Category Archives: फ़ासीवाद / साम्‍प्रदायिकता

भाजपा की योगी सरकार द्वारा मालिकों और पूँजीपतियों की सेवा में मेहनतकशों-मज़दूरों पर थोपा गया अमानवीय शोषण, दमन, अन्याय और आतंक का राज

भाजपा सरकारें, केन्द्र में व हर राज्य में, मज़दूरों की सबसे बड़ी दुश्मन साबित हुई हैं। यह बात हरेक सचेत मज़दूर और मेहनतकश को पता है। न सिर्फ़ नोएडा में बल्कि बरौनी में, पानीपत में, सूरत में और हर जगह भाजपा सरकारों के राज में पूँजीपतियों के हितों को साधने के लिए मज़दूरों की हर आवाज़ का क्रूरता से दमन किया गया है। अगर आप मज़दूरों की औसत मज़दूरी की राज्यवार पड़ताल करें, तो पाएँगे कि दिल्ली को छोड़ दें (जहाँ क़ानूनी काग़ज़ी न्यूनतम मज़दूरी कुछ ज़्यादा होने के ऐतिहासिक व आर्थिक कारण हैं और जो लागू भी नहीं होती!), तो अधिकांश भाजपा-शासित राज्यों में मज़दूरों की औसत मज़दूरी सबसे निचली कतारों में आती है। सभी भाजपा-शासित राज्यों में ठेकाकरण की रफ़्तार सबसे तेज़ है। श्रम कानूनों के उल्लंघन के मामले में भी भाजपा-शासित राज्य ही सबसे आगे हैं।

स्वतंत्रता दिवस पर अपने भाषण में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने फिर की खोखले दावों, अनगिनत झूठों और बेहिसाब जुमलों की बरसात

हालिया छात्र-युवा आन्दोलन की प्रमुख उपलब्धियों नें से एक यह रही कि इसने आम जनता के व्यापक हिस्सों को निष्क्रियता की स्थिति से जगाने का काम किया और मोदी-शाह शासन द्वारा संचालित “हिन्दू-मुसलमान” और “मन्दिर-मस्जिद” की साम्प्रदायिक फ़ासीवादी राजनीति के नक़ली मुद्दों को नकारते हुए उनके बरक्स आम जनता के वास्तविक मुद्दों को एक हद तक विमर्श के केन्द्र में फिर से स्थापित करने का काम किया, इसलिए फ़ासीवादी ताक़तों की बौखलाहट स्वाभाविक ही है। और चूँकि फ़ासीवादियों के पास उठाये जा रहे सवालों के कोई जवाब नहीं हैं, इसलिए उन्होंने अपने राजनीतिक विरोधियों को बदनाम करने के लिए नये-नये राजनीतिक शब्द गढ़ने की अपनी पुरानी तरकीब का सहारा लेना पड़ रहा है और झूठे दावे करने पड़ रहे हैं कि यह देशविरोधी तत्व देश में “हिंसा और अराजकता” फैलाने की कोशिश कर रहे हैं। ग़ौरतलब है कि देश की “सीमाओं के भीतर” होने वाले युद्ध की बात भी नरेन्द्र मोदी ने अपने भाषण में की। लेकिन सबसे पहले मोदी जी को इस सवाल का जवाब देना चाहिए कि यह युद्ध कौन छेड़ रहा है और किसके ख़िलाफ़ छेड़ रहा है? पिछले 12 सालों का लेखा-जोखा निकालकर देख लिया जाये तो यह मोदी-शाह हुकूमत है जिसने देश में आतंक और हिंसा का माहौल क़ायम किया है, जिसकी लम्पट गुण्डा वाहिनियों ने कभी “लव जिहाद” तो कभी “गौ रक्षा” के नाम पर मुसलमानों का जीवन दूभर कर दिया है, जिसकी ट्रोल आर्मी ने सोशल मीडिया पर लड़कियों को बलात्कार, एसिड अटैक, हत्या तक की धमीकियाँ देकर उन्हें आतंकित करने का काम किया है, जिसकी आततायी पुलिस ने हर शान्तिपूर्ण आन्दोलन में निहत्थे मज़दूरों-नौजवानों को बर्बर दमन का निशाना बनाया है। दरअसल यह ख़ुद मोदी सरकार है जिसने पिछले 12 सालों में एक युद्ध छेड़ रखा है देश की अवाम के ख़िलाफ़!

