इतिहास के गलियारों से आती आवाज़ को सुनो!
शहीदे-आज़म भगतसिंह आज देश के मज़दूरों, ग़रीब किसानों और मेहनतकशों को क्या सन्देश दे रहे हैं?

सम्पादकीय अग्रलेख

23 मार्च को शहीदे-आज़म भगतसिंह और उनके महान साथियों सुखदेव और राजगुरू की शहादत को 94 वर्ष पूरे हो गये। अंग्रेज़ी हुकूमत तो भगतसिंह और उनके साथियों के विचारों से बुरी तरह भयाक्रान्त थी ही, लेकिन आज़ादी के बाद के क़रीब आठ दशकों में इस देश के शासक वर्ग ने भी भगतसिंह और उनके साथियों के विचारों को तरह-तरह से दबाने की कोशिश की है। ज़ाहिर है, चूँकि भगतसिंह और उनके साथियों के प्रति इस देश के मज़दूरों, आम मेहनतकश लोगों और छात्रों-युवाओं के दिल में गहरी भावना है, इसलिए भगतसिंह के नाम को पूरी तरह से दबाने की शासक वर्गों की कोई भी साज़िश कामयाब नहीं हो सकती थी। इस बात को इस देश के हुक्मरान भी भली-भाँति समझते हैं। इसलिए भगतसिंह के विचारों को उनकी ही प्रतिमाओं, तस्वीरों, फूलमालाओं के बोझ, आदि के नीचे दबा देने की कोशिशें की जाती रही हैं। भगतसिंह की एक ग़लत छवि लोगों के बीच प्रचारित-प्रसारित की जाती रही है। यह छवि है एक बहादुर नौजवान की जिसने बम-पिस्तौल के रास्ते देश की आज़ादी के लिए लड़ाई का रास्ता चुना और इसी रास्ते पर चलते हुए शहीद हो गया।

त्रासद विडम्बना है कि इस छवि में जो नायकत्व, बहादुरी या दबंगपन दिखायी देता है, उसके प्रभाव में देश के धनिक वर्गों के ठेकेदार, धनी किसान-कुलक-ज़मीन्दार और व्यापारियों की गुण्डा और लम्पट औलादें भी अपनी भारी-भरकम कारों व गाड़ियों पर भगतसिंह की मूँछों पर ताव देते, पिस्तौल पकड़े, किसी जट्ट फ़ार्मर से मिलती-जुलती काया वाली तस्वीर के स्टिकर लगाकर घूमते हैं। वही धनिक व पूँजीपति वर्ग जिनके ख़िलाफ़ भगतसिंह ने क्रान्ति की अलख जगाने की बात की थी! भगतसिंह के विचारों, उनकी विरासत और उनकी स्मृतियों के साथ इससे ज़्यादा भद्दा मज़ाक और कोई नहीं हो सकता है। साथ ही, देश के शासक वर्गों ने भगतसिंह को संसद के गलियारों, पार्कों और उद्यानों में प्रतिमाएँ लगाकर क़ैद करने की लगातार कोशिशें की हैं। हर कोई उनके प्रति देश की आम जनता में मौजूद भावना को उनकी छवि का इस्तेमाल कर भुनाना चाहता है, लेकिन साथ ही उनके विचारों को इसी प्रतीकवाद, प्रतिमावाद में दबा डालना चाहता है।

देश में छात्रों की पाठ्यपुस्तकों में स्कूल से लेकर कॉलेज के स्तर तक अम्बेडकर, नेहरू, गाँधी, और पिछले कुछ दिनों से सावरकर, गोलवलकर, मूंजे के लेख, निबन्ध आदि और साथ ही उनके विचारों व जीवन के बारे में लिखे लेख आदि मिल जायेंगे। लेकिन आपको भगतसिंह और उनके साथियों और उनकी समूची क्रान्तिकारी धारा के बारे में बिरले ही कहीं कुछ मिलेगा। शासक वर्ग की मैनेजिंग कमेटी, यानी सरकार का काम शासक वर्ग की कोई भी पार्टी कर रही हो, चाहे वह कांग्रेस या भाजपा की सरकारें हों या फिर  संसदीय वामपन्थियों व क्षेत्रीय दलों वाले किसी तीसरे मोर्चे की सरकार हो, सभी भगतसिंह और उनके क्रान्तिकारी समाजवादी संगठन हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसियेशन (एच.एस.आर.ए.) की समूची क्रान्तिकारी धारा के विचारों को आज भी सक्रिय रूप से दबाने, भुला-बिसरा देने और उस पर राख की परतें चढ़ा देने का काम बड़ी सावधानी से और सोचे-समझे तरीक़े से करते हैं।

