Category Archives: फ़ासीवाद / साम्‍प्रदायिकता

शर्मनाक!! योगी का बुलडोज़र अब क्रान्तिकारी शहीदों की मूर्तियों पर भी चल रहा है!!

23 मार्च को जब सारा देश भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु के शहादत दिवस पर उनको याद कर रहा था, तो उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में सरकारी बुलडोज़र हमारे तीन शहीद क्रान्तिकारियों की मूर्तियों को चकनाचूर कर रहा था! जिस शाहजहांपुर की जनता को अपने इंक़लाबी सपूतों रामप्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाक़ुल्ला ख़ां और रोशन सिंह पर फ़ख्र है, उसी शाहजहांपुर के सरकारी अमले ने शहर के टाउनहॉल चौक पर 1972 में स्थापित इन तीनों की प्रतिमाओं को रात तीन बजे बुलडोज़र चलाकर ध्वस्त कर दिया।

मोदी के इज़रायल दौरे और मोदी सरकार द्वारा ‘बोर्ड ऑफ पीस’ जैसी साम्राज्यवादी साज़िश के समर्थन पर देशव्यापी विरोध प्रदर्शन!

भारत सरकार का पक्ष शुरू से ही फ़िलिस्तीनी आवाम के मुक्ति-संघर्ष के समर्थन में रहा है मगर भाजपा के सत्तासीन होने के बाद से फ़िलिस्तीन के प्रति इनके रुख में काफ़ी तेज़ी से बदलाव आया है। नरेन्द्र मोदी इज़रायल का दौरा करने वाले पहले प्रधानमंत्री बन चुके हैं। जहाँ वह एक तरफ़ अरब देशों के विदेश मंत्रियों को फ़िलिस्तीन के प्रति भारत के समर्थन का भरोसा दिलाते हैं, वहीं दूसरी ओर इज़रायल के साथ उनकी प्रगाढ़ होती मित्रता किसी से छुपी हुई नहीं है और अब तो वह इज़रायल के भ्रमण पर भी जा रहें है। यह पूरी तरह साफ़ है कि भाजपा की केन्द्र सरकार ने इज़रायल को अन्तरराष्ट्रीय समर्थन देकर उसके नरसंहार को परोक्ष रूप से जायज़ ठहराया है। यह फ़िलिस्तीन की जनता की पीठ में छुरा घोंपने के समान है। भले ही कागजों पर वे फ़िलिस्तीनी राज्य का समर्थन करने का ढोंग करते हों लेकिन ये ढोंग अन्तरराष्ट्रीय मंच पर अपनी छवि बचाने की एक खोखली और शर्मनाक कोशिश मात्र हैं। यह एक बार फिर मोदी सरकार के दोमुँहें और अवसरवादी चरित्र को बेनकाब करता है।

बंगाल में चुनाव आयोग की मिलीभगत से एसआईआर के ज़रिये चुनाव को ‘हाईजैक’ करने में जुटी फ़ासिस्ट भाजपा!

बंगाल के साथ-साथ अन्य 12 राज्यों में घोषित या अघोषित तौर पर एसआईआर की प्रक्रिया जारी है। इन तमाम राज्यों में ख़ासकर ग़रीबों, मुसलमानों, दलितों, स्त्रियों और प्रवासी मज़दूरों को निशाना बनाया जा रहा है। उत्तर प्रदेश से लेकर बंगाल और अन्य राज्यों में एसआईआर का कोई एक स्वरूप नहीं है। हर राज्य में भाजपा व मोदी सरकार अलग-अलग तरीक़ों से चुनाव आयोग के साथ मिलकर इसे अंजाम दे रही है। सवाल यह भी उठता है कि बंगाल जैसे राज्य में, जहाँ से ज़्यादातर प्रवासी मज़दूर अलग-अलग राज्यों में काम करने के लिए जाते हैं और प्राकृतिक आपदाओं समेत अन्य कारकों की वजह से उनके प्रमाण पत्र या पहचान कार्ड उनके पास नहीं है, क्या उन सबको डिटेंशन कैंप में भेज दिया जायेगा? फ़ासीवादी भाजपा की मानें तो अब “अमृतकाल” में  इस देश में ऐसा ही होगा!

