Category Archives: फ़ासीवाद / साम्‍प्रदायिकता

‘महाराष्ट्र जन सुरक्षा क़ानून’ – “जन सुरक्षा” के नाम पर जनता के दमन की तैयारी!

सरकार की मर्जी के ख़िलाफ़ किसी भी व्यक्ति का सार्वजनिक व्यवस्था बिगाड़ने की ‘प्रवृत्ति’ होना, बस अब यह महसूस होने पर ही उक्त व्यक्ति अपराधी ठहराया जा सकता है। इसके लिए अब सरकार को सिर्फ “लगना” काफी होगा! क़ानून का उल्लंघन हुआ है या नहीं, यह तय करना अब तक न्यायालयों का काम था। सरकार आरोप लगा सकती थी, लेकिन न्यायालयों द्वारा फैसला आने तक अपराध सिद्ध नहीं माना जाता था। लेकिन इस क़ानून ने किसी संगठन को अवैध है या नहीं, यह तय करने का प्रभावी अधिकार सरकार को ही दे दिया है। धारा-3 के अनुसार सरकार राजपत्र में अधिसूचना जारी कर किसी भी संगठन को अवैध घोषित कर सकती है, और धारा-3(2) के अनुसार उसके कारण बताना भी सरकार के लिए अनिवार्य नहीं है।

‘बंगलादेशी घुसपैठियों’ के नाम पर देशभर में मेहनतकश ग़रीब जनता पर पुलिस, प्रशासन और संघी संगठनों की गुण्डागर्दी व बर्बरता

पहली बात तो यह कि हर वह व्यक्ति जो इस देश में रहता है या आता है, सिर्फ़ पेट लेकर नहीं आता बल्कि दो हाथ भी लेकर आता है और मेहनत-मशक्क़त करता है और अपने हक़ का खाता है, वह यहाँ बस सकता है क्योंकि वह परजीवी नहीं बल्कि इसी समाज में अपने श्रम से भौतिक सम्पदा का सृजन कर रहा है। अगर किसी बंगलादेशी को देश से बाहर करना चाहिए तो वह बंगलादेश की ज़ालिम भूतपूर्व शासक शेख़ हसीना है, जिसे भारत की मोदी सरकार ने पनाह दे रखी है! वह तो बस यहाँ ऐश कर रही है! लेकिन निशाना मज़दूरों को बनाया जा रहा है, जिनमें से अधिकांश तो बंगलादेश से आये भी नहीं हैं, वे बस मुसलमान हैं और बांग्लाभाषी हैं।

1975 का आपातकाल और आज का अघोषित आपातकाल

जो काम आरएसएस और उनके नेताओं ने अंग्रेज़ों के समय में किया था, वही काम आरएसएस और उनके नेताओं ने आपातकाल के दौरान भी किया यानी-माफ़ीनामा और दमन में सरकार का साथ देना! वास्तव में, मज़दूर वर्ग के क्रान्तिकारी और छात्रों-युवाओं के बीच मौजूद क्रानितकारी एक्टिविस्ट सबसे बहादुरी के साथ लड़ रहे थे, आपातकाल का विरोध कर रहे हैं, दमन-उत्पीड़न झेल रहे थे और यहाँ तक कि शहादतें भी दे रहे थे। इनमें क्रान्तिकारी कम्युनिस्ट सबसे आगे थे, जो जनता के हक़ों पर हो रहे हमलों का ज़बर्दस्त प्रतिरोध कर रहे थे। दूसरी ओर, आरएसएस कायरता के साथ अपनी माँद में दुबक गयी थी और उसके नेता शर्मनाक माफ़ीनामे लिख रहे थे। आज भाजपा की मोदी-शाह सरकार और भाजपाई आपातकाल के 50 वर्षों के पूरे होने पर सियारों की तरह हुआँ रहे हैं कि आपातकाल लागू करके इन्दिरा गाँधी और कांग्रेस ने कितना ज़ुल्म किया। लेकिन ये ख़ुद उस समय माफ़ीनामों के बण्डल पर बैठकर इन्दिरा गाँधी के नाम कसीदे पढ़ रहे थे।

मतदाता सूची संशोधन, 2025 : जनता के मताधिकार को चुराने के लिए भाजपा का हथकण्डा और पीछे के दरवाज़े से एनआरसी लागू करने की नयी साज़िश