क्यों? ऐसा क्यों है? हम मज़दूरों को एक बात अच्छी तरह से समझ लेनी चाहिए : हमारे देश का शासक वर्ग, यानी, कारख़ानों, कम्पनियों, उद्यमों खानों-खदानों के मालिकों, धनी व्यापारियों, धनी किसानों, दलालों, बिचौलियों, पूँजी के अहलकारों यानी नौकरशाहों-नेताओं, सेना-पुलिस के उच्च अधिकारियों का समूचा सामाजिक संस्तर, जिन विचारों को दबाना चाहता है और हमसे छिपाना चाहता है, वे विचार आम तौर पर हमारे हित में होते हैं। अगर इस देश के हुक्मरान भगतसिंह और उनके साथियों के विचारों को पिछले आठ दशकों से दबाते, छिपाते और विकृत करते आये हैं, तो हमें समझ लेना चाहिए कि इन विचारों में हम मेहनतकशों-मज़दूरों के हित की बात है।

इस बार हम इसी विषय में बात करेंगे कि भगतसिंह और उनके साथियों के वे विचार क्या हैं, जिनसे देश के हुक्मरान आज भी घबराते हैं और उन्हें हमसे छिपाने और दूर करने की नयी-नयी तरक़ीबें निकालते हैं। एक सम्पादकीय अग्रलेख में शहीदे-आज़म भगतसिंह के विचारों की सम्पूर्ण चर्चा सम्भव नहीं है। उसके लिए हम मज़दूरों को स्वयं भगतसिंह के लेख, निबन्ध आदि पढ़ने होंगे। इसलिए यहाँ हम बस नुक़्तेवार कुछ मोटी-मोटी बातों को समझेंगे और उसके ज़रिये यह जानने की कोशिश करेंगे कि भगतसिंह और उनके साथियों के विचार व उनकी स्मृति आज हमें इतिहास के गलियारों से क्या सन्देश दे रही है।

सबसे पहली बात तो यह है कि भगतसिंह महज़ एक बहादुर मुक्तियोद्धा नहीं थे, बल्कि एक महान चिन्तक थे। सच है कि महज़ 23 साल की उम्र में वह शहीद हो गये थे। लेकिन इस छोटी-सी उम्र में ही उन्होंने दुनियाभर के क्रान्तिकारी साहित्य, अलग-अलग मुल्कों में आज़ादी की लड़ाइयों, मार्क्सवाद और समाजवाद के विचारों, रूसी क्रान्ति के इतिहास के बारे में गहरा अध्ययन किया था। इस अध्ययन का बड़ा हिस्सा उन्होंने जेल में रहते हुए किया था। लेकिन अगर इस दौर के उनके लेखन पर कोई संक्षिप्त निगाह डालें तो स्पष्ट होता है कि अपने क्रान्तिकारी जीवन के शुरुआती दौर में अपनाये गये दुस्साहसवादी तौर-तरीक़ों से भगतसिंह का चिन्तन बेहद आगे जा चुका था। इस बात को वह स्पष्ट तौर पर समझ चुके थे कि बम और पिस्तौल अपने आप में आज़ादी या इंक़लाब नहीं ला सकते हैं। यह देश की बहुसंख्यक मेहनतकश जनता, यानी मज़दूर और ग़रीब मेहनतकश किसान हैं, जो समाज का क्रान्तिकारी रूपान्तरण कर डालने का काम करते हैं। जनता इतिहास बनाती है।

