Category Archives: संघर्षरत जनता

मोदी के इज़रायल दौरे और मोदी सरकार द्वारा ‘बोर्ड ऑफ पीस’ जैसी साम्राज्यवादी साज़िश के समर्थन पर देशव्यापी विरोध प्रदर्शन!

भारत सरकार का पक्ष शुरू से ही फ़िलिस्तीनी आवाम के मुक्ति-संघर्ष के समर्थन में रहा है मगर भाजपा के सत्तासीन होने के बाद से फ़िलिस्तीन के प्रति इनके रुख में काफ़ी तेज़ी से बदलाव आया है। नरेन्द्र मोदी इज़रायल का दौरा करने वाले पहले प्रधानमंत्री बन चुके हैं। जहाँ वह एक तरफ़ अरब देशों के विदेश मंत्रियों को फ़िलिस्तीन के प्रति भारत के समर्थन का भरोसा दिलाते हैं, वहीं दूसरी ओर इज़रायल के साथ उनकी प्रगाढ़ होती मित्रता किसी से छुपी हुई नहीं है और अब तो वह इज़रायल के भ्रमण पर भी जा रहें है। यह पूरी तरह साफ़ है कि भाजपा की केन्द्र सरकार ने इज़रायल को अन्तरराष्ट्रीय समर्थन देकर उसके नरसंहार को परोक्ष रूप से जायज़ ठहराया है। यह फ़िलिस्तीन की जनता की पीठ में छुरा घोंपने के समान है। भले ही कागजों पर वे फ़िलिस्तीनी राज्य का समर्थन करने का ढोंग करते हों लेकिन ये ढोंग अन्तरराष्ट्रीय मंच पर अपनी छवि बचाने की एक खोखली और शर्मनाक कोशिश मात्र हैं। यह एक बार फिर मोदी सरकार के दोमुँहें और अवसरवादी चरित्र को बेनकाब करता है।

कोटद्वार (उत्तराखण्ड) में संघी उत्पात और फ़ासिस्ट साम्प्रदायिक राजनीति का कारगर प्रतिरोध

फ़ासिस्ट संघ परिवार की साम्प्रदायिक साज़िश की पोल-पट्टी खोलते ही ‘हिन्दू’ ‘हिन्दू’ नहीं रह जाता। वह “ग़द्दार” हो जाता है और हिन्दू धर्म के झण्डाबरदारों द्वारा उसकी हत्या की सुपारी बाँटी जाने लगती है। यानी या तो आप फ़ासिस्टों के हर झूठ, नफ़रत की राजनीति में उनका साथ दीजिए या चुप रहिए! अगर आप इनकी असलियत को उजागर करेंगे तो आपको ‘हिन्दू’ से ‘ग़द्दार’ होने में सेकण्ड भी नहीं लगेंगे! दीपक के साथ भी यही हुआ। दीपक ने बजरंग दल की गुण्डागर्दी पर ज्यों ही उँगली उठायी  (जो कि हर इंसाफ़पसन्द इन्सान का फ़र्ज़ है!) वैसे ही दीपक के नाम सुपारी दी जाने लगी। ग़ौरतलब है कि ‘हिन्दू रक्षा दल’ के अध्यक्ष ललित शर्मा ने दीपक का सिर कलम कर लाने वाले को 5 लाख 51 हज़ार रुपये का इनाम देने का ऐलान किया।

मोदी सरकार द्वारा लाये गये चार लेबर कोड और वीबी-ग्रामजी क़ानून के ख़िलाफ़ चलाये जा रहे अभियान को मिल रहा व्यापक जनसमर्थन!

केन्द्रीय ट्रेड यूनियन फ़ेडरेशनों को और ग़रीब किसानों और ग्रामीण मज़दूरों की नुमाइन्दगी का दावा करने वाले यूनियनों व सगठनों को ऐसी आम हड़ताल का आह्वान करना चाहिए। व्यापक मज़दूर-मेहनतकश आबादी को इन संगठनों व यूनियनों पर ऐसी आम हड़ताल का ऐलान करने का दबाव बनाना चाहिए। हम एक बार फिर से केन्द्रीय ट्रेड यनिूयन फ़ेडरेशनों के नेतृत्व से दिली अपील करते हैं कि वे वक़्त की नज़ाकत और ज़रूरत को समझें। इस देश के मज़दूर वर्ग पर इससे बड़ा और कोई हमला नहीं हो सकता है और मोदी-शाह सरकार किसी भी तरह के रस्मी कवायद, ज़ुबानी जमाख़र्च, प्रतीकात्मक प्रदर्शन आदि करने से सुनने वाली नहीं है। उसे झुकाने के लिए आज अपने सबसे बड़े हथियारों में से एक यानी आम हड़ताल का इस्तेमाल करना ही होगा। इस वक़्त अगर केन्द्रीय ट्रेड यूनियनें अनिश्चितकालीन आम हड़ताल की तरफ़ आगे बढ़ती हैं तो हम यह बात बिल्कुल दावे के साथ कह सकते हैं कि अन्य यूनियनें व संगठन भी उनका भरपूर साथ देंगे।

पानीपत रिफ़ाइनरी के मज़दूरों की सभी जायज़ माँगों को पूरा करो!

