Category Archives: पर्यावरण

पूँजीपतियों के मुनाफ़े के लिए अरावली पर्वत श्रृंखला को तबाह करने पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर

हमारा जीवन उस हवा पर निर्भर करता है, जिसमें हम साँस लेते है, उस पानी पर निर्भर करता है, जिसे हम पीते हैं और उस खाद्यान्न पर निर्भर करता है, जिसका हम सेवन करते हैं। जब इन तीनों को सोचे-समझे तरीके से नष्ट किया जाता रहे, लोगों को साफ हवा और स्वच्छ पानी भी नसीब न हो, खाने का अनाज तक प्रदूषित हो जाये, तब ऐसे हालात में हम चुप नहीं बैठ सकते हैं। हमें आगे आकर अपने पर्यावरण को बचाने के इस संघर्ष में अपनी भूमिका चुननी होगी। पारिस्थितिकी तंत्र को बचाना अब कोई विकल्प नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व को बचाये रखने का प्रश्न बन चुका है! इसलिए, जनस्वास्थ्य और पारिस्थितिकी तंत्र के सन्तुलन की कीमत पर पूँजीवादी मुनाफ़ाखोरी की मशीनरी को प्रश्रय देने वाली वाली इस पर्यावरण-विरोधी फ़ासीवादी सत्ता के ख़िलाफ़ एक सतत और निरंतर संघर्ष आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। अरावली के वर्तमान मुद्दे पर आज हमारी यह तात्कालिक माँग होनी चाहिए कि अरावली पर्वत श्रेणी की परिभाषा में कोई बदलाव नहीं किया जाये और अरावली में हो रहे अवैध खनन पर तत्काल रोक लगा कर, इसके संरक्षण के लिए वैज्ञानिक आधार पर कार्यक्रम चलाये जाये।

शान्ति (SHANTI) विधेयक, 2025 – कॉरपोरेट मुनाफ़े के लिए मानव जीवन को ख़तरे में डालने का बेशर्म दस्तावेज़

बड़े पैमाने पर होने वाले परमाणु रिसाव, कचरे का अनुचित प्रबन्धन व निपटारा तथा परमाणु संचालन से जुड़े अन्य बड़े जोख़िम वाले कारकों से होने वाली आपदाओं को छिपाने, उन्हें कम करके दिखाने और उनकी ज़िम्मेदारी से पूँजीपतियों और निजी प्रतिष्ठानों को मुक्त करने की मंशा से ही यह विधेयक मूलतः संचालित है। जैसे-जैसे आप इस विधेयक को पढ़ेंगे तो पायेंगे कि यह पूरा क़ानून इस अत्यन्त ख़तरनाक क्षेत्र में बड़े पैमाने पर निजी और विदेशी भागीदारी को प्रोत्साहित करने के लिए बनाया गया है। वहीं दूसरी तरफ़ सार्वजनिक सुरक्षा सम्बन्धी चिन्ताओं को पूरी तरह से नज़रअन्दाज़ कर दिया गया है। यह विधेयक पूरी निर्माण श्रृंखला यानी खनन से लेकर संयंत्र संचालन और कचरा प्रबन्धन तक के लिए एक ही लाइसेंस की अनुमति देता है। इससे निजी कम्पनियाँ बिना किसी वास्तविक जवाबदेही और दण्ड से मुक्त रहते हुए अधिकतम मुनाफ़ा कमा सकती हैं।

बढ़ रहे प्रदूषण के बीच मोदी सरकार की जुमलेबाज़ी और ख़राब होते मज़दूर वर्ग के हालात

