विशाखापट्टनम स्टील प्लाण्ट से लेकर सूरत के सेप्टिक टैंक तक कार्यस्थल पर मज़दूरों की मौतों का सिलसिला बदस्तूर जारी है!
इन दर्दनाक मौतों के लिए इस देश का हुक्मरान तबक़ा ज़िम्मेदार है!

आनन्द

पिछले कुछ दिनों के दौरान देश में कई औद्योगिक हादसे हुए जिनमें दो विशेष तौर पर दिल दहलाने वाले हैं। गत 7 जून को अरब सागर के तट के निकट स्थित गुजरात के सूरत शहर की एक आभूषण बनाने वाली फ़ैक्ट्री के सेप्टिक टैंक की सफ़ाई करने उतरे 4 मज़दूरों की ज़हरीली गैस की चपेट में आने से मौत हो गयी। अभी यह ख़ौफ़नाक ख़बर सुर्खियों से गयी नहीं थी कि अगले ही दिन बंगाल की खाड़ी के तट पर स्थित आन्ध्र प्रदेश के विशाखापट्टनम शहर के प्रसिद्ध स्टील प्लाण्ट में भयानक विस्फोट की त्रासद ख़बर आई जिसमें मज़दूरों पर 1600 डिग्री तापमान वाला पिघला हुआ लोहा गिर गया जिससे 9 मज़दूरों ने बेहद दर्दनाक हालत में दम तोड़ दिया और 5 मज़दूर गम्भीर रूप से झुलस गये। अरब सागर से बंगाल की खाड़ी तक और कश्मीर से कन्याकुमारी तक इस देश की फ़ैक्ट्रियों, सेप्टिक टैंकों, खानों-खदानों, और खेत-खलिहानों में करोड़ों मज़दूर दिन-रात खटते हैं जिसकी बदौलत ही इस देश का वजूद है। लेकिन बदले में मज़दूरों को क्या मिलता है? मुफ़लिसी की ज़िन्दगी या फिर दर्दनाक दमघोंटू मौत!

हर बार की ही तरह शासक-प्रशासक तबक़े ने विशाखापट्टनम और सूरत की घटनाओं को दुर्भाग्यपूर्ण हादसा बताते हुए घड़ियाली आँसू बहाये तथा मृतकों के परिजनों को कुछ मुआवज़ा देने एवं दुर्घटनाओं की जाँच का वायदा किया। हमसे यह अपेक्षा की जाती है कि हम यह मान लें कि ये हादसे क़ुदरती आपदाओं की तरह हैं जिनपर हमारा कोई नियंत्रण नहीं है। लेकिन क्या वाक़ई ऐसे हादसों को रोका नहीं जा सकता है? आइए देखते हैं।

