Category Archives: संघर्षरत जनता

नोएडा मज़दूर आन्दोलन के दौरान गिरफ़्तार राजनीतिक कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों, छात्रों-कलाकारों का दमन व ‘विच हण्ट’ जारी!

तो आज मेहनतकशों और मज़दूरों का यह सवाल पूछना क्या जायज़ नहीं है कि ऐसा तो नहीं कि जिस “राष्ट्र”, उसके “हितों” और उसकी “सुरक्षा” की बातें बार-बार तमाम सरकारें, मालिकान व प्रबन्धन, तमाम कम्पनियाँ, पुलिस व प्रशासन और मुख्यधारा का मीडिया अनन्त रूप से करते रहते हैं, उस “राष्ट्र” में केवल इस देश के धनिक वर्ग, मालिक वर्ग, उनकी नुमाइन्दगी करने वाले नेता व मन्त्री, ऊँचे नौकरशाह व अधिकारी शामिल हैं? ऐसा तो नहीं कि उस “राष्ट्र” में देश के ग़रीब, मज़दूर, छोटे किसान, मेहनतकश और निम्न-मध्यवर्ग के लोग और उनके हक़ों की हिमायत करने वाले सामाजिक व राजनीतिक कार्यकर्ता शामिल ही नहीं हैं? और क्या यह सवाल भी जायज़ नहीं है कि मज़दूर अधिकारों की बात करना ही क्यों जुर्म में तब्दील कर दिया गया है? क्यों हड़ताल, संघर्ष, प्रतिरोध और आन्दोलन करने को ही अपराध क़रार दे दिया गया है? ये सवाल हर इंसाफ़पसन्द नागरिक के सामने आज खड़े हैं। 

नोएडा और मानेसर के मज़दूर संघर्षों में कौन “बाहरी” और कौन “भीतरी”

जब भी कहीं मज़दूरों की कोई हड़ताल या आन्दोलन शुरू होता है, तो उसमें सक्रिय ट्रेड यूनियन कार्यकर्ताओं और मज़दूर संगठन के राजनीतिक कार्यकर्ताओं पर पुलिस प्रशासन और सरकार “बाहरी तत्व” होने की तोहमत लगाते हैं। उनके अनुसार, जो स्वयं उस शहर या औद्योगिक क्षेत्र में कारखाने में काम नहीं करता, उसे मज़दूरों के मसले पर बोलने का या उनके आन्दोलन में शिरक़त करने का कोई अधिकार नहीं है। यह हुक्मरानों का पुराना “तर्क” है। बल्कि कहना चाहिए कि कुतर्क है। नोएडा के मज़दूर आन्दोलन में सक्रिय मज़दूर कार्यकर्ताओं, श्रम अधिकार कार्यकर्ताओं, छात्र कार्यकर्ताओं और उसका समर्थन करने वाले बुद्धिजीवियों मसलन सत्यम वर्मा, आदित्य आनन्द, रूपेश राय, हिमांशु ठाकुर, सृष्टि, आकृति आदि पर नोएडा पुलिस ने यही “बाहरी” होने का आरोप लगाया। उसी प्रकार मानेसर में गिरफ्तार कार्यकर्ता साथियों श्यामबीर और हरीश पर भी ये ही आरोप लगाये गये हैं। तो हमें इस आरोप का पूरा कुतर्क समझ लेना चाहिए।

नोएडा के मज़दूर आन्दोलन और गिरफ्तार सामाजिक कार्यकर्ताओं व बुद्धिजीवियों के बारे में उत्तर प्रदेश पुलिस की विचित्र ‘सत्य कथाएँ’ और वास्तविक सच्चाई

देश में शायद ही कोई ऐसा हो जो यह न जानता हो कि नोएडा के मज़दूर आन्दोलन के दौरान सैंकड़ों मज़दूरों और 7 सामाजिक कार्यकर्ताओं, पत्रकारों, बुद्धिजीवियों और छात्र कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया है। इन पर शुरू में उत्तर प्रदेश पुलिस और गोदी मीडिया ने “पाकिस्तानी एजेण्ट” होने का आरोप लगा दिया! इस पर जनता के बड़े हिस्से की हँसी छूट गयी। इसके बाद इनको “नक्सली” बताने का प्रयास भी किया गया। इस पर भी जनता अपनी हँसी मुश्किल से ही रोक पायी, पर कुछ लोग फिर फक से हँस दिये! लेकिन ज्यादा बड़ा चुटकुला सुनने का मन हो तो आप उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा अब तक गिरफ्तार सामाजिक कार्यकर्ताओं की ज़मानत का विरोध करने वाले लिखित आवेदन और रिमाण्ड दस्तावेज़ देख सकते हैं। हम आपको विस्तार से उत्तर प्रदेश पुलिस के ये चुटकुले सुनाते हैं। ये चुटकुले उत्तर प्रदेश पुलिस के आला अधिकारियों और उनके तहत काम करने वाले पुलिसकर्मियों की मानसिक स्थिति और क्षमताओं के बारे में भी काफ़ी-कुछ बताते हैं। आइये, अब तक उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा अदालत में पेश कुछ दस्तावेज़ों की पड़ताल करें। पुलिस की भाषा पढ़कर हँसी आ सकती है क्योंकि एक दसवीं पास लड़का भी इससे बेहतर भाषा लिख सकता है।

नोएडा और मानेसर में गिरफ्तार मज़दूरों, राजनीतिक कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों व छात्रों को रिहा करो! सभी अन्यायपूर्ण मुक़दमे वापस लो!

