केरल में ग़द्दार वामपन्थ के कारनामे – ‘धन्धा करने की आसानी’ को बढ़ावा, आशा कार्यकर्ताओं का दमन, अवसरवादियों का स्वागत
बिपिन बालाराम
पिछले कुछ दिनों में केरल के सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य में सामने आयी घटनाओं ने एक बड़ा उद्देश्य पूरा किया है। उन्होंने केरल में संस्थागत वामपन्थ और उसके नेतृत्व वाली सरकार की वास्तविक वर्गीय प्रकृति को उजागर कर दिया है। इन घटनाओं ने इसके सबसे भोले समर्थकों के सामने भी पूँजी के सामने वामपन्थ के पूर्ण समर्पण और मज़दूर वर्ग की सक्रियता को कुचलने के उसके इरादों को उघाड़कर रख दिया है। आइए, इन काले कारनामों को रोशनी में ले आने वाली इन घटनाओं पर एक नज़र डालते हैं।
सबसे बड़ा ‘ब्लॉकबस्टर इवेंट’ था केरल सरकार द्वारा कोच्चि में आयोजित “इन्वेस्ट केरला ग्लोबल समिट 2025”, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) द्वारा ज़ोरदार (बल्कि पागलपन भरे जोश से भरपूर) समर्थन दिया गया था। यह केरल के अपने “विकास के महाकुम्भ” से कम नहीं था। एक ओर संघ परिवार हमें ‘मलवाले बैक्टीरिया की भारी मात्रा’ वाली गंगा में डुबकी लगाकर मोक्ष पाने के लिए प्रेरित कर रहा था, दूसरी ओर केरल का वामपन्थ पूँजी के सागर में डुबकी लगाकर स्वयं को शुद्ध कर रहा था, वही पूँजी जो मार्क्स के शब्दों में, “सिर से पाँव तक, रोएँ-रोएँ तक ख़ून और गन्दगी में लिथड़ी होती है।”
केरल सरकार ने अपने “विकास महाकुम्भ” को अख़बारों के पहले पन्ने पर (दिल्ली संस्करणों सहित) और सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्मों पर विज्ञापित करने के लिए करोड़ों खर्च किये। माकपा कॉरपोरेट जगत को यह दिखाने के लिए बेताब थी कि वे कितने कारोबार-समर्थक और पूँजीपतियों के हितैषी हैं। भाजपा के केन्द्रीय मंत्री, माकपा की राज्य सरकार के मन्त्री और कांग्रेस के विपक्षी नेता ‘इन्वेस्ट केरला’ के मंच पर साथ-साथ विराजमान थे और साथ मिलकर निवेश के लिए लाल कालीन बिछा रहे थे। सब एक-दूसरे से गले मिल रहे थे, हँस रहे थे और एक-दूसरे की प्रशंसा कर रहे थे। मंच पर, गौतम अडानी के बेटे करण अडानी ने नरेन्द्र मोदी और पिनाराई विजयन दोनों की उनकी ‘विकास योजनाओं’ के लिए दिल खोलकर सराहना की। केरल के वामपन्थ के लिए यह वास्तव में एक गौरवपूर्ण क्षण था!!
करोड़ों-करोड़ के अपने विज्ञापन अभियान में, माकपा ने लगातार इस बात पर ज़ोर दिया कि उनके सक्षम नेतृत्व में केरल ने ‘धन्धा करने में आसानी’ के मामले में शानदार प्रगति की है। ‘इन्वेस्ट केरला’ की वेबसाइट घोषित करती है : “कारोबारी सुधारों में केरल सबसे आगे है, 2022 में धन्धा करने की आसानी के मामले में यह शीर्ष उपलब्धि हासिल करने वाला राज्य बन गया है…. 9 शीर्ष उपलब्धियाँ हासिल करके…. और इस तरह यह देश में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाला राज्य बन गया है। …2024 के धन्धा करने की आसानी के 99% सुधारों को पूरा करके इस मामले में केरल सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन जारी रख रहा है”।
वर्गीय सन्दर्भ में ‘धन्धा करने की आसानी’ का क्या अर्थ है? व्यापार/निवेश का एकमात्र मकसद होता है मुनाफ़ा कमाना, और मज़दूरों से निचोड़ा गया अतिरिक्त मूल्य ही मुनाफ़े का स्रोत होता है। अतिरिक्त मूल्य की उगाही मज़दूर वर्ग के शोषण के अलावा और कुछ नहीं है। इसलिए, ‘धन्धा करने की आसानी’ का सीधा मतलब है ‘मज़दूरों का शोषण करने की आसानी’। ‘धन्धा करने की आसानी’ के आकर्षक जुमले का वर्गीय अर्थों में यही सीधा मतलब है; यह मज़दूरों के शोषण को आसान और बेरोकटोक बनाने के लिए तमाम ज़रूरी इन्तज़ाम करने के अलावा और कुछ नहीं है।
“धन्धा करने की आसानी से सम्बन्धित कारोबारी सुधार”– जिसे 99% पूरा कर लेने का केरल के वामपन्थी दावा करते हैं – वे ऐसे उपाय हैं जिनका मकसद है ‘मज़दूरों के शोषण की आसानी’ के रास्ते में आने वाली हर बाधा को बेरहमी से उखाड़ फेंकना। ख़ुद को बेशर्मी से कम्युनिस्ट कहते हुए भी माकपा गर्व से घोषणा करती है कि उसने केरल में मज़दूर वर्ग के शोषण को सुगम बनाने के लिए सुधार किये हैं, और वे इस मामले में भारत में नंबर 1 हैं!!