विशाखापट्टनम स्टील प्लाण्ट का नाम राष्ट्रीय इस्पात निगम है जो राष्ट्र के विकास का स्तम्भ माना जाता है। परन्तु राष्ट्र के इस पूँजीवादी विकास की प्रक्रिया में ज्वालामुखी के लावे जैसा खौलता लोहे से मज़दूरों के शरीर जलकर राख हो जाता है। ज़ाहिरा तौर पर यह ज्वालामुखी जैसी क़ुदरती परिघटना नहीं है। किसी भी संवेदनशील इन्सान की रूह को झकझोर देने वाले इस ख़ौफ़नाक वाक़ये के लिए क़ुदरत नहीं बल्कि पूँजीवादी विकास का वह मॉडल ज़िम्मेदार है जिसमें मज़दूरों की स्थिति मशीन के पुर्ज़े जैसी होती है। इसकी जवाबदेही केन्द्र सरकार और निगम के प्रबन्धन की बनती है जिन्होंने वर्षों से मज़दूरों की सुरक्षा के प्रति घोर उपेक्षापूर्ण रवैया अपनाया है। ग़ौरतलब है कि पिछले कई वर्षों से इस सरकारी स्टील प्लाण्ट को निजी हाथों में सौंपने की तैयारी चल रही है, हालाँकि प्लाण्ट में काम करने वाले मज़दूरों और कर्मचारियों के विरोध के चलते अभी तक निजीकरण की यह योजना अमल में नहीं लायी जा सकी है। पिछले कुछ वर्षों में प्लाण्ट में बड़े पैमाने पर छँटनी की गयी और बचे हुए मज़दूरों पर काम का बोझ बढ़ा है। नयी भर्तियाँ नहीं की जा रही हैं और लागत कम करने के नाम पर पुरानी पड़ गयी मशीनों की मरम्मत पर कोई ख़र्च नहीं किया जा रहा है। यानी मज़दूरों की सुरक्षा के इंतज़ाम पुख्ता करने के बजाय कार्यकुशलता बढ़ाने और लागत में कटौती के नाम पर उनकी ज़िन्दगी को और जोख़िम में डाला जा रहा है। ग़ौरतलब है कि किसी भी स्टील प्लाण्ट में अत्यधिक उच्च तापमान, प्रेशरयुक्त गैस, भारी उपकरण और ऊष्मीय ऊर्जा के विशाल भण्डारण की वजह से उसमें काम करने वाले मज़दूरों को बहुत जोख़िम उठाकर काम करना पड़ता है। ऐसे कार्यस्थल पर सुरक्षा के पुख्ता इन्तज़ाम होना और उनकी समीक्षा करते हुए उसे लगातार सुधारते रहना बेहद ज़रूरी हो जाता है। परन्तु विशाखापट्टनम प्लाण्ट में सुरक्षा के इन्तज़ामों की लम्बे समय से अनदेखी की जाती रही है। ग़ौरतलब है कि विशाखापट्टनम स्टील प्लाण्ट के मज़दूर लम्बे अरसे से सुरक्षा मानकों के उल्लंघन और मशीनों की मरम्मत न होने के मद्देनज़र प्रबन्धन को आगाह करते आए थे कि प्लाण्ट में कभी भी कोई भयंकर हादसा हो सकता है। परन्तु प्रबन्धन ने मज़दूरों व कर्मचारियों की इस चेतावनी को नज़रअन्दाज़ किया क्योंकि उसका मुख्य उद्देश्य लागत में कटौती करना और कार्यकुशलता बढ़ाना जो था। यही नहीं मज़दूरों व कर्मचारियों के एक प्रतिनिधिमण्डल ने पिछले साल विशाखापट्टनम के ज़िलाधिकारी से भी मुलाक़ात कर उन्हें प्लाण्ट में कार्यस्थल पर सुरक्षा सम्बन्धित गम्भीर चिन्ताओं से अवगत कराया था और सुरक्षा ऑडिट कराने की माँग भी की थी। परन्तु ज़िलाधिकारी की ओर से भी कोई कार्रवाई नहीं की गयी। मज़दूरों की सुरक्षा के प्रति लापरवाही और उदासीनता का एक बड़ा कारण यह भी है कि देश के अन्य कारख़ानों की ही तरह विशाखापट्टनम स्टील प्लाण्ट में भी ज़्यादातर काम ठेका मज़दूरों से कराया जाता है ताकि कम्पनी प्रबन्धन मज़दूरों की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी से पल्ला झाड़ सके और कम से कम लागत में ज्यादा से ज़्यादा काम कराया जा सके। ऐसे में स्पष्ट है कि 8 जून को प्लाण्ट में हुआ विस्फोट सीधे तौर पर प्रबन्धन व शासन-प्रशासन की लापरवाही और मज़दूरों की सुरक्षा के प्रति आपराधिक उपेक्षापूर्ण रवैया ज़िम्मेदार है।

