लगातार बाधित संसद सत्र, जनता के टैक्स के पैसों की बर्बादी
नौरीन
पूँजीवाद की चाशनी में लिपटी, “भारतीय जनतन्त्र” की नंगी तस्वीर हम सबके सामने है। सत्ता में आने से पहले, फ़ासीवादी मोदी सरकार द्वारा जो “मुँगेरी लाल के हसीन सपने” दिखाये गये थे, उनकी हवा निकल चुकी है। यह कहना ग़लत नहीं होगा कि “कहाँ तो तय था चराग़ाँ हर एक घर के लिए, कहाँ चराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए”। कहाँ तो भारत को “विश्वगुरु” बनना था और कहाँ भारत विकासशील देशों की सूची से भी बाहर हो चुका है।
“विश्वगुरू भारत” में 32 करोड़ नौजवान बेरोज़गार हैं, 5 हज़ार से ज़्यादा बच्चे हर दिन भूख और कुपोषण से अपना दम तोड़ देते हैं। एक बड़ी आबादी के पास सिर ढकने के लिए छत नहीं है, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएँ बाज़ार में बिकने वाली वस्तु बन चुकी है। ऐसी स्थिति में, मेहनतकश आबादी से लूटे गये पैसों को, संसद की फि़जूल बहसबाजी में लूटाना किसी त्रासदी से कम नहीं है।
इस बदहाली और तंगी के दौर में संसद की भव्यता में कहीं कोई कमी नहीं दिखायी दे रही है। जहाँ देश की मेहनतकश आबादी अपनी मूलभूत ज़रूरतों को पूरा करने के लिए संघर्ष कर रही है, दड़बेनुमा कमरों में पूरे परिवार के साथ रहने को मजबूर है। वहीं दूसरी तरफ़, फ़ासिस्ट भाजपा सरकार द्वारा, एक संसद के होते हुए भी अपने ऐशोआराम और गप्पेबाजी के लिए 1200 करोड़ रुपये की लागत से नयी संसद का निर्माण किया गया है। यह कोई नेता-मन्त्री या अंबानी-अडानी का पैसा नहीं था, बल्कि यह टैक्स के नाम पर आम मेहनतकश जनता से लूटा गया पैसा था।
दस से बारह घण्टे काम बनाम अय्याशी और आराम
एक तरफ़ हमारे देश की वह मेहनतकश ग़रीब आबादी है, जो रोज़ 10 से 12 घंटों तक कल-कारखानों में अपनी हड्डियाँ गलाती है। जो सुई से लेकर हवाई जहाज़ तक बनाती है। इसी मेहनतकश आबादी से, टैक्स के नाम पर निचोड़े गये पैसों से यह संसद चलती है। दूसरी तरफ कुछ ऐसे भी लोग हैं जो जनता के सामने आँसू बहाकर, संसद तक तो पहुँच जाते हैं, लेकिन वहाँ जाने के बाद मेहनतकश आबादी के साथ गद्दारी करते हैं। मेहनत मजूरी करने वाले लोगों को संसद से पहले भी कोई ख़ास उम्मीद नहीं थी। लेकिन 2014 में फ़ासीवादी मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद जिस तरीके से लगातार संसद की कार्यवाही बाधित हो रही है,यह और कुछ नहीं बल्कि आम जनता के पैसों की बर्बादी है। वैसे भी जब पूँजीवादी संसद काम करती भी है, तो मालिकों, ठेकेदारों, व्यापारियों, दलालों के हितों के लिए ही नीतियाँ बनाती है और कभी-कभार मजबूरी में जनदबाव के कारण उसे जनता के लिए भी कुछ ख़ैर-ख़ैरात करनी पड़ती है। लेकिन आज तो ये सारी नीतियाँ भी फ़ासीवादी कैबीनेट में ही बन जाती हैं, संसद में दिखावे के लिए भी कोई बहस नहीं होती, और जो होता है वह जूतम-पैजार और कचरम-कूट! वह भी हर घण्टे जनता के करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाकर!