भारत के कई शहर एक घने, ज़हरीले धुएँ की चादर से ढके हुए हैं जिससे आँखों में जलन और गले में खराश हो रही है। यह ज़हर न उम्र देखता है, न जाति-धर्म, न ही शक्ल-सूरत—यह लगातार साँस के ज़रिये हर किसी के फेफड़ों में समा रहा है। हाँ, एक तबका जिसके पास आर्थिक सामर्थ्य है वह इससे बचने की तात्कालिक कोशिशें ज़रूर कर रहा है। हाल के आँकड़े बताते हैं कि दिल्ली-एनसीआर में एयर प्यूरीफ़ायर की बिक्री में 72% की बढ़ोतरी हुई है, वहीं महाराष्ट्र 12% के साथ दूसरे स्थान पर रहा है। यानी बढ़ रहे प्रदूषण से फ़ायदा भी पूँजीपतियों को ही हो रहा है! कुछ ऐसे भी लोग हैं जो फिलहाल शहर छोड़कर पहाड़ियों और समन्दर के किनारे बसने चले गये हैं। ज़ाहिरा तौर पर प्रदूषण के दुष्प्रभावों से बचने की ऐसी कोशिशें देश की बहुसंख्यक मेहनतकश आबादी के लिए सम्भव नहीं।

दिल्ली का जानलेवा प्रदूषण और आँगनवाड़ी केन्द्रों, बच्चों व आँगनवाड़ीकर्मियों के प्रति सरकार की अनदेखी!!

दिल्ली की आँगनवाड़ियों में लाखों बच्चे रोज़ाना जाते हैं लेकिन उनके प्रति सरकार पूरी तरह से आँख मूँद कर बैठी है! वायु प्रदूषण के बढ़ते ही सीएम ऑफ़िस के लिए 5.5 लाख के ‘एयर प्यूरिफ़ायर’ ख़रीद लिये जाते हैं लेकिन आँगनवाड़ियों और स्कूलों को खुला रखकर बच्चों को मरने के लिए छोड़ दिया जाता है। वायु प्रदूषण की चपेट में सबसे अधिक मेहनतकश आबादी और उनके घरों से आने वाले बच्चे आते हैं क्योंकि न तो उनके लिये एयर प्यूरीफ़ायर है, ना ही वे बेहतर पोषण हासिल कर सकते हैं और बीमार पड़ने पर न उन्हें बेहतर चिकित्सा सुविधा मिल पाती है। आँगनवाड़ी में जाने वाले अधिकांश बच्चे मज़दूरों-मेहनतकशों या निम्न-मध्यम वर्गीय परिवारों से आते हैं जिनके लिए उपरोक्त कारणों की वज़ह से इस जानलेवा प्रदूषण से बचने का कोई विकल्प सरकार ने नहीं छोड़ा है! आँगनवाड़ी केन्द्रों, बच्चों व आँगनवाड़ीकर्मियों के प्रति यह लापरवाही एक बार फ़िर भाजपा सरकार के जन-विरोधी, आँगनवाड़ीकर्मी-विरोधी चेहरे को हमारे सामने उजागर करती है।

अनियोजित विकास, प्रकृति की लूट, भ्रष्टाचार, पर्यावरणीय तबाही से धराली जैसी आपदाओं की मार झेलने को अभिशप्त उत्तराखण्ड

हिमालय के पर्यावरण की तबाही के अलग-अलग कारणों को मिलाकर अगर देखा जाये तो इसके बुनियाद में पूँजीवादी व्यवस्था की अराजकता, अमीरों की विलासिता और मुनाफे की अन्धी हवस है। हिमालय की आपदा केवल धराली जैसे गाँवों, शहरों, कस्बों की नहीं है बल्कि ये एक राष्ट्रीय आपदा है। छोटे-मोटे आन्दोलनों से इस समस्या का समाधान सम्भव नहीं है। हिमालय की इस तबाही को राष्ट्रीय फलक पर लाने और एक व्यापक आन्दोलन खड़ा करने की आज ज़रूरत है। नहीं तो बड़ी-बड़ी ठेका कम्पनियों को फायदा पहुँचाने, अमीरों की विलासिता और मुनाफे की अन्धी हवस में जिस प्रकार पूरे हिमालय की पारिस्थितिकीय तन्त्र को बर्बाद किया जा रहा है, आने वाले वक़्त में इसका खामियाजा पूरे उत्तर भारत को भुगतना पड़ सकता है। सरकारों के लिए ये आपदाएँ मौसमी चक्र बन चुकीं हैं, जो आती और जाती रहती हैं। उसके लिए जनता उजड़ती-बसती रहती है। लेकिन मुनाफ़ा निरन्तर जारी रहना चाहिए!