जहाँ तक सूरत में हुए हादसे का सवाल है तो सबसे पहले तो यह अपने आप में इस देश के विकास का डंका पीटने वालों के लिए शर्मनाक बात है कि 21वीं सदी में भी यहाँ गटर और सेप्टिक टैंक की सफ़ाई मैनुअल तरीक़े से होती है। न सिर्फ़ विकसित देशों में बल्कि मलेशिया जैसे विकासशील और छोटे देश में भी यह काम बहुत पहले ही ऑटोमेट किया जा चुका है। भारत में हालाँकि मैनुअल स्केवेंजिंग क़ानूनन प्रतिन्धित है परन्तु फिर भी यह कुप्रथा अभी भी बदस्तूर जारी है। इसकी बड़ी वजह यहाँ की बर्बर जाति व्यवस्था है जिसकी वजह से भारत के पूँजीपति शासक वर्ग को बेहद सस्ते दाम पर इस तरह का काम करने वाले लोग आसानी से मिल जाते हैं। ग़ौरतलब है कि मैनुअल स्केवेंजिंग का काम ज़्यादातर दलित आबादी करती है। सेप्टिक टैंक की सफ़ाई में उतरने वाले मज़दूरों के लिए ज़हरीली गैसों की चपेट में आने का ख़तरा हमेशा बना रहता है। इसके बावजूद ऐसे मज़दूरों के लिए किसी भी प्रकार के सुरक्षा इन्तज़ाम नहीं किये जाते हैं। क़ायदे से ऐसे मज़दूरों के लिए साँस लेने के उपकरण, हार्नेस, सुचारु संचार व्यवस्था और स्टैण्डबाय आदि के बन्दोबस्त होने चाहिए; उसके बिना किसी को सेप्टिक टैंक में भेजना वास्तव में मौत के मुँह में ढकेलना है। हर साल ऐसे सैकड़ों सफ़ाई मज़दूरों की मौत होने के बावजूद इस व्यवस्था के बेरहम हुक़्मरानों के ज़ेहन में उनकी सुरक्षा के इन्तज़ाम करने का ख़्याल तक नहीं आता क्योंकि उन्हें पता है कि सुरक्षा के इन्तज़ाम का सिरदर्द लेने से उनके मुनाफ़े और विलासिता में कटौती हो जाएगी। सूरत में आभूषण बनाने वाली जिस फ़ैक्ट्री के सेप्टिक टैंक की सफ़ाई के दौरान 4 मज़दूरों की दमघोंटू मौत हुई उसके सेठ को अपने मुनाफ़े की सनक में मज़दूरों की सुरक्षा का ख़्याल भला कहाँ से आएगा।

सरकारी आँकड़ों के मुताबिक़ भारत में हर रोज़ कार्यस्थल पर हुई दुर्घटनाओं में 3 लोगों की मौत हो जाती है। हम सभी जानते हैं कि वास्तविक संख्या इससे कहीं ज़्यादा होगी। इसके बावजूद मज़दूरों की सुरक्षा कभी भी राष्ट्रीय चर्चा का विषय नहीं बनती। नवउदारवादी पूँजीवाद के इस दौर में मज़दूरों की सुरक्षा के प्रति उपेक्षा और लापरवाही लगातार बढ़ती गयी है। मुनाफ़े की नाली बेरोकटोक बहती रहे इसके लिए उसमें आने वाली बाधाओं को एक-एक करके हटाया जा रहा है। मज़दूरों के अधिकारों को लगातार छीना जा रहा है। ज़्यादातर काम ठेके पर कराये जा रहे हैं ताकि मज़दूरों की सुरक्षा के प्रति कोई जवाबदेही ही न रहे। हाल ही में लागू हुए 4 मज़दूर-विरोधी लेबर कोड में से एक मज़दूरों की पेशागत सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्यस्थितियों से सम्बन्धित है। इसके नाम से किसी को लग सकता है कि इसमें ज़्यादा से ज़्यादा फ़ैक्ट्रियों में काम की परिस्थितियों को ज़्यादा सुरक्षित करने की बात होगी। पर असलियत यह है कि इस कोड में फ़ैक्ट्री की परिभाषा को ही इस तरह बदल दिया गया है कि देश की क़रीब आधी फ़ैक्ट्रियों को सुरक्षा की जवाबदेही से ही छुटकारा मिल गया है। ऐसे में स्प्ष्ट है कि इस देश का बेशर्म और बेरहम हुक़्मरान तबक़ा विशाखापट्टनम और सूरत जैसे हादसों के लिए सीधे तौर पर ज़िम्मेदार है।

 

मज़दूर बिगुल, जून 2026