Category Archives: श्रम क़ानून

‘नोएडा के मज़दूरों और कार्यकर्ताओं की रिहाई के लिए अभियान’ (CaRWAN) के बैनर तले दिल्ली में विरोध प्रदर्शन

प्रोफेसर नंदिता नारायण ने कहा, “मुझे आकृति, हिमांशु और योगेश जैसे छात्रों पर गर्व है। आज की पीढ़ी के छात्रों को ऐसा ही करना चाहिए। केवल अपने करियर के बारे में सोचने के बजाय उन्होंने अपनी शिक्षा का उपयोग उत्पीड़ित लोगों की आवाज़ बनने के लिए किया। सभा में उपस्थित छात्रों को सम्बोधित करते हुए प्रो. नंदिता ने विश्वविद्यालयों में जनवादी स्पेस के सिकुड़ने पर भी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा, “यह वास्तव में परेशान करने वाली बात है कि योगेश को यूपी पुलिस के सिविल ड्रेस में आए पुलिसकर्मियों द्वारा नॉर्थ कैंपस के अन्दर से अगवा किया गया और विश्वविद्यालय प्रशासन ने इस पर कोई कार्रवाई नहीं की।” सामाजिक कार्यकर्ता नौरीन ने नोएडा मज़दूर आन्दोलन के बाद यूपी पुलिस द्वारा चलाए गए “विच हंट” पर विस्तार से बाते रखी। यूपी पुलिस की स्पेशल टास्क फोर्स ने निजी स्थानों, लाइब्रेरी और कई जगहों पर ग़ैरक़ानूनी तरीक़े से छापेमारी की और बिना किसी उचित प्रक्रिया के युवाओं को अगवा कर अवैध रूप से गिरफ़्तार किया। नौरीन ने यह भी बताया कि ट्रैकिंग और निगरानी अभी भी जारी है। यूपी पुलिस के अधिकारी अब भी दिल्ली में महिला छात्रों का पीछा कर रहे हैं, उन्हें धमका रहे हैं। उन्होंने कहा, “ पुलिस ने मुझे भी अगवा किया था, मेरी धार्मिक पहचान के कारण प्रताड़ित किया, मुझे बांग्लादेशी तक कहा।”

विशाखापट्टनम स्टील प्लाण्ट से लेकर सूरत के सेप्टिक टैंक तक कार्यस्थल पर मज़दूरों की मौतों का सिलसिला बदस्तूर जारी है!

सरकारी आँकड़ों के मुताबिक़ भारत में हर रोज़ कार्यस्थल पर हुई दुर्घटनाओं में 3 लोगों की मौत हो जाती है। हम सभी जानते हैं कि वास्तविक संख्या इससे कहीं ज़्यादा होगी। इसके बावजूद मज़दूरों की सुरक्षा कभी भी राष्ट्रीय चर्चा का विषय नहीं बनती। नवउदारवादी पूँजीवाद के इस दौर में मज़दूरों की सुरक्षा के प्रति उपेक्षा और लापरवाही लगातार बढ़ती गयी है। मुनाफ़े की नाली बेरोकटोक बहती रहे इसके लिए उसमें आने वाली बाधाओं को एक-एक करके हटाया जा रहा है। मज़दूरों के अधिकारों को लगातार छीना जा रहा है। ज़्यादातर काम ठेके पर कराये जा रहे हैं ताकि मज़दूरों की सुरक्षा के प्रति कोई जवाबदेही ही न रहे। हाल ही में लागू हुए 4 मज़दूर-विरोधी लेबर कोड में से एक मज़दूरों की पेशागत सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्यस्थितियों से सम्बन्धित है। इसके नाम से किसी को लग सकता है कि इसमें ज़्यादा से ज़्यादा फ़ैक्ट्रियों में काम की परिस्थितियों को ज़्यादा सुरक्षित करने की बात होगी। पर असलियत यह है कि इस कोड में फ़ैक्ट्री की परिभाषा को ही इस तरह बदल दिया गया है कि देश की क़रीब आधी फ़ैक्ट्रियों को सुरक्षा की जवाबदेही से ही छुटकारा मिल गया है। ऐसे में स्प्ष्ट है कि इस देश का बेशर्म और बेरहम हुक़्मरान तबक़ा विशाखापट्टनम और सूरत जैसे हादसों के लिए सीधे तौर पर ज़िम्मेदार है।

जनता के विरोध से घबराकर उत्तर प्रदेश सरकार ने एक बार फिर लगाया एस्मा!

