Category Archives: फ़ासीवाद / साम्‍प्रदायिकता

योगी राज का असली खेल: अपराधियों को बेल, बेगुनाहों को जेल!

योगी आदित्यनाथ ने साल 2017 में राज्य विधानसभा में घोषणा की कि राज्य सरकार जल्द ही “विभिन्न दलों के राजनेताओं और राजनीतिक कार्यकर्ताओं” के ख़िलाफ़ दर्ज लगभग 20,000 आपराधिक मामले वापस ले लेगी। इसके लिए यूपी सरकार ने ‘उत्तर प्रदेश दण्ड विधि (अपराधों का शमन एवं मुक़दमों का समापन) (संशोधन) विधेयक, 2017’ पेश किया जोकि बिना किसी विरोध के पारित हो गया। लेकिन वास्तव में यह विभिन्न राजनेताओं और राजनीतिक कार्यकर्ताओं के बजाय मुख्यतः भाजपा से जुड़े नेताओं और साम्प्रदायिक हिन्दुत्ववादी गुण्डों को योगी आदित्यनाथ द्वारा दिया गया आश्वासन था कि “टेंशन नहीं लेने का- मैं हूँ न!”

क़र्ज़ माफ़ी के साथ पूँजीपति हुए मालामाल!

देश की ग़रीब जनता कुल टैक्सों का तीन-चौथाई से भी ज़्यादा परोक्ष करों के रूप में देती है। मगर इसका भारी हिस्सा नेताशाही और अफ़सरशाही की ऐय्याशियों पर और धन्नासेठों को तमाम तरह की छूटें और रियायतें देने पर ख़र्च हो जाता है। इतने से भी उनका पेट नहीं भरता तो वे बैंकों से भारी क़र्जे़ लेकर उसे डकार जाते हैं! ग़रीबों के क़र्जे़ वसूल करने के लिए उनकी झोपड़ी तक नीलाम करवा देने वाली सरकार अपने इन माई-बापों से एक पैसा नहीं वसूल पाती और फिर कई साल बाद उन्हें माफ़ कर दिया जाता है। दरअसल इस सारी रकम पर जनता का हक़ होता है। करोड़ों लोगों की छोटी-छोटी बचतों से बैंकों को जो भारी कमाई होती है, उसी में से वे पूँजीपति वर्ग के लिए यह दरियादिली दिखाते हैं!

मोदी राज में जीडीपी वृद्धि के आँकड़ों में व्यापक हेराफेरी! यह महज़ आँकड़ों की बाज़ीगरी नहीं बल्कि खुली डकैती है!

जीडीपी यानी सकल घरेलू उत्पाद एक निश्चित अवधि में किसी भी देश के भीतर उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं के कुल मूल्य को दर्शाता है। जीडीपी यह नहीं बताता कि उत्पादित मूल्य समाज में किस प्रकार वितरित हो रहा है और इसकी वृद्धि से किसे लाभ मिल रहा है। हम जानते हैं कि यह समस्त मूल्य मज़दूर वर्ग अपनी मेहनत से पैदा करता है लेकिन इसका फ़ायदा उसे नहीं मिलता है। अगर जीडीपी की दर मोदी राज में कुलांचे भर रही है तो फिर क्यों देश की कुल सम्पत्ति का 40 प्रतिशत ऊपर के 1 प्रतिशत के पास है और नीचे की आधी आबादी के पास महज़ 3 प्रतिशत है? क्यों मज़दूर वर्ग की वास्तविक मज़दूरी में कोई वृद्धि नहीं हो रही है? ज़ाहिर सी बात है कि पूँजीवादी समाज में जीडीपी का कोई भी आँकड़ा समाज की प्रगति की वास्तविक तस्वीर नहीं पेश कर सकता है। सच तो यह है कि इस ग़ैर-बराबरी वाली मुनाफ़े पर खड़ी व्यवस्था में सकल घरेलू उत्पाद का बड़ा हिस्सा जनता के हिस्से में नहीं बल्कि पूँजीपतियों की तिजोरियों में जा रहा है। साथ ही, जीडीपी आर्थिक प्रगति का इसलिए भी कोई सटीक सूचक नहीं है क्योंकि इसकी गणना में ऐसे कई घटक शामिल किये जाते हैं जो अनुत्पादक हैं, यानी जो समाज में नया मूल्य पैदा नहीं करते, भले ही वे पूँजीवाद के संचालन के लिए उपयोगी हो सकते हैं, मसलन वाणिज्यिक बिक्री, राज्य के प्रशासनिक कार्य आदि। इसके अलावा, भारतीय अर्थव्यवस्था पिछले लम्बे समय से मुनाफ़े की दर के संकट से बुरी तरह प्रभावित है। अन्तरराष्ट्रीय बाज़ार में रुपये की गिरावट भारतीय अर्थव्यवस्था की ख़राब स्थिति का एक और संकेतक है। बावजूद इसके, मोदी जी जीडीपी में वृद्धि के हवाई गोले छोड़ रहे हैं  और हमें जश्न मनाने को कह रहे हैं!