दूसरी बात यह है कि भगतसिंह और उनके साथियों ने बार-बार स्पष्ट किया था कि उनकी लड़ाई सिर्फ़ अंग्रेज़ी हुकूमत के ख़िलाफ़ नहीं है। उनकी लड़ाई लूट पर टिकी समूची व्यवस्था के ख़िलाफ़ है। उनकी लड़ाई का मक़सद एक ऐसी व्यवस्था का निर्माण है जिसमें इन्सान के हाथों इन्सान का शोषण असम्भव हो जाये। एच.एस.आर.ए. के क्रान्तिकारियों ने अपने लेखन में बार-बार साफ़ किया था कि अंग्रेज़ों से आज़ादी भारत की मेहनतकश जनता की मुक्ति का महज़ पहला क़दम है। लेकिन अगर आज़ादी देश के पूँजीपति वर्ग की पार्टी कांग्रेस या किसी भी अन्य पूँजीवादी दल के नेतृत्व में आयेगी, तो वह गोरे हुक्मरानों से भूरे हुक्मरानों के बीच एक समझौते के रूप में ख़त्म होगी। वजह यह कि ये सभी पूँजीवादी दल देश के पूँजीपतियों, धनी दुकानदारों व भूस्वामियों की नुमाइन्दगी करते हैं। ऐसे में, आज़ादी के बाद यदि ये ही लुटेरे व शोषक वर्ग सत्ता में पहुँचेंगे, तो देश की जनता को औपनिवेशिक ग़ुलामी से आज़ादी ज़रूर मिलेगी। लेकिन उन्हें अपने ही देश के पूँजीपतियों और भूस्वामियों द्वारा होने वाले शोषण, उत्पीड़न और दमन से आज़ादी नहीं मिलेगी। यह आज़ादी देश की आम जनता को एक ऐसी व्यवस्था में ही मिल सकती है, जिसमें उत्पादन, राज-काज और समाज के समूचे ढाँचे पर उन वर्गों का नियन्त्रण हो, जो स्वयं सुई से लेकर जहाज़ तक सबकुछ बनाते हैं, यानी मज़दूरों-मेहनतकशों के राज में; दूसरे शब्दों में, समाजवादी व्यवस्था में। भगतसिंह और उनके साथियों की दूरगामी लड़ाई एक समाजवादी व्यवस्था को स्थापित करने की थी। भगतसिंह ने अपने प्रसिद्ध लेख क्रान्तिकारी कार्यक्रम का मसविदा’ में लिखा था:

“मेरी राय में इस समय वास्तविक क्रान्तिकारी ताक़तें मैदान में नहीं हैं। यह संघर्ष मध्यवर्गीय दुकानदारों और चन्द पूँजीपतियों के बलबूते किया जा रहा है। ये दोनों वर्ग, विशेषतः पूँजीपति, अपनी सम्पत्ति या मिल्कियत ख़तरे में डालने की जुर्रत नहीं कर सकते। वास्तविक क्रान्तिकारी सेनाएँ तो गाँवों और कारख़ानों में हैं – किसान और मज़दूर… भारत सरकार का प्रमुख लार्ड रीडिंग की जगह यदि सर पुरुषोत्तम दास ठाकुर दास हो तो उन्हें (जनता को) इससे क्या फ़र्क ़पड़ता है? एक किसान को इससे क्या फ़र्क़ पड़ेगा, यदि लार्ड इरविन की जगह सर तेज बहादुर सप्रू आ जायें? राष्ट्रीय भावनाओं की अपील बिल्कुल बेकार है।… क्रान्ति से हमारा क्या आशय है, यह स्पष्ट है। इस शब्दावली में इसका सिर्फ एक ही अर्थ हो सकता है – जनता के लिए जनता का राजनीतिक शक्ति हासिल करना। वास्तव में यही है ‘क्रान्ति’, बाक़ी सभी विद्रोह तो सिर्फ मालिकों के परिवर्तन द्वारा पूँजीवादी सड़ाँध को ही आगे बढ़ाते हैं।…भारत में हम भारतीय श्रमिक के शासन से कम कुछ नहीं चाहते…हम गोरी बुराई की जगह काली बुराई को लाकर कष्ट नहीं उठाना चाहते।…. क़ौम कांग्रेस के लाउडस्पीकर नहीं हैं, वरन् वे मज़दूर-किसान हैं जो भारत की 95 प्रतिशत जनसंख्या है।”

