द्वारा लाये गये नये क़ानून के तहत अब यह महज़ मामूली लापरवाही होगी, जिसके तहत अब बस जुर्माना होगा (वो भी क़ानून के मुताबिक़, व्यवहार में शायद कुछ भी नहीं होगा)। औद्योगिक क्षेत्र विकास अधिनियम, 1976 के तहत कागज़ी कार्रवाई में देरी या प्रक्रियात्मक भूल जैसी ग़लतियों के लिए जो आपराधिक सज़ा थी, उसे भी ख़त्म कर दिया गया है और अब सिर्फ़ जुर्माना भरना होगा। पूँजीपतियों को इसी तरह, भूजल (प्रबन्धन और विनियमन) अधिनियम, 2019 की धारा 39 (a) के तहत मिलने वाली सामान्य जेल की सज़ा को सिर्फ़ गम्भीर अपराधों तक सीमित कर दिया गया है, जबकि बाकी उल्लंघनों पर सिर्फ़ जुर्माना लगेगा। वृक्ष संरक्षण अधिनियम, 1976 के तहत छोटे अपराधों, जिनके लिए पहले जेल हो सकती थी, उन्हें भी अब जुर्माने में बदल दिया गया है। मतलब कि पूँजीपतियों का मुनाफ़ा सुनिश्चित होना चाहिए भले ही मज़दूर दुर्घटनाओं में बेमौत मरें और प्रकृति तबाह हो जाये।

वास्तव में, फ़ासिस्टों द्वारा लाये गये इन नये नियमों के तहत न केवल मज़दूरों की मेहनत की लूट को निरपेक्ष तरीक़े से बढ़ा दिया गया है अपितु मज़दूरों को मालिकों की लापरवाही से और प्रकृति के संरक्षण के लिए जो क़ानून थे उनको भी पूँजीपतियों के मुनाफ़े के लिए होम कर दिया गया है। फ़ासिस्टों ने संशोधन/बदलाव के ज़रिये मज़दूरों के हित में मौजूद अतिसीमित क़ानूनों की भी बलि चढ़ा दी ताकि पूँजीपतियों का मुनाफ़ा सुनिश्चित हो सके, निवेशकों का “भरोसा” बढ़ सके और उत्तर प्रदेश में “प्रगतिशील” शासन का संकेत मिले।
वास्तव में, मुनाफ़े की गिरती औसत दर को किसी भी क़ीमत पर पुरानी दर पर बरक़रार रखने के लिए पूँजीपति वर्ग किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार है। अभी कुछ दिनों पहले की ही बात है जब इंफोसिस के डायरेक्टर ने मज़दूरों को हर हफ़्ते 70 घण्टे काम करने और लार्सन एण्ड ट्यूब्रो के चेयरमैन ने 90 घण्टे काम करने की इच्छा ज़ाहिर की थी। पूँजीपति वर्ग ने इसी इच्छा की पूर्ति के लिए फ़ासीवादी ताक़तों को सत्ता तक पहुँचाया था। सत्ता में आने के बाद फ़ासीवादी मोदी सरकार द्वारा चार लेबर कोड  इसीलिए ही लाये गये हैं ताकि पूँजीपतियों को मज़दूरों की मेहनत को बेरोकटोक लूटने की इच्छा पूरी की जा सके। अब इन चार लेबर कोड को एक प्रक्रिया में पूरे देश में लागू किया जा रहा है। उत्तर प्रदेश में लागू किये जाने से पहले 1 जुलाई को गुजरात में बहुत मामूली फ़र्क़ के साथ इसी तरह का क़ानून लागू किया गया था।

फ़ासीवादी ताक़तों द्वारा पूँजीपति वर्ग के पक्ष में लाये जा रहे श्रम क़ानून का मज़दूर वर्ग को पुरज़ोर प्रतिरोध करना होगा। अन्यथा मज़दूर वर्ग उन अधिकारों को भी खो देगा जिसे मज़दूरों ने अपनी शहादत देकर हासिल किया था। ‘चार लेबर कोड’ वास्तव में मज़दूरों को नये सिरे ग़ुलाम बनाने की तैयारी है। मज़दूरों को यह बात समझनी ही होगी कि उनके पास लड़ने के अलावा कोई और विकल्प नहीं है। इन क़ानूनों को वापस करवाने के लिए और सरकार को घुटने टेकने के लिए तभी मजबूर किया जा सकता है जब गाँवों और शहरों की व्यापक मेहनतकश आबादी अपने विशिष्ट पेशों की चौहद्दियों से आगे बढ़कर एकजुट हो और सेक्टरगत व इलाकाई पैमाने अपनी क्रान्तिकारी यूनियनों का निर्माण करे और इनके विरुद्ध एक व्यापक जनांदोलन का निर्माण करें। इतना तो यह फ़ासीवादी सरकार भी समझती है कि मज़दूरों की मेहनत की लूट से ही उनके पूँजीवादी आकाओं के पास पूँजी का अम्बार खड़ा होता है। अब मज़दूरों को क्रान्तिकारी फ़ौलादी एकजुटता से अपनी बारी में यह बात समझानी है कि अतीत में भी फ़ासिस्टों की कब्र मज़दूरों ने खोदी थी और आने वाले दिनों में मज़दूर ही भारत के फ़ासिस्टों की कब्र खोदेंगे।

 

मज़दूर बिगुल, नवम्बर 2025

 

 

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