काम करने के हालात बेहद अमानवीय हैं। मज़दूरों को पीने का साफ़ पानी, शौचालय, परिवहन, कैण्टीन और पर्याप्त सुरक्षा उपकरण जैसी मूलभूत सुविधाएँ भी ठीक से नहीं मिलती हैं। रिफ़ाइनरी जैसे संवेदनशील और जोखिमपूर्ण कार्यस्थल पर इन अमानवीय हालात में मज़दूरों से काम लिया जाना सीधे तौर पर उनके जीवन के साथ खिलवाड़ है।

अंकिता हत्याकाण्ड : न्याय के लिए एक बार फ़िर हज़ारों लोग सड़कों पर उतरे मगर भाजपा बेशर्मी से ‘वीआईपी’ को बचाने में जुटी!

ये कोई पहला मामला नहीं है जब भाजपा और संघ ने बलात्कारियों-अपराधियों को बचाने में, उनको संरक्षण देने में एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाया हो! इतना ही नहीं इस “संस्कारी पार्टी” में बलात्कारियों-अपराधियों के स्वागत की एक नई परम्परा ही शुरू कर दी गई है। अभी कुलदीप सिंह सेंगर के जमानत के शर्मनाक फ़ैसले आने के बाद ये लोग फूल-माला लेकर ‘बलात्कारी स्वागत’ हेतु पहुँच गये थे। यह अलग बात है कि जन दबाव के चलते सुप्रीम कोर्ट को ये फ़ैसला रद्द करना पड़ा। कठुआ में आठ साल की बच्ची के बलात्कारियों के समर्थन में भाजपाइयों ने तिरंगा रैली निकाली थी। बिलकिस बानो के बलात्कारियों की रिहाई के बाद भाजपा नेताओं द्वारा अच्छे “संस्कारी ब्राह्मण” होने के लिए बलात्कारियों का फूल-माला से स्वागत किया गया था। आई.आई.टी बी.एच.यू के गैंगरेप के आरोपी की ज़मानत होने पर केक काटकर स्वागत किया गया था।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय में छात्र आन्दोलन को मिली शानदार जीत के मायने

फ़ासीवादी मोदी सरकार के सत्तासीन होने के बाद से ही देशभर में लोकतान्त्रिक आवाज़ों और जनवादी स्पेस का गला घोंटा जा रहा है। देश की सभी संस्थाओं में ऊपर से नीचे तक फ़ासीवादी जकड़बन्दी लगातार मज़बूत होती जा रही है। भाजपा सरकार द्वारा मेहनतकश जनता पर हमले का दौर बदस्तूर जारी है। चार लेबर कोड मेहनतकशों पर अब तक का सबसे बड़ा फ़ासीवादी हमला है। इसी तरह कुछ साल पहले मोदी सरकार द्वारा लागू ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020’ मेहनतकश अवाम के घरों के बच्चों पर एक बड़ा हमला था। जैसे-जैसे नयी शिक्षा नीति पर अमल हो रहा है, वैसे-वैसे उसकी सच्चाई भी आम जनता के सामने खुलती जा रही है। विश्वविद्यालयों में बेतहाशा फ़ीस वृद्धि हो रही है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पिछले चार सालों में नियमित कोर्स के लिए छः गुना से ज़्यादा फ़ीस बढ़ायी जा चुकी है और हर साल 10 फ़ीसदी की फ़ीस वृद्धि की जा रही है।

फ़िलिस्तीनी जनता के मुक्ति संघर्ष के समर्थन में और ग़ज़ा में जारी इज़राइली जनसंहार के खिलाफ़ दुनियाभर के इंसाफ़पसन्द नागरिक और मज़दूर सड़कों पर

कई यूरोपीय देशों में डॉक मज़दूरों ने ग़ज़ा के साथ एकजुटता ज़ाहिर करते हुए इज़रायल से जुड़े शिपमेण्ट और सप्लाई चेन पर काम को ठप्प कर दिया। इसमें विशेष रूप से बेल्जियम, आयरलैण्ड, इटली, ग्रीस और स्पेन के डॉक मज़दूर संगठन शामिल रहे हैं। फ्रांस और पुर्तगाल की पोस्टल यूनियनें भी इस प्रदर्शन में शामिल रहीं। डॉक मज़दूर संगठनों ने इज़राइल को हथियार या सैन्य सामग्री पहुँचाने वाले पार्सल या शिपमेण्ट को सम्भालने से इन्कार कर दिया। ग्रीस में पीरियस पोर्ट पर डॉक मजदूरों ने ऐसे जहाज़ों को रोका, जिनमें हथियारों की खेप थी। इसी तरह इटली में यूएसबी यूनियन सिण्डिकेट डिबेस ने कई बार ऐलान किया कि वे हथियार लदे जहाज़ों को रोकेंगे. रोम और जिनेवा जैसे बंदरगाहों पर बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए। फ्रांस में डॉक वर्कर्स ने एफ-35 जेट पार्सल को ले जाने वाले जहाज़ को समय से लेट कर दिया और मज़दूरों ने सरकार पर दबाव बनाया कि सरकार हथियारों का निर्यात बन्द करे।