तीसरी बात, भगतसिंह उस समय ही इस बात को अच्छी तरह से समझते थे कि साम्प्रदायिकता और धर्मान्धता जनता के सबसे ख़तरनाक दुश्मनों में से एक है। अपने समय में उन्होंने हिन्दू महासभा, आर.एस.एस., इस्लामिक कट्टरपन्थी संगठनों, आदि जैसे साम्प्रदायिक संगठनों की तीखी आलोचना की थी और बताया था कि ऐसे संगठन अंग्रेज़ों के हाथों में खेलते हैं और जनता की एकता को तोड़ने का काम करते हैं। आज के समय में भगतसिंह के ये विचार विशेष तौर पर प्रासंगिक हैं। देश में इस समय धर्म के नाम पर की जा रही फ़ासीवादी साम्प्रदायिक राजनीति ने जनता की कमर तोड़कर रख दी है। एक ऐसे समय में जब बेरोज़गारी, महँगाई, ग़रीबी, भूख, कुपोषण और बीमारी ने देश के 80 फ़ीसदी लोगों का जीना मुहाल कर रखा है, जब शिक्षा और चिकित्सा आम मेहनतकश जनता की पहुँच से बाहर जा चुकी है, निजीकरण और उदारीकरण की नीतियों का देश की आम जनता लगातार ख़ामियाज़ा भुगत रही है, तो मोदी सरकार और संघ परिवार की साम्प्रदायिक फ़ासीवादी नीतियों ने देश की जनता को धर्म के नाम पर बाँटने का काम लगातार जारी रखा है। इसका मक़सद यह है कि एक ओर देश की जनता की बदहाली के लिए ज़िम्मेदार असली ताक़त यानी समूची पूँजीवादी व्यवस्था और पूँजीपति वर्ग कठघरे से बाहर हो जाता है, और देश के बहुसंख्यक समुदाय की आम जनता के समक्ष एक नक़ली दुश्मन के तौर पर मुसलमानों को पेश कर दिया जाता है। गोदी मीडिया से लेकर समूचे फ़िल्म उद्योग तक को इस समय दंगाई की भूमिका में लाकर खड़ा कर दिया गया है। समाचार चैनलों पर लगातार साम्प्रदायिकता, धर्मान्धता और अन्धविश्वास का ज़हर उगला जा रहा है। ‘छावा’ जैसी फ़िल्मों के ज़रिये झूठा इतिहास पेश कर जनता के बीच साम्प्रदायिक आधार पर वैमनस्य पैदा किया जा रहा है और इतिहास के कल्पित “अन्याय” का बदला लेने के लिए कुण्ठित और हीनता-ग्रन्थि के शिकार टुटपुँजिया हिन्दू जनमानस को ललकारा जा रहा है। इसका नतीजा नागपुर में हुई साम्प्रदायिक हिंसा में सामने भी आने लगा है। नागपुर तो केवल एक प्रातिनिधिक उदाहरण है। पूरे देश के ही जनमानस में एक ऐसा विष घोला जा रहा है जिसका नतीजा आने वाले समय में धनी वर्गों, अमीरज़ादों और सेठों को नहीं बल्कि देश की आम मेहनतकश जनता को ही चुकाना पड़ेगा। ऐसे समय में, देश के आम मेहनतकश लोगों के लिए भगतसिंह का साम्प्रदायिक दंगे और उनका इलाज’ नामक लेख में दिया गया सन्देश और भी ज़्यादा प्रासंगिक हो गया है।