इस पूरी प्रक्रिया को लागू करने की असली मंशा पीछे के दरवाज़े से NRC को लागू करने की भी है। NRC के द्वारा देश की मेहनतकश जनता के एक विचारणीय हिस्से से उसकी नागरिकता छीनने की साज़िश मोदी सरकार ने 6 साल पहले ही रची थी लेकिन उस समय जनान्दोलनों के दबाव के कारण वह उसे लागू नहीं कर पाई थी। आज चुनाव आयोग द्वारा पिछले दरवाज़े से उसी NRC को लागू करने की कोशिश की जा रही है। इसके द्वारा लोगों से पहले वोट देने का अधिकार छीना जायेगा उसके बाद उसे विदेशी व घुसपैठिया साबित कर उसके सारे जनवादी अधिकारों को छीन लिया जायेगा। इस मौक़े पर भी देश की मुख्य धारा की मीडिया (गोदी मीडिया ) सरकार के पक्ष में राय का निर्माण करने के अपने कर्तव्य को बख़ूबी निभा रही है। सुबह-शाम चीख-चीखकर मीडिया के एंकर इसे “देशहित” में बता रहे हैं।

भारत को विश्वगुरु बनाने के ‘डंकापति’ के दावों का सच!

आज से पहले कभी किसी प्रधानमन्त्री या पार्टी ने इस हद तक जाकर युद्धोन्माद का इस्तेमाल अपने चुनावी फ़ायदे के लिए शायद ही किया हो, जितना नरेन्द्र मोदी और भाजपा ने किया है। पिछले एक दशक में पड़ोसी देशों के प्रति बेवजह की आक्रमकता दिखाकर और वैश्विक स्तर पर निरंकुश सत्ताओं को समर्थन देकर फ़ासीवादी मोदी सरकार ने अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की बेतहाशा फ़जीहत करवायी है। लेकिन जैसा कि हमने लेख की शुरुआत में ही कहा था कि अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी भद पिटवाने के बावजूद गोदी मीडिया और संघी आई.टी सेल की ट्रोल आर्मी ने मोदी की छवि का आभामण्डल “विश्व-विजयी सम्राट” सरीखा बना रखा है! हालाँकि देर-सबेर सच्चाई की ठोस दीवार से टकराकर यह आभामण्डल भी टूटेगा!  

उत्तर प्रदेश में बिजली का निजीकरण किसके हक़ में?

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार बिजली विभाग पर निजीकरण का बुलडोज़र चलाने की ठान चुकी है। बिजली कर्मचारियों के व्यापक विरोध प्रदर्शन के बावजूद योगी सरकार पूँजीपतियों के हक़ में अपने अटल इरादे को ज़ाहिर कर चुकी है। इसके लिये योगी सरकार एस्मा जैसे क़ानून का डण्डा और निलम्बन और बर्खास्तगी जैसे हथकण्डे इस्तेमाल करने के लिए तैयार बैठी है। उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड (यूपीपीसीएल) दो प्रमुख बिजली वितरण निगमों (डिस्कॉम) – दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम (आगरा) और पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम (वाराणसी) का निजीकरण करने जा रही है। योगी सरकार की मंज़ूरी के बाद ऊर्जा विभाग ने यूपी पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड को इस योजना को लागू करने के लिए आदेश जारी कर दिया है। यह निर्णय उत्तर प्रदेश के 40 से अधिक ज़िलों को प्रभावित करेगा।

फ़ासीवादियों द्वारा इतिहास के साम्प्रदायिकीकरण का विरोध करो! अपने असली इतिहास को जानो! (भाग-1)

फ़ासिस्ट इतिहास से ख़ौफ़ खाते हैं। ये इतिहास को इसलिए भी बदल देना चाहते हैं क्योंकि इनका अपना इतिहास राष्ट्रीय मुक्ति आन्दोलन से ग़द्दारी, माफ़ीनामे लिखने, क्रान्तिकारियों की मुख़बिरी करने, साम्प्रदायिक हिंसा और उन्माद फैलाने का रहा है। जब भगतसिंह जैसे क्रान्तिकारी राष्ट्रीय मुक्ति आन्दोलन में अपनी शहादत दे रहे थे, तो उस दौर में संघी फ़ासिस्टों के पुरखे लोगों को समझा रहे थे कि अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ लड़ने की बजाय मुसलमानों और कम्युनिस्टों के ख़िलाफ़ लड़ना चाहिए! संघी फ़ासिस्टों के गुरु “वीर” सावरकर का माफ़ीनामा, अटल बिहारी वाजपेयी जैसे लोगों द्वारा मुख़बिरी और गाँधी की हत्या में संघ की भूमिका और ब्रिटिश सत्ता के प्रति वफ़ादारी के इतिहास को अगर फ़ासिस्ट सात परतों के भीतर छिपा देना चाहते हैं तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है।

रेखा गुप्ता सरकार दिल्ली में मज़दूरों की बस्तियों पर बेरहमी से चला रही है बुलडोज़र!