बारिश ने उजागर की “स्मार्ट सिटी” की हक़ीकत – हर बार की तरह मज़दूर और मेहनतकश तबका ही भुगत रहा है!

इन हालात में सबसे ज़्यादा मार उस वर्ग पर पड़ी है, जो हर रोज़ सुबह 5 बजे उठकर काम की तलाश में, या कारखानों, दफ़्तरों, दुकानों पर काम तक पहुँचने के लिए निकलता है — मज़दूर वर्ग। फुटपाथ पर रहने वाला, झुग्गियों में गुजर-बसर करने वाला, ईंट-भट्ठों और फ़ैक्टरियों में काम करने वाला, सफाई कर्मचारी, निर्माण मज़दूर, रेहड़ी-पटरी चलाने वाला, इन सबके लिए ये बारिश आफ़त बनकर आई है। जिन झुग्गियों में वे रहते हैं, वहाँ सीवर व्यवस्था नाम की कोई चीज़ नहीं। न कोई निकासी का प्रबन्ध है, न कोई प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधा। इसका नतीजा क्या होता है, ये हम मज़दूर जानते हैं। हमें इसी गन्दगी में पशुवत पड़े रहने के लिए छोड़ दिया जाता है, हालाँकि हमारे समाज के धनाढ्य वर्गों की समृद्धि की इमारतें हमारे श्रम की नींव पर ही खड़ी होती हैं।

पर्यावरणीय विनाश के चलते सिमटता वसन्त

जानलेवा होते ये पर्यावरण परिवर्तन पूँजी द्वारा प्रकृति की अन्धी लूट के कारण हैं। पर्यावरण परिवर्तन की तमाम चिन्ता पूँजीवादी देशों के हुक्मरानों के एजेण्‍डे में ही नहीं हैं। उनकी चिन्ता मुनाफ़े की गिरती दर को रोकने के ख्यालों और प्रयासों में ही डूबी है जो उन्हें श्रम और प्रकृति को और अधिक लूटने की ओर ही धकेलती है। भारत सरकार द्वारा जंगलों से लेकर पर्वतों, नदियों को नष्ट करने की योजनाओं पर मुहर लगाने से लेकर साम्राज्यवादी शक्तियों द्वारा ग्रीनलैण्‍ड, आर्कटिक और अण्टार्क्टिक में जीवाश्म ईंधन के भण्डार की लूट के लिए रस्साकशी हो या ब्राज़ील के अमेज़न जंगलों की तबाही, यह स्पष्ट है कि पर्यावरण को बचाना इनके एजेण्डे में है ही नहीं। स्पष्ट ही है कि पर्यावरण को बचाने का मुद्दा भी आम मेहनतकश जनता के जीने के हक़ से जुड़ा मुद्दा है। पर्यावरण वैज्ञानिक हान्सेन की ‘2 सी इज़ डेड’ की यह चेतावनी पूँजीवादी हुक्मरानों के बहरे कानों पर पड़ रही है। यह मसला आज मज़दूरवर्गीय राजनीति का अहम मुद्दा है। यह दुनिया के मज़दूरों और मेहनतकशों के जीवन के अधिकार का ही मुद्दा है और इसके लिए संघर्ष भी मज़दूरवर्गीय राजनीति से ही लड़कर दिया जा सकता है न कि हुक्मरानों के आगे की गयी गुहारों से!

भोपाल गैस हत्याकाण्ड के 40 साल – मेहनतकशों के हत्याकाण्डों पर टिका मानवद्रोही पूँजीवाद!!