भगतसिंह ने स्पष्ट तौर पर कहा था कि मेहनतकश लोगों और ग़रीब जनता को धर्म को पूर्णत: एक व्यक्तिगत मसला मानना चाहिए। कौन-सा व्यक्ति कौन-सा धर्म मानता है या कोई भी धर्म नहीं मानता, यह उसका निजी मामला है और इसका राजनीति और सामाजिक जीवन से कोई रिश्ता नहीं होना चाहिए। भगतसिंह ने देश की जनता से पूछा कि हम धर्म के मसले पर अलग-अलग होकर भी राजनीति यानी अपने वर्ग हितों के लिए किये जाने वाले संघर्ष में एक क्यों नहीं हो सकते? अपने उक्त लेख में भगतसिंह लिखते हैं :

“जहाँ तक देखा गया है, इन दंगों के पीछे साम्प्रदायिक नेताओं और अख़बारों का हाथ है। इस समय हिन्दुस्तान के नेताओं ने ऐसी लीद की है कि चुप ही भली। वही नेता जिन्होंने भारत को स्वतन्त्र कराने का बीड़ा उठाया था और जो ‘समान राष्ट्रीयता’ और ‘स्वराज- स्वराज’ के दमगजे मारते नहीं थकते थे, वही या तो अपने सिर छिपाये चुपचाप बैठे हैं या इसी धर्मान्धता में बह चले हैं।”

आज अख़बारों की जगह आप समूचा गोदी मीडिया पढ़ें जिसमें अख़बार समेत सभी समाचार चैनल, यूट्यूब पर चलने वाले साम्प्रदायिक चैनल, व्हाट्सऐप पर चलने वाले साम्प्रदायिक ग्रुप आदि सभी शामिल हैं। इसी लेख में आगे वह लिखते हैं:

“लोगों को परस्पर लड़ने से रोकने के लिए वर्ग चेतना की जरूरत है। ग़रीब मेहनतकश व किसानों को स्पष्ट समझा देना चाहिए कि तुम्हारे असली दुश्मन पूँजीपति हैं, इसलिए तुम्हें इनके हथकण्डों से बचकर रहना चाहिए और इनके हत्थे चढ़ कुछ न करना चाहिए। संसार के सभी ग़रीबों के, चाहे वे किसी भी जाति, रंग, धर्म या राष्ट्र के हों, अधिकार एक ही हैं। तुम्हारी भलाई इसी में है कि तुम धर्म, रंग, नस्ल और राष्ट्रीयता व देश के भेदभाव मिटाकर एकजुट हो जाओ और सरकार की ताक़त अपने हाथ में लेने का यत्न करो। इन यत्नों में तुम्हारा नुकसान कुछ नहीं होगा, इससे किसी दिन तुम्हारी ज़ंजीरें कट जायेंगी और तुम्हें आर्थिक स्वतन्त्रता मिलेगी।”

भगतसिंह के ये शब्द आज उनके समय से भी ज़्यादा प्रासंगिक हैं और इस बात को आप और हम अच्छी तरह से समझ सकते हैं कि ऐसा क्यों है।

चौथी बात, साम्प्रदायिकता के ही समान जाति प्रश्न और अस्पृश्यता की समस्या पर भी भगतसिंह के विचार आज ख़ास तौर पर मौजूँ हो गये हैं, हालाँकि वे हमेशा ही प्रासंगिक थे। भगतसिंह ने स्पष्ट किया था कि दलित आबादी की मुक्ति का रास्ता सुधारों, पैबन्दसाज़ी, पहचान की राजनीति, सरकारों की बाट जोहने, अर्ज़ियाँ और आवेदन देते रहने के व्यवहारवाद और सुधारवाद से होकर नहीं जाता है। केवल और केवल एक आमूलगामी श्रमिक क्रान्ति ही जाति के अन्त और दलितों की मुक्ति का रास्ता खोल सकती है। आज जिस प्रकार अम्बेडकरवादी व्यवहारवाद, सुधारवाद, संविधानवाद की राजनीति और पहचान की राजनीति ने दलित मुक्ति की समूची परियोजना को अर्ज़ीबाज़ी के गोल चक्कर और प्रतीकवाद की अन्धी गली में भटका और घुमा दिया है, वह सबके सामने है। भगतसिंह ने अछूत समस्या’ नामक लेख में जो विचार पेश किये हैं, वे इस समूचे वातावरण में आश्चर्यजनक रूप से प्रासंगिक हैं। भगतसिंह अपने इस लेख में लिखते हैं:

“लेकिन ध्यान रहे, नौकरशाही के झाँसे में मत फँसना। यह तुम्हारी कोई सहायता नहीं करना चाहती, बल्कि तुम्हें अपना मोहरा बनाना चाहती है। यही पूँजीवादी नौकरशाही तुम्हारी ग़ुलामी और ग़रीबी का असली कारण है। इसलिए तुम उसके साथ कभी न मिलना। उसकी चालों से बचना। तब सबकुछ ठीक हो जायेगा। तुम असली सर्वहारा हो… संगठनबद्ध हो जाओ। तुम्हारी कुछ हानि न होगी। बस ग़ुलामी की ज़ंजीरें कट जायेंगी। उठो, और वर्तमान व्यवस्था के विरुद्ध बग़ावत खड़ी कर दो। धीरे-धीरे होने वाले सुधारों से कुछ नहीं बन सकेगा।”

इसी लेख में भगतसिंह यह भी बताते हैं कि स्वयं मज़दूरों व मेहनतकशों की आबादी में जिस प्रकार जातिगत पूर्वाग्रह और ऊँच-नीच की सोच व्याप्त है, उसे दूर करने का रास्ता वर्गीय एकजुटता है, न कि पहचान की राजनीति के ज़रिये जनता के ही अलग-अलग हिस्सों को जाति के आधार पर आपस में लड़ा देना। जनता के बीच के अन्तरविरोधों और जनता और दुश्मन वर्गों के बीच के अन्तरविरोधों के बीच जो फ़र्क़ नहीं करता, वह मेहनतकश आबादी की मुक्ति की लड़ाई को एक क़दम भी आगे नहीं ले जा सकता है। उक्त लेख में ही भगतसिंह लिखते हैं:

“अलग-अलग संगठन और खाने-पीने का भेदभाव मिटाना ज़रूरी है। छूत-अछूत शब्दों को जड़ से निकालना होगा। जब तक हम अपनी तंगदिली छोड़कर एक न होंगे, तब तक हममें वास्तविक एकता नहीं हो सकती।”

भगतसिंह के इन विचारों को आज समझने और लागू करने की ज़रूरत पहले हमेशा से ज़्यादा है। जब साम्प्रदायिक फ़ासीवादी मोदी सरकार सत्ता में है, जब देश भर में संघ परिवार साम्प्रदायिक विषवमन कर जनता की एकजुटता पर हमला कर रहा है, जब जाति की पहचानवादी राजनीति को कभी जाति जनगणना के नाम पर तो कभी नयी-नयी श्रेणियाँ बनाकर आरक्षण की राजनीति के ज़रिये हावी बनाया जा रहा है, जब जनता के जनवादी हक़ों पर लगातार फ़ासीवादी हमले किये जा रहे हैं, तो भगतसिंह के विचार हमारी पीढ़ी के मज़दूरों, मेहनतकशों, ग़रीब किसानों और छात्रों-युवाओं के लिए एक प्रकाश-स्तम्भ का काम कर रहे हैं। देश में आज जो माहौल है, उसके बारे में भगतसिंह के निम्न शब्द हमारे ज़ेहन में बार-बार गूँजते हैं :

“जब गतिरोध की स्थिति लोगों को अपने शिकंजे में जकड़ लेती है तो किसी भी प्रकार की तब्दीली से वे हिचकिचाते हैं। इस जड़ता और निष्क्रियता को तोड़ने के लिए एक क्रान्तिकारी स्पिरिट पैदा करने की ज़रूरत है, अन्यथा पतन और बर्बादी का वातावरण छा जाता है। लोगों को गुमराह करने वाली प्रतिक्रियावादी शक्तियाँ जनता को ग़लत रास्ते पर ले जाने में सफल हो जाती हैं। इससे इन्सान की प्रगति रुक जाती है और उसमें गतिरोध आ जाता है। इस परिस्थिति को बदलने के लिए यह ज़रूरी है कि क्रान्ति की स्पिरिट ताज़ा की जाये, ताकि इन्सानियत की रूह में हरकत पैदा हो।”