पिछले कुछ वर्षों में संसद की कार्यवाही पर नज़र डालें तो पता चलता है की, 2021 के मानसून सत्र के दौरान संसद ने निर्धारित समय 107 घण्टों में से मात्र 18 घण्टे काम किया। वहीं संसदीय कार्यमन्त्री अर्जुन राम मेघवाल के अनुसार बजट सत्र 2023 के दौरान लोकसभा के उत्पादकता 34 प्रतिशत जबकि राज्यसभा की उत्पादकता 24.4 प्रतिशत दर्ज की गयी। पीआरएस लेजिसलेटिव रिसर्च के अनुसार इस सत्र में लोकसभा 133.6 घण्टे की तुलना में मात्र 45.9 घण्टे तक तथा राज्यसभा ने 130 घण्टे में से केवल 32.3 घण्टे तक काम किया।
इस दौरान हुए कुल खर्च की बात करें तो पता चलता है कि, संसद की कार्रवाई पर प्रत्येक मिनट 2.5 लाख रुपये का खर्च आता है। इस प्रकार 2021 के सिर्फ मानसून सत्र में कुल 133 करोड़ रुपये तथा बजट सत्र 2023 में लोकसभा में कुल एक अरब 31 करोड़ 55 लाख रुपये और राज्यसभा में एक अरब 46 करोड़ 55 लाख रुपये की बर्बादी हुई।
संसद की कार्यवाही के निर्धारित समय की बात करें तो, यह सुबह 11 बजे से शाम 6 बजे तक चलती है।इसमें एक घण्टे का लंच ब्रेक होता है जिसमें नेताओं को कम कीमत पर सब्सिडाइज्ड खाना मिलता है। ये नेता-मन्त्री तमाम सुविधाओं के बाद भी मात्र 6 घण्टे “काम” करने का नाटक करते हैं । एक बार सांसद या विधायक बनने पर इन्हें तमाम सुविधाएँ जैसे वेतन भत्ते, स्वास्थ्य सुविधाएँ, मुफ्त में यात्रा करने और आवास की सुविधा इत्यादि मिलती। दूसरी तरफ हमारे देश की एक बड़ी आबादी कारखानों में ठेकों पर 10 से 12 घण्टों तक गुलामों की तरह घटती है। यह वही आबादी है जो अपने मूलभूत अधिकारों से भी महरूम है।
श्रम मन्त्रालय का एक आँकड़ा बताता है कि, भारत में 45% मज़दूरों की मज़दूरी 10,000 रुपये से भी कम है, वहीं महिला मज़दूरों को कई जगह 5000 रुपये से भी कम वेतन मिलता है। इन आँकड़ों से यह स्पष्ट है की जिस वक्त संसद में हुल्लड़बाजी और बेमतलब के मुद्दों पर तू तू , मैं मैं करके संसद की कार्यवाही बाधित होती है और करोड़ों रुपये का नुकसान होता है, ठीक उसी समय एक बड़ी मेहनतकश आबादी प्रतिदिन चार सौ रुपये से भी कम कमाने के लिए अत्यन्त भयावह स्थिति में काम करने को मज़बूर होती है।
फ़ासीवाद के दौर में पूँजीवादी संसद : जनता के काम की बात के बजाय मोदी के मन की बात करने का अड्डा!
यह किसी से छिपा नहीं है की कैसे 2014 में सत्ता में आने के बाद से ही, इस फ़ासीवादी मोदी सरकार ने, जनता के पैसों पर चलने वाले संसद से, जनता के जीवन से जुड़े मुद्दों को गायब किया है। इसका ताज़ा उदाहरण अभी मणिपुर घटना के रूप में सामने आया। मणिपुर में जो भी हुआ वह एक इन्साफपसन्द समाज के माथे पर कलंक से कम नहीं है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसकी गुण्डा वाहिनियों तथा बीजेपी सरकार द्वारा दो समुदायों के बीच दंगे कराए गए,महिलाओं को निर्वस्त्र करके घुमाया गया और सामूहिक बलात्कार किया गया। इस घटना पर प्रधानमन्त्री हमेशा की तरह चुप्पी मारकर बैठे रहे। चौतरफा आलोचना होने के बाद संसद में 2 घण्टे के अपने लम्बे चौड़े लफ़्फ़ाज़ी भरे भाषण में प्रधानमन्त्री मोदी ने मात्र 2 मिनट मणिपुर की घटना पर बात की। हालाँकि यह कोई पहली बार नहीं हुआ है। 2014 के बाद से ही संसद मोदी जी के भाषणबाजी का अड्डा बना हुआ है। इसी क्रम में बीजेपी के नेता संसद में ऐसी तमाम हरकतें कर चुके हैं जिससे, इस पार्टी का फ़ासीवादी चरित्र उजागर हो चुका है। “बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ” की डींगे हाँकने वाली इसी सरकार के कर्नाटक के दो नेता और त्रिपुरा का एक नेता संसद में बैठकर अश्लील फिल्में देखते हुए पकड़े गये थे।