मज़दूर वर्ग के शोषण और इसलिए ‘धन्धा करने की आसानी’ की राह में सबसे बड़ी बाधाएँ सर्वहारा वर्ग की चेतना और मज़दूरों की सक्रियता है। इसलिए, ‘मज़दूरों के शोषण को आसान बनाने’ के लिए, माकपा के नेतृत्व वाली वामपन्थी सरकार राज्य में किसी भी मज़दूर सक्रियता या संघर्ष को कुचलना अपना फ़र्ज़ समझती है। केरल में आशा कार्यकर्ताओं के चल रहे संघर्ष को कुचलकर, बदनाम और लांछित करके उन्हें पूँजीपति वर्ग के सामने इस सम्बन्ध में अपनी वफ़ादारी दिखाने का एक बढ़िया मौका मिल गया।
केरल की ‘आशा’ (मान्यता-प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता) कार्यकर्ता 10 फ़रवरी से अपने मानदेय में संशोधन, हर महीने की 5 तारीख़ से पहले इसे जारी करने और सेवानिवृत्ति लाभ के प्रावधान की माँग को लेकर हड़ताल पर हैं। राज्य की आशा कार्यकर्ता सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, लेकिन उन पर काम का भारी बोझ है, कर्मचारियों की संख्या कम है और वेतन (मानदेय) बहुत ही कम है। लेकिन केरल सरकार, माकपा के कुशल नेतृत्व में, उनकी हड़ताल को दबाने और नाकाम करने पर अड़ी है। और कुछ हो भी नहीं सकता। अगर वे ‘इनवेस्ट केरला’ में पूँजीपतियों से किये गये अपने वादों को पूरा करना चाहते हैं, तो उन्हें ‘मज़दूरों के शोषण को आसान बनाने’ के लिए हर मज़दूर आन्दोलन को कुचलना ही होगा।
यानी, जिस वक़्त तमाम बड़े वामपन्थी नेता “विकास महाकुम्भ” में मगन थे, उसी वक़्त माकपा और सरकारी मशीनरी झूठ फैलाने, धमकियाँ देने और हड़ताली स्त्रियों का मनोबल तोड़ने में जुटी थीं। यह कोई नयी बात नहीं है। केरल के वामपन्थियों ने पिछले एक दशक के दौरान केरल में हर स्वतःस्फूर्त मज़दूर या छात्र आन्दोलन को नाकाम करने की कोशिश की है। निजी अस्पताल की नर्सों (केरल में सबसे अधिक शोषित कामगारों में से एक), चाय/कॉफ़ी बागानों के मज़दूरों, निजी इंजीनियरिंग छात्रों और निजी नर्सिंग विद्यार्थियों आदि के स्वतःस्फूर्त और जुझारू आन्दोलनों का जीतोड़ विरोध करने का उनका इतिहास रहा है।
केरल के वामपन्थ और ख़ासकर माकपा इस बात का बहुत ध्यान रखते हैं कि राज्य में मज़दूर वर्ग की सक्रियता को उनकी ट्रेड यूनियनों द्वारा निर्धारित सख़्त सीमाओं से आगे नहीं जाने दिया जाना चाहिए, जो ख़ुद पूँजीपतियों के दलालों के स्तर तक गिर चुकी हैं। केरल के मज़दूरों से उनका साफ़ कहना है: “अगर तुम विरोध करना चाहते हो, तो हम तुम्हें हमारी ट्रेड यूनियनों द्वारा साल में एक या दो दिन आयोजित की जाने वाली औपचारिक, अनुष्ठानिक हड़तालों में ऐसा करने का अवसर देंगे। उनमें भाग लो और घर जाओ। क्योंकि, याद रखो…हम ‘मज़दूरों के शोषण को आसान बनाने’ के लिए कटिबद्ध हैं”!!