उत्तर प्रदेश में लगे एस्मा का खास महत्व है। इसे हमें उत्तर प्रदेश के विभिन्न विभागों में बढ़ते असंतोष को दबाने के क्रम में देखने की ज़रूरत है। इस समय उत्तर प्रदेश में गहराते आर्थिक संकट, बिजली संकट और इन संकटों की वजह से बढ़ते जनाक्रोश की परिस्थिति से निपटने के लिए एस्मा लगाया गया है। अगले साल उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। चुनावों से पहले योगी सरकार अपने कुशासन और जनविरोधी शासन के ख़िलाफ़ किसी भी तरह के प्रतिरोध को पनपने से पहले ही कुचल देने कि कोशिशें कर रही है। इसीलिए योगी सरकार कभी एस्मा लगाती है तो कभी मज़दूर कार्यकर्ताओं के ऊपर रासुका जैसा दमनकारी क़ानून लगा दिया जाता है ताकि लोग अपनी बुनियादी माँगों मसलन शिक्षा, चिकित्सा, रोज़गार, आवास, न्यूनतम वेतन आदि के लिए एकजुट और संगठित न हो सकें।

एक इंसान जैसी ज़िन्दगी जीने के लिए न्यूनतम मज़दूरी कितनी होनी चाहिए?

हमारे देश में 90 फ़ीसदी से ज़्यादा अनौपचारिक मज़दूरों की औसत मासिक आय 10 से 12 हज़ार रुपये के क़रीब है! यह हमारी मानवीय गरिमा पर चोट नहीं है तो क्या है? हमें कीड़ा-मकोड़ा और कॉकरोच समझा जाता है। हमें न तो इंसान माना जाता है और न ही इंसानों जैसा बर्ताव हमारे साथ किया जाता है। पूँजीपतियों के लिए हम बोझा ढोने वाले पशुओं से ज़्यादा और कुछ नहीं हैं, जिन्हें बस जीने की ख़ुराक़ दे दी जाय और बदले में वे कमरतोड़ मेहनत कर धन्नासेठों की तिजोरियाँ भर सकें, उनकी औलादों की ऐय्याशियों का ख़र्च उठा सकें, उनकी सात पुश्तों का भविष्य सुरक्षित कर सकें, जबकि हमारे बच्चे हमेशा भूख और कुपोषण की रेखा पर जियें, दवा-इलाज से वंचित रहें, शिक्षा उनकी पहुँच से बाहर रहे और हम पुश्त-दर-पुश्त रोज़ ग़ुलामों के समान खटने का अभिशप्त हों।

कर्नाटक और तेलंगाना में न्यूनतम वेतन वृद्धि : नाकाफ़ी और देरी से लागू की गयी बढ़ोत्तरी

यह वेतन वृद्धि भी कांग्रेस की सरकारों ने किसी भलमनसाहत से नहीं बल्कि इन राज्यों में सम्भावित मज़दूर आन्दोलन की लहर से घबराकर की है क्योंकि सतह के नीचे इन दोनों राज्यों में भी मज़दूरों का गुस्सा और उनकी नाराज़गी पनप रही थी। कर्नाटक में पूँजीपति इसका कड़ा विरोध करने में लगे हैं। उनके अनुसार मज़दूरी पर वे पहले ही बेहद अधिक “ख़र्चा” कर रहे हैं और इसे और बढ़ाना सरासर अन्याय है! जैसा कि हमने ऊपर बताया, यह कोरा झूठ है। असलियत यह है कि पूँजीपतियों द्वारा मज़दूरी पर होने वाला निवेश लगातार ही घटाया गया है और पूँजीपति इसे और भी कम कर देना चाहते हैं। पहली बात तो यह है कि पूँजीपति मज़दूरी पर “ख़र्च” नहीं बल्कि निवेश करते हैं, जो मज़दूरों के श्रम से पैदा मुनाफ़े के साथ उनके पास वापस आ जाता है। मालिक का मुनाफ़ा मज़दूर के शोषण के ज़रिये हासिल होता है। मज़दूरी और कुछ नहीं बल्कि एक मज़दूर की श्रमशक्ति की क़ीमत होती है और एक मज़दूर श्रमकाल के एक हिस्से से अपनी मज़दूरी के बराबर मूल्य पैदा करता है तो बाक़ी हिस्सा मालिक बेशी-मूल्य के रूप में हड़पता है। यही उसके मुनाफ़े का आधार होता है। मालिक हर-हमेशा कोशिश करता है कि मज़दूरी कम की जाये ताकि मुनाफ़ा और उसकी दर को बढ़ाया जा सके। मुनाफ़ा और मज़दूरी व्युत्क्रमानुपाती होते हैं। इसको गोल करके कर्नाटक के पूँजीपति कोर्ट में और मीडिया में नंगा झूठ बोल रहे हैं। उनके अनुसार, कर्नाटक सरकार द्वारा की गयी वेतन-बढ़ोत्तरी उनका दमन है और उनके धन्धा करने के संवैधानिक हक़ का हनन है! पूँजीवादी मानकों से इन सेठों-व्यापारियों का कहना सही भी है क्योंकि पूँजीवादी जनवाद का मर्म ही मज़दूरों के लिए यह है कि पूँजीपतियों को मज़दूरों का शोषण करने की आज़ादी मिले!

