Category Archives: फ़ासीवाद / साम्‍प्रदायिकता

“माओवाद” से लड़ने के नाम पर राजनीतिक कार्यकर्ताओं और आम आदिवासियों की न्यायेतर हत्याएँ बन्द करो

भारत की क्रान्तिकारी मज़दूर पार्टी (RWPI) मोदी सरकार द्वारा जारी सीपीआई (माओवादी) के नेतृत्व और आम कार्यकर्ताओं की हत्याओं की भर्त्सना करती है और माँग करती है कि इन तमाम हत्याओं की उच्च-स्तरीय न्यायिक जाँच हो। साथ ही ‘ऑपरेशन कगार’ समेत तमाम तथाकथित “उग्रवाद-विरोधी ऑपरेशनों” को तत्काल बन्द किया जाये। इसके अलावा मध्य भारत समेत पूरे भारत में लगाये जाने वाले आपवादिक क़ानूनों को तुरन्त भंग किया जाये।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का वहशी चेहरा एक बार फिर बेनक़ाब

इन मानवता के दुश्मनों  के लिए मानव शरीर केवल भोग की वस्तु हैं जिसे ये पशुवत भोग लेना चाहते हैं। गुजरात दंगों से लेकर मुज़फ्फ़रनगर दंगों तक, कठुआ से लेकर हाथरस तक में इन नरपशुओं की बर्बरता पूरी दुनिया ने देखी है। ये संघी वैम्पायर समाज में तो लूट, शोषण, बलात्कार जैसे बर्बरता को अंज़ाम देते ही हैं, अपने संगठन में  भी उन लोगों को अपने हवस का शिकार बनाते रहते हैं जो उनके कुकर्मों को सर झुका कर सह लेते  हैं और अन्दर ही अन्दर घुटते हुए अन्ततः जीवन ख़त्म करने की दिशा में आगे बढ़ जाते हैं। केरल की यह जुगुप्सा पैदा करने वाली घटना भी संघ परिवार की इसी असलियत को सामने लाती है और इनके असली “संस्कारों” की कलई खोल देती है।

करोड़ों मज़दूरों-कर्मचारियों पर क़हर बरपाने वाले चार लेबर कोड लागू हुए! इन काले क़ानूनों के खिलाफ़ मज़दूर वर्ग को लम्बी व जुझारू लड़ाई की तैयारी करनी होगी!

‘औद्योगिक सम्बन्ध संहिता’ को इसलिए तैयार किया गया है कि मालिकों को बिना किसी नोटिस या जवाबदेही के मज़दूरों को काम से निकालने का रास्ता साफ़ हो जाये। यानी रोज़गार की सुरक्षा के प्रति मालिक की सारी क़ानूनी ज़िम्मेदारी को ख़त्म करने का रास्ता खोल दिया गया है; जब चाहे मज़दूरों को काम पर रखो और जब चाहे उन्हें निकाल बाहर करो! पूँजीपति वर्ग बहुत समय से यह “आज़ादी” माँग रहा था। यह संहिता लागू होने का मतलब यह होगा कि किसी भी मज़दूर के लिए स्थायी नौकरी का सपना देखना भी असम्भव हो जायेगा। साथ ही जिन कारख़ानों में 300 तक मज़दूर हैं, उन्हें ‘लेऑफ़’ या छँटनी करने के लिए सरकार की इजाज़त लेने की अब ज़रूरत नहीं होगी (पहले यह संख्या 100 थी)। मैनेजमेंट को 60 दिन का नोटिस दिये बिना मज़दूर हड़ताल पर नहीं जा सकते। अगर किसी औद्योगिक न्यायाधिकरण में उनके मामले की सुनवाई हो रही है, तो फ़ैसला आने तक मज़दूर हड़ताल नहीं कर सकते। इन बदलावों का सीधा मतलब है कि कारख़ानों में हड़ताल लगभग असम्भव हो जायेगी क्योंकि अगर 300 मज़दूरों से कम हैं (जो काग़ज़ पर दिखाना बिल्कुल आसान है), तो कम्पनी हड़ताल के नोटिस की 60 दिनों की अवधि में आसानी से छँटनी करके नये लोगों की भरती कर सकती है।

वोटचोरी : फ़ासीवाद की प्रयोगशाला से निकला सत्ता हथियाने का नया हथकण्डा!

