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बवाना औद्योगिक क्षेत्र मज़दूर यूनियन द्वारा देश के विभिन्न हिस्सों में ज़ारी मज़दूर आन्दोलन के समर्थन में व राजकीय दमन के विरोध में किये गये कार्यक्रमों की संक्षिप्त रिपोर्ट

मई दिवस के शहीदों की अगुवाई में मज़दूरों ने अपने वक़्त में कारख़ानों का चक्का जाम कर दिया था। शहादत, दमन-उत्पीड़न के बाद भी मज़दूर डटे रहे और पूरे मज़दूर वर्ग की तरफ़ से उन्होंने अन्ततः पूँजीपतियों की सरकारों से 8 घण्टे काम का हक़ लड़कर छीन लिया था। लेकिन वर्तमान समय में पूँजी की अपनी गति के चलते पूँजीवादी दुनिया लम्बे आर्थिक संकट से गुज़र रही है। इस स्थिति से निपटने के लिए 1990 के दशक से ही मज़दूरों के हक़ों-अधिकारों पर लगातार हमले “श्रम क़ानूनों में सुधार” के नाम पर किये जा रहे थे। लेकिन पूँजीपति वर्ग इससे संतुष्ट न था। नतीजतन, मेहनतकश जनता की मेहनत को सस्ते दामों पर चूसने और जन-असन्तोष को कुचलने के लिए पूँजीपति वर्ग ने फ़ासीवादी भाजपा को सत्ता सौंप दी ताकि नवउदारवाद की मज़दूर-विरोधी नीतियों के विरुद्ध उठने वाली विरोध की हर आवाज़ को बेरहमी से कुचला जा सके और मज़दूर-मेहनतकश आबादी को धर्म के नाम पर बाँटकर उसकी शक्ति को तोड़ा जा सके। उसके बाद से मोदी सरकार ने अरबों रुपये के चन्दे के बदले पूँजीपतियों के पक्ष में मज़दूरों को ग़ुलामों की तरह खटाने के लिए क़ानूनी इन्तज़ामात करने और साम्प्रयिकता की आग में उन्हें झोंकने में पूरा ज़ोर लगा दिया है।

बवाना के मज़दूर की चिट्ठी

सुबह जगो तो काम के लिए, नहाओ तो काम के लिए, खाओ तो काम के लिए, रात बारह बजे सोओ तो काम के लिए। ऐसा लगता है की हम सिर्फ काम करने के लिए पैदा हुए हैं ‌तो हम फिर अपना जीवन कब जियेंगे। महीने की सात से दस तारीख के बीच तनखा मिलती है, पन्द्रह तारीख तक जेब में पैसे होते हैं तो अपने बच्चों के लिए फल या कुछ ज़रूरी चीजें ले सकते हैं । उसके बाद हर दिन एक-एक रुपया सोचकर खर्च करना पड़ता है। महीना ख़त्म होते-होते ये भी सोच ख़त्म हो जाती है। अगर कहीं बीमार पड़ गये तो क़र्ज़ के बोझ तले दबना तय है।