कॉकरोच जनता पार्टी और उसकी लोकप्रियता : भारतीय जनता में व्‍यवस्‍था और मौजूदा सरकार के प्रति बढ़ते गुस्‍से व असन्‍तोष और साथ ही विकल्‍पहीनता की अभिव्‍यक्ति 

कॉकरोच जनता पार्टी की अचानक बढ़ी भारी लोकप्रियता के पीछे मुख्‍य कारण यह है कि हमारे देश का शासक वर्ग, उसकी राज्‍यसत्‍ता और उसके विभिन्‍न अंग-उपांग मेहनतकश जनता की तक़लीफ़ों के प्रति आश्‍चर्यजनक असंवेदनशीलता दिखा रहे हैं और उनका रवैया काफ़ी हद तक पुराने फ्रांस की रानी मैरी एन्‍त्‍वानेत जैसा हो चुका है जिसने पूछा था कि “अगर जनता के पास खाने के लिए रोटी नहीं है, तो वह केक क्‍यों नहीं खा लेती?” उसी प्रकार, भूख और कुपोषण की कगार पर खड़ी भारी बहुसंख्‍यक मेहनतकश और आम मध्‍यवर्गीय आबादी को बताया जा रहा है कि “सब चंगा सी”, “मेलोडी खाओ खुद जान जाओ”, “देश शान्ति और विकास के पथ पर अग्रसर है”, आदि। वहीं दूसरी ओर, खाता-पीता उच्‍च मध्‍य वर्ग और उच्‍च वर्ग नशे में बुरी तरह से टल्‍ली है। यह नशा है उपभोक्‍तावाद, खाऊ-पियू-अघाऊ संस्‍कृति का जिसमें चूर यह वर्ग निरन्‍तर “खाओ-पियो-ऐश करो मितराँ” गाने पर उन्‍मादी नृत्‍य करता रहता है। उसे न सिर्फ़ सुई से लेकर जहाज़ तक बनाने वाली और हर सेवा पैदा करने वाली जनता के दुख-दर्द से कोई लेना-देना नहीं है, बल्कि वह उसकी खिल्‍ली भी उड़ाता है। प्राचुर्य और धनाढ्यता का उसका यह अश्‍लील प्रदर्शन भी आँसुओं के समन्‍दर में खड़ी मेहनतकश जनता के धैर्य को परख रहा है।

नोएडा मज़दूर आन्दोलन के दौरान गिरफ़्तार राजनीतिक कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों, छात्रों-कलाकारों का दमन व ‘विच हण्ट’ जारी!

तो आज मेहनतकशों और मज़दूरों का यह सवाल पूछना क्या जायज़ नहीं है कि ऐसा तो नहीं कि जिस “राष्ट्र”, उसके “हितों” और उसकी “सुरक्षा” की बातें बार-बार तमाम सरकारें, मालिकान व प्रबन्धन, तमाम कम्पनियाँ, पुलिस व प्रशासन और मुख्यधारा का मीडिया अनन्त रूप से करते रहते हैं, उस “राष्ट्र” में केवल इस देश के धनिक वर्ग, मालिक वर्ग, उनकी नुमाइन्दगी करने वाले नेता व मन्त्री, ऊँचे नौकरशाह व अधिकारी शामिल हैं? ऐसा तो नहीं कि उस “राष्ट्र” में देश के ग़रीब, मज़दूर, छोटे किसान, मेहनतकश और निम्न-मध्यवर्ग के लोग और उनके हक़ों की हिमायत करने वाले सामाजिक व राजनीतिक कार्यकर्ता शामिल ही नहीं हैं? और क्या यह सवाल भी जायज़ नहीं है कि मज़दूर अधिकारों की बात करना ही क्यों जुर्म में तब्दील कर दिया गया है? क्यों हड़ताल, संघर्ष, प्रतिरोध और आन्दोलन करने को ही अपराध क़रार दे दिया गया है? ये सवाल हर इंसाफ़पसन्द नागरिक के सामने आज खड़े हैं। 

बारह साल, जनता बेहाल – टूटे सपनों का अम्बार! कौन है इसका ज़िम्मेदार ?