आज की तारीख़ में जनता को उनके वास्तविक मुद्दों पर संगठित कर सड़कों पर उतरने का माद्दा किसी भी चुनावबाज़ पार्टी  में नहीं है। ये तमाम पार्टियाँ असल में पूँजीपति वर्ग के ही विभिन्न धड़ों की नुमाइन्दगी करती हैं। इसलिए इनसे ज़्यादा उम्मीद करना ही बेमानी है। आज मतदान के राजनीतिक जनवादी अधिकार पर हो रहे फ़ासीवादी हमले के विरुद्ध भी क्रान्तिकारी शक्तियों को आम जनता को गोलबन्द और संगठित करना होगा, राजनीतिक जनवाद के अधिकार की हिफ़ाज़त के इस मुद्दे को भी अपने हाथों में लेना होगा और इसके लिए एक जनान्दोलन खड़ा करना होगा। जनता के मताधिकार की रक्षा के लिए खड़ा हुआ आन्दोलन देश में फ़ासीवाद-विरोधी संघर्ष की अहम कड़ी होगी।

आरएसएस के 100 साल – संघ की सच्चाई और देश के मेहनतकशों से ग़द्दारी की दास्तान

आजादी की लड़ाई और आरएसएस का क्या सम्बन्ध है? कुछ नहीं! आइए देखते हैं। 1925 में विजयदशमी के दिन संघ की स्थापना होती है। अपनी स्थापना से लेकर 1947 तक संघ ने अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ किसी लड़ाई में कोई हिस्सा नहीं लिया। इतना ही नहीं अंग्रेज़ों को कई माफ़ीनामे भी लिखे और अंग्रेज़ी हुकूमत के प्रति वफ़ादार रहते हुए किसी भी आन्दोलन में शामिल नहीं होने का वादा तक किया। इसके साथ ही जो नौजवान आज़ादी की लड़ाई में शामिल होना चाहते थे उन्हें शामिल होने से भी रोका। इस बात की पुष्टि के लिए हम कुछ उदाहरण देख सकते हैं।

फ़ासिस्ट भाजपा और संघ के साम्प्रदायिक एजेण्डा और अम्बेडकर अस्पताल की आपराधिक लापरवाही के कारण नौजवान की मौत

इस घटना से यह बात स्पष्ट है। “हिन्दू हितैषी” होने का दावा करने वाली फ़ासीवादी भाजपा सरकार में एक “हिन्दू” बच्चा इलाज के बिना तड़प-तड़पकर अपना दम तोड़ देता है लेकिन ये सरकार उसको इलाज तक मुहैया नहीं कराती! कोई विधायक या सांसद इलाक़े में झाँकने तक नहीं आते हैं! साफ़ है कि आरएसएस और भाजपा हिन्दू धर्म का हवाला देकर सिर्फ़ और सिर्फ़ हमारा फ़ायदा उठाना चाहते हैं, धर्म के नाम पर हमें बाँटना चाहती है और आम मेहनतकश आबादी के युवाओं को अपनी साम्प्रदायिक फ़ासीवादी राजनीति का एक मोहरा बनाना चाहती है। हमारे इलाक़े में आरएसएस अपने साम्प्रदायिक ऐजेण्डे को पूरा करने के लिए ऐसे कार्यक्रम आयोजित करवाता रहता है, हमें “धर्म” और “राष्ट्र” की पट्टी पढ़ाता है। लेकिन साम्प्रदायिक फ़ासीवादी “राष्ट्र” ग़रीब मेहनतकशों की जगह क्या है, वह तमाम घटनाओं से रोज़-ब-रोज़ ज़ाहिर होता ही रहता है और इस घटना से भी ज़ाहिर हो गया।

‘आई लव मुहम्मद’ विवाद और उसका फ़ासीवादी साम्प्रदायिक इस्तेमाल

कानपुर में मुस्लिमों पर एकतरफ़ा कार्यवाई के बाद पुलिस ने सफ़ाई देते हुए कहा कि यह कार्यवाई ‘आई लव मुहम्मद’ पर नहीं बल्कि नई परम्परा शुरू करने और माहौल ख़राब करने के लिए की गयी है।  लेकिन सवाल यह है कि माहौल ख़राब करने में हिन्दू संगठन के लोग भी ज़िम्मेदार थे लेकिन उन पर कोई कार्यवाई क्यों नहीं हुई? अपनी धार्मिक आस्था के अनुसार पोस्ट डालना कैसे गुनाह हो गया? बजरंग दल से लेकर कई कट्टरपंथी हिन्दू संगठनों ने ‘आई लव महादेव’ से लेकर ‘आई लव योगी’ तक के पोस्टर, बैनर लगाये और सोशल मीडिया पर पोस्ट डाली। लेकिन तब इस “नई परम्परा” पर कोई कार्यवाई नहीं हुई। सोशल मीडिया पर मुस्लिम-विरोधी साम्प्रदायिक पोस्ट की बाढ़ आ गयी लेकिन इस पर भी कोई कार्यवाई नहीं हुई। हाथरस में एक प्रदर्शन में तो ‘आई लव यूपी पुलिस’, ‘आई लव योगी’ और ‘आई लव महादेव’ के बैनर लेकर लोग नारे लगा रहे थे- ‘यूपी पुलिस तुम लट्ठ बजाओ, हम तुम्हारे साथ हैं’! क्या इससे माहौल ख़राब नहीं होता?