आज हमारा देश एक अभूतपूर्व संकट से गुज़र रहा है। बेरोज़गारी और महँगाई का मुद्दा आज हमारे देश के मज़दूरों, ग़रीब किसानों, आम मेहनतकश आबादी और नौजवानों के लिए सबसे बड़ा मुद्दा है। लेकिन ये फ़ासिस्ट मोदी सरकार अब यह बात नहीं करती की हर साल 2 करोड़ नौकरी देने के इसके हवाई वायदे का क्या हुआ? सबके खाते में अब तक 15 लाख रुपये क्यों नहीं आये? इसके उलट यह देश की जनता का ध्यान भटकाने के लिए संसद में चीन-पाकिस्तान, हिन्दू-मुसलमान जैसे नकली मुद्दों पर बहसबाज़ी करते हैं ।
संसद में तू नंगा-तू नंगा का खेल खेलती तमाम पूँजीवादी चुनावबाज़ पार्टियों की असलियत
शासक वर्ग के विभिन्न धड़ों की नुमाइन्दगी करने वाली तमाम पूँजीवादी चुनावबाज़ पार्टियों के नेता संसद के भीतर गत्ते की तलवार भाँजते तू नंगा-तू नंगा का खेल खेलते हैं। यही नेता मज़दूर वर्ग एवं समस्त मेहनतकश जनता के ख़िलाफ़ बनने वाली नीतियों पर एकमत हो जाते हैं। पूँजीपतियों के पक्ष में नीतियों को बनाने मे इन तमाम चुनावबाज़ पार्टियों मे नाममात्र का ही फर्क है। कॉंग्रेस अगर कुछ लोकलाज और कल्याणवाद के मुखौटे के साथ नवउदारवाद की नीतियाँ लागू करती है, तो फ़ासीवादी मोदी सरकार नंगे और बेशर्म तरीके से मेहनतकश आबादी का खून निचोड़कर, पूँजीपतियों की तिजोरियाँ भरने के लिए मेहनतकश जनता के ख़िलाफ़ आक्रामक तरीके से नवउदारवादी नीतियाँ बनाती है, जनता के अधिकारों को छीनती है, श्रम अधिकारों को निरस्त करती है और दंगे फैलाकर जनता की एकजुटता को तोड़ती है ताकि सभी को बाँटकर हरेक पर राज किया जा सके।
ये पार्टियाँ चाहें जितना एक दूसरे पर कीचड उछाल लें, लेकिन सच्चाई तो यह है की इनका वर्गीय हित एक ही है। संसद में गप्पेबाजी करते ये नेता चुने तो जनता द्वारा जाते हैं, लेकिन संसद में पहुँचने के बाद ये अंबानी-अडानी जैसे अपने पूँजीपति आकाओं की तिजोरियाँ भरने के लिए लिए ‘दिन दुनी, रात चौगुनी’ गति से काम करते हैं। हमारे असली दुश्मन यही मुनाफ़ाखोर और लुटेरे हैं, जिनके किसी न किसी गिरोह की नुमाइन्दगी आज की सभी पूँजीवादी चुनावबाज़ पार्टियाँ करती हैं। यह सच है कि फ़ासीवादी पूँजीवादी पार्टी होने के नाते भाजपा और संघ परिवार मेहनतकश जनता के लिए सबसे ख़तरनाक हैं और उसके सबसे बड़े दुश्मन हैं। फ़ासीवाद गहराते संकट के समय पूँजीपति वर्ग की ज़रूरत है और इसीलिए इस समय मोदी पूँजीपति वर्ग का चहेता बना हुआ है।
आज का भारतीय पूँजीवादी जनतन्त्र सिर से पाँव तक सड़ चुका है। मेहनतकश वर्ग के सामने एकमात्र विकल्प यही है की वह पूँजीवादी संसदीय जनवाद की इस ख़र्चीली धोखाधड़ी और लूटतन्त्र को सिरे से ख़ारिज कर दे। एक नया समाजवादी जनवाद का ढाँचा खड़ा करे जिसमें, जनप्रतिनिधियों के निकाय महज बहसबाज़ी और गप्पे मारने के अड्डे ना हो। कार्यपालिका और संसद यानी विधायिका के काम करने के लिए शोषकों का अलग विशेषज्ञ वर्ग न हों। जनता, जो उत्पादन करती है, वही कानून बनाये भी और वही कानून लागू भी करे। नौकरशाही का काम भी जनप्रतिनिधियों के निकाय द्वारा ही किया जाये। नेताओं का कोई विशेषाधिकार प्राप्त अलग सामाजिक संस्तर न हो। विलासितापूर्ण जीवन शैली के बजाय उनका वेतन और जीवन स्तर भी आम उत्पादक वर्गों के समान हो। आज का पूँजीवादी समाज जिस अभूतपूर्व संकट से गुज़र रहा है, उसमें तमाम इन्साफ़पसन्द नौजवानों, मेहनतकश जनता का यह कर्तव्य बन जाता है कि, वह इस परजीवी नौकरशाही, अफ़सरशाही और सड़कर बजबजाते बुर्जुआ लोकतन्त्र को समाप्त कर, एक नया समाजवादी ढाँचा खड़ा करने की दिशा में एकजुट हो। मौजूदा फ़ासीवादी शासन और फ़ासीवादी फिरकापरस्ती के उभार ने इस कार्यभार को और भी ज़रूरत के साथ रेखांकित कर दिया है।
मज़दूर बिगुल, सितम्बर 2023