एक ऐसे समय में जब जनता कमरतोड़ महँगाई और विकराल बेरोज़गारी की मार झेल रही है, जब देश के छात्र-युवा बरबाद होती शिक्षा व परीक्षा व्यवस्था का नतीजा भुगत रहे हैं, जब देश के अल्पसंख्यक, विशेष तौर पर, मुसलमान साम्प्रदायिक तनाव और विषवमन के शिकार बन रहे हैं, जब स्त्री-विरोधी व दलित-विरोधी अपराध अपने चरम पर हैं, जब देश के ग़रीब छोटे किसान हर रोज़ तबाह हो रहे हैं और आत्महत्याएँ कर रहे हैं, उस समय नरेन्द्र मोदी के प्रधानमन्त्रित्व के 12 साल पूरे होने का भाजपा द्वारा मनाया जा रहा यह जश्न जनता के दुख-दर्द के साथ क्या एक भद्दा मज़ाक और राजनीतिक अश्लीलता की पराकाष्ठा नहीं है?

नोएडा और मानेसर के मज़दूर संघर्षों में कौन “बाहरी” और कौन “भीतरी”

जब भी कहीं मज़दूरों की कोई हड़ताल या आन्दोलन शुरू होता है, तो उसमें सक्रिय ट्रेड यूनियन कार्यकर्ताओं और मज़दूर संगठन के राजनीतिक कार्यकर्ताओं पर पुलिस प्रशासन और सरकार “बाहरी तत्व” होने की तोहमत लगाते हैं। उनके अनुसार, जो स्वयं उस शहर या औद्योगिक क्षेत्र में कारखाने में काम नहीं करता, उसे मज़दूरों के मसले पर बोलने का या उनके आन्दोलन में शिरक़त करने का कोई अधिकार नहीं है। यह हुक्मरानों का पुराना “तर्क” है। बल्कि कहना चाहिए कि कुतर्क है। नोएडा के मज़दूर आन्दोलन में सक्रिय मज़दूर कार्यकर्ताओं, श्रम अधिकार कार्यकर्ताओं, छात्र कार्यकर्ताओं और उसका समर्थन करने वाले बुद्धिजीवियों मसलन सत्यम वर्मा, आदित्य आनन्द, रूपेश राय, हिमांशु ठाकुर, सृष्टि, आकृति आदि पर नोएडा पुलिस ने यही “बाहरी” होने का आरोप लगाया। उसी प्रकार मानेसर में गिरफ्तार कार्यकर्ता साथियों श्यामबीर और हरीश पर भी ये ही आरोप लगाये गये हैं। तो हमें इस आरोप का पूरा कुतर्क समझ लेना चाहिए।

नोएडा के मज़दूर आन्दोलन और गिरफ्तार सामाजिक कार्यकर्ताओं व बुद्धिजीवियों के बारे में उत्तर प्रदेश पुलिस की विचित्र ‘सत्य कथाएँ’ और वास्तविक सच्चाई

देश में शायद ही कोई ऐसा हो जो यह न जानता हो कि नोएडा के मज़दूर आन्दोलन के दौरान सैंकड़ों मज़दूरों और 7 सामाजिक कार्यकर्ताओं, पत्रकारों, बुद्धिजीवियों और छात्र कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया है। इन पर शुरू में उत्तर प्रदेश पुलिस और गोदी मीडिया ने “पाकिस्तानी एजेण्ट” होने का आरोप लगा दिया! इस पर जनता के बड़े हिस्से की हँसी छूट गयी। इसके बाद इनको “नक्सली” बताने का प्रयास भी किया गया। इस पर भी जनता अपनी हँसी मुश्किल से ही रोक पायी, पर कुछ लोग फिर फक से हँस दिये! लेकिन ज्यादा बड़ा चुटकुला सुनने का मन हो तो आप उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा अब तक गिरफ्तार सामाजिक कार्यकर्ताओं की ज़मानत का विरोध करने वाले लिखित आवेदन और रिमाण्ड दस्तावेज़ देख सकते हैं। हम आपको विस्तार से उत्तर प्रदेश पुलिस के ये चुटकुले सुनाते हैं। ये चुटकुले उत्तर प्रदेश पुलिस के आला अधिकारियों और उनके तहत काम करने वाले पुलिसकर्मियों की मानसिक स्थिति और क्षमताओं के बारे में भी काफ़ी-कुछ बताते हैं। आइये, अब तक उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा अदालत में पेश कुछ दस्तावेज़ों की पड़ताल करें। पुलिस की भाषा पढ़कर हँसी आ सकती है क्योंकि एक दसवीं पास लड़का भी इससे बेहतर भाषा लिख सकता है।