उत्तर प्रदेश सरकार का पुलिस प्रशासन पूँजीवादी व्यवस्था का वह डेढ़ सौ साल पुराना ‘टूलकिट’ ही लागू कर रहा है, जो इसके अमेरिकी पुरखों ने 1886 में मई दिवस के शहीदों एंजेल, स्पाइस, फिशर और पार्संस को फँसाने के लिए लागू किया था। डेढ़ सौ साल में ये लोग कुछ नया भी ईजाद नहीं कर पाये हैं! तब अमेरिकी पुलिस ने हेमार्केट में खुद के ही दलालों द्वारा बम फिंकवाकर बेगुनाह मज़दूर नेताओं को फँसाया था ताकि मज़दूरों के संघर्ष को तोड़ा जा सके। बाद में अमेरिकी पूँजीवादी अदालत तक को मानना पड़ा था कि मई दिवस के शहीद बेगुनाह थे। बाद में इसे मानने में पूँजीवाद को कोई ख़ास नुक़सान भी नहीं था। आज तक दुनिया भर में पूँजीवादी व्यवस्था की पुलिस मज़दूरों और मज़दूर नेताओं के ख़िलाफ़ इन्हीं तौर-तरीक़ों का इस्तेमाल करती है। लेकिन मज़दूरों का संघर्ष न तो तब रुका था न अब रुका है और न ही तब तक रुकेगा जब तक इंसान द्वारा इंसान का शोषण जारी रहेगा। देश भर में इंसाफ़पसन्द लोगों और जनता ने पुलिस के इस ‘टूलकिट’ को समझ लिया है। देश के अलग-अलग हिस्सों में नोएडा आन्दोलन के गिरफ्तार मज़दूरों, लेबर कार्यकर्ताओं, उनके समर्थन में उतरे बुद्धिजीवियों, छात्र कार्यकर्ताओं की रिहाई के लिए प्रदर्शन, प्रेस सम्मेलन, आदि हो रहे हैं। उत्तर प्रदेश पुलिस की संदेहास्पद भूमिका समूची जनता के सामने बेनक़ाब हो रही है। यह समूची पूँजीवादी व्यवस्था और मौजूदा फ़ासीवादी शासन को भी बेनक़ाब कर रहा है।

दिल्‍ली एनसीआर में जायज़ माँगों को लेकर जारी मज़दूर आन्‍दोलन को सही दिशा देने के वास्‍ते 𝐓𝐨 𝐭𝐚𝐤𝐞 𝐭𝐡𝐞 𝐨𝐧𝐠𝐨𝐢𝐧𝐠 𝐰𝐨𝐫𝐤𝐞𝐫𝐬’ 𝐦𝐨𝐯𝐞𝐦𝐞𝐧𝐭 𝐢𝐧 𝐃𝐞𝐥𝐡𝐢-𝐍𝐂𝐑 𝐢𝐧 𝐭𝐡𝐞 𝐜𝐨𝐫𝐫𝐞𝐜𝐭 𝐝𝐢𝐫𝐞𝐜𝐭𝐢𝐨𝐧

हर जगह असंगठित मज़दूरों को अपनी यूनियनें संगठित करनी होंगी ताकि भविष्‍य में भी वे अपनी जायज़ माँगों को लेकर अनुशासित, व्‍यवस्थित व संगठित तौर पर संघर्ष कर सकें। मालिकान-प्रबन्‍धन व उनकी सरकारें आपसे ज्‍़यादा बड़ी नहीं हैं, बल्कि आपसे ज्‍़यादा संगठित हैं। आपका असंगठित होना ही उनके लिए सबसे बड़ा वरदान है। कारखाना मालिकों के संघ व संगठन होते हैं, जिसमें आपसी प्रतिस्‍पर्द्धा के बावजूद, मज़दूर वर्ग के विरुद्ध वे संगठित होते हैं। उनके ये संगठन और संघ ही मालिकान के हितों को सरकारों तक पहुँचाते हैं और चूँकि तमाम पार्टियों की सरकारें इसी मालिक वर्ग की मैनेजिंग कमेटी का काम करती हैं, इसलिए वे उनके हितों के अनुसार ही नीतियाँ बनाती हैं और कार्रवाई करती हैं। उनकी संगठित शक्ति द्वारा शोषण व उत्‍पीड़न का मुक़ाबला मज़दूर वर्ग केवल संगठ‍ित होकर ही कर सकता है। इसलिए आज ही समस्‍त असंगठित मज़दूरों को अपनी यूनियनों का गठन करने का प्रयास करना होगा। तभी हम अपने जायज़, क़ानूनी और संवैधानिक नागरिक व जनवादी अधिकारों के लिए संघर्ष कर सकते हैं।