पाँचवीं बात, शहीदे-आज़म भगतसिंह ने स्पष्ट बताया था कि किसी देश में मज़दूरों-मेहनतकशों के इंक़लाब के लिए दो बुनियादी चीज़ों की ज़रूरत होती है : सर्वहारा वर्ग की वैज्ञानिक विचारधारा और दूसरा एक जुझारू अनुशासित क्रान्तिकारी संगठन। बिना विचारधारा के संगठन अन्धी गली में भटकता रहेगा और बिना संगठन के विचारधारा कभी मूर्त रूप नहीं ले पायेगी बल्कि एक हवा-हवाई चीज़ बनकर रह जायेगी। और बिना संगठन और विचारधारा के जनता के आन्दोलन स्वत:स्फूर्तता की सीमा से आगे नहीं जा सकेंगे। इनके अभाव में जनता विद्रोहों को तो ज़रूर जन्म दे सकती है और शक्तिशाली विद्रोहों की सूरत में शासन-परिवर्तन भी कर सकती है, लेकिन वह व्यवस्था-परिवर्तन नहीं कर सकती। व्यवस्था-परिवर्तन के लिए एक वैकल्पिक व्यवस्था का ख़ाका होना ज़रूरी है और ऐसा ख़ाका एक सही विचारधारात्मक लाइन, राजनीतिक लाइन और कार्यक्रम के ज़रिये ही पेश किया जा सकता है, जिसे क्रान्ति के विज्ञान के अध्ययन और क्रान्तिकारी व्यवहार के ज़रिये सर्वहारा वर्ग का क्रान्तिकारी संगठन, यानी क्रान्तिकारी पार्टी ही सूत्रबद्ध कर सकती है।

‘क्रान्तिकारी कार्यक्रम का मसविदा’ नामक अपने प्रसिद्ध लेख में, जिसे हम ऊपर भी उद्धृत कर चुके हैं, भगतसिंह स्पष्ट शब्दों में एक क्रान्तिकारी पार्टी की ज़रूरत पर बल देते हैं। जब आप उनके विचारों को पढ़ते हैं तो आप पाते हैं कि वे लेनिन द्वारा बताये गये बोल्शेविक संगठन जैसे संगठन की ही बात कर रहे हैं, जो लौह-अनुशासन के आधार पर काम करते हैं, अपने समूचे ढाँचे को पूँजीवादी राज्यसत्ता के रहमोकरम पर नहीं रखते और जिनकी रीढ़ की हड्डी ऐसे पेशेवर क्रान्तिकारियों से तैयार होती है, जो पूर्ण रूप से क्रान्ति और क्रान्तिकारी पार्टी की ज़रूरतों के अनुसार पूरावक़्ती कार्यकर्ता के तौर पर काम करते हैं। ऐसे पेशेवर क्रान्तिकारी किसी भी वर्ग से आ सकते हैं, बशर्ते कि वे राजनीतिक तौर पर सर्वहारा वर्ग का पक्ष चुनें। लेकिन निश्चित तौर पर यह बेहद ज़रूरी है कि उन्नत व वर्ग-चेतना से लैस मज़दूर ऐसी पार्टी की ज़रूरत को समझें, पेशेवर क्रान्तिकारी बनने के रास्ते को अपनायें और एक क्रान्तिकारी सर्वहारा पार्टी को देशव्यापी पैमाने पर खड़ा करने के लिए जी-जान से जुट जायें।

