Category Archives: शिक्षा और रोज़गार

शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफ़े की माँग को लेकर दिल्ली के जन्तर-मन्तर पर छात्रों-युवाओं का विरोध प्रदर्शन

सीबीएसई द्वारा एक कम्पनी को फ़ायदा पहुँचाने के लिए छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ किया गया। इन दिनों विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं के पेपर लीक, धाँधली और घपलेबाजी को लेकर छात्र-युवा आबादी के बीच गहरा आक्रोश व्याप्त है। लगातार बढ़ते आक्रोश के बीच 6 जून को दिल्ली में जन्तर-मन्तर पर सीजेपी ने अपना पहला प्रदर्शन किया था। इसके बाद सीजेपी के द्वारा लखनऊ और पुणे में भी प्रदर्शन किया गया था। जन्तर-मन्तर पर अभी जारी प्रदर्शन दिल्ली में सीजेपी का दूसरा प्रदर्शन है। सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दिपके ने छात्र-युवा आबादी को अपनी पीड़ा व्यक्त करने का और संघर्ष का एक चैनल मुहैया कराया जो निश्चित तौर पर एक प्रशंसनीय काम है। सीजेपी से पहले हुए के प्रदर्शनों में भी धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफ़े की माँग को उठाया जाता रहा है।

“आँकड़े छिपाओ, बेरोज़गारी भगाओ!” बेरोज़गारी से लड़ने का मोदी सरकार का नायाब नुस्ख़ा

ज्ञात हो कि भारत की लगभग 93% कार्यशक्ति असंगठित क्षेत्र में काम करती है, लेकिन इस सरकारी सर्वेक्षण में उनके काम करने की स्थिति, काम के घण्टे, औसत मज़दूरी या वेतन और काम की प्रकृति का कोई आँकड़ा मौजूद नहीं। सरकार के लिए अनौपचारिक क्षेत्र में काम करने वाली आबादी का अस्तित्व ही नहीं है! सरकार द्वारा मान्य रोज़गार की परिभाषा के अनुसार अनौपचारिक क्षेत्र के दिहाड़ी, ठेका व कैजुअल मज़दूरों की एक बड़ी संख्या, जिनके पास कोई रोज़गार सुरक्षा नहीं है, को भी रोज़गारशुदा क़रार दे दी गया है। वहीँ दूसरी ओर 2025 के सर्वेक्षण में श्रमशक्ति भागीदारी दर (LFPR)  में जिस बढ़ोतरी को दिखाया गया है, उसका मुख्य कारण तथाकथित स्वरोज़गार में हुई वृद्धि है। लेकिन इन स्वरोज़गार करने वालों की स्थिति क्या है? यदि कोई व्यक्ति ढंग का रोज़गार न मिलने की सूरत में कहीं ठेला लगाकर या चाय स्टॉल लगाकर या फ़िर ई-रिक्शा/ऑटो चलाकर मुश्किल से अपनी रोज़ी कमा रहा है, या कोई छोटी जोत का ग़रीब किसान, जिसकी जोत से उसके खाने-पीने व दवा-इलाज का बुनियादी ख़र्च भी मुश्किल से जुट पा रहा हो, तो ऐसे तमाम व्यक्तियों को स्वरोज़गार के नाम पर रोज़गारशुदा मानना कितना वाजिब है?! जिनको नौकरी नहीं मिलती, वे सारे लोग आत्महत्या थोड़े ही कर लेते हैं! वे तथाकथित स्वरोज़गार कर किसी तरह से भुखमरी रेखा पर जीवित रहते हैं और मानवीयता से रिक्त पाशविक जीवन जीने को मजबूर होते हैं।

कॉकरोच जनता पार्टी और उसकी लोकप्रियता : भारतीय जनता में व्‍यवस्‍था और मौजूदा सरकार के प्रति बढ़ते गुस्‍से व असन्‍तोष और साथ ही विकल्‍पहीनता की अभिव्‍यक्ति 

कॉकरोच जनता पार्टी की अचानक बढ़ी भारी लोकप्रियता के पीछे मुख्‍य कारण यह है कि हमारे देश का शासक वर्ग, उसकी राज्‍यसत्‍ता और उसके विभिन्‍न अंग-उपांग मेहनतकश जनता की तक़लीफ़ों के प्रति आश्‍चर्यजनक असंवेदनशीलता दिखा रहे हैं और उनका रवैया काफ़ी हद तक पुराने फ्रांस की रानी मैरी एन्‍त्‍वानेत जैसा हो चुका है जिसने पूछा था कि “अगर जनता के पास खाने के लिए रोटी नहीं है, तो वह केक क्‍यों नहीं खा लेती?” उसी प्रकार, भूख और कुपोषण की कगार पर खड़ी भारी बहुसंख्‍यक मेहनतकश और आम मध्‍यवर्गीय आबादी को बताया जा रहा है कि “सब चंगा सी”, “मेलोडी खाओ खुद जान जाओ”, “देश शान्ति और विकास के पथ पर अग्रसर है”, आदि। वहीं दूसरी ओर, खाता-पीता उच्‍च मध्‍य वर्ग और उच्‍च वर्ग नशे में बुरी तरह से टल्‍ली है। यह नशा है उपभोक्‍तावाद, खाऊ-पियू-अघाऊ संस्‍कृति का जिसमें चूर यह वर्ग निरन्‍तर “खाओ-पियो-ऐश करो मितराँ” गाने पर उन्‍मादी नृत्‍य करता रहता है। उसे न सिर्फ़ सुई से लेकर जहाज़ तक बनाने वाली और हर सेवा पैदा करने वाली जनता के दुख-दर्द से कोई लेना-देना नहीं है, बल्कि वह उसकी खिल्‍ली भी उड़ाता है। प्राचुर्य और धनाढ्यता का उसका यह अश्‍लील प्रदर्शन भी आँसुओं के समन्‍दर में खड़ी मेहनतकश जनता के धैर्य को परख रहा है।

बारह साल, जनता बेहाल – टूटे सपनों का अम्बार! कौन है इसका ज़िम्मेदार ?

