Category Archives: फ़ासीवाद / साम्‍प्रदायिकता

फ़ासीवादियों और ज़ायनवादियों की प्रगाढ़ होती एकता!

नरेन्द्र मोदी द्वारा इज़रायल की यह दो-दिवसीय यात्रा एक ऐसे समय में हुई है जब जेफ़री एपस्टीन जैसे पतित व्यक्ति के साथ भाजपा के नेताओं-मंत्रियों और अम्बानी जैसे पूँजीपतियों की संलिप्तता का मामला सामने आया था। जेफ़री एप्सटीन एक गलीज़ नरभक्षी था और बच्चियों के साथ बलात्कार व यौन अपराध का अन्तरराष्ट्रीय रैकेट चलाता था। उसके घृणित कारनामे न केवल पूँजीवादी समाज की सड़ाँध और गलाज़त को प्रदर्शित करते हैं बल्कि दुनिया भर के शासक वर्गों की पतनशीलता को भी उघाड़ कर रख देते हैं। ऐसे घृणित व्यक्ति के साथ भाजपा के नेताओं और खुद नरेन्द्र मोदी के कथित सम्बन्ध आम जनता के लिए कई सवाल खड़े कर रहे थे। एप्स्टीन 2008 में ही यौन अपराधी साबित हो चुका था, मगर इसके बावजूद 2017 में अनिल अम्बानी, हरदीप सिंह पुरी आदि का एप्सटीन के साथ मेलजोल और अमेरिकी अधिकारियों के साथ मीटिंग्स का कार्यक्रम बनाना किन वज़हों से हो सकता है? क्या यह राजनीतिक व व्यापारिक फ़ायदों के लिए था या फ़िर निजी फ़ायदों के लिए? एप्स्टीन स्वयं एक ज़ायनवादी था और इज़रायली ख़ुफ़िया एजेंसी मोस्साद का एजेण्ट था। उसके साथ रिश्तों की बात सामने आने पर दुनिया के कई रसूख़दार व्यक्तियों को गिरफ़्तार किया गया है और कई से उनके पदों से इस्तीफ़े ले लिये गये हैं। सिर्फ़ डोनाल्ड ट्रम्प का अमेरिका और मोदी का भारत ही ऐसे देश हैं, जहाँ एप्सटीन फ़ाइलों में नाम आने के बाद भी किसी पर कार्रवाई तो दूर, जाँच की भी घोषणा नहीं की गयी है। सवाल है कि 2008 में एप्स्टीन की घिनौनी असलियत दुनिया के सामने आने के बाद भी भाजपा के नेताओं की बातचीत ऐसे घृणित, बलात्कारी व्यक्ति के साथ क्यों हो रही थी?

बंगाल में चुनाव आयोग की मिलीभगत से एसआईआर के ज़रिये चुनाव को ‘हाईजैक’ करने में जुटी फ़ासिस्ट भाजपा!

बंगाल के साथ-साथ अन्य 12 राज्यों में घोषित या अघोषित तौर पर एसआईआर की प्रक्रिया जारी है। इन तमाम राज्यों में ख़ासकर ग़रीबों, मुसलमानों, दलितों, स्त्रियों और प्रवासी मज़दूरों को निशाना बनाया जा रहा है। उत्तर प्रदेश से लेकर बंगाल और अन्य राज्यों में एसआईआर का कोई एक स्वरूप नहीं है। हर राज्य में भाजपा व मोदी सरकार अलग-अलग तरीक़ों से चुनाव आयोग के साथ मिलकर इसे अंजाम दे रही है। सवाल यह भी उठता है कि बंगाल जैसे राज्य में, जहाँ से ज़्यादातर प्रवासी मज़दूर अलग-अलग राज्यों में काम करने के लिए जाते हैं और प्राकृतिक आपदाओं समेत अन्य कारकों की वजह से उनके प्रमाण पत्र या पहचान कार्ड उनके पास नहीं है, क्या उन सबको डिटेंशन कैंप में भेज दिया जायेगा? फ़ासीवादी भाजपा की मानें तो अब “अमृतकाल” में  इस देश में ऐसा ही होगा!

फ़ासिस्टों की गुण्डागर्दी के ख़िलाफ़ उठ खड़े होते आम लोग 

पिछले 11 वर्षों से देशभर में संघ-भाजपा गिरोह के लोगों की मनमानी और गुण्डागर्दी चलती रही है। मुसलमानों, ईसाइयों, दलितों, स्त्रियों, आम ग़रीब आबादी और संघ-भाजपा के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने वाले छात्रों-युवाओं, प्रगतिशील लोगों पर हमले, मारपीट से लेकर बुलडोज़र चढ़ाने और मॉब लिंचिंग तक की इन्हें खुली छूट मिली हुई है। लेकिन पिछले कुछ समय से माहौल बदल रहा है। जगह-जगह लोग इनकी गुण्डई के ख़िलाफ़ उठ खड़े हो रहे हैं और इन्हें दुम दबाकर भागना पड़ रहा है।