केवल ऐसी पार्टी ही पूँजीवादी व्यवस्था और शासक पूँजीपति वर्ग को निर्णायक तौर पर चुनौती दे सकती है; केवल ऐसी पार्टी ही मज़दूरों, ग़रीब किसानों व आम मेहनतकश आबादी को एक साझा कार्यक्रम पर गोलबन्द और संगठित कर सकती है और केवल ऐसी पार्टी ही समूची मेहनतकश जनता का क्रान्तिकारी कोर बन एक मज़दूर इंक़लाब की अगुवाई कर सकती है जो मज़दूर सत्ता के मातहत समाजवादी व्यवस्था की स्थापना करे; एक ऐसी व्यवस्था जिसमें सभी कल-कारख़ानों व खानों-खदानों व बड़े उद्यमों का राष्ट्रीकरण कर उसे राज्य के मातहत कर दिया जायेगा, सभी बड़े कुलकों व फ़ार्मरों के फ़ार्मों को ज़ब्त कर उस पर सामूहिक व राजकीय सरकारी फ़ार्मों की स्थापना कर दी जायेगी, समूचे उत्पादन और वितरण को सामाजिक आवश्यकताओं के आधार पर नियोजित और संगठित किया जायेगा और राज-काज और समाज के समूचे ढाँचे पर उत्पादन करने वाले वर्गों का हक़ होगा व फ़ैसला लेने की ताक़त उनके हाथों में होगी। केवल एक ऐसी व्यवस्था में ही हमारे समाज को बेरोज़गारी, ग़रीबी, भुखमरी, कुपोषण, अशिक्षा, साम्प्रदायिकता, जात-पात, शोषण व दमन से मुक्ति मिल सकती है और मनुष्य का सर्वांगीण विकास हो सकता है।

शहीदे-आज़म भगतसिंह ने एक ऐसे समाज का ही सपना देखा था और यह कोई शेखचिल्ली का सपना नहीं था। यह एक वैज्ञानिक सोच पर और व्यावहारिक कार्यक्रम पर आधारित उद्देश्य है। आज भगतसिंह की स्मृति, उनकी विरासत और उनके विचार इतिहास के नेपथ्य से हमें यह आवाज़ दे रहे हैं :

भारत के मज़दूरो, ग़रीब किसानो, आम मेहनतकशो और आम छात्रो व युवाओ! तुम चाहे किसी भी धर्म, जाति, नस्ल, क्षेत्र या भाषा से रिश्ता रखते हो, तुम्हारे राजनीतिक व आर्थिक हित समान हैं, तुम्हारी एक जमात है! तुम्हें लूटने वाली इस देश की परजीवी पूँजीवादी जमात है जिसमें कारख़ाना मालिक, खानों-खदानों के मालिक, ठेकेदार, धनी व्यापारी, धनी किसान व ज़मीन्दार, दलाल और बिचौलिये शामिल हैं! ये जोंक के समान इस देश की मेहनतकश अवाम के शरीर पर चिपके हुए हैं! ये ही इस देश की मेहनत और कुदरत की लूट के बूते अपनी तिजोरियाँ भर रहे हैं! इनके जुवे को अपने कन्धों से उतार फेंको! इसके लिए संगठित हो, अपनी क्रान्तिकारी पार्टी का निर्माण करो! केवल यही शहीदे-आज़म भगतसिंह की स्मृतियों को इस देश के मेहनती हाथों का सच्चा क्रान्तिकारी सलाम होगा, उनको सच्ची आदरांजलि होगी : एक ऐसे समाज का निर्माण करके जिसमें सुई से लेकर जहाज़ बनाने वाले मेहनतकश वर्ग उत्पादन, समाज और राज-काज पर अपना नियन्त्रण स्थापित करेंगे, परजीवी लुटेरी जमातों के हाथों से राजनीतिक और आर्थिक सत्ता छीन ली जायेगी, जो मेहनत नहीं करेगा उसे रोटी खाने का भी अधिकार नहीं होगा, दूसरे की मेहनत की लूट का हक़ किसी को नहीं होगा, जिसमें, भगतसिंह के ही शब्दों में, मनुष्य के हाथों मनुष्य का शोषण असम्भव हो जायेगा।

 

मज़दूर बिगुल, मार्च 2025


 

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