फ़ासिस्टों की गुण्डागर्दी के ख़िलाफ़ उठ खड़े होते आम लोग 

पिछले 11 वर्षों से देशभर में संघ-भाजपा गिरोह के लोगों की मनमानी और गुण्डागर्दी चलती रही है। मुसलमानों, ईसाइयों, दलितों, स्त्रियों, आम ग़रीब आबादी और संघ-भाजपा के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने वाले छात्रों-युवाओं, प्रगतिशील लोगों पर हमले, मारपीट से लेकर बुलडोज़र चढ़ाने और मॉब लिंचिंग तक की इन्हें खुली छूट मिली हुई है। लेकिन पिछले कुछ समय से माहौल बदल रहा है। जगह-जगह लोग इनकी गुण्डई के ख़िलाफ़ उठ खड़े हो रहे हैं और इन्हें दुम दबाकर भागना पड़ रहा है।

देश भर में “हिन्दू” सम्मेलनों एवं यात्राओं में अभूतपूर्व बढ़ोत्तरी भारतीय फ़ासीवाद के ‘नीचे से उठते चक्रवात’ का जीता-जागता उदाहरण

इन सम्मेलनों और यात्राओं में ऐसे भाषण दिये जाते हैं जो सीधे तौर पर संवैधानिक मानकों और न्यायिक धाराओं के खिलाफ़ जाते है। लेकिन बिरले ही हम पाते हैं कि ऐसे किसी व्यक्ति पर कोई क़ानूनी कार्रवाई हुई हो। यह यही दर्शाता है कि आज के हिन्दुत्व फ़ासीवादी ताक़तों ने ‘अन्दर से’ सत्ता के अलग-अलग निकायों पर क़ब्ज़ा किया है और इनलिए इनकी गुण्डा वाहिनियों को सत्ता का संरक्षण प्राप्त है। फ़ासीवादी सत्ता भी इन संघी गुण्डा वाहिनियों  के ज़रिये ही समाज में साम्प्रदायिक ज़हर बेहद बेशर्मी से फैलाने का प्रयास करती है। सत्ता की शह के दम पर ही ये हिंदुत्ववादी भाषणों और नारों से आगे बढ़कर दुकानों में घुस-घुसकर मुसलमान दुकानदारों के साथ बदतमीज़ी व हिंसा जैसे कुकृत्य कर पाते हैं। फ़ासीवादी सत्ता की ताक़त ही इन्हें वह कूवत देती है जिसके दम पर ये गुण्डे राह चलते मुसलमानों से जबरन ‘वन्दे मातरम’ बुलवाते हैं, कश्मीरी शॉल बेचने वालों को कश्मीरी बोलने पर उत्तराखण्ड में पीट-पीटकर अधमरा कर देते हैं और आवामी एकता की मिसाल देने वाले कोटद्वार के दीपक के घर के बाहर 150-200 की भीड़ लाकर साम्प्रदायिक और उन्मादी नारेबाज़ी करते हैं।

कोटद्वार (उत्तराखण्ड) में संघी उत्पात और फ़ासिस्ट साम्प्रदायिक राजनीति का कारगर प्रतिरोध

फ़ासिस्ट संघ परिवार की साम्प्रदायिक साज़िश की पोल-पट्टी खोलते ही ‘हिन्दू’ ‘हिन्दू’ नहीं रह जाता। वह “ग़द्दार” हो जाता है और हिन्दू धर्म के झण्डाबरदारों द्वारा उसकी हत्या की सुपारी बाँटी जाने लगती है। यानी या तो आप फ़ासिस्टों के हर झूठ, नफ़रत की राजनीति में उनका साथ दीजिए या चुप रहिए! अगर आप इनकी असलियत को उजागर करेंगे तो आपको ‘हिन्दू’ से ‘ग़द्दार’ होने में सेकण्ड भी नहीं लगेंगे! दीपक के साथ भी यही हुआ। दीपक ने बजरंग दल की गुण्डागर्दी पर ज्यों ही उँगली उठायी  (जो कि हर इंसाफ़पसन्द इन्सान का फ़र्ज़ है!) वैसे ही दीपक के नाम सुपारी दी जाने लगी। ग़ौरतलब है कि ‘हिन्दू रक्षा दल’ के अध्यक्ष ललित शर्मा ने दीपक का सिर कलम कर लाने वाले को 5 लाख 51 हज़ार रुपये का इनाम देने का ऐलान किया।

कविता – प्रचार की ज़रूरत / बेर्टोल्ट ब्रेष्ट Poem – The Necessity of Propaganda / Bertolt Brecht

प्रचार के मकसद के बारे में
और एक बात लाज़मी है : प्रचार जितना बढ़ता जाता है,
बाक़ी सारी चीज़ें उतनी ही घटने लगती हैं।