एक ऐसे समय में जब जनता कमरतोड़ महँगाई और विकराल बेरोज़गारी की मार झेल रही है, जब देश के छात्र-युवा बरबाद होती शिक्षा व परीक्षा व्यवस्था का नतीजा भुगत रहे हैं, जब देश के अल्पसंख्यक, विशेष तौर पर, मुसलमान साम्प्रदायिक तनाव और विषवमन के शिकार बन रहे हैं, जब स्त्री-विरोधी व दलित-विरोधी अपराध अपने चरम पर हैं, जब देश के ग़रीब छोटे किसान हर रोज़ तबाह हो रहे हैं और आत्महत्याएँ कर रहे हैं, उस समय नरेन्द्र मोदी के प्रधानमन्त्रित्व के 12 साल पूरे होने का भाजपा द्वारा मनाया जा रहा यह जश्न जनता के दुख-दर्द के साथ क्या एक भद्दा मज़ाक और राजनीतिक अश्लीलता की पराकाष्ठा नहीं है?

दिल्‍ली एनसीआर में जायज़ माँगों को लेकर जारी मज़दूर आन्‍दोलन को सही दिशा देने के वास्‍ते 𝐓𝐨 𝐭𝐚𝐤𝐞 𝐭𝐡𝐞 𝐨𝐧𝐠𝐨𝐢𝐧𝐠 𝐰𝐨𝐫𝐤𝐞𝐫𝐬’ 𝐦𝐨𝐯𝐞𝐦𝐞𝐧𝐭 𝐢𝐧 𝐃𝐞𝐥𝐡𝐢-𝐍𝐂𝐑 𝐢𝐧 𝐭𝐡𝐞 𝐜𝐨𝐫𝐫𝐞𝐜𝐭 𝐝𝐢𝐫𝐞𝐜𝐭𝐢𝐨𝐧

हर जगह असंगठित मज़दूरों को अपनी यूनियनें संगठित करनी होंगी ताकि भविष्‍य में भी वे अपनी जायज़ माँगों को लेकर अनुशासित, व्‍यवस्थित व संगठित तौर पर संघर्ष कर सकें। मालिकान-प्रबन्‍धन व उनकी सरकारें आपसे ज्‍़यादा बड़ी नहीं हैं, बल्कि आपसे ज्‍़यादा संगठित हैं। आपका असंगठित होना ही उनके लिए सबसे बड़ा वरदान है। कारखाना मालिकों के संघ व संगठन होते हैं, जिसमें आपसी प्रतिस्‍पर्द्धा के बावजूद, मज़दूर वर्ग के विरुद्ध वे संगठित होते हैं। उनके ये संगठन और संघ ही मालिकान के हितों को सरकारों तक पहुँचाते हैं और चूँकि तमाम पार्टियों की सरकारें इसी मालिक वर्ग की मैनेजिंग कमेटी का काम करती हैं, इसलिए वे उनके हितों के अनुसार ही नीतियाँ बनाती हैं और कार्रवाई करती हैं। उनकी संगठित शक्ति द्वारा शोषण व उत्‍पीड़न का मुक़ाबला मज़दूर वर्ग केवल संगठ‍ित होकर ही कर सकता है। इसलिए आज ही समस्‍त असंगठित मज़दूरों को अपनी यूनियनों का गठन करने का प्रयास करना होगा। तभी हम अपने जायज़, क़ानूनी और संवैधानिक नागरिक व जनवादी अधिकारों के लिए संघर्ष कर सकते हैं।

मज़दूर कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी के ख़ि‍लाफ़ गोरखपुर में प्रदर्शन

देश भर में हो रहे मज़दूर आंदोलन ने फ़ासीवाद के असली चेहरे को बेनक़ाब कर दिया है। पूंजीपतियों के इशारे पर उत्तर प्रदेश की फ़ासीवादी योगी सरकार मज़दूर आंदोलन का बर्बर दमन करने पर उतारू है। स्थिति इतनी भयानक है कि आन्दोलन के बाद घर जा रहे साथी रूपेश, आकृति, सृष्टि और मनीषा के साथ उत्तर प्रदेश पुलिस ने बोटेनिकल गार्डन मेट्रो स्टेशन पर सीसीटीवी कैमरे के सामने मारपीट की और जबरन उत्तर प्रदेश पुलिस की गाड़ी में बैठा कर लेकर चली गई। इन्होंने महिला साथियों के साथ पुरुष पुलिसकर्मियों के साथ भी मारपीट की और उनको अगवा कर ले गए। 24 घण्टे बीत जाने के बाद भी अभी तक कार्यकर्ताओं को कहांँ रखा गया है नहीं मालूम चल पा रहा है।

Protest in Visakhapatnam opposing the arrest of Mazdoor Bigul activists

The police targeted Mazdoor Bigul activists who have been active in the strike, and forcibly picked them up from a metro station on Saturday evening while they were returning from the protest. Three women activists were detained without the presence of women police officers. Since last night, other activists have been waiting at the police station and demanding information, but the police haven’t given a shred of informationa—neither have they revealed their whereabouts nor have they released them.