मुनाफ़े की अन्धी हवस में अमेरिकी कम्पनी यूनियन कार्बाइड की भारतीय सब्सिडियरी यूसीआईएल चन्द पैसे बचाने के लिए सारे सुरक्षा उपायों को ताक पर रखकर मज़दूरों से काम करवा रही थी। मालूम हो कि नगरनिगम योजना के मानकों के अन्तर्गत भी इस फैक्ट्री को लगाना गलत था लेकिन मध्यप्रदेश सरकार ने यू.सी.सी. का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। 1979 तक फैक्ट्री ने काम भी शुरू कर दिया गया, लेकिन काम शुरू होते ही कई दुर्घटनाएँ हुईं। दिसम्बर 1981, में ही गैस लीक होने के कारण एक मज़दूर की मौत हो गई और दो बुरी तरह घायल हो गये। लगातार हो रही दुर्घटनाओं के मद्देनज़र मई, 1982 में तीन अमेरिकी इंजीनियरों की एक टीम फैक्ट्री का निरीक्षण करने के लिए बुलाई गई। उन्होंने अपनी रिपोर्ट में साफ कहा कि मशीनों का काफी हिस्सा ख़राब है, एवं गैस भण्डारण की सुविधा अत्यन्त दयनीय है जिससे कभी भी गैस लीक हो सकती है और भारी दुर्घटना सम्भव है। इस रिपोर्ट के आधार पर 1982 में भोपाल के कई अखबारों ने लिखा था कि ‘वह दिन दूर नहीं, जब भोपाल में कोई त्रासदी घटित हो जाए।’ फिर भी न तो कम्पनी ने कोई कार्रवाई की और न ही सरकार ने।

आख़िर कब तक उत्तर बिहार की जनता बाढ़ की विभीषिका झेलने को मजबूर रहेगी?

आज विज्ञान और टेक्नोलॉजी जिस हद तक आगे बढ़ चुकी है, उसका उपयोग कर ऐसी प्राकृतिक आपदाओं के प्रभावों को कम किया जा सकता है। हालाँकि जैसा कि पहले भी कहा पूँजीवादी व्यवस्था के अन्तर्गत भी उत्पादक शक्तियों के विकास के कारण ऐसा सम्भव होते हुए भी इसे नहीं किया जाता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हम हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे। हमें सत्ता में बैठी सरकारों को इन मसलों पर घेरते हुए उनसे सवाल करना होगा और पूँजीवादी व्यवस्था को कठघरे में खड़ा करना होगा। बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदा के प्रभावों को नियंत्रित करने के लिए हमें सरकारों को मजबूर करना होगा।

केरल में भूस्खलन एवं असम और आन्ध्र-तेलंगाना में बाढ़ से भीषण तबाही

पूँजीवाद के दायरे में पर्यावरण को बचाने और पारिस्थितिक तन्त्र को स्थिर करने की तमाम कोशिशों के बावजूद अगर यह संकट कम होने की बजाय तीखा ही होता जा रहा है तो ऐसा इसलिए है कि मुनाफ़ा-केन्द्रित और अनियोजित विकास पूँजीवाद की संरचना में ही निहित है। मुनाफ़े की दर को लगातार बढ़ाते जाने की ज़रूरत पूँजी को नियन्त्रण और नियोजन की दीवारों को तोड़कर बेक़ाबू होने पर मजबूर करती है। इस समस्या के समाधान की दिशा में तभी आगे बढ़ा जा सकता है जब सामाजिक उत्पादन की प्रेरणा मुनाफ़ा न होकर लोगों की ज़रूरत पूरा करना हो। केवल तभी जलवायु परिवर्तन, पेड़ों की अन्धाधुन्ध कटाई, बेरोकटोक खनन-उत्खनन की प्रक्रिया को काबू में लाया जा सकता है। केवल ऐसे समाज में ही न सिर्फ़ फ़ैक्टरी के भीतर उत्पादन को योजनाबद्ध किया जा सकता है बल्कि समाज के स्तर पर भी उत्पादन व वितरण की एक समग्र योजना बनायी जा सकती है और उसपर अमल किया जा सकता है। इस प्रक्रिया में ही शहरीकरण को नियोजित किया जा सकता है। सामाजिक उत्पादन की प्रणाली को नज़रअन्दाज़ करके पर्यावरण विनाश की समस्या के समाधान की दिशा में एक क़दम भी नहीं बढ़ाया जा सकता है।