“सीज़फ़ायर समझौते” के बावजूद फ़िलिस्तीनियों पर हमले जारी : फ़िलिस्तीनी ज़मीन पर बढ़ती अवैध इज़रायली सेटलरों की संख्या!

“सीज़फ़ायर” और “शान्ति समझौते” जैसी घोषणाएं एक बार फिर साम्राज्यवादी साज़िश साबित हुई है। ज़ायनवादी उपनिवेशवादी सेटलर्स और साम्राज्यवादी अमेरिका दुनियाभर में फ़िलिस्तीनी-मुक्ति के समर्थन में बढ़ते जनान्दोलन से भयाक्रांत थे और इससे निजात पाने के लिए ही उन्होंने “सीज़फ़ायर” की नौटंकी की। यह सच्चाई दिन-ब-दिन हमारे सामने खुलती जा रही है। इज़रायली नेताओं के बयान को ही देख लें तो यह साफ़ ज़ाहिर होता है कि “सीज़फ़ायर” का अर्थ उनके लिए कहीं से भी शान्ति या नरसंहार को रोकना नहीं था बल्कि बिना किसी रुकावट के हमलों को जारी रखना था। इज़रायल के राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री बेन-ग्विर का हालिया बयान न सिर्फ़ सेटलर्स की मंशा को नंगे तौर पर उजागर करता है बल्कि ज़ायनवादियों की क्रूरता और अमानवीयता का भी चरम उदाहरण है।

योगी सरकार की चालों को उत्तर प्रदेश के मज़दूर-मेहनतकश भूलेंगे नहीं!

एक बार फिर से उत्तर प्रदेश की जनता के सामने और भी स्पष्टता से यह तथ्य सामने आ गया है कि योगी सरकार, मोदी सरकार और भाजपा पार्टी जैसी मज़दूर-विरोधी, मेहनतकश-विरोधी, स्त्री-विरोधी और जन-विरोधी और कोई भी पार्टी नहीं है। ऐसे में, उत्तर प्रदेश के सभी चेतनासम्पन्न मज़दूरों-मेहनतकशों को यह प्रण लेना चाहिए कि उनके समूचे वर्ग के साथ किये जा रहे इस अन्याय को वे भूलेंगे नहीं : फ़रवरी 2027 में होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के दौरान वे याद रखेंगे कि पिछले दस वर्षों में योगी सरकार ने प्रदेश के मज़दूरों, मेहनतकशों, सरकारी कर्मचारियों, आशाकर्मियों, आँगनवाड़ीकर्मियों, शिक्षा मित्रों आदि के साथ क्या सुलूक किया है। वे याद रखेंगे कि प्रदेश के दलितों, स्त्रियों और मुसलमान आबादी के साथ योगी सरकार ने क्या सुलूक किया है। सब याद रखा जायेगा।

बर्बरता के नित नये प्रतिमान गढ़ने में लगी पश्चिम बंगाल की भाजपा सरकार! कोलकाता में मेहनतकशों की एक बस्ती का पानी किया बन्द!