साम्प्रदायिकता और फासीवाद पर भगतसिंह व गोर्की के उद्धरण

संसार के सभी ग़रीबों के, चाहे वे किसी भी जाति, रंग, धर्म या राष्ट्र के हों, अधिकार एक ही हैं। तुम्हारी भलाई इसी में है कि तुम धर्म, रंग, नस्ल और राष्ट्रीयता व देश के भेदभाव मिटाकर एकजुट हो जाओ और सरकार की ताक़त अपने हाथों में लेने का प्रयत्न करो।

फ़ासिस्ट मोदी के राज में नफ़रती हिंसा और अपराध चरम पर

2014 में मोदी की सरकार के सत्ता में पहुँचने के बाद से ही आरएसएस और उनके तमाम अनुषंगी संगठनों को नफ़रत फैलाने और नफ़रती अपराधों को अंजाम देने की खुली छूट मिली हुई है। नफ़रती अपराधों को अंजाम देने में फ़ासीवादी आरएसएस-भाजपा परिवार से सम्बन्ध रखने वाले लोग सबसे अगली कतार में खड़े हैं, यह बात सभी जानते हैं। नफ़रती अपराध को अंजाम देने के बाद सत्ता के संरक्षण द्वारा दोषियों के बच निकलने की हर सम्भव मदद की जाती है। सत्ता की मेहरबानी नफ़रत का ज़हर उगलने वाले अपराधियों के मनोबल को बढ़ाने का काम कर रही है। अपराधियों को सत्ता की शह मिलने का नतीजा आज स्त्रियों, उत्तरपूर्व के राज्यों के निवासियों, मुसलमानों, ईसाइयों, दलितों, आदिवासियों आदि के विरुद्ध नफ़रती अपराध चरम पर है और यहाँ तक कि व्यापक पैमाने पर ग़रीब मेहनतकश हिन्दू आबादी भी इसकी चपेट में आ रही है। यह तो होना ही था। फ़ासीवाद जिन बर्बर शक्तियों को निर्बन्ध करता है, उसमें यह होता ही है और यह फ़ासीवादी राजनीति की ज़रूरत भी होती है।

बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिन्दुओं के साथ हिंसा का मुद्दा उछालकर देश में साम्प्रदायिक उन्माद भड़काने और बंगाल चुनाव में ध्रुवीकरण की कोशिश में लगी भाजपा-संघ की दंगाई फ़ौज

बांग्लादेश में हो रही निर्मम हत्याओं का इस्तेमाल भारत में संघ-भाजपा-गोदी मीडिया द्वारा भी अपने फ़ासीवादी मंसूबे साधने के लिए किया जा रहा है; आख़िर लोगों की चिताओ पर राजनीतिक रोटियाँ सेकने की इनसे बड़ी काबिलियत किसके ही पास होगी! बांग्लादेश में निशाना बनायी जा रही अल्पसंख्यक आबादी की “आपदा में फ़ायदा” ढूँढ़ते हुए भाजपा-आरएसएस व विश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल समेत इनके अनेकों बगलबच्चा संगठनों ने पूरे देश में साम्प्रदायिक माहौल बनाने में कमी नहीं छोड़ी है। मीडिया-सोशल मीडिया के ज़रिये व सड़कों पर घूमते संघ के गुण्डे “बांग्लादेशी” के नाम पर देश की मुस्लिम आबादी को निशाना बना रहे हैं। जो काम बांग्लादेश में बिखरे ढंग से किया जा रहा है उसे सुनियोजित, संगठित व योजनाबद्ध तरीके से फ़ासीवादी भाजपा-संघ भारत में कर रहा है। यानी कि मुनाफ़े पर टिकी व्यवस्था में बर्बाद होती मेहनतकश जनता के असली दुश्मन इस पूँजीवादी व्यवस्था को बचाने के लिए जनता के सामने एक नक़ली शत्रु को पेश किया जा रहा है। इसके लिए अगर घड़ियाली आँसू बहा कर किसी की बर्बर हत्या का इस्तेमाल अपनी दंगाई राजनीति को मजबूत करने के लिए किया जा सकता है, तो उसमें भी भाजपा-संघ को परहेज़ नहीं; आख़िर रोज़ देश में खुलेआम क़त्लेआम तक करने वाली भाजपा-संघ-बजरंग दल को कैसा ही परहेज़ होगा!