मज़दूर अधिकारों की क़ीमत पर ही सही, “उद्योग का भविष्य” चमकते रहना चाहिए!

पिछले कुछ समय में हमारे देश के न्यायालयों ने एक के बाद एक कई ऐसे फैसले दिये हैं जिससे कि वे ‘न्यायिक व्यवस्था’ की नुमाइन्दगी कम बल्कि ‘अन्यायिक व्यवस्था’ की नुमाइन्दगी करते अधिक नज़र आये हैं। कई मसले देश की सुर्खियों में आये जो सीधे तौर पर न्यायालयों के जन-विरोधी चरित्र को दिखा रहे थे मगर ऐसे कई मसले सुर्खियों से भी ग़ायब रहे जो इस देश की आम मेहनतकश आबादी की ज़िंदगियों का फ़ैसला करते थे! इसी तरह का एक मसला बीते 20 अगस्त को चीफ़ जस्टिस सूर्यकान्त की अध्यक्षता में नौ न्यायाधीशों की खण्डपीठ द्वारा सुना गया। मामला उद्योग, उद्योगपतियों और मज़दूरों से जुड़ा हुआ था।

पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेन्दु अधिकारी द्वारा एसआईआर और जनगणना को जोड़े जाने का फ़ासीवादी बयान और उसके निहितार्थ

एसआईआर के बाद बंगाल में जिन 27 लाख लोगों का नाम न्यायिक निर्णयन के बाद हटाया गया है, उनमें मुसलमान ज़्यादा हो सकते हैं, लेकिन हिंदुओं की तादाद भी अच्छी-ख़ासी है! असल में न तो हिंदुओं के दुश्मन मुसलमान हैं, न ही मुसलमानों के दुश्मन हिन्दू हैं! बल्कि इन दोनों ही धर्मों से आने वाली मेहनतकश आवाम के आज सबसे बड़े दुश्मन संघ परिवार और भाजपा के दंगाई और फ़सादी हैं। इसलिए आज जब जनगणना और एसआईआर के बारे में सुवेन्दु अधिकारी ऐसी बातें बोल रहे हैं, तो उसे हमें हल्के में नहीं लेते हुए उसकी पुरज़ोर मुख़ालिफ़त करनी चाहिए। दूसरे, हम मेहनतकश लोगों को आपस में न बँटते हुए नागरिकता संशोधन क़ानून 2019 और एसआईआर जैसी फ़ासीवादी कवायदों को फ़ौरन रद्द किये जाने की माँग ज़ोर-शोर से उठानी चाहिए।

देश के छात्रों-युवाओं ने किया “महामानव” की महाछवि को चकनाचूर!

मोदीजी की “महामानव” छवि को जेन-ज़ी आन्दोलन द्वारा चकनाचूर और ध्वस्त कर दिया गया है। यही वजह है कि भाजपा इस वक़्त पूरी तरह बौखलायी हुई है। इसलिए ही तो मोदी सरकार व अन्य राज्य भाजपा सरकारों की पुलिस देश के 15 से 25 साल के नौजवानों के पीछे पड़ी है कि उसने ‘फ्यूहरर’ का अपमान कैसे कर दिया? उनकी असंसदीय भाषा को बड़ा मसला बनाया जा रहा है। सारा मामला ही भाषाई शुचिता पर स्थानान्तरित करके भाजपा सरकार और संघ परिवार आन्दोलनरत युवाओं को ही दोषी ठहराने में लग गये हैं, उन्हें मर्डर और रेप तक की ऑनलाइन धमकियाँ दिलवायी जा रही हैं, उन्हें आतंकित करने की कोशिश की जा रही है। लेकिन हमारे देश के प्राचीन ग्रन्थों में ही एक उक्ति है : विनाश काले, विपरीत बुद्धि। जितना अधिक मौजूदा फ़ासीवादी सरकार इन चालबाज़ियों और साज़िशों को अंजाम दे रही है, उतना ही इस पीढ़ी के युवाओं का गुस्सा और मोहभंग बढ़ रहा है, उतना ही वह समझती जा रही है कि मौजूदा मोदी सरकार किस क़दर जनविरोधी, छात्र-विरोधी और युवा-विरोधी है, उतना ही उसके अन्दर परिवर्तन की भावना विकसित होती जा रही है और उतना ही उसके अन्दर का डर भी ख़त्म होता जा रहा है। जिस सीमा रेखा पर जनता का डर ख़त्म होता है, वहीं से आततायी सरकारों और हुक्मरानों का डर शुरू होता है। अब वह मंज़िल आ चुकी है।