पूँजीवाद में एक तरफ़ गाँव से शहरों की ओर प्रवास जारी रहता है और दूसरी तरफ़ शहर फैलते रहते हैं जिसमें शहरी “विकास” हर-हमेशा ग़रीबों की बस्तियों को उजाड़ने की क़ीमत पर किया जाता है। जो सीमित वैकल्पिक आवास मज़दूरों को मुहैया कराये जाते हैं वे मज़दूरों के रोज़गार के स्थान से दूर तथा अस्पताल, शिक्षा, पानी, बिजली जैसी सुविधाओं से रिक्त होते हैं। दिल्ली में बवाना और नरेला में झुग्गियों को उजाड़कर बसायी झुग्गी-झोंपड़ी क्लस्टर के मकान झुग्गियों से भी बदतर जीवन स्थिति देते हैं। झुग्गी-मुक्त शहर के दावे झूठे और बेमानी हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार ही भारत में 6.5 करोड़ झुग्गीवासी थे और क़रीब एक लाख झुग्गियाँ थीं। ये झुग्गियाँ पटरी किनारे, नाले किनारे या शहर के कोनों में बसी होती हैं जहाँ बिजली, पानी, सीवर, शौचालय, सड़क से लेकर साफ़-सफ़ाई की समस्या हमेशा रहती है। हालाँकि कई रिपोर्टें बताती हैं कि यह आँकड़ा सटीक नहीं था और असल संख्या 14-15 करोड़ है।

भाजपा के “रामराज्य” में बढ़ते स्त्री-विरोधी अपराध

फ़ासीवादी भाजपा के शासन में एक तरफ़ महिलाओं को ही सीमा में और संस्कार में रहने की हिदायत दी जाती है, महिलाओं के कपड़े पहनने, खाने, जीवनसाथी चुनने की आज़ादी पर हमला किया जाता है और दूसरी तरफ़ बलात्कारियों को खुली छूट मिलती है! जब ऐसी पार्टी सत्ता में होगी तो क्या नवधनाढ्य वर्गों, लम्पट टुटपुँजिया वर्गों और नेताओं की बिगड़ी औलादों का दुस्साहस नहीं बढ़ेगा कि वह किसी भी औरत पर हमला करे और उसका बलात्कार करे? जब इन आपराधिक तत्वों को यह यक़ीन है कि इन अपराधों की उसे कोई सज़ा नहीं मिलेगी, बस उसे भाजपा में शामिल हो जाने की आवश्यकता है, तो ज़ाहिर सी बात है कि स्त्री–विरोधी अपराधों में बढ़ोत्तरी तो होगी ही। शुचिता और संस्कार का ढोंग करने वाली फ़ासीवादी भाजपा के राज ने इस पतनशील और प्रतिक्रियावादी स्त्री-विरोधी मानसिकता को और मज़बूत किया है। भाजपा के गुरू गोलवलकर का मानना था कि औरतें बच्चा पैदा करने का यन्त्र होती हैं; इनके माफ़ीवीर सावरकर का मानना था कि बलात्कार का राजनीतिक हिंसा के उपकरण के तौर पर इस्तेमाल किया जाना चाहिए। यही इनकी असली जन्मकुण्डली है!

पहलगाम आतंकी हमला : कश्मीर में शान्ति स्थापना के दावे हुए हवा! सैलानियों और आम नागरिकों की सुरक्षा में चूक के लिए कौन है ज़िम्मेदार ?

कश्मीर दुनिया भर में सबसे ज़्यादा सैन्यकृत जगहों में से एक है। इसके बावजूद कैसे पुलवामा जैसी घटना हो जाती है जिसमें सीआरपीएफ़ के 40 जवान मारे गये थे? और अब कैसे पहलगाम जैसी घटना हो गयी, जिसमें 27 बेगुनाहों की जान चली गयी!? यदि इन हमलों के पीछे सचमुच पाकिस्तान का ही हाथ है तो सीमापार से घुसपैठ हो कैसे जाती है! मोदी सरकार ने अपना छप्पन इंची सीना फुलाकर नोटबन्दी के साथ “आतंकवाद की कमर तोड़नी” शुरू की थी, लेकिन उसके बाद भी “आतंकवाद की कमर टूटती” नज़र नहीं आ रही है। निश्चय ही जहाँ न्याय नहीं है वहाँ शान्ति नहीं हो सकती है।