क्या हमने अपना दिमाग़ संघ परिवार के हवाले कर दिया है या हम अभी भी सोच-समझ सकते हैं? क्या अब समय नहीं आ गया है कि हम अपने सहनागरिकों के साथ खड़े हों और पूरी ताक़त से आवाज़ उठायें कि राज्य प्रशासन की हिम्मत कैसे हुई उन्हें पानी से वंचित करने की, जो एक बहुत ही बुनियादी और सार्वभौमिक रूप से स्वीकार किया गया मानवाधिकार है? क्या अब समय नहीं आ गया है कि हम ज्योतिनगर के अपने भाइयों और बहनों के समर्थन में हर जगह बड़ी तादाद में सड़कों पर उतरें?

नोएडा मज़दूर आन्दोलन – सर्वोच्च न्यायालय ने ज्ञानेश कुमार पुत्री को दी राहत, जुर्माने के आदेश पर लगायी रोक! सुनवाई की प्रक्रिया गम्भीर सवालों के घेरे में!

दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहलाने वाला भारत उन चन्देक देशों में से है जहाँ का संविधान ‘प्रिवेण्टिव डिटेंशन’ के क़ानून की इजाज़त देता है, जिसके तहत केवल सरकार या पुलिस प्रशासन के अधिकारियों के ‘मनोगत तौर पर सन्तुष्ट’ होने के आधार पर किसी को भी बिना किसी सबूत या ट्रायल के अधिकतम 12 माह तक जेल में रखा जा सकता है। 1980 में इस क़ानून के बनने के पहले 1977 तक ऐसा ही एक दूसरा क़ानून ‘मीसा’ 1971 से प्रभाव में था। उसके पहले 1950 में एक प्रिवेण्टिव डिटेंशन क़ानून आया था। 1977 से 1980 तक के तीन वर्ष ही आज़ाद भारतीय गणराज्य में ऐसा दौर हैं, जबकि ऐसा ‘प्रिवेण्टिव डिटेंशन’ का कोई क़ानून मौजूद नहीं था। इसके अलावा, आज़ाद भारत के पूरे इतिहास में आम इंसान की आज़ादी का मख़ौल बनाने वाला कोई न कोई ऐसा क़ानून मौजूद रहा है।

एसआईआर मेहनतकश जनता का मताधिकार छीनने के लिए किया गया एक घोटाला है!

पहले यह प्रक्रिया स्वयं सरकार की पहलक़दमी पर होती थी। पहले चुनाव आयोग का नारा था : ‘कोई वोटर न छूटे’। लेकिन बहुत कम लोगों ने ग़ौर किया होगा कि अब उसका नारा हो गया है : ‘कोई योग्य वोटर न छूटे’। “योग्य वोटर” कौन होगा? यह मोदी-शाह की फ़ासीवादी सरकार तय करेगी! यहाँ एक बहुत बड़ा बदलाव किया गया है। पहले इस बात की ज़िम्मेदारी राज्यसत्ता पर होती थी कि वह यह पक्का करे कि हर नये वोटर का नाम मतदाता सूची में जुड़े। इसे ‘राजकीय पहलक़दमी पर होने वाला मतदाता पंजीकरण’ कहा जाता है। दुनिया के हर देश में जहाँ पूँजीवादी जनवाद किसी न किसी हद तक काम करता है, वहाँ यही होता है। इसके बरक्स कुछ देशों में एक दूसरा मॉडल लागू किया जाता है जिसे कहा जाता है ‘व्यक्तिगत पहलक़दमी पर होने वाला मतदाता पंजीकरण’। यह आम तौर पर सर्वसत्तावादी तानाशाहियों द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला तरीक़ा है, जिसका मक़सद ही यह होता है कि बड़ी संख्या में मतदाताओं का नाम काटा जाये और उनके मताधिकार को छीन लिया जाये। इसके कारणों को हम कुछ आगे समझेंगे।

बलात्कारियों को संरक्षण देने वाले स्त्रियों को दे रहे “संस्कारी” बनने की सलाह!