फ़ासीवादी ताक़तों द्वारा इतिहास को विकृत करने का एक और प्रयास

इतिहास पर यह हमला कोई आकस्मिक घटना नहीं है। इतिहास को विकृत करना उस वृहद फ़ासीवादी परियोजना का अभिन्न हिस्सा है, जिसका उद्देश्य वास्तव में मुनाफ़े पर आधारित इस पूँजीवादी व्यवस्था द्वारा पैदा की गयी तमाम समस्याओं और संकट के लिए एक नक़ली व काल्पनिक दुश्मन का निर्माण करना और फिर उससे ही इन समस्याओं के लिए ज़िम्मेदार ठहराना और उस नक़ली दुश्मन के बहिष्कार तथा विरोध के आधार पर एक विशुद्ध विचारधारात्मक समुदाय-अर्थात् “आर्यन राइख” या “हिन्दू राष्ट्र” का निर्माण करना है। इसके ज़रिये ही फ़ासीवाद टुट्टपूंजिया वर्गों के संगठित प्रतिक्रियावादी आन्दोलन को विशिष्ट तौर पर बड़ी पूँजी की सेवा और आम तौर पर पूँजी की सेवा में सन्नद्ध करता है। लेकिन न तो यह तथाकथित “नक़ली दुश्मन” और न ही यह विशुद्ध विचारधारात्मक समुदाय, मसलन ‘हिन्दू राष्ट्र’, किसी वास्तविक ऐतिहासिक आधार पर मौजूद है। इसलिए एक ऐसे स्वर्णिम, अखण्ड अतीत की काल्पनिक तस्वीर गढ़ी जाती है, जिसमें उस विचारधारात्मक समुदाय को हमेशा से महान और एकीकृत दिखाया जाता है तथा उसके ऊपर किसी “दुश्मन” द्वारा किये गये पतनकारी हमले की कहानी प्रस्तुत की जाती है।

पश्चिम बंगाल में भाजपा सरकार और बुलडोज़र का आतंक!

बंगाल में नये नवेले पहुँचे “बुलडोज़र राज” ने छोटे दुकानदारों, रेहड़ी पटरी वालों, फेरीवालों की आजीविका पर गम्भीर असर डाला है। ध्वस्तीकरण अभियान चलाने से पहले, तोड़फोड़ की कार्रवाई करने से पहले कहीं भी उन्हें पर्याप्त पूर्व सूचना नहीं दी गई थी। कई छोटे व्यापारियों का कहना था कि जमींदोज़ की गईं कई दुकानें दशकों से मौजूद थीं और उन्होंने प्रशासन से उसके पुनर्वास या वैकल्पिक वेंडिंग (दुकान लगाने) की व्यवस्था की माँग की थी। लेकिन बजाय उनकी माँग पर ग़ौर फ़रमाने के सरकार ने उन्हें बुलडोज़ कर दिया। ग़ौरतलब है कि,”बुलडोज़र राज” में तमाम वैधानिक, क़ानूनी प्रक्रियाओं को धता बताते हुए, बुलडोज़र चलाया जाता है। उच्चतम न्यायालय ने नवम्बर 2024 में ध्वस्तीकरण, बुलडोज़र कार्रवाई के सम्‍बन्‍ध में दिशा-निर्देश जारी किये थे, जिसमें अनिवार्य 15 दिन की नोटिस अवधि भी शामिल है, इन तमाम कार्रवाइयों में उन दिशानिर्देशों की अवेहलना की जा रही है। विडम्बना है कि बंगाल चुनाव के दौरान झालमुड़ी खाने की नौटंकी करने वाले महामानव की सरकार बनने के बाद झालमुड़ी बेचने वालों को ही दर-बदर किया जा रहा है।