योगी-राज में उत्तर प्रदेश में जातिवादी गुण्डों का कहर

आज देश में होने वाली जातिगत उत्पीड़न की घटनाओं में उत्तर-प्रदेश पहले नम्बर पर आता है। इस बात से समझा जा सकता है कि जातिवादी गुण्डों और अपराधियों के मन में कानून का डर बैठा है या संरक्षण पाने का विश्वास! ‘राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो’ के 2022 के आँकड़ों के अनुसार यूपी में दलितों के ख़िलाफ़ अपराध के 15,368 मामले दर्ज हुए जो देश में कुल दलित-विरोधी अपराधों का 26.7% है। वहीं इन घटनाओं में 2021 की तुलना में 16% की वृद्धि हुई है। शायद जातिगत उत्पीड़न में उत्तर प्रदेश के प्रथम स्थान और वृद्धि को ही देखकर नरेन्द्र मोदी ने कहा था कि ‘योगी का कानून व्यवस्था मॉडल देश के लिए उदाहरण है।’ इसी मॉडल को राजस्थान और मध्य-प्रदेश की भाजपा सरकारों ने अपना लिया है, तभी तो ये राज्य दलितों के ख़िलाफ़ अपराध के मामले में दूसरे और तीसरे नम्बर पर हैं।

पेट्रोल में इथेनॉल की मिलावट के नाम पर भाजपा ने दिया एक और “राष्ट्रवादी” लूट को अंजाम!

निखिल गडकरी की कम्पनी ‘सी.आई.ए.एन एग्रो’ ने 2024 में इथेनॉल सेक्टर में क़दम रखा। इससे पहले यह मसाला और खाने के तेल बेचने वाली कम्पनी थी। 2024 में कम्पनी का टर्नओवर 171 करोड़ था, जोकि 2025 में बढ़कर 1029 करोड़ हो गया। इस कम्पनी के शेयर की क़ीमत जनवरी, 2025 में 41 रुपये थी, जो कि अब बढ़कर 850 रुपये से अधिक हो गयी है यानी इनकी क़ीमतों में 552 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। सिर्फ़ एक साल में यह कम्पनी इथेनॉल उत्पादन में देश की सबसे बड़ी कम्पनी बन चुकी है। यही है भाजपा के नेता-मन्त्रियों की “राष्ट्रवादी” लूट!

एसआईआर के फ़र्जीवाड़े से लाखों प्रवासी मज़दूरों, मेहनतकशों, स्त्रियों, अल्पसंख्यकों के मताधिकार के हनन के बीच बिहार विधानसभा चुनाव – जनता के सामने क्या है विकल्प?

दूसरी ख़ास बात जिस पर ध्यान दिया जाना चाहिए वह यह है कि एसआईआर के ज़रिये मोदी-शाह जोड़ी ने वास्तव में वह काम करने का प्रयास किया है जो जनता के जुझारू आन्दोलनों के कारण वे देश में राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) और नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के ज़रिये नहीं कर पायी थी। वास्तव में, चुनाव आयोग को नागरिकता की वैधता जाँचने, उसे क़ायम रखने या रद्द करने का कोई अधिकार नहीं है। 2003 एसआईआर के दिशा-निर्देश स्पष्ट शब्दों में यह बात कहते हैं कि नागरिकता निर्धारित करने का अधिकार सिर्फ़ गृह मन्त्रालय को है। शाह का गृह मन्त्रालय देशव्यापी जनविरोध के कारण देश के पैमाने पर एनआरसी नहीं करवा सका, तो अब यह काम चोर-दरवाज़े से एसआईआर के ज़रिये करवाया जा रहा है। यही कारण है कि जब सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने वाले पक्षों ने 2003 के दिशा-निर्देशों को ज़ाहिर करने की बात की तो केचुआ ने कहा कि उसको वह दिशा-निर्देशों वाली फ़ाइल नहीं मिल रही है! यह भी मोदी-राज की एक ख़ासियत है! वही फ़ाइलें मिलती हैं जिसका फ़ायदा मोदी-शाह उठा सकते हैं! बाक़ी या तो ग़ायब हो जाती हैं, या फिर जल जाती हैं!