देश भर में “हिन्दू” सम्मेलनों एवं यात्राओं में अभूतपूर्व बढ़ोत्तरी भारतीय फ़ासीवाद के ‘नीचे से उठते चक्रवात’ का जीता-जागता उदाहरण

इन सम्मेलनों और यात्राओं में ऐसे भाषण दिये जाते हैं जो सीधे तौर पर संवैधानिक मानकों और न्यायिक धाराओं के खिलाफ़ जाते है। लेकिन बिरले ही हम पाते हैं कि ऐसे किसी व्यक्ति पर कोई क़ानूनी कार्रवाई हुई हो। यह यही दर्शाता है कि आज के हिन्दुत्व फ़ासीवादी ताक़तों ने ‘अन्दर से’ सत्ता के अलग-अलग निकायों पर क़ब्ज़ा किया है और इनलिए इनकी गुण्डा वाहिनियों को सत्ता का संरक्षण प्राप्त है। फ़ासीवादी सत्ता भी इन संघी गुण्डा वाहिनियों  के ज़रिये ही समाज में साम्प्रदायिक ज़हर बेहद बेशर्मी से फैलाने का प्रयास करती है। सत्ता की शह के दम पर ही ये हिंदुत्ववादी भाषणों और नारों से आगे बढ़कर दुकानों में घुस-घुसकर मुसलमान दुकानदारों के साथ बदतमीज़ी व हिंसा जैसे कुकृत्य कर पाते हैं। फ़ासीवादी सत्ता की ताक़त ही इन्हें वह कूवत देती है जिसके दम पर ये गुण्डे राह चलते मुसलमानों से जबरन ‘वन्दे मातरम’ बुलवाते हैं, कश्मीरी शॉल बेचने वालों को कश्मीरी बोलने पर उत्तराखण्ड में पीट-पीटकर अधमरा कर देते हैं और आवामी एकता की मिसाल देने वाले कोटद्वार के दीपक के घर के बाहर 150-200 की भीड़ लाकर साम्प्रदायिक और उन्मादी नारेबाज़ी करते हैं।

कोटद्वार (उत्तराखण्ड) में संघी उत्पात और फ़ासिस्ट साम्प्रदायिक राजनीति का कारगर प्रतिरोध

फ़ासिस्ट संघ परिवार की साम्प्रदायिक साज़िश की पोल-पट्टी खोलते ही ‘हिन्दू’ ‘हिन्दू’ नहीं रह जाता। वह “ग़द्दार” हो जाता है और हिन्दू धर्म के झण्डाबरदारों द्वारा उसकी हत्या की सुपारी बाँटी जाने लगती है। यानी या तो आप फ़ासिस्टों के हर झूठ, नफ़रत की राजनीति में उनका साथ दीजिए या चुप रहिए! अगर आप इनकी असलियत को उजागर करेंगे तो आपको ‘हिन्दू’ से ‘ग़द्दार’ होने में सेकण्ड भी नहीं लगेंगे! दीपक के साथ भी यही हुआ। दीपक ने बजरंग दल की गुण्डागर्दी पर ज्यों ही उँगली उठायी  (जो कि हर इंसाफ़पसन्द इन्सान का फ़र्ज़ है!) वैसे ही दीपक के नाम सुपारी दी जाने लगी। ग़ौरतलब है कि ‘हिन्दू रक्षा दल’ के अध्यक्ष ललित शर्मा ने दीपक का सिर कलम कर लाने वाले को 5 लाख 51 हज़ार रुपये का इनाम देने का ऐलान किया।

कविता – प्रचार की ज़रूरत / बेर्टोल्ट ब्रेष्ट Poem – The Necessity of Propaganda / Bertolt Brecht

प्रचार के मकसद के बारे में
और एक बात लाज़मी है : प्रचार जितना बढ़ता जाता है,
बाक़ी सारी चीज़ें उतनी ही घटने लगती हैं।

साम्प्रदायिकता और फासीवाद पर भगतसिंह व गोर्की के उद्धरण

संसार के सभी ग़रीबों के, चाहे वे किसी भी जाति, रंग, धर्म या राष्ट्र के हों, अधिकार एक ही हैं। तुम्हारी भलाई इसी में है कि तुम धर्म, रंग, नस्ल और राष्ट्रीयता व देश के भेदभाव मिटाकर एकजुट हो जाओ और सरकार की ताक़त अपने हाथों में लेने का प्रयत्न करो।

