Category Archives: संघर्षरत जनता

कोटद्वार (उत्तराखण्ड) में संघी उत्पात और फ़ासिस्ट साम्प्रदायिक राजनीति का कारगर प्रतिरोध

फ़ासिस्ट संघ परिवार की साम्प्रदायिक साज़िश की पोल-पट्टी खोलते ही ‘हिन्दू’ ‘हिन्दू’ नहीं रह जाता। वह “ग़द्दार” हो जाता है और हिन्दू धर्म के झण्डाबरदारों द्वारा उसकी हत्या की सुपारी बाँटी जाने लगती है। यानी या तो आप फ़ासिस्टों के हर झूठ, नफ़रत की राजनीति में उनका साथ दीजिए या चुप रहिए! अगर आप इनकी असलियत को उजागर करेंगे तो आपको ‘हिन्दू’ से ‘ग़द्दार’ होने में सेकण्ड भी नहीं लगेंगे! दीपक के साथ भी यही हुआ। दीपक ने बजरंग दल की गुण्डागर्दी पर ज्यों ही उँगली उठायी  (जो कि हर इंसाफ़पसन्द इन्सान का फ़र्ज़ है!) वैसे ही दीपक के नाम सुपारी दी जाने लगी। ग़ौरतलब है कि ‘हिन्दू रक्षा दल’ के अध्यक्ष ललित शर्मा ने दीपक का सिर कलम कर लाने वाले को 5 लाख 51 हज़ार रुपये का इनाम देने का ऐलान किया।

पानीपत रिफ़ाइनरी के मज़दूरों की सभी जायज़ माँगों को पूरा करो!

काम करने के हालात बेहद अमानवीय हैं। मज़दूरों को पीने का साफ़ पानी, शौचालय, परिवहन, कैण्टीन और पर्याप्त सुरक्षा उपकरण जैसी मूलभूत सुविधाएँ भी ठीक से नहीं मिलती हैं। रिफ़ाइनरी जैसे संवेदनशील और जोखिमपूर्ण कार्यस्थल पर इन अमानवीय हालात में मज़दूरों से काम लिया जाना सीधे तौर पर उनके जीवन के साथ खिलवाड़ है।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय में छात्र आन्दोलन को मिली शानदार जीत के मायने

फ़ासीवादी मोदी सरकार के सत्तासीन होने के बाद से ही देशभर में लोकतान्त्रिक आवाज़ों और जनवादी स्पेस का गला घोंटा जा रहा है। देश की सभी संस्थाओं में ऊपर से नीचे तक फ़ासीवादी जकड़बन्दी लगातार मज़बूत होती जा रही है। भाजपा सरकार द्वारा मेहनतकश जनता पर हमले का दौर बदस्तूर जारी है। चार लेबर कोड मेहनतकशों पर अब तक का सबसे बड़ा फ़ासीवादी हमला है। इसी तरह कुछ साल पहले मोदी सरकार द्वारा लागू ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020’ मेहनतकश अवाम के घरों के बच्चों पर एक बड़ा हमला था। जैसे-जैसे नयी शिक्षा नीति पर अमल हो रहा है, वैसे-वैसे उसकी सच्चाई भी आम जनता के सामने खुलती जा रही है। विश्वविद्यालयों में बेतहाशा फ़ीस वृद्धि हो रही है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पिछले चार सालों में नियमित कोर्स के लिए छः गुना से ज़्यादा फ़ीस बढ़ायी जा चुकी है और हर साल 10 फ़ीसदी की फ़ीस वृद्धि की जा रही है।

फ़िलिस्तीनी जनता के मुक्ति संघर्ष के समर्थन में और ग़ज़ा में जारी इज़राइली जनसंहार के खिलाफ़ दुनियाभर के इंसाफ़पसन्द नागरिक और मज़दूर सड़कों पर