फ़ासीवादी भाजपा के शासन में एक तरफ़ महिलाओं को ही सीमा में और संस्कार में रहने की हिदायत दी जाती है, महिलाओं के कपड़े पहनने, खाने, जीवनसाथी चुनने की आज़ादी पर हमला किया जाता है और दूसरी तरफ़ बलात्कारियों को खुली छूट मिलती है! जब ऐसी पार्टी सत्ता में होगी तो क्या नवधनाढ्य वर्गों, लम्पट टुटपुँजिया वर्गों और नेताओं की बिगड़ी औलादों का दुस्साहस नहीं बढ़ेगा कि वह किसी भी औरत पर हमला करे और उसका बलात्कार करे? जब इन आपराधिक तत्वों को यह यक़ीन है कि इन अपराधों की उसे कोई सज़ा नहीं मिलेगी, बस उसे भाजपा में शामिल हो जाने की आवश्यकता है, तो ज़ाहिर सी बात है कि स्त्री–विरोधी अपराधों में बढ़ोत्तरी होगी ही। शुचिता और संस्कार का ढोंग करने वाली फ़ासीवादी भाजपा के राज ने इस पतनशील और प्रतिक्रियावादी स्त्री-विरोधी मानसिकता को और मज़बूत किया है। भाजपा के गुरू गोलवलकर का मानना था कि औरतें बच्चा पैदा करने का यन्त्र होती हैं; इनके माफ़ीवीर सावरकर का मानना था कि बलात्कार का राजनीतिक हिंसा के उपकरण के तौर पर इस्तेमाल किया जाना चाहिए। यही इनकी असली जन्मकुण्डली है!

हॅंगामा है क्यों बरपा, गाली ही तो दी है!

तानाशाह को भी सबसे ज़्यादा चिढ़ लोगों की हँसी से होती है। जब लोग उसका मज़ाक उड़ाते हैं, उससे होती है। 15 साल के छात्रों की गालियों से 56 इंच की सरकार घबरा गयी है! मोदी जी रील बनाकर संस्कृति की दुहाई दे रहे हैं। महामानव  इतने सुसभ्य और शालीन हैं कि छात्रों के व्यंग्य से क्षुब्ध होकर मूल मुद्दे को ही गोल कर रहे हैं! कितनी हास्यास्पद बात है कि जो प्रधानमंत्री महिलाओं को जर्सी गाय कहते हैं अब वह नैतिकता और संस्कृति की दुहाई दे रहे हैं। 15 – 16 साल के छात्रों द्वारा दी गयी गालियों को ‘कल्चरल शॉक’ बताने वाले नरेन्द्र मोदी जी को यह भी बताना चाहिए कि भरी सभा में सोनिया गांधी को जर्सी गाय, सुन्नदा पुष्कर को 55 करोड़ की गर्लफ्रेण्ड कहना क्या है? क्या प्रधानमंत्री इसके लिए माफ़ी माँगेंगे। क्या यह अभद्र भाषा नहीं है? भद्रता का मुखौटा हटाइये मोदी जी! जिन गालियों से आपको ठेस पहुँच रही है उनसे भी अधिक घटिया गालियों को संसद में खड़े होकर प्रचलित करने का काम आपकी ख़ुद की पार्टी के नेता रमेश बिधूड़ी ने किया है। 2023 में रमेश बिधूड़ी ने संसद में खड़े होकर मुसलमानों को भद्दी-भद्दी गालियाँ दी थीं। लेकिन आज तक आपको रमेश बिधूड़ी की गालियों से ‘कल्चरल शॉक’ तो छोड़िए कोई छोटी-मोटी फुरफुरी भी नहीं मची, फिर बिधूड़ी पर कोई कार्रवाई की बात तो बहुत दूर की है! गली के लोफरों-लफ़ंगों के स्टैण्डर्ड की भाषा बोलने वाले असम के मुख्यमंत्री की गालियों से आजतक आपकी भावनाएँ आहत नहीं हुई।