तो जैसा कि उचित ही था, आशा कार्यकर्ताओं को कुचलने के प्रयासों में मुख्य भूमिका माकपा की केन्द्रीय ट्रेड यूनियन सीटू के राज्य सचिव एलामारन करीम ने निभायी, जो पिछली वामपन्थी सरकार में उद्योग मन्त्री के रूप में केरल के पूँजीपति वर्ग के लाडले बनकर उभरे हैं। उन्होंने घोषणा की कि हड़ताल “राजनीति से प्रेरित” है (लेनिन का कहना था कि मज़दूर वर्ग की अगुआ पार्टी का कर्तव्य विशुद्ध रूप से आर्थिक संघर्षों में राजनीतिक विषयवस्तु डालना है, और यहाँ सीटू सचिव शिकायत कर रहे हैं कि हड़ताल राजनीति से प्रेरित है!), कि इसका नेतृत्व अराजकतावादी तत्व कर रहे हैं (माकपा के लिए, अब हर पूँजीवाद-विरोधी अराजकतावादी है!) और आशा महिलाओं को गुमराह किया गया है। उन्होंने हड़ताली कर्मचारियों का हर मौके पर तिरस्कार किया और उनके संघर्ष को बदनाम करने की लगातार कोशिश की।
जहाँ एक ओर केरल की वामपन्थी सरकार इस बात पर अड़ी हुई थी कि आशा कार्यकर्ताओं का मासिक मानदेय नहीं बढ़ाया जा सकता, वहीं पिछले हफ्ते उसने केरल लोक सेवा आयोग (पीएससी) के अध्यक्ष और सदस्यों को भारी वेतन वृद्धि देने का फ़ैसला किया। केरल में मौजूदा सरकार के तहत 21 सदस्यों वाला भारी-भरकम पीएससी है, जिनमें सभी राजनीतिक नियुक्तियाँ हैं। ये बहुत फ़ाय़दे के पद हैं जो आमतौर पर सत्ताधारी दल के क़रीबी लोगों को मिलते हैं। अध्यक्ष का वेतन अधिकतम 2.26 लाख रुपये से बढ़ाकर 3.5 लाख रुपये कर दिया गया, जबकि सदस्यों का वेतन 2.23 लाख रुपये से बढ़ाकर 3.25 लाख रुपये कर दिया गया। ख़ुद को “कम्युनिस्ट-मार्क्सवादी” कहने वाले केरल के वामपन्थी आशा कार्यकर्ताओं का वेतन 7000 रुपये से एक पैसा नहीं बढ़ाने पर अड़े हुए हैं। लेकिन वे पीएससी में बैठे अपने चमचों पर 3.25 लाख रुपये मासिक लुटाने के लिए तैयार हैं।
वामपन्थी सरकार यहीं नहीं रुकी। अगले ही दिन उन्होंने श्री के.वी. थॉमस, जो केरल सरकार द्वारा सृजित ‘दिल्ली में केरल के विशेष प्रतिनिधि’ नामक वाहियात पद पर आसीन हैं, के यात्रा भत्ते को 5 लाख से 11.31 लाख रुपये करने का प्रस्ताव रख दिया! थॉमस कई दशकों तक कांग्रेस से जुड़े रहे, लेकिन संसदीय सीट का टिकट न मिलने के बाद कांग्रेस से छलाँग मारकर माकपा में आ गये। केरल में यह कोई ख़बर नहीं है, वामपन्थ कांग्रेस और भाजपा छोड़ने वालों का पसंदीदा ठिकाना बन गया है। संसदीय वामपन्थ का जिस हद तक पतन हुआ है, उसके बाद ऐसा भला क्यों नहीं होगा? यात्रा भत्ते में यह वृद्धि थॉमस को पहले से मिल रहे 12.50 लाख रुपये के मानदेय के अलावा है। साथ ही उनके पास एक निजी सचिव, सहायक, कार्यालय परिचारक और ड्राइवर भी है, जिसका भुगतान राज्य सरकार करती है।
केरल के वामपन्थियों का चरित्र इससे अधिक नंगा नहीं हो सकता – मज़दूरों को कुचलो, उन्हें उचित मज़दूरी और काम करने की स्थितियाँ भी न दो, पूँजीपतियों के सामने लम्बलेट हो जाओ, उनके मुनाफ़ा निचोड़ने की राह से हर बाधा को हटाओ, सत्ता पर अपनी पकड़ बनाये रखने के लिए चापलूस सहयोगियों और दूसरी पार्टियों से आये दलबदलुओं पर जनता के पैसे उड़ाओ। और साथ ही ख़ुद को ‘मार्क्सवादी’ कहते रहो!!