कई यूरोपीय देशों में डॉक मज़दूरों ने ग़ज़ा के साथ एकजुटता ज़ाहिर करते हुए इज़रायल से जुड़े शिपमेण्ट और सप्लाई चेन पर काम को ठप्प कर दिया। इसमें विशेष रूप से बेल्जियम, आयरलैण्ड, इटली, ग्रीस और स्पेन के डॉक मज़दूर संगठन शामिल रहे हैं। फ्रांस और पुर्तगाल की पोस्टल यूनियनें भी इस प्रदर्शन में शामिल रहीं। डॉक मज़दूर संगठनों ने इज़राइल को हथियार या सैन्य सामग्री पहुँचाने वाले पार्सल या शिपमेण्ट को सम्भालने से इन्कार कर दिया। ग्रीस में पीरियस पोर्ट पर डॉक मजदूरों ने ऐसे जहाज़ों को रोका, जिनमें हथियारों की खेप थी। इसी तरह इटली में यूएसबी यूनियन सिण्डिकेट डिबेस ने कई बार ऐलान किया कि वे हथियार लदे जहाज़ों को रोकेंगे. रोम और जिनेवा जैसे बंदरगाहों पर बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए। फ्रांस में डॉक वर्कर्स ने एफ-35 जेट पार्सल को ले जाने वाले जहाज़ को समय से लेट कर दिया और मज़दूरों ने सरकार पर दबाव बनाया कि सरकार हथियारों का निर्यात बन्द करे।

नेपाल में युवाओं की बग़ावत के बाद केपी शर्मा ओली की भ्रष्ट सत्ता का पतन

नेपाल के युवाओं का विद्रोह सिर्फ़ सत्तारूढ़ संशोधनवादी पार्टी या उसके नेताओं के ख़िलाफ़ ही नहीं बल्कि उन सभी पार्टियो व नेताओं एवं धन्नासेठों के ख़िलाफ़ था जिन्होंने पिछले 2 दशकों के दौरान सत्ता में भागीदारी की या जो सत्ता के निकट रहे हैं। यही वजह है कि प्रदर्शनकारियों के निशाने पर संसद, प्रधानमन्त्री निवास, शासकीय व प्रशासनिक मुख्यालय, उच्चतम न्यायालय के अलावा तमाम बड़ी पार्टियों के कार्यालय और उनके नेताओं के आवास भी थे जिनमें पाँच बार नेपाल के प्रधानमन्त्री रह चुके शेर बहादुर देउबा और माओवादी नेता व पूर्व प्रधानमन्त्री प्रचण्ड के आवास भी शामिल थे। इसके अलावा प्रदर्शनकारियों ने काठमांडू की कई बहुमंज़िला व्यावसायिक इमारतों और आलीशान होटलों में भी आग लगा दी जो धनाढ्यता का प्रतीक थीं। इस प्रकार यह बग़ावत वस्तुत: समूचे पूँजीवादी निज़ाम के ख़िलाफ़ थी।

हिण्डन नदी के किनारे बसे नोएडा-ग्रेटर नोएडा में लाखों लोग भीषण गर्मी में बिना बिजली के रहने को मजबूर!

दरअसल पूँजीवादी व्यवस्था में सरकार-प्रशासन से लेकर धन्नासेठों-अमीरज़ादों की जमातों तक मेहनतकश आबादी को इन्सान समझा ही नहीं जाता। इनके लिए ये बस काम करने वाली चलती-फिरती मशीन हैं, 12-14 घण्टे मज़दूरी करने वाले ग़ुलाम हैं और इसलिए ये मज़दूरों को कीड़े-मकोड़ों की तरह जीने के लिए छोड़ देते हैं। सत्ता में चाहे किसी भी चुनावबाज़ पार्टी की सरकार आ जाये, ये सभी तमाम अमीरों और पूँजीपतियों से चन्दे लेते हैं और इसलिए जीतकर आने के बाद तन-मन-धन से उनकी ही सेवा में लगे होते हैं। लेकिन इनमें भी फ़ासीवादी भाजपा यह काम सबसे अधिक तत्परता के साथ करती है और उत्तर प्रदेश की योगी सरकार तो इसमें काफ़ी ज़्यादा माहिर है। इसी का फ़ायदा तमाम बिचौलिये, दलाल और बाहुबली उठाते हैं जो लोगों की मजबूरी का इस्तेमाल कर अपना निजी फ़ायदा निकालते हैं। इन इलाक़ों में तो स्थानीय बाहुबली भी भाजपा का ही सदस्य है।

भारत की मेहनतकश जनता को फ़िलिस्तीन की जनता का साथ क्यों देना चाहिए?

अगर आपके देश में कोई साम्राज्यवादी ताक़त आकर कब्ज़ा कर ले तो क्या आपको हथियार उठा कर लड़ने का हक़ है? बिल्कुल है। अगर आप अन्तरराष्ट्रीय क़ानून की बात करें, जिसे सभी देश मान्यता देते हैं, तो वह भी कहता है कि किसी भी जबरन कब्ज़ा करने वाली ताक़त के ख़िलाफ़ किसी भी देश के लोगों को हथियारबन्द बग़ावत करने और अपनी आज़ादी के लिए सशस्त्र संघर्ष करने की पूरी आज़ादी है। यह आतंकवाद नहीं है। यह आत्मरक्षा और मुक्ति के लिए और ग़ुलामी के विरुद्ध संघर्ष है। अगर आप को हथियारबन्द ताक़त और हिंसा के ज़रिये कोई ग़ुलाम बनाकर रखता है तो अन्तरराष्ट्रीय क़ानून के ही मुताबिक आप हथियारबन्द संघर्ष और क्रान्तिकारी हिंसा द्वारा उसकी मुख़ालफ़त कर सकते हैं, उसके विरुद्ध लड़ सकते हैं। यह भी हम नहीं, अन्तरराष्ट्रीय क़ानून कहता है, जिसे सभी देशों से मान्यता प्राप्त है, भारत से भी।

देशभर में जारी है ‘बीडीएस’ अभियान! इज़रायली हत्यारों से सम्बन्ध रखने वाली कम्पनियों व ब्राण्डों के उत्पादों का लोग कर रहे हैं बहिष्कार!

फ़िलिस्तीन के प्रति एकजुटता दर्शाने के लिए ‘बीडीएस’ नामक यह अभियान दुनिया भर में तेज़ी से फ़ैल रहा है। ‘बीडीएस’ अभियान का ही प्रभाव है कि कई देशों में इज़रायल की समर्थक कम्पनियों/ब्राण्डों की दुकानें बन्द हो चुकी हैं। कुछ देशों में तो फ़िलिस्तीन पर हमले की समर्थक कई कम्पनियाँ दिवालिया तक हो चुकी हैं। इज़रायली सेटेलमेण्ट की समर्थक स्टारबर्क्स नामक कॉफी कम्पनी की मलेशिया में कम से कम 50 दुकाने (आउटलेट) बन्द हो चुकी हैं।

साम्प्रदायिक फ़ासीवादी दौर में घटता जनवादी स्पेस व बढ़ते छात्र-युवा आन्दोलन

आज छात्रों को विराजनीतिकरण के ख़िलाफ़ संघर्ष करते हुए कैम्पस से बाहर भी निकलना होगा और आम मेहनतकश जनता के साथ मिलकर जनविरोधी नीतियों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठानी होगी। साथ ही, आम मेहनतकश जनता को भी जनवादी अधिकारों पर हो रहे हमलों के ख़िलाफ़ खड़ा होना होगा, जिसमें छात्र- युवा आन्दोलन के सही माँगो के साथ खड़ा होना भी शामिल है।

केरल में ग़द्दार वामपन्थ के कारनामे – ‘धन्धा करने की आसानी’ को बढ़ावा, आशा कार्यकर्ताओं का दमन, अवसरवादियों का स्वागत

आशा कर्मियों की हड़ताल पर सबसे उग्र हमला सीटू नेताओं की ओर से हुआ। सामाजिक-जनवादियों के बीच के श्रम विभाजन के अनुसार, वामपन्थी सरकार पूरी तरह से नवउदारवादी नीतियों को लागू करके पूँजीपति वर्ग की सेवा करती है। उसके ट्रेड यूनियन मोर्चे के रूप में, सीटू का ‘वर्गीय कर्तव्य’ यह सुनिश्चित करना होता है कि मज़दूरों पर लगाम कसी रहे और वे इन नीतियों का विरोध क़तई न कर पायें। इसलिए, कोई भी हड़ताल जो सीटू की हड़तालों के ‘अनुष्ठानिक’ दायरे से आगे बढ़ती है, पूँजीपति वर्ग और सामाजिक-जनवाद के लिए ख़तरा बन जाती है। ऐसे में कोई आश्चर्य नहीं कि सीटू के राज्य उपाध्यक्ष हर्षकुमार ने हड़ताल की एक महिला नेता को “संक्रामक रोग फैलाने वाला कीट” कहकर पुकारा।