पूँजीपतियों के मुनाफ़े के लिए अरावली पर्वत श्रृंखला को तबाह करने पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर
हमारा जीवन उस हवा पर निर्भर करता है, जिसमें हम साँस लेते है, उस पानी पर निर्भर करता है, जिसे हम पीते हैं और उस खाद्यान्न पर निर्भर करता है, जिसका हम सेवन करते हैं। जब इन तीनों को सोचे-समझे तरीके से नष्ट किया जाता रहे, लोगों को साफ हवा और स्वच्छ पानी भी नसीब न हो, खाने का अनाज तक प्रदूषित हो जाये, तब ऐसे हालात में हम चुप नहीं बैठ सकते हैं। हमें आगे आकर अपने पर्यावरण को बचाने के इस संघर्ष में अपनी भूमिका चुननी होगी। पारिस्थितिकी तंत्र को बचाना अब कोई विकल्प नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व को बचाये रखने का प्रश्न बन चुका है! इसलिए, जनस्वास्थ्य और पारिस्थितिकी तंत्र के सन्तुलन की कीमत पर पूँजीवादी मुनाफ़ाखोरी की मशीनरी को प्रश्रय देने वाली वाली इस पर्यावरण-विरोधी फ़ासीवादी सत्ता के ख़िलाफ़ एक सतत और निरंतर संघर्ष आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। अरावली के वर्तमान मुद्दे पर आज हमारी यह तात्कालिक माँग होनी चाहिए कि अरावली पर्वत श्रेणी की परिभाषा में कोई बदलाव नहीं किया जाये और अरावली में हो रहे अवैध खनन पर तत्काल रोक लगा कर, इसके संरक्षण के लिए वैज्ञानिक आधार पर कार्यक्रम चलाये जाये।






