फ़ासिस्ट मोदी के राज में नफ़रती हिंसा और अपराध चरम पर

2014 में मोदी की सरकार के सत्ता में पहुँचने के बाद से ही आरएसएस और उनके तमाम अनुषंगी संगठनों को नफ़रत फैलाने और नफ़रती अपराधों को अंजाम देने की खुली छूट मिली हुई है। नफ़रती अपराधों को अंजाम देने में फ़ासीवादी आरएसएस-भाजपा परिवार से सम्बन्ध रखने वाले लोग सबसे अगली कतार में खड़े हैं, यह बात सभी जानते हैं। नफ़रती अपराध को अंजाम देने के बाद सत्ता के संरक्षण द्वारा दोषियों के बच निकलने की हर सम्भव मदद की जाती है। सत्ता की मेहरबानी नफ़रत का ज़हर उगलने वाले अपराधियों के मनोबल को बढ़ाने का काम कर रही है। अपराधियों को सत्ता की शह मिलने का नतीजा आज स्त्रियों, उत्तरपूर्व के राज्यों के निवासियों, मुसलमानों, ईसाइयों, दलितों, आदिवासियों आदि के विरुद्ध नफ़रती अपराध चरम पर है और यहाँ तक कि व्यापक पैमाने पर ग़रीब मेहनतकश हिन्दू आबादी भी इसकी चपेट में आ रही है। यह तो होना ही था। फ़ासीवाद जिन बर्बर शक्तियों को निर्बन्ध करता है, उसमें यह होता ही है और यह फ़ासीवादी राजनीति की ज़रूरत भी होती है।

बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिन्दुओं के साथ हिंसा का मुद्दा उछालकर देश में साम्प्रदायिक उन्माद भड़काने और बंगाल चुनाव में ध्रुवीकरण की कोशिश में लगी भाजपा-संघ की दंगाई फ़ौज

बांग्लादेश में हो रही निर्मम हत्याओं का इस्तेमाल भारत में संघ-भाजपा-गोदी मीडिया द्वारा भी अपने फ़ासीवादी मंसूबे साधने के लिए किया जा रहा है; आख़िर लोगों की चिताओ पर राजनीतिक रोटियाँ सेकने की इनसे बड़ी काबिलियत किसके ही पास होगी! बांग्लादेश में निशाना बनायी जा रही अल्पसंख्यक आबादी की “आपदा में फ़ायदा” ढूँढ़ते हुए भाजपा-आरएसएस व विश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल समेत इनके अनेकों बगलबच्चा संगठनों ने पूरे देश में साम्प्रदायिक माहौल बनाने में कमी नहीं छोड़ी है। मीडिया-सोशल मीडिया के ज़रिये व सड़कों पर घूमते संघ के गुण्डे “बांग्लादेशी” के नाम पर देश की मुस्लिम आबादी को निशाना बना रहे हैं। जो काम बांग्लादेश में बिखरे ढंग से किया जा रहा है उसे सुनियोजित, संगठित व योजनाबद्ध तरीके से फ़ासीवादी भाजपा-संघ भारत में कर रहा है। यानी कि मुनाफ़े पर टिकी व्यवस्था में बर्बाद होती मेहनतकश जनता के असली दुश्मन इस पूँजीवादी व्यवस्था को बचाने के लिए जनता के सामने एक नक़ली शत्रु को पेश किया जा रहा है। इसके लिए अगर घड़ियाली आँसू बहा कर किसी की बर्बर हत्या का इस्तेमाल अपनी दंगाई राजनीति को मजबूत करने के लिए किया जा सकता है, तो उसमें भी भाजपा-संघ को परहेज़ नहीं; आख़िर रोज़ देश में खुलेआम क़त्लेआम तक करने वाली भाजपा-संघ-बजरंग दल को कैसा ही परहेज़ होगा!

महाराष्ट्र नगर निगम चुनाव: अहमदनगर नगर निगम चुनाव में भारत की क्रान्तिकारी मज़दूर पार्टी (RWPI) 17 प्रतिशत आबादी की पसन्द बनकर तीसरे स्थान पर रही

चुनाव आते-जाते रहेंगे, किन्तु मज़दूर एवं मेहनतकश वर्ग का वास्तविक संघर्ष सड़क पर है – सम्मानजनक जीवन हेतु, रोजगार-शिक्षा-स्वास्थ्य जैसे मूलभूत अधिकारों हेतु तथा पूँजीवाद और विशेषतः फ़ासीवाद के विरुद्ध क्रान्तिकारी सामाजिक आंदोलन के निर्माण हेतु। आने वाले दिनों में ज़्यादातर नगर निगमों में पुनः फ़ासीवादी भाजपा नेतृत्व वाली महायुती और कुछ एक नगर निगमों में दूसरी चुनावबाज़ पार्टीओं का शासन स्थापित होने वाला है। नगर निगमों में बिल्डरों, ठेकेदारों, दलालों, व्यापारियों और बड़े–छोटे पूँजीपतियों के हाथ में सत्ता पहले की तरह बनी रहेगी। लूट, निजीकरण, ठेकेदारी व्यवस्था, नगरीय जनसुविधाओं की कमी, बस्तियों की बदहाली, नशाख़ोरी, अपराध तथा जाति-धर्म-भाषा आधारित संघर्ष यथावत् बने रहेंगे। पूंजीपति वर्ग की लूट पहले की तरह जारी रहेगी – केवल उसकी लूट के आपसी बँटवारे में छोटा-मोटा परिवर्तन होगा।