Protest in Visakhapatnam opposing the arrest of Mazdoor Bigul activists

The police targeted Mazdoor Bigul activists who have been active in the strike, and forcibly picked them up from a metro station on Saturday evening while they were returning from the protest. Three women activists were detained without the presence of women police officers. Since last night, other activists have been waiting at the police station and demanding information, but the police haven’t given a shred of informationa—neither have they revealed their whereabouts nor have they released them.

गुड़गांव- मानेसर में उठी वेतन बढ़ोतरी और मज़दूरों के जायज़ हक-अधिकारों की लड़ाई अब पूरे गुड़गांव, बिनौला, धारूहेड़ा और बावल सहित ऑटोमोबाइल और एक्सपोर्ट क्षेत्रों में फैल रही है। मज़दूरों की मांगें पूरी तरह जायज़ हैं—न्यायपूर्ण वेतन, बेहतर कार्य-परिस्थितियाँ और ठेका प्रथा का अंत। बिगुल मज़दूर दस्ता की अपील है कि गुरुग्राम, दिल्ली और पूरे एनसीआर के मज़दूर एक साझा मांग-पत्र तैयार करें और तालमेल कमेटी बनाकर इस संघर्ष को आगे बढ़ाएँ।

गुड़गांव- मानेसर में उठी वेतन बढ़ोतरी और मज़दूरों के जायज़ हक-अधिकारों की लड़ाई अब पूरे गुड़गांव, बिनौला, धारूहेड़ा और बावल सहित ऑटोमोबाइल और एक्सपोर्ट क्षेत्रों में फैल रही है। मज़दूरों…

पानीपत रिफ़ाइनरी के असंगठित मज़दूरों का संघर्ष : अमानवीय शोषण-उत्पीड़न के ख़िलाफ़ श्रमिकों के गुस्से का विस्फोट

हरियाणा के पानीपत में स्थित इस रिफ़ाइनरी की विभिन्न इकाइयों और विस्तार योजनाओं में 30 से 40 हज़ार मज़दूर-कर्मचारी काम करते हैं। इनमें से ज़्यादातर श्रमिक ठेकेदारों के तहत कार्यरत हैं। यहाँ बड़ी ठेकेदार कम्पनियों और छोटे ठेकेदारों का पूरा जाल मौजूद है जिनके ज़रिये मज़दूरों को काम पर रखा जाता है। ये ठेकेदार कम्पनियाँ और छोटे ठेकेदार मज़दूरों पर जोंक की तरह चिपके रहते हैं और उनके थोड़े-से वेतन से भी “अपना हिस्सा” उड़ाते रहते हैं। तमाम कम्पनियों में दमन और शोषण का सबसे ज़्यादा सामना ठेका श्रमिकों को ही करना पड़ता है। जानकारी के अनुसार पानीपत रिफाइनरी की कुल रिफ़ाइनिंग क्षमता लगभग 15 मिलियन टन प्रति वर्ष (एमटीपीए) तक पहुँच चुकी है लेकिन हज़ारों ठेका मज़दूर, जो इस रिफ़ाइनरी के निर्माण, रखरखाव और उत्पादन कार्यों में लगे हैं, आज अपने बुनियादी अधिकारों तक से महरूम हैं। यहाँ कार्यरत मज़दूरों के आरोप हैं कि उनपर 12-12 घण्टे काम कराने का दबाव बनाया जाता है, ओवरटाइम का समुचित भुगतान नहीं होता, वेतन में देरी होती है, ईएसआई-पीएफ़ जैसे अधिकार नहीं मिलते और आवाज़ उठाने पर ठेकेदारों द्वारा काम से निकालने की धमकियाँ दी जाती हैं। यही नहीं काम करने के हालात बेहद अमानवीय हैं। श्रमिकों को पेयजल, शौचालय, परिवहन, कैण्टीन और पर्याप्त सुरक्षा उपकरण जैसी मूलभूत सुविधाएँ भी ठीक से नहीं मिलती हैं। रिफ़ाइनरी जैसे संवेदनशील और जोखिमपूर्ण कार्यस्थल पर इन अमानवीय हालात में श्रमिकों से काम लिया जाना सीधे तौर पर उनके जीवन के साथ खिलवाड़ है। ध्यान रहे श्रमिकों के ये हालात तो तब हैं जब मज़दूर-कर्मचारी विरोधी चार श्रम संहिताओं को अभी लागू होना है। ये श्रम संहिताएँ लागू होने के बाद श्रमिकों की स्थिति का अन्दाज़ा सहज ही लगाया जा सकता है।