‘नोएडा के मज़दूरों और कार्यकर्ताओं की रिहाई के लिए अभियान’ (CaRWAN) के बैनर तले दिल्ली में विरोध प्रदर्शन

प्रोफेसर नंदिता नारायण ने कहा, “मुझे आकृति, हिमांशु और योगेश जैसे छात्रों पर गर्व है। आज की पीढ़ी के छात्रों को ऐसा ही करना चाहिए। केवल अपने करियर के बारे में सोचने के बजाय उन्होंने अपनी शिक्षा का उपयोग उत्पीड़ित लोगों की आवाज़ बनने के लिए किया। सभा में उपस्थित छात्रों को सम्बोधित करते हुए प्रो. नंदिता ने विश्वविद्यालयों में जनवादी स्पेस के सिकुड़ने पर भी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा, “यह वास्तव में परेशान करने वाली बात है कि योगेश को यूपी पुलिस के सिविल ड्रेस में आए पुलिसकर्मियों द्वारा नॉर्थ कैंपस के अन्दर से अगवा किया गया और विश्वविद्यालय प्रशासन ने इस पर कोई कार्रवाई नहीं की।” सामाजिक कार्यकर्ता नौरीन ने नोएडा मज़दूर आन्दोलन के बाद यूपी पुलिस द्वारा चलाए गए “विच हंट” पर विस्तार से बाते रखी। यूपी पुलिस की स्पेशल टास्क फोर्स ने निजी स्थानों, लाइब्रेरी और कई जगहों पर ग़ैरक़ानूनी तरीक़े से छापेमारी की और बिना किसी उचित प्रक्रिया के युवाओं को अगवा कर अवैध रूप से गिरफ़्तार किया। नौरीन ने यह भी बताया कि ट्रैकिंग और निगरानी अभी भी जारी है। यूपी पुलिस के अधिकारी अब भी दिल्ली में महिला छात्रों का पीछा कर रहे हैं, उन्हें धमका रहे हैं। उन्होंने कहा, “ पुलिस ने मुझे भी अगवा किया था, मेरी धार्मिक पहचान के कारण प्रताड़ित किया, मुझे बांग्लादेशी तक कहा।”

करोड़ों लोगों के वोट देने के बुनियादी राजनीतिक अधिकार छीनने वाली एसआईआर (SIR) की क़वायद पर सर्वोच्च न्यायालय की मुहर!

एसआईआर वास्तव में भाजपा द्वारा अपने गिरते हुए जनाधार की सूरत में भी लम्बे समय तक सत्ता में बने रहने के तमाम हथकण्डों में से एक है। अगर हम एसआईआर को भाजपा की अन्य आगामी हथकण्डों—परिसीमन, एक देश एक वोट और क्षेत्रीय पार्टियों को तोड़ना— के साथ देखें तो स्पष्ट हो जाता है कि आने वाले दिनों में येन-केन-प्रकारेण सत्ता में बने रहने की उसकी रणनीति क्या है। पहले जनता सरकार को चुनती थी अब सरकार जनता को चुनेगी।

जनता के विरोध से घबराकर उत्तर प्रदेश सरकार ने एक बार फिर लगाया एस्मा!

उत्तर प्रदेश में लगे एस्मा का खास महत्व है। इसे हमें उत्तर प्रदेश के विभिन्न विभागों में बढ़ते असंतोष को दबाने के क्रम में देखने की ज़रूरत है। इस समय उत्तर प्रदेश में गहराते आर्थिक संकट, बिजली संकट और इन संकटों की वजह से बढ़ते जनाक्रोश की परिस्थिति से निपटने के लिए एस्मा लगाया गया है। अगले साल उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। चुनावों से पहले योगी सरकार अपने कुशासन और जनविरोधी शासन के ख़िलाफ़ किसी भी तरह के प्रतिरोध को पनपने से पहले ही कुचल देने कि कोशिशें कर रही है। इसीलिए योगी सरकार कभी एस्मा लगाती है तो कभी मज़दूर कार्यकर्ताओं के ऊपर रासुका जैसा दमनकारी क़ानून लगा दिया जाता है ताकि लोग अपनी बुनियादी माँगों मसलन शिक्षा, चिकित्सा, रोज़गार, आवास, न्यूनतम वेतन आदि के लिए एकजुट और संगठित न हो सकें।