लेकिन असली कमाल तो अभी बाक़ी था। जब यह सब चल रहा था, उसी समय, पक्के अवसरवादी और केरल में उच्च मध्य वर्ग के लाडले शशि थरूर के कांग्रेस के राज्य नेतृत्व के साथ मतभेद उभर रहे थे। माकपा की मशीनरी ने मौक़ा ताड़ा और फ़ौरन थरूर पर डोरे डालना शुरू कर दिया। अब दृश्य में प्रवेश हुआ माकपा की केन्द्रीय समिति के सदस्य श्री ए.के. बालन का, जो केरल के वामपन्थियों में सबसे काबिल कामदेव के रूप में उभरे हैं। कुछ महीने पहले, संघ परिवार का एक प्रमुख नेता सन्दीप वारियर, जो अपने ज़हरीले साम्प्रदायिक भाषणों के लिए बदनाम था, पलक्काड़ निर्वाचन क्षेत्र से पार्टी टिकट ने मिलने पर भाजपा से अलग हो गया। बालन ने तुरन्त उसका माकपा में स्वागत किया और कहा कि वे बहुत अच्छे कॉमरेड बनेंगे! इस बार, उन्होंने फ़ौरन घोषणा कर दी कि थरूर ‘विश्व स्तर पर प्रसिद्ध बुद्धिजीवी’ और ‘क्रान्तिकारी’ हैं!! इसके बाद माकपा ने ‘जनवादी नौजवान सभा’ के बेचारे नेताओं को थरूर के घर भेजा और उन्हें अपने द्वारा आयोजित ‘स्टार्टअप फ़ेस्ट’ में आमन्त्रित किया। ये अलग बात है कि घुटे हुए अवसरवादी थरूर ने जल्दी से पार्टी छोड़ने के किसी भी प्रलोभन का विरोध किया और अधिकतम लाभ पाने के लिए सही समय का इन्तज़ार कर रहे हैं (सम्भवतः सही समय पर वह भाजपा में शामिल हो जायें)।
ये और इसी तरह की कई अन्य घटनाएँ हमें संसदीय वामपन्थ के बारे में क्या बताती हैं? माकपा के नेतृत्व में भारत के संसदीय वामपन्थ ने दशकों पहले मार्क्सवाद को तिलांजलि दे दी थी और सामाजिक-जनवाद की राह पर चल पड़ा था। लेनिन ने कहा था कि सामाजिक-जनवाद मज़दूर वर्ग के अन्दर घुसा हुआ भितरघाती है, जो मज़दूर वर्ग की पार्टी की आड़ में बुर्जुआ नीतियों को अंजाम देता है। वामपन्थ का यह भितरघाती चरित्र लोगों के सामने हर दिन बेनक़ाब हो रहा है। पूँजी के सामने वे पूरी तरह दण्डवत हो चुके हैं। सत्ता में रहने पर वे मज़दूरों के शोषण को सुगम बनाकर पूँजीपति वर्ग के कारिन्दे की भूमिका निभाते हैं। पार्टी ढाँचे और ट्रेड यूनियनों का इस्तेमाल करके वे यह सुनिश्चित करते हैं कि मज़दूर वर्ग नियन्त्रण में रहे।
यही कारण है कि आशा कर्मियों की हड़ताल पर सबसे उग्र हमला सीटू नेताओं की ओर से हुआ। सामाजिक-जनवादियों के बीच के श्रम विभाजन के अनुसार, वामपन्थी सरकार पूरी तरह से नवउदारवादी नीतियों को लागू करके पूँजीपति वर्ग की सेवा करती है। उसके ट्रेड यूनियन मोर्चे के रूप में, सीटू का ‘वर्गीय कर्तव्य’ यह सुनिश्चित करना होता है कि मज़दूरों पर लगाम कसी रहे और वे इन नीतियों का विरोध क़तई न कर पायें। इसलिए, कोई भी हड़ताल जो सीटू की हड़तालों के ‘अनुष्ठानिक’ दायरे से आगे बढ़ती है, पूँजीपति वर्ग और सामाजिक-जनवाद के लिए ख़तरा बन जाती है। ऐसे में कोई आश्चर्य नहीं कि सीटू के राज्य उपाध्यक्ष हर्षकुमार ने हड़ताल की एक महिला नेता को “संक्रामक रोग फैलाने वाला कीट” कहकर पुकारा।
स्वाभाविक ही है कि सीटू का एक नेता, जो पूँजी और बुर्जुआ वर्ग की रक्षा के लिए मज़दूर वर्ग को नियन्त्रित करने के अपने कर्तव्य से बँधा है, हड़ताली आशा कार्यकर्ताओं को ‘कीट’ के रूप में देखता है। लेकिन वे जो ‘संक्रामक रोग’ फैला रही हैं, उसे मज़दूर वर्गीय चेतना कहा जाता है। और वह दिन बहुत दूर नहीं जब अवसरवादी, संसदीय वामपन्थ इस ‘रोग’ से मारा जायेगा और ये ‘कीट’ मानवता को इस मरणासन्न व्यवस्था से मुक्त कर देंगे।
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