नेपाल में युवाओं की बग़ावत के बाद केपी शर्मा ओली की भ्रष्ट सत्ता का पतन

नेपाल के युवाओं का विद्रोह सिर्फ़ सत्तारूढ़ संशोधनवादी पार्टी या उसके नेताओं के ख़िलाफ़ ही नहीं बल्कि उन सभी पार्टियो व नेताओं एवं धन्नासेठों के ख़िलाफ़ था जिन्होंने पिछले 2 दशकों के दौरान सत्ता में भागीदारी की या जो सत्ता के निकट रहे हैं। यही वजह है कि प्रदर्शनकारियों के निशाने पर संसद, प्रधानमन्त्री निवास, शासकीय व प्रशासनिक मुख्यालय, उच्चतम न्यायालय के अलावा तमाम बड़ी पार्टियों के कार्यालय और उनके नेताओं के आवास भी थे जिनमें पाँच बार नेपाल के प्रधानमन्त्री रह चुके शेर बहादुर देउबा और माओवादी नेता व पूर्व प्रधानमन्त्री प्रचण्ड के आवास भी शामिल थे। इसके अलावा प्रदर्शनकारियों ने काठमांडू की कई बहुमंज़िला व्यावसायिक इमारतों और आलीशान होटलों में भी आग लगा दी जो धनाढ्यता का प्रतीक थीं। इस प्रकार यह बग़ावत वस्तुत: समूचे पूँजीवादी निज़ाम के ख़िलाफ़ थी।

हिण्डन नदी के किनारे बसे नोएडा-ग्रेटर नोएडा में लाखों लोग भीषण गर्मी में बिना बिजली के रहने को मजबूर!

दरअसल पूँजीवादी व्यवस्था में सरकार-प्रशासन से लेकर धन्नासेठों-अमीरज़ादों की जमातों तक मेहनतकश आबादी को इन्सान समझा ही नहीं जाता। इनके लिए ये बस काम करने वाली चलती-फिरती मशीन हैं, 12-14 घण्टे मज़दूरी करने वाले ग़ुलाम हैं और इसलिए ये मज़दूरों को कीड़े-मकोड़ों की तरह जीने के लिए छोड़ देते हैं। सत्ता में चाहे किसी भी चुनावबाज़ पार्टी की सरकार आ जाये, ये सभी तमाम अमीरों और पूँजीपतियों से चन्दे लेते हैं और इसलिए जीतकर आने के बाद तन-मन-धन से उनकी ही सेवा में लगे होते हैं। लेकिन इनमें भी फ़ासीवादी भाजपा यह काम सबसे अधिक तत्परता के साथ करती है और उत्तर प्रदेश की योगी सरकार तो इसमें काफ़ी ज़्यादा माहिर है। इसी का फ़ायदा तमाम बिचौलिये, दलाल और बाहुबली उठाते हैं जो लोगों की मजबूरी का इस्तेमाल कर अपना निजी फ़ायदा निकालते हैं। इन इलाक़ों में तो स्थानीय बाहुबली भी भाजपा का ही सदस्य है।

भारत की मेहनतकश जनता को फ़िलिस्तीन की जनता का साथ क्यों देना चाहिए?

अगर आपके देश में कोई साम्राज्यवादी ताक़त आकर कब्ज़ा कर ले तो क्या आपको हथियार उठा कर लड़ने का हक़ है? बिल्कुल है। अगर आप अन्तरराष्ट्रीय क़ानून की बात करें, जिसे सभी देश मान्यता देते हैं, तो वह भी कहता है कि किसी भी जबरन कब्ज़ा करने वाली ताक़त के ख़िलाफ़ किसी भी देश के लोगों को हथियारबन्द बग़ावत करने और अपनी आज़ादी के लिए सशस्त्र संघर्ष करने की पूरी आज़ादी है। यह आतंकवाद नहीं है। यह आत्मरक्षा और मुक्ति के लिए और ग़ुलामी के विरुद्ध संघर्ष है। अगर आप को हथियारबन्द ताक़त और हिंसा के ज़रिये कोई ग़ुलाम बनाकर रखता है तो अन्तरराष्ट्रीय क़ानून के ही मुताबिक आप हथियारबन्द संघर्ष और क्रान्तिकारी हिंसा द्वारा उसकी मुख़ालफ़त कर सकते हैं, उसके विरुद्ध लड़ सकते हैं। यह भी हम नहीं, अन्तरराष्ट्रीय क़ानून कहता है, जिसे सभी देशों से मान्यता प